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30 अक्टूबर 2010

ये क्या है दोस्तों

Saturday, August 7, 2010

ये क्या है दोस्तों








शांक्सी चाइना
सभ्यता का एक पौराणिक केंद्र

Wednesday, July 28, 2010

खूबसूरती
























































































































Monday, July 19, 2010

आस्थाओं के बहाव से होती है भरपूर बारिश ?

बारिश नहीं हुई। ढोल धमाके और देवता मनाने का दौर प्रारंभ हुआ। पत्थर के बने भगवान् पानी मे डुबोये जाने लगे। गाँव वासियों ने शमशान मे हल चलाए । गधे पर बैठाकर गाँव भर मे सरपंच को घुमाया। ज़िंदा आदमी की शव यात्रा निकाली गई। मिटटी से मेंढक बनाकर मुकुट पहनाया, पालकी मे उसे बिठाकर यात्रा निकाली और
मेंढक राजा मेंढक दे
पानी की बरसात दे
के नारे लगाकर शहर भर मे घुमे । दरगाहों पर चादरे चढ़ी, ग्रन्थ साहिब का पाठ गुरुद्वारे मे हुआ चर्च मे प्रेयर की गई तो मंदिरों मे विविध धार्मिक आयोजन किये जाने लगे। सर्वधर्म प्रार्थना सभा का आयोजन भी हुआ। लोग शहर-गाँव छोड़ जंगल मे उजमनी मनाने यानी वहां जाकर भोजन बनाकर बारिश की दुआ करने लगे। मगर हाय रे बारिश ! होने का नाम ही नहीं लेती।
आज जब शहर गाँव छोड़ कर बाहर जंगल तलाशने पर पेड़ों का झुरमुट तक नजर नहीं आता और बारिश के प्रति हमारा स्वार्थ ? आस्थापरक? हम चाहते है बारिश हो बादल बरसे, चार महीने तक हमारे सर पर बने रहे। मगर हमारी करनी जो कहानी कहती है वो समस्त प्रकृति विरुद्ध ही है। हमें भूमि चाहिए मगर वृक्ष नहीं । हम खेती चाहते है , पानी चाहते है पर जंगल और जानवर नहीं ।
अब उजमानी की ही ले, रोज सवेरे बच्चो के लिए टिफिन तैयार होते हैं जिन्हें बच्चे सामूहिक रूप से रोज घर के बाहर जाकर खाते है, यह पूरे साल चलता है। अगर घर के बाहर जाकर भोजन सामूहिक रूप से करने से बारिश होती तो यह सारा देश रोज़ पानी की बरसात से लबरेज़ होता।
बारिश का एक पहलु यह भी है की वह अपने साथ विध्वंस भी लाती है। बाढ़ और सूखा उसके दो भिन्न पहलु हैं। जिन जगहों पर बारिश नहीं होती वहां के लोग बारिश होने की मन्नते करते हैं। जहां बाढ़ आ जाती वहां भगवान् से प्रार्थना की जाती है की कदापि धमाकेदार ना हो। अब भगवान् को यह समझ मे नहीं आता होगा की बारिश कहाँ करनी है और कहाँ नहीं । वे आखिर सुने तो किसकी ।
सन २००० से मध्य भारत के प्रान्त सूखे का सामना करते आ रहे हैं। मध्यप्रदेश मे जंगल लगातार कट रहे हैं बाघ की आबादी घट गई है, वृक्षों की लगातार बलि ली जा रही है। सड़कें फोरलेन होते ही जमीने महंगे दाम की हो गई। जमीनों का डायवर्शन होने लगा। सड़के बनाने के लिए किनारे लगे वृक्ष काट देने उपरान्त अब बीच मे बोगनवेलिया कनेर जैसी झाडीनुमा पौधे लगाए जाने लगे है और किनारों की सुध लेने की कोई कोशिश नहीं है ।
आज जब चिता की कीमत डेढ़गुना बढ़ गई है, महंगाई के नाम पर लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं ऐसे मे अजहर हाशमी साहब की कविता की पंक्तियाँ याद आती है जो पृथ्वी दिवस पर नईदुनिया अखबार मे छपी हैं, लिखते हैं :
बड़ी बड़ी बातों से
नहीं बचेगी धरती
वह बचेगी
छोटी-छोटी कोशिशों से
मगर हमारी मानसिकता का निरंतर छोटा प्रयास नहीं किया जा रहा है और वह प्रयास पौधों की परवरिश से सम्बंधित है.
चौथा स्तम्भ है कि वह लगातार यह बताता है की यह फोटो जिसमे पेड़ के ठूंठ नजर आ रहे हैं यह किस पेड़ के है, कब और कहाँ इन्हें काटा गया है। जिम्मेदार विभाग कौन है जिसके लापरवाह कर्मचारी हाथ पर हाथ धरे बैठे है। मगर यह कभी नहीं बताता की कहाँ पेड़ लगाए जा सकते हैं. उनकी सुचना ऐसी लगती है जैसे वे लक्कड़ चोरो से यारी किये बैठे है और उन्हें बताते रहते है कि और कहाँ कहाँ पर चोरी से लकडियाँ काटी जा सकती है. "जल ही जीवन है" का मन्त्र अब "जल ही जीवन के लिए आवश्यक उत्पाद है" मे बदल गया है. इसलिए कमर्शियल प्रयासों कि जरुरत है तुच्छ छोटे प्रयास करने के बजाय इश्वर आस्था पर निर्भर रहने कि जरूरत है । क्योंकी पानी मे आस्था का पत्थर डुबाने या अन्य टोटके की मानसिकता ही है जो मानसून के दिनों मे बरसात कराती है।

29 अक्टूबर 2010

ये समूह

मित्रो,

लिखते हुए, अक्सर किसी भाव या विचार को चुभलाते हुए, उसके स्वाद लायक़ उपयुक्त
शब्द की कमी हम सब ने महसूस की है, और ऐसा भी हुआ है कि शब्दकोश के पन्नो पर
फ़िसलती उंगलियाँ हमें सही अभिव्यक्ति तक ले जाने में असमर्थ हुई हैं। आभासी जगत
की इन नज़दीकियों ने जो हमें मौक़ा दिया है उसके ज़रिये हम एक-दूसरे को उसकी सही
अभिव्यक्ति तक पहुँचा सकते हैं।

ये समूह बस इसीलिए!

हिन्दी शब्दों के समान्तर अर्थ;
हिन्दी से उर्दू व उर्दू से हिन्दी में अर्थ;
अंग्रेज़ी से हिन्दी व हिन्दी से अंग्रेज़ी में अर्थ;
हिन्दी से अन्य भारतीय भाषाओं व अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अर्थ;
हिन्दी से अरबी-फ़ारसी व अरबी-फ़ारसी से हिन्दी में अर्थ
पर चर्चा का एक मंच।

28 अक्टूबर 2010

sms

आज दोपहर में मेरे मोबाईल पर एक कॉल आया, रिंग बजी मैने उठाया एक लड़की ने कहा कि आपने मुझे मेसेज क्यों भेजा? मैने कहा कि मेडम मैंने तो आपको कोई मेसेज नहीं भेजा, वो बोली आपने भेजा है, मैने कहा सच्ची नहीं भेजा, वो बोली मेरे मोबाईल में है मेसेज मैने कहां मेरे मोबाईल में तो आपका नम्बर ही नहीं है, पर वो थी की बहस पर बहस किये जा रही थी और कह रही थी की मेरे मोंबाईल में आपके द्वारा भेजे गये मेसेज है। मैंने सोचा मेरी कोई दोस्त होगी जो मजाक कर रही है। फिर थोड़ी देर में एक लड़के का कॉल आया उससे भी वैसी ही बहस हुई जैसी उस लड़की के साथ हुई थी। उसके बाद एक और लेडीज का कॉल आया उन्हे तो मैने पोलिस में जाने की धमकी भी दे दी, जवाब में उन्होने ने भी मुझे वैसी ही धमकी दी। अभी तक मेरे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर माजरा क्या है? क्यों लोग मेरे कभी कभार बजने वाले बेचारे गुपचुप मोबाईल को बजा बजाकर तंग कर रहे है। कहीं मेरे दोस्तो का कोई प्लान तो नहीं है? क्योंकि मैं बिना जाने पहचाने नम्बर्स के कॉल उठाता नहीं और मोबाईल से बात करना भी ज्यादा पसंद नहीं है, तो हो सकता है इसीलिए प्लान बनाया गया हो की आज इसे परेशान किया जाए?
    पर मेरा दिमाग तब ठनका जब देश के कुछ वीवीआईपी लोगो के कॉल भी मेरे मोबाईल पर आने लगे। अब तक तो मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे क्योंकि मेरे समझ आ चुका था कि आखिर माजरा क्या है। एक्चुअली आज सुबह-सुबह बॉस का फरमान आया की कोई ऐसा सॉफ्टवेयर या वेबसाईट ढूंण्डो जो फ्री में बल्क एसएमएस करता हो ताकि दीपावली की बधाई भेजी जा सके। मैने गूगल पे दे मारा सर्च अब दुनिया भर की वेबसाईटस और सॉफ्टवेयर्स पेज पर आ गये। अब मैं लगा सबको ट्राय करने। मेरी जानी पहचानी दो साईट्स sms-Gupshup गपसप और way2sms मुझे जंच गई क्योंकि इनका मैं पहले से ही मेंम्बर भी हूं। फिर मैं way2sms में ग्रूप एसएमएस ट्राय करने लगा। ये जांचने के लिए की एक साथ बहुत सारे एसएमएस जाते है की नही? मैने बॉस का मोबाईल लिया और सारे कांटेक्ट्स को सीएसवी फाईल फारमेट में बदलकर सीधे ही मेरी way2sms प्रोफाईल जो की मेरे मोबाईल नम्बर से रजिस्टर्ड थी में अपलोड कर दिया। उन कॉक्टेक्ट्स में पूरे देश विदेश के नेताओं, वीवीआईपी, वीआईपी, लोकल सारे के सारे नम्बर अपडेट हो गये।
    कांटेक्स अपलोडिंग के 5 मिनट में ही मेरी मुसिबत शुरू हो गई। सायद way2sms वेबसाईट से मेरे द्वारा जिन मोबाईल नम्बरो को मेरी प्रोफाईल में डाला गया उन्हे सूचना मेसेज गया होगा की उनका मोबाईल मेरी प्रोफाईल में एड किया गया है। उस मेसेज में मेरा नम्बर भी गया होगा। जिससे उन नम्बर वालो द्वारा मुझे वापस कॉल किया जा रहा था। चलों वैसे तो ये नेता और वीआईपी लोग सिर्फ भाषणों और फंक्सनों में ही सुने जाते है पर इसी बहाने मेरे मोबाईल ने भी इनकी आवाज सुनली।

काहे के लोक सेवक ??


फिलहाल यह कहना कठिन है कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा इकोनामी क्लास में हवाई सफर करने से उन केंद्रीय मंत्रियों को सही संदेश मिल गया होगा जो फिजूलखर्ची रोकने के कांग्रेस के अभियान को लेकर नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं। यदि सभी केंद्रीय मंत्री और विशेष रूप से कांग्रेस के मंत्री इकोनामी क्लास में हवाई सफर करना शुरू कर देते हैं तो भी इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि फिजूलखर्ची पर लगाम लग गई। यह समझ पाना कठिन है कि कांग्रेस किफायत बरतने के अपने अभियान को केवल अपने ही मंत्रियों और सांसदों तक क्यों सीमित रखना चाहती है? यदि मंत्रियों और सांसदों द्वारा फिजूलखर्ची की जा रही है तो फिर यह अभियान सभी पर लागू होना चाहिए और कम से कम उसका दायरा संप्रग तक तो जाना ही चाहिए। यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के मंत्री और सांसद अपने यात्रा खर्च को सीमित कर लेते हैं तो इसके जो भी नतीजे सामने आएंगे वे भी अत्यंत सीमित होंगे, क्योंकि फिजूलखर्ची केवल यात्राओं के दौरान ही नहीं होती। केंद्रीय मंत्रियों के यात्रा व्यय के अतिरिक्त अन्य अनेक खर्च ऐसे हैं जिनमें अच्छी-खासी धनराशि खर्च हो रही है। यदि केंद्रीय मंत्रियों के केवल यात्रा खर्च और अन्य खर्चो को शामिल कर लिया जाए तो यह राशि करीब दो सौ करोड़ रुपये पहुंच जाती है। यह खर्च किस तेजी से बढ़ता चला जा रहा है, इसका प्रमाण यह है कि वित्तीय वर्ष 2005-06 में वेतन और यात्रा खर्च और अन्य भत्तों में व्यय कुल राशि सौ करोड़ रुपये से भी कम थी।
यदि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता फिजूलखर्ची रोकने के प्रति वास्तव में गंभीर है तो उसे सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों में बुनियादी बदलाव करना होगा और साथ ही उन अनेक परंपराओं से पीछा छुड़ाना होगा जो एक लंबे अर्से से चली आ रही हैं। फिजूलखर्ची केवल मंत्रियों द्वारा ही नहीं, बल्कि शीर्ष नौकरशाहों द्वारा भी की जा रही है। नि:संदेह यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उच्च पदों पर बैठे नौकरशाह और नेतागण अपनी जीवनशैली को सामान्य व्यक्तियों की तरह ढाल लें, लेकिन यह भी नहीं होना चाहिए कि उनकी विशिष्टता राजसी ठाठ-बाट को मात देती नजर आए। यह भी विचित्र है कि फिजूलखर्ची रोकने का यह अभियान इस आधार पर शुरू किया गया है कि देश सूखे और मंदी का सामना कर रहा है। इस अभियान से तो यह प्रकट हो रहा है कि यदि सूखे और मंदी का दुर्योग एक साथ सामने नहीं आया होता तो कोई फिजूलखर्ची रोकने पर ध्यान नहीं देता। फिजूलखर्ची तो प्रत्येक परिस्थिति में रोकी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा न करने का अर्थ है संसाधनों की बर्बादी। एक ऐसे देश में जहां लगभग तीस प्रतिशत लोग भयावह निर्धनता से जूझ रहे हों वहां यह शोभा नहीं देता कि मंत्रीगण राजसी ठाठ-बाट में रहें। इससे भी अधिक अशोभनीय यह है कि जब इस ठाठ-बाट का उल्लेख किया जाए तो विरोध और नाराजगी के स्वर उभरें। इन स्वरों का उभरना यह बताता है कि हमारे आज के औसत राजनेता किस तरह अभी भी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। ऐसी मानसिकता वाले राजनेता उच्च पदों पर तो विराजमान हो सकते हैं, लेकिन उन्हें लोकसेवक नहीं कहा जा सकता।

25 अक्टूबर 2010

सुनियोजित अपराध की श्रेणी में शामिल हो मिलावटख़ोरी

जब सुनियोजित तरीके से किसी एक व्यक्ति की हत्या करने के आरोपी को सज़ा-ए-मौत या आजीवन कारावास जैसी सख्त सज़ा का सामना करना पड़ता है फिर मिठाई,जीवन रक्षक दवाईयां अथवा खाने-पीने की अन्य तमाम वस्तुओं में मिलावट करने वाले तथा इनमें ज़हरीली रासयानिक सामग्री मिलाकर सैकड़ों व हज़ारों लोगों की एक साथ सामूहिक हत्या का प्रयास करने वालों के विरुद्ध ऐसी ही सख्त सज़ा का प्रावधान क्यों नहीं है?
  भारत वर्ष को त्यौहारों व पर्वों का देश कहा जाता है। अपने सीमित संसाधनों में ही अनगिनत त्यौहारों के अवसर पर झूमने व खुशियां मनाने वाले भारतीय नागरिक इस विशाल देश के किसी न किसी क्षेत्र में किसी न किसी त्यौहार में अक्सर खुशियां मनाते देखे जा सकते हैं। ज़ाहिर है इन भारतीय त्यौहारों का खाने पीने, स्वादिष्ट व लज़ीज़ व्यंजनों खा़सतौर पर मिठाईयों से सीधा संबंध है। अत: अमीर भारतवासी से लेकर गरीब से गरीब व्यक्ति तक की यह कोशिश होती है कि वह त्यौहारों के अवसर पर अपने मित्रों,  रिश्ते-नातेदारों अथवा अपने परिवारवालों के लिए खाने हेतु किसी न किसी किस्म की मिठाई का तो अवश्य ही आदान प्रदान करे। गोया हम कह सकते हैं कि भारतीय समाज में मिठाई को त्यौहारों के शगुन के रूप में  स्वीकार कर लिया  गया है।
   परंतु हमारे ही देश में  हरामख़ोरी की कमाई का आदी हो चुका एक तीसरे दर्जे का गिरा हुआ वर्ग ऐसा भी है जिसे अपने चंद पैसों की कमाई की खातिर त्यौहारों में खुशियां मनाते व झूमते गाते आम लोगों की खुशी संभवत: सहन नहीं होती। और यह बेशर्म तबक़ा आम लोगों की खुशियों में रंग में भंग डालने का काम करता है। बजाए इसके कि यह वर्ग आम लोगों की खुशी में शरीक हो कर खुद भी खुशियां मनाए तथा आम लोगों को भी प्रोत्साहित करे। परंतु ठीक इसके विपरीत यह हरामख़ोर वर्ग आम लोगों को मिठाईयों के नाम पर ज़हर बेचने का काम करता है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी त्यौहारों के इन दिनों में देश में चारों तरफ से मिलावटी, सड़ी गली, बदबूदार, ज़हरीली तथा रासायनिक पद्धति से तैयार की गई मिठाइयों की बरामदगी के अफसोसनाक समाचार प्राप्त हो रहे हैं। जोधपुर,बीकानेर,चंडीगढ़,दिल्ली व कानपुर जैसे बड़े शहरों से लेकर अंबाला जैसे छोटे शहरों तक से प्रदूषित व ज़हरीली मिष्ठान सामग्री के बरामद होने के समाचार निरंतर प्राप्त हो रहे हैं।
   समाचार पत्रों व विभिन्न टीवी चैनल्स के माध्यम से यह बार बार चेतावनी दी जा रही है कि ऐसी मिलावटी,ज़हरीली व रासायनिक पद्धतियों से तैयार मिष्ठान सामग्रियों के सेवन से आम आदमी के स्वास्थय पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। स्वास्थय विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी मिलावटी मिठाईयां दिल की बीमारी,रक्तचाप,कैंसर,पीलिया,अलसर तथा चमड़ी रोग जैसी तमाम जानलेवा बीमारियों के द्वार तक पहुंचा देती हैं। परिणाम स्वरूप जाने अनजाने में तमाम लोग इन्हीं मिठाईयों के सेवन से मौत के मुंह तक पहुंच जाते हैं। परंतु मिलावट खोरी के इस कारोबार से जुड़े तथा ऐसी कमाई के आदी हो चुके व्यापारी इन सब बातों की परवाह किए बिना अपने इस काले कारोबार को पूर्ववत् जारी रखते हैं। और यदि कभी इत्तेफाक से कोई मिलावटखोर कहीं पकड़ा भी जाता है तो आम लोगों की जान से खेलने वाला वह व्यक्ति भारतीय कानून के अंतर्गत होने वाली नर्म व लचीली कार्रवाई का सामना करते हुए जल्द ही सलाखों से बाहर आ जाता है। बाद में वही अपराधी अपने उसी हौसले के साथ फिर मिलावटखोरी के काम में जुट जाता है। इस प्रकार कम लागत में अधिक पैसे कमाने का आदी हो चुका यह वर्ग आम लोगों की जान से निरंतर खिलवाड़ करने से हरगिज़ नहीं चूकता।
  सवाल यह है कि भारतीय समाज को ऐसे कलंकों से कभी मुक्ति मिलेगी भी या नहीं और यदि मिलेगी तो उसके उपाय क्या हो सकते हैं? भारतीय न्यायालयों में हत्या व हत्या के प्रयास को लेकर चलने वाले मुकद्दमों में आमतौर पर माननीय न्यायाधीश गवाहों के बयान व साक्ष्यों के आधार पर जहां यह जानने की कोशिश करते हैं कि अमुक व्यक्ति की हत्या या हत्या का प्रयास आरोपी व्यक्ति द्वारा अंजाम दिया गया है या नहीं। वहीं माननीय अदालतें मुकद्दमे के दौरान यह पता लगाने की भी पूरी कोशिश करती हैं कि आखिर जुर्म को अंजाम देने का कारण क्या था। अर्थात् जुर्म जानबूझ कर किया गया है या परिस्थितियों वश हो गया। और इन सभी नतीजों पर पहुंचने के बाद अदालतें  जुर्म की उसी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए दोषी को सज़ा सुनाती हैं। उस आरोपी को सबसे अधिक व सख्त सज़ा सुनाई जाती है जिसने जानबूझ कर तथा सुनियोजित ढंग से किसी अपराध को अंजाम दिया हो। यहां गौरतलब है कि किसी एक व्यक्ति की हत्या जैसे सुनियोजित षड्यंत्र रचने वाले अपराधी को फांसी या आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई जाती है।
  ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सुनियोजित तरीके से किसी एक व्यक्ति की हत्या करने के आरोपी को सज़ा-ए-मौत या आजीवन कारावास जैसी सख्त सज़ा का सामना करना पड़ता है फिर मिठाई,जीवन रक्षक दवाईयां अथवा खाने-पीने की अन्य तमाम वस्तुओं में मिलावट करने वाले तथा इनमें ज़हरीली रासयानिक सामग्री मिलाकर सैकड़ों व हज़ारों लोगों की एक साथ सामूहिक हत्या का प्रयास करने वालों के विरुद्ध ऐसी ही सख्त सज़ा का प्रावधान क्यों नहीं है? ज़ाहिर है इस प्रकार की मिलावटखोरी करने का इनका मकसद कम से कम लागत में ज्य़ादा से ज्य़ादा पैसे कमाना ही होता है। और अपने इस एक सूत्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह मिलावटखोर  व्यापारी प्रत्येक स्तर पर मिलावटखोरी को अंजाम देते हैं। यह भली भांति जानते हैं कि ऐसी मिठाईयों अथवा अन्य खाद्य सामग्रियों के खाने से स्वास्थय पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ेगा। परंतु मात्र धन कमाने की चाहत में यह वर्ग समाज को सामूहिक रूप से स्वास्थ्य क्षति पहुंचाने से कतई नहीं हिचकिचाता। अत: आम लोगों को ऐसी ज़हरीली व प्रदूषित खाद्य सामग्री बेचकर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा जानबूझ कर रचे जाने वाले षड्यंत्र का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।
  आज हम अपने ही समाज के बीच स्वास्थय संबंधी तरह-तरह की ऐसी समस्याएं देख रहे हैं जो प्राय: हमें हैरान कर देती हैं। उदाहरण के तौर पर छोटे बच्चों को दिल का दौरा पडऩे लगा है। कम उम्र में लोग पीलिया के शिकार हो रहे हैं। छोटी उम्र में ही कैंसर व अलसर जैसी बीमारियों के लक्षण पाए जा रहे हें। चर्म संबंधी रोगियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। समय पूर्व लोगों की आंखें कमज़ोर हो रही हैं तथा दांतों पर प्रभाव पड़ रहा है। और इस तरह की और समय पूर्व होने वाली तमाम बीमारियों से जूझने वाला आम आदमी कभी सही इलाज न मिल पाने के कारण तो कभी आर्थिक  संकट की बदौलत प्राय: अकाल मौत के मुंह तक चला जाता है। ज़रा कल्पना कीजिए  कि यदि हम आज किसी छोटे बच्चे को ऐसी ही मिलावटी मिठाईयां अथवा अन्य खाद्य सामग्रियां आज खिलाना शुरु करें तो बड़ा होते-होते उसके शरीर की बुनियाद आखिर  किन ज़हरीली खुराकों पर खड़ी होगी।
  लिहाज़ा मिलावटखोरी के इस निरंतर बढ़ते जा रहे नेटवर्क से आम लोगों को निजात दिलाने का एक ही उपाय है कि इसमें शामिल लोगों को पकड़े जाने पर एक तो उनकी ज़मानत हरगिज़ नहीं होनी चाहिए। और दूसरे यह कि ऐसे व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को हमेशा के लिए सील कर सरकार को अपने अधीन ले लेना चाहिए। और तीसरी व सबसे अहम बात यह कि मिलावटखोरी जैसे अपराध को भी फांसी या उम्रकैद जैसी सज़ा की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। जब तक ऐसी सख्त सज़ा का प्रावधान हमारे कायदे व कानूनों के अंतर्गत नहीं होता तब तक मिलावटखोरी के शिकंजे से मुक्ति पाने की कल्पना करना हमारे लिए बेमानी है। यहां एक बात यह भी गौरतलब है कि मिलावटखोरी के इस नेटवर्क में केवल आम आदमी ही नहीं पिस रहा बल्कि बड़े से बड़ा,विशिष्ट,रईस तथा स्वयं को वी आई पी समझने वाला व्यक्ति भी इस त्रासदी से अछूता नहीं है। इस समय बाज़ार में बिकने वाली तमाम मिलावटी वस्तुएं विशिष्ट व्यक्तियों के हिस्से में भी आती हैं। चाहे वह फल अथवा सब्ज़ी के रूप में या फिर दूध,खोया,पनीर या देसी घी की शक्ल में ही क्यों न हों।
  यहां एक बार फिर चीन में गत् वर्ष घटी उस घटना का उल्लेख करना ज़रूरी है जिसमें कि दूध में मिलावट करने वाले एक व्यापारी को मात्र 6 महीने तक मिलावटी कारोबार करने के आरोप में उसे मृत्युदंड दे दिया गया। यदि हमें देश व समाज के हितों का ध्यान रखना है तो हमारे देश में भी ऐसे ही सख्त कानून लागू होने की अविलंब ज़रूरत है। अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि हमारी नस्लें बचपन के बाद सीधे बुढ़ापे में ही कदम न रखने लग जाएं और जवानी उनके भाग्य में ही न लिखी जा सके। और यदि देश को ऐसे बुरे दिन देखने पड़े तो इन मिलावटखोरों से ज्य़ादा दोष हमारे देश के कानून तथा उस व्यवस्था का होगा जो इन हरामखोर मिलावटखोरों की सुनियोजित हरकतों को देखते हुए भी अंजान बना बैठा है तथा इन्हें सख्त दंड देने के बजाए इन्हें प्रोत्साहन या छूट देने की मुद्रा में नज़र आ रहा है।

22 अक्टूबर 2010

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बाजार सजने शुरू

नवरात्र की शुरुआत के साथ ही बाजार सजने शुरू हो गए हैं, या यूं कहें कि बाजार में फेस्टिव सीजन की शुरुआत हो गई है। ग्राहकों को बाजार में नए-नए तरह के सामानों का विकल्प मिलता है, तो दुकानदार भी ग्राहकों को अधिक से अधिक लुभाने के लिए ऑफरों की झड़ी लगा देते हैं। इसके बीच ग्राहक अगर थोड़ी समझदारी दिखाए तो ऑफर का लाभ भी उठा सकता है।

जीरो इंटरेस्ट का क्रेज
बाजार में कई तरह के ऑफर चलते हैं, लेकिन इनमें जो ग्राहकों को सबसे अधिक लुभाता है वह है जीरो इंटरेस्ट लोन, यानी किश्तों पर खरीदारी और वह भी बिना किसी ब्याज के । अगर बात सचमुच ऐसी ही हो जैसा तो क्या बात, लेकिन पड़ताल में डील इतनी सीधी नहीं दिखती।

जीरो इंटरेस्ट की हकीकत
जीरो इंटरेस्ट में कई पेच हैं। पहला यह कि नकद खरीदारी में कंपनियां ग्राहकों को सामान की कीमत पर अच्छा कैश डिस्काउंट देती हैं। जीरो इंटरेस्ट ईएमआई में जाने पर यह डिस्काउंट नहीं मिलता। फाइनेंसिंग के लिए कीमत के अलावा प्रोसेसिंग फीस के नाम पर भी रकम ली जाती है। अमूमन तीन से चार ईएमआई की रकम एडवांस में ले ली जाती है, यानि समूची रकम का लोन नहीं होता। इस तरह से आपको कैश डिस्काउंट भी नहीं मिलता है, ऊपर से प्रोसेसिंग के नाम पर और रकम देनी पड़ती है। इस घाटे की गणना करें, तो पाएंगे कि आप पर 18 से 20 फीसदी ब्याज के बराबर देनदारी बढ़ गई।

फाइनेंस कंपनी को क्या है लाभ
जिस तरह से ग्राहकों को कैश डिस्काउंट मिलता है उसी तरह कंपनियां फाइनेंस कंपनी को भी भारी डिस्काउंट देती हैं। उस डिस्काउंट की रकम फाइनेंस कंपनी की झोली में जाती है, जबकि ग्राहकों से वह सामान की पूरी कीमत पर ऑफर और ईएमआई की गणना करता है।

क्या सचमुच अच्छा नहीं होते जीरो फाइनेंस
ऐसा बिल्कुल नहीं है। मोलतोल में अगर कैश डिस्काउंट भी ले लिया जाए और प्रोसेसिंग के नाम पर अतिरिक्त रकम न देनी पड़े तो यह स्कीम अच्छी है। इसके अलावा महंगे कंज्यूमर ड्यूरेबल के लिए कई बार रकम पूरी नहीं पड़ती, ऐसे में चाहत की वस्तु लेने के लिए इस योजना को तो खराब नहीं कहा जा सकता।

टिप्स
फेस्टिव खरीदारी में कुछ खास बातों का खास ध्यान रखना चाहिए। सामान के उत्पादन और समाप्ति की तारीख जरूर देखनी चाहिए। सस्ते के चक्कर में वैसे उत्पाद कभी नहीं खरीदने चाहिए जिनका चलन खतम हो रहा हो या जो आउट ऑफ फैशन हो रहे हों। खाने-पीने के आयातित सामान में उत्पादन और समाप्ति की तारीख पर खास ध्यान रखना चाहिए। तकनीकी सामान में आफ्टर सेल सर्विस के विकल्प को जरूर जान लें।

फ्रिज में होता है वायरस व बैक्टीरिया

आमतौर पर फ्रिज में रखे सामान को सुरक्षित मान लेते हैं लोग। लेकिन ग्लोबल हाईजीन काउंसिल के ताजा अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि फ्रिज में रखे सामान 70 फीसदी गंदे होते हैं। जबकि 95 फीसदी बाथरूम में बैक्टीरिया और वायरस का साम्राज्य रहता है। इन बैक्टीरिया व वायरस के कारण आम भारतीय पेट की खराबी, सांस की तकलीफ, चर्म रोग, फुड प्वाइजनिंग और एलर्जी का शिकार हो रहे हैं।
काउंसिल के भारत प्रतिनिधि डॉ.नरेंद्र सैनी ने संवाददाताओं से कहा कि हाथ की सफाई ठीक से न होने के कारण बैक्टीरिया व वायरस तेजी से फैलता है। जिन सामान को ऐसे हाथों से छुआ जाता है उसमें बैक्टीरिया व वायरस चला जाता है। कंप्यूटर की 22 फीसदी की बोर्ड में वायरस का साम्राज्य रहता है। जबकि टेलिफोन पर 45 फीसदी वायरस पाया गया है। किचन में काम करने वाली महिलाएं एक ही तौलिए का उपयोग कई कामों में करती है और प्रतिदिन साफ नहीं करती है। जिसके कारण 75 फीसदी वायरस जमा रहता है। हाथ में जमा वायरस छह से 4

इस त्योहार खिल उठे दरो-दीवार

 हर कोई त्योहारों के लिए अपने घर को खास अंदाज में सजाना चाहता है ताकि उसका घर बिल्कुल अलग नजर आए। इसलिए त्यौहारों के शुरू होते ही लोग घर के मेकओवर में लग जाते हैं। कुछ लोग इस काम में प्रोफेशनल्स की मदद लेते हैं, तो कुछ लोग खुद ही इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। वैसे भी जरूरी नहीं कि हर बार घर के मेकओवर के लिए किसी एक्सपर्ट की ही मदद ली जाए। आप खुद भी अपनी सोच में रचनात्मकता लाकर अपने घर को एक अलग अंदाज में सजा सकती हैं और हर किसी की प्रशंसा भी पा सकती हैं।
चटख रंगों की राजस्थानी थीम
यदि आपको घर की सजावट में चटख रंग पसंद हैं, तो आपको राजस्थानी लुक जरूर पसंद आएगा। क्योंकि राजस्थानी थीम में चटख रंगों का ज्यादा प्रयोग किया जाता है। नक्काशीदार व चित्रकारी किया फर्नीचर, लकड़ी के झरोखे, खूबसूरत पेंटिंग्स, जिनमें राजस्थान के ग्रामीण पृष्ठभूमि का चित्रण होता है, लकड़ी व कपड़े से बनी कठपुतलियां, वॉल हैंगिंग्स आदि घर के इंटीरियर में जान डाल देते हैं। इसके अलावा बंधेज या चुनरी प्रिंट वाली चादरें, कुशन कवर और परदों से आप अपने घर को राजस्थानी रंग में रंग सकती हैं।
ग्रीनरी बनाम मेडिटरेनियन
घर में प्रकृति का एहसास करना चाहती हैं और ग्रीनरी पसंद है, तो मेडिटरेनियन थीम के आधार पर अपने घर को सजा सकती हैं। इसमें आंखों को सुकून देने वाले आसमानी, समुद्री ग्रीन, क्रीम, वाइबे्रंट ब्ल्यू रंगों का प्रयोग किया जाता है। साज-सज्जा में घास की चटाइयां, छोटी-छोटी रंग-बिरंगी मूर्तियां, आर्टिफिशियल फव्वारे, रंग-बिरंगे कुशंस/ तकिए, टेराकोटा के गमले आदि ले सकती हैं। रॉट आयरन के बने सोफा, टेबल, कैंडल्स होल्डर और अन्य कलात्मक चीजें घर को मेडिटरेनियन थीम
देती हैं।
विक्टोरियन थीम
घर को एलिगेंट लुक देना चाहती हैं, तो विक्टोरियन थीम भी ट्राई कर सकती हैं। घर की साज-सज्जा में बहुत सारे फूलों का प्रयोग किया जाता है। चादर हों या घर के परदे व कुशंस, इसमें फ्लावरी पैटर्न का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। फर्नीचर भी ऐसे इस्तेमाल किए जाते हैं, जिसमें ज्यादा कट्स या नक्काशी न हो। सजावट में सफेद बेस पर बड़े-बड़े प्रिंटों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। कमरों के कोने को हाईलाइट करने के लिए बड़े-बड़े वासेज का इस्तेमाल बढ़िया होता है। यदि घर में मम्मी के जमाने का पीतल का गागर हो, तो उस पर खूबसूरत पेंटिंग कर कमरे के किसी कोने में रख सकती हैं। इसी तरह और भी पॉट्स हाें, तो उन्हें घर में कलात्मक ढंग से सजा सकती हैं।
चाइनीज थीम
इस थीम के इंटीरियर में घर की पूरी सजावट में बेहद शोख रंगों का इस्तेमाल होता है, जिसमें मुख्यतः सुनहरे, लाल और काले रंग को प्रमुखता दी जाती है। साथ ही नीले, पीले और हरे रंगों का भी प्रयोग किया जाता है। सिरामिक और पॉटरी के साथ फैब्रिक या अपहोल्स्ट्री में फूल, पंछी, मछली और ड्रैगन जैसे डिजाइन सिल्क से कशीदाकारी किए होते हैं, जो पूरेघर को चाइनीज लुक देते हैं। साथ ही घर की खिड़कियों और हॉल में मिट्टी की विंड चाइम टांगें। या अन्य चाइनीज सजावटी वस्तुओं को घर की साज-सज्जा में शामिल कर सकती हैं।
मोरक्कन थीम
इस थीम में चमकीले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जो ऑरेंज, रेड, डीप ब्लू व ग्रीन, सैंड, गोल्ड और सिल्वर शेड्स लिए होते हैं। सजावट के लिए टेराकोटा टाइल्स, सिरामिक या टेराकोटा के पॉट्स, बुनी हुई टोकरियां, रंगीन मोजैक टाइल्स, शीशे के लालटेन, शीशे के जार में सजी बेहतरीन सुगंध देती एरोमा कैंडल्स, पाम के पौधों आदि का इस्तेमाल किया जाता है।
कुछ देसी हो जाए
घर की बैठक को पुराने जमाने के अंदाज में भी सजा सकती हैं। इसके लिए आपको ज्यादा खर्च करने की भी जरूरत नहीं है। पुरानी चौकी दीवार से लगाकर उसपर गद्दा रख दें। आकर्षक चादर बिछाने के बाद उस पर बड़े आकार के मसनद और विभिन्न शेप के कुशंस रखकर आरामदायक और देसी लुक दिया जा सकता है। डेकोरेटिव पीसेज में गणेश की मूर्ति, पिंजरा, लालटेन, मिट्टी की बनी घंटियाें आदि का प्रयोग कर सकती हैं। अगर आपके पास पुरानी बास्केट हो, तो उसे लेस या गोटा से सजा कर दीवार से टांग सकती हैं। कमरे में यदि गमला रखना चाहती हैं, तो पीतल के बने वासेज या मिट्टी के डिजाइनर गमलों को फूल से सजाकर रख सकती हैं। इस तरह अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल कर घर को देसी लुक दे सकती हैं।ह्ल
जापानी स्टाइल
बात जब घर का मेकओवर करने की हो, तो फर्नीचर को इसकी महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ऐसे में अगर आप जापानी थीम पर गौर करें, तो यह हर तरह के घर के लिए परफेक्ट होता है। क्योंकि जापानी इंटीरियर में भारी-भरकम फर्नीचर की जगह हलका फर्नीचर इस्तेमाल किया जाता है। ये ट्रेंडी होने के साथ-साथ किफायती भी होता है। इसमें फर्नीचर या अन्य साजो-सामान की वस्तुएं ज्यादातर बैंबू और सेरामिक की बनी होती हैं। वैसे तो इसमें ब्राउन, बेज और ग्रे जैसे हल्के रंगों का प्रयोग ज्यादा किया जाता है, लेकिन फर्नीचर आमतौर पर गहरे रंगों यानी डार्क वुड जैसे ब्लैक रंग में होता है। टी-पॉट्स, टी-सेट्स, पेपर से बने लालटेन, पेन होल्डर, पेपर फैन, इकेबाना जैसी एक्सेसरीज से घर को सजा सकती हैं।

'शिकारी' नेता आएगा, चुनावी जाल बिछाएगा

बिहार के सुपौल, मधेपुरा और सहरसा ज़िले को मिथिलांचल का कोसी अंचल भी कहा जाता है. दो साल पहले कोसी नदी ने नेपाल-बिहार सीमा क्षेत्र में कुसहा तटबंध तोड़कर बिहार के इन तीनों ज़िलों में भारी तबाही मचाई थी.

इस पीड़ा से जुड़े सवाल यहाँ के चुनावी मुद्दों वाली बहस में पीछे छूट गए लगते हैं.

इस बार छह चरणों में हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में ही कोसी अंचल के मतदाता वोट डालेंगे.

लेकिन वोट किसे और क्यों देंगे, इस सवाल पर बंटे हुए मतदाताओं के सामने प्राय सभी प्रमुख दलों ने जाति, व्यक्ति, पैसा और परिवार से जुड़े तमाम चारे डाल दिए हैं

चुनावी माहौल ऐसा बना दिया गया है कि कोसी-प्रलय के समय भारी जनाक्रोश से भयभीत सत्ता ने कोसी अंचल पुनर्निर्माण का वायदा अभियान चला कर उसे ठंडा किया.
लेकिन वो वायदा ऐसा ठंडा पड़ा कि फिर पांच साल के लिए जनादेश मांग रही उस सत्ता के सामने गरम सवाल बन कर खड़ा भी नहीं हो सका.
कोसी का प्रकोप


यहाँ तक कि विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (राजद), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और काग्रेस ने भी कोसी अंचल की इस त्रासदी को बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर यहाँ के लाखों बाढ़-पीड़ितों में बेहतर पुनर्वास की उम्मीदें जगाना ज़रूरी नहीं समझा.
कोसी-त्रासदी का सबसे ज़्यादा भुक्तभोगी ज़िला है मधेपुरा. वहाँ के मतदाता चुनाव के संदर्भ में इस क्षेत्र के रुख़ या रुझान का अपने ही नज़रिए से दो टूक विश्लेषण कर डालते हैं.
यहाँ भी राजपूत-ब्राह्मण को अंदर से लालू और नीतीश विरोधी बताने, मुस्लिम-यादव के बीच फिर से तालमेल होने या कांग्रेस के पक्ष में सवर्ण, दलित और मुस्लिम समाज के बढ़ते रुझान की ही चर्चा लोगों के बीच अधिक हो रही हैऐसे विश्लेषणों से अलग इस कोसी अंचल को राज्य का सबसे अधिक पिछड़ा इलाक़ा बनाए रखने वाली आपराधिक राजनीति की पहचान और उस पर चोट जैसी चुनावी समीक्षा इस ' पेड न्यूज़ ' के ज़माने में होती कहाँ हैलोक-राशि के वैध-अवैध उपभोग वाले राजसुख से जुड़ी राजनीति अपने तमाम चुनावी वायदों से बेपरवाह दिखती हैक्योंकि चुनाव के समय मतदाता भी अपने हक़ वाले असली मुद्दों से भटकते हुए फिर से तोते की तरह शिकारी नेता के चुनावी जाल में फंस जाते है.

20 अक्टूबर 2010

पुरुषों के लिए बहुत जरूरी सलाह

पुरुषों के लिए एक बहुत ही जरूरी सलाह। वे दोपहर के वक्त महिलाओं के साथ किसी भी कीमत पर उलझने से बचें। नहीं तो इस समय महिलाओं के साथ बहसबाजी में उन्हें मुंह की खानी पड़ सकती है।

जी हां, लोगों के मिजाज पर किए गए एक सर्वे के नतीजे पर यकीन करें तो पुरुषों को इस सलाह पर जरूर अमल करना चाहिए। वरना, उन्हें महिलाओं से मात मिल सकती है। अध्ययन के नतीजों में यह भी कहा गया है कि यदि महिलाएं पुरुषों से कुछ कहना चाहती हैं तो उन्हें शाम के छह बजे तक इंतजार करना चाहिए, क्योंकि यही वह समय है जब पुरु ष अपने करीबी लोगों की मांगों को पूरी करते हैं।

ब्रिटेन में हुए इस अध्ययन में 1,000 पुरु षों और महिलाओं को शामिल किया गया था। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जब किसी महिला को तनख्वाह में इजाफे या प्रोन्नति की बात अपने बॉस से कहनी हो तो वह यह काम सुबह में न कर दोपहर एक बजे करे। इस वक्त उनकी मांगें पूरी होने की ज्यादा संभावना रहती है।

नतीजों के मुताबिक, दोपहर एक बजे के बाद का समय ऐसा होता है जब प्रबंधक अपने कर्मचारियों की मांग के प्रति बहुत उदार होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘महिलाएं यह जानकर काफी खुश होंगी कि मूड में होने वाले उतार-चढ़ाव से सिर्फ वहीं पीड़ित नहीं हैं, बल्कि ऐसा पुरुषों में भी देखा जाता है।’

19 अक्टूबर 2010

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06 अक्टूबर 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स डे 3: अब तक भारत ने जीते 10 गोल्ड मेडल। भारत के लिए 10वां गोल्ड राजेंद्र कुमार ने जीता। कुश्ती में ही मनोज ने जीता सिल्वर मेडल। वेटलिफ्टिंग में रेनू बाला चानू को भी गोल्ड। शूटिंग में आज तीसरा गोल्ड। ओमकार सिंह ने जीता गोल्ड। अनीसा सईद ने 25 मीटर एयर पिस्टल इवेंट में गोल्ड जीता। कॉमनवेल्थ गेम्स के मेडल अपडेट जानने के लिए क्लिक करें�े मेडल अपडेट जानने के लिए क्लिक करें बिग बॉस में दागी चेहरे

रियलिटी शो 'बिग बॉस' में जिस तरह अपराधियों और विवादस्पद लोगों को स्टार बनाने की कोशिश की जा रही है, उस पर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री और समाज
को ठहर कर सोचना चाहिए। कहीं यह शो जाने-अनजाने निगेटिव को पॉजिटिव बनाने या करैक्टर की लॉन्ड्रिंग का जरिया तो नहीं बनता जा रहा? इसकी चौथी कड़ी के कुछ उम्मीदवारों पर नजर डालें। इसमें एक तरफ बंटी चोर (जो पहले ही दिन बाहर हो गया) और डकैत रह चुकी सीमा परिहार हैं, तो दूसरी तरफ फिक्सिंग मामले में फंसे पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहम्मद आसिफ की पूर्व गर्लफ्रेंड एक्ट्रेस वीना मलिक और कभी पाक आतंकवादी अजमल कसाब की पैरवी करने वाले वकील अब्बास काजमी हैं। सवाल यह है कि अभिनेता-अभिनेत्रियों और मॉडलों के साथ इन्हें शामिल किए जाने का क्या आधार है? 70 लोगों की हत्या और करीब 200 लोगों का अपहरण करने वाली सीमा परिहार को टीवी पर दिखाकर इस शो के निर्माता क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या एक दागी क्रिकेटर की दोस्त होना और एक आतंकवादी का वकील होना बड़ी योग्यता है? ये लोग चर्चित तो हैं, लेकिन किसी सकारात्मक कारण से नहीं।

बिग बॉस-2 में जब राहुल महाजन और मोनिका बेदी को शामिल किया गया था, तब उनकी भी 'ख्याति' किसी अच्छे कारणों से नहीं थी। मोनिका बेदी ने भले ही कुछ फिल्मों में काम किया हो, पर उन्हें सिर्फ इस आधार पर रखा गया कि उनका नाम एक डॉन से जुड़ा था। राहुल महाजन भी नशे की आदत और अपनी पूर्व पत्नी से संबंध विच्छेद के कारण ज्यादा चर्चा में थे। लेकिन इस शो के बाद वह रातोंरात एक सिलेब्रिटी बन गए और उनकी पुरानी छवि अचानक धुल गई। यही मोनिका बेदी के साथ भी हुआ। तो क्या माना जाए कि बिग बॉस-4 सीमा परिहार को एक नायिका बना देगा? कुछ समय पहले तक काले को सफेद बनाने का यह काम राजनीति किया करती थी। लेकिन अब पॉलिटिक्स ने भी ऐसे तत्वों से किनारा करना शुरू कर दिया है। ऐसे में मनोरंजन उद्योग का इन्हें गले लगाना वाकई चिंता का विषय है।

यह कार्यक्रम अपने प्रतिभागियों के बहाने मनुष्य की कुप्रवृत्तियों का गंभीर विश्लेषण करने की कोशिश करता, तो शायद इसकी कुछ सार्थकता हो सकती थी। मगर यह शो ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाने के बजाय उसके महिमामंडन में ज्यादा रुचि लेता है। सच कहा जाए तो यह शो चर्चित होने को एक मूल्य की तरह स्थापित करता है। यानी एक व्यक्ति को बस चर्चित होना चाहिए, चाहे वह कोई गलत काम करके ही क्यों न हो। अगर वह एक बार चर्चा में आ गया तो यह शो उसे हीरो बनाकर ही छोड़ेगा। अगर इस तरह निगेटिव वैल्यूज ने जोर पकड़ा तो इसका समाज पर गलत असर पड़ सकता है। ठीक है कि हमारे स्वभाव में अनेक विसंगतियां हैं, लेकिन कला और संस्कृति का मकसद उनसे मनुष्य को मुक्त कराना है न कि उन्हें और मजबूत बनाना।

यानी महिला सुंदर है?






एक नई स्टडी रिपोर्ट में बताया गया है कि वे कौन सी चीजें हैं जिनसे लगभग सभी संस्कृतियों में किसी महिला को शारीरिक तौर पर खूबसूरत माना जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं की सुंदरता के ये अहम पैमाने हैं जवां लुक, लंबाई, पतली छरहरी कमर और लंबी बांहें हैं।
न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी, हॉन्गकॉन्ग पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी और तियानजिन पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों की एक इंटरनैशनल टीम ने इस बारे में स्टडी की। टीम ने दावा किया है कि शरीर की बनावट से महिलाओं की सुंदरता को आंकने से जुड़ी यह अब तक की सबसे बड़ी स्टडी है। स्टडी में शामिल प्रोफेसर रॉब बूक्स ने कहा कि सुंदरता को लेकर की गई ज्यादातर स्टडीज धड़, कमर और नितंबों के आकार के आकलन पर ही आधारित रही हैं। लेकिन हमने अपनी स्टडी में पाया है कि बांहों की लंबाई और आकार भी सुंदरता के मामले में एक बड़ा पैमाना हैं। यह पूरे शरीर की बनावट और वजन में एक तरह से चार चांद लगाने का काम करता है। इस स्टडी में यह भी बताया गया है कि बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) और एचडब्ल्यूआर (हिप-टू-वेस्टरेश्यो) किसी भी महिला में आकर्षण के सबसे बडे़ पैमानों में से हैं।

17 फलों में पाई गई कीटनाशक दवा

 उपभोक्ताओं को जागरूक करने वाली संस्था कंस्यूमर वाइस ने दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, कोलकाता औरबेंगलुरु की थोक और खुदरा फल मंडियों से 17 फलों के सैंपल उठाकर उनकी जांच की है। जांच में पता चला है कि इन सब में कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल किया गया था। यह अलग बात है कि किसी में कम और किसी में अधिक।
कंस्यूमर वाइस के मुताबिक, दिल्ली की आजादपुर, ओखला, शाहदरा और गाजीपुर आदि फल मंडियों से सेब, केला, चेरी, चीकू, अंगूर, खुमानी, किवी, लीची, आम, खरबूजा, पपीता, आडू, नाशपाती, अन्नास, आलूबूखारा, अनार और तरबूज जैसे फलों के सैंपल उठाए गए। इनकी जांच करने पर पता लगा है कि इनमें से किसी को चमकाने के लिए कीटनाशक दवाई का इस्तेमाल किया गया तो किसी की उपज को जल्दी बढ़ाने के लिए। कंस्यूमर वाइस ने बताया कि कई फलों में तो कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल काफी अधिक किया गया था। ऐसा होने से इन्हें खाने वाले उपभोक्ताओं को कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। इनमें ब्रेन और ब्रेस्ट आदि का कैंसर, किडनी कैंसर, मुंह में अल्सर होना, फूड पॉइजनिंग, मूड उखड़ा रहना, नींद न आना, मानसिक भ्रम और याददाश्त कम होना जैसी कई बीमारियों से उपभोक्ता ग्रस्त हो सकते हैं।
इन सभी फलों के लिए गए सैंपल की कई-कई स्तर पर जांच की गई। आम की जांच में डीडीटी की मौजूदगी होने का पता लगा है। जांच में यह भी पता लगा है कि कई फलों में कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव किया गया था तो किसी-किसी में इंजेक्शन के माध्यम से यह दवाइयां फलों के अंदर पहुंचाई गईं। कंस्यूमर वाइस द्वारा इन सबकी विस्तृत जानकारी बुधवार को दी जाएगी।

05 अक्टूबर 2010

कॉमनवेल्थ



कॉमनवेल्थ कॉमनवेल्थ
                   आ गया लो कॉमनवेल्थ
कितने मुद्दे अपने साथ
                   और लाया कॉमनवेल्थ
किसने खाया किसको खिलाया
                  बता न पाया कॉमनवेल्थ
कितनी अभी और नई कहानी
                 हमको सुनाएगा कॉमनवेल्थ
बारिश आई चली गई
                फिर भी न डोला कॉमनवेल्थ
गरीबो ने अपनी मेहनत से
                खूब सजाया कॉमनवेल्थ
बाड़ से बेहाल जनता को
               नज़र अंदाज़ कर गया कॉमनवेल्थ
नेतागड़ सब व्यस्त थे
              क्युकी बहुत करीब था कॉमनवेल्थ
भूखी जनता रो - रो हारी
               उनको क्या देगा ये कॉमनवेल्थ
ये सब  तो चलता  ही रहेगा
             अब कह भी दो स्वागत  कॉमनवेल्थ !

हिंदू विवाद और केंद्र सरकार कि किरकिरी



''यू.पी.ए. गठबंधननीत केंद्र सरकार ने माननीय उच्चतम न्यायालय में एक हलफनामा दाखिल कर यह दावा किया था कि मर्यादापुरूषोत्तम श्रीराम का कोई अस्तित्व ही नही है, और न ही उनके जीवन चरित्र ''रामायण'' का कोई वैज्ञानिक आधार है।'' तमिलनाड़ू के मुख्यमंत्री नास्तिक श्री करूणानिधी ने ''श्रीरामसेतु'' निर्माण मुद्दे पर ''श्रीराम'' के इंजिनियरिंग की डिग्री के बारे में सवाल उठाया था।
''श्रीरामजन्म भूमिं विवाद के अंतर्गत ''माननीय उच्च न्यायालय'' के दिनांक ३०.०९.१० को आये फैसले नें श्रीरामजी के अस्तित्व की सत्यता को प्रमाणित कर दिया, साथ ही यह भी कि उनका जन्म अयोध्या के उसी स्थान पर हुआ जहां ''हिन्दुमत''है, इससे ''रामायण'' की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। अब सरकार को उक्त गलती को सुधारते हुए श्रीरामसेतु को विश्व धरोहर घोषित कराने में अग्रणी भूमिंका निभानी चाहिए, क्योंकि उक्त फैसले से रामायण के पात्र ''श्रीराम'' श्रीराम से ''रामायण'' और रामायण से ''श्रीरामसेतु'' की प्रमाणिकता भी सिद्ध होती है। यही नहीं अगर भारत सरकार ''श्रीरामसेतु'' को तोडऩे के स्थान पर यदि ''जिर्नोद्धार'' का विचार करें तो यह राष्ट्रीय सम्पदा के साथ-साथ राष्ट्रीय महत्व वाला सेतु और दूध देती गाय बन जाएगा।

हमारे देश में एक परम्परा रही है कि जब तक पश्चिमीं देशो द्वारा हमारी किसी भी धारणा, विचारधारा, कार्य, वस्तु, या सांस्कृतिक विरासत को मान्यता सर्टीफिकेट नहीं मिल जाता, हम लोग इसी संसय में रहते है कि यार क्या ऐसा हो सकता है्? क्या ऐसा होना चाहिए? क्या हमें मानना चाहिए? ऐसे संसय में हममें से हर कोई एक ही राग अलापने लगता है कि सबूत चाहिए और हम तृप्ति के लिए विदेसियों के स्पष्टिकरण और प्रमाणिकता की राह तकते है। जैसे कि पेटेंट देने और प्रमाणीकरण का ठेका उन्होने ही ले रखा हो। ऐसा क्यों होता है कि सिर्फ हमारे देश की चीजो को ही प्रमाण की जरूरत पड़ती है? कभी उन लोगो को प्रमाणित किया जाने की जरूरत नहीं पड़ती? उन्होने जो कह दिया तो वह ब्रम्हवाक्य हो गया और हमने जो कह दिया शो कुछ नहीं? आज हमारे उद्योगो को पश्चिम की मान्यता की जरूरत पड़ती है, हमारे देश में कोई अमीर है, है तो कितना अमीर है, अगर नहीं है तो कितना नहीं, हमारे देश में कितने गरीब है वह भी पश्चिम तय करता है, हमारे शैक्षणिक संस्थानों की रेंकिंग भी वही से होती है, हम आस्कर के लिए मरे जाते है। पूरे विश्व को मालूम है कि हमारे देश में क्या है क्या नहीं है, वैसे हमारे पास भी आकड़े है, पर क्या करें उसपर ऑडिटर के हस्ताक्षर नहीं है। कुल मिलाकर हम पश्चिम के देशो द्वारा किये गये ऑडिट के बलबूते देश चला रहे है। हमारा स्वआकलन का कोई पैमाना नहीं है और दूसरों को आकलित करने की क्षमता हममे नहीं है। फिर भी हम गर्व से कहते है कि हम हिन्दुस्तानी है, हम विश्व गुरू हैं? इस बार की समस्या तो पहले से बहुत ही ज्यादा गम्भीर है क्योंकि इस बार भारतवर्ष के इतिहास पर ही प्रश्र चिन्ह लगा दिया गया क्योंकि हमारी आदिकाल की सवैंधानिक पुस्तकों चारो वेद, इतिहास पथप्रदर्शक एवं पूज्य रामायण एवं श्रष्टिरचियता अवतार भगवान श्रीराम पर ही प्रश्र चिन्ह लगा दिया गया। यह तुक्ष मानसीकता कैसे उत्पन्न हुई और किसने उत्पन्न की यह तो बहुत ही पेचिदा और अन्दर का राज है पर भारतीय संस्कृति की इसमें गलति सिर्फ इतनी सी थी कि हमारे वेदो हमारी रामायण पर पश्चिमी देशो की हस्ताक्षरमय सील नहीं लगी थी। सील इसलिए नहीं लग पाई क्योंकि ये इतिहास तब का है जब इन सील लगाने वालों का अस्तित्व ही नहीं था। इसलिए जब-जब प्रमाण देने की बारी आई तो उन्होने हमारे इतिहास और हकिकत को ही नकार दिया। अब विडम्बना ये है की हमारे पुरातत्वविद, इतिहासकार, राजनेता, विद्वान सभी विदेशी गुलामी की मानसिकता से कहीं ना कहीं घिरे हुए है, क्योंकि विद्वानों, पुरातत्वविदों, इतिहासकारों में से ज्यादातर ने अंग्रेजी शिक्षा ले रखी है, बाबर इतिहास, अमेरिकी इतिहास, यूरोपीय इतिहास सबकों मालूम है। इनमें से कोई नहीं कहेगा कि वे भरतवंशियों के इतिहास से वाकिफ है। इसका सबसे बड़ा कारण है हमारी शिक्षा पद्धति जो विदेशी शिक्षा पद्धति की नकल है, और इसे बदलना हमारे देश के अग्रणी जो खुद विदेशी मानसिकता के गुलाम है, के बस की बात नहीं है।
वैसे तो हिन्दू समुदाय के सहनशीलता, सहिष्णुता और नैतिकता का फायदा उठाकर हमेशा ही इसको छति पहुचांने की कोशिशे की जाती रही है, पर इतिहास में एक और बहुत बड़े विवाद ने तब जन्म लिया जब 2005 में केंद्र सरकार ने ''सेतुसमुद्रम'' परियोजना जिसके तहत तमिलनाडु को श्रीलंका से ''श्रीरामसेतु'' को तोड़कर जोड़ा जाना था की घोषणा की। इसके पीछे सरकार का तर्क यह था कि इससे देश के बहुत बड़े व्यापारिक हित जुड़े है। योजना के पूर्ण होने पर हमारे व्यापारिक जहाजों को लम्बे मार्ग से जाने के बजाय एक छोटा एवं सुलभ मार्ग मिल जाएगा जिससे लगभग 2० हजार करोड़ रूपये का तेल इंधन बचाया जा सकेगा। परियोजना का विरोध किसी ने उसके आर्थिक हितो के आधार पर नहीं किया बल्कि उसके दुष्परिणामों के विस्लेशन के आधार पर किया।
श्री राम सेतु
रामसेतु तोड़े जाने से बहुत बड़ी संभावना है कि सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से केरल में जो जनजीवन का नुकसान होगा वह अकल्पनीय है। चूंकि श्रीराम सेतु इन प्राकृतिक आपदाओं एवं मानव सम्पदाओं की बीच एक दीवार की भांति हमारी रक्षा कर रहा है। हजारों मछुआरे जो सेतु के आस-पास मछली पकड़कर अपना जीवन यापन कर रहे है वे बेरोजगार हो जाएँगे, इस क्षेत्र की दुर्लभ शंख व शिप सम्पदा जिससे १०० करोड़ रुपए से अधिक की वार्षिक आय होती है, से वंचित होना पड़ेगा, यूरेनियम का सर्वश्रेष्ठ विकल्प थोरियम जिसका विश्व में सबसे बड़ा भंडार उसी सेतु के आसपास है, विलुप्त हो जाएगा। कई प्रकार के समूद्रीय जीव-जन्तुओ की कई दुर्लभ प्रजातियाँ नष्ट हो जाएँगी। प्रमाणिकता चाहिए तो देश लीजिए- प्रकृति से खिलवाड़ करने का नतीजा पश्चिमीं जगत भुगत रहा है। जिस प्रकार तेजी से प्रकृति के सिद्धांतों से खिलवाड़ करके वहां निर्माण चल रहा है, प्रकृति उसी अनुपात में अपना रौद्र रूप धारण कर विनास लीला रच रही है, प्रकृति भी एक सीमा तक ही अति बरदास्त कर सकती है, अति करने का परिणाम सदैव भयानक होगा। हमारे सभ्य समाज के प्रतिनिधियों एवं बुद्धिजीवियों ने इन्ही सब विस्लेशनों के आधार पर इस परियोजना का विरोध किया। विरोध में माननीय उच्चतम न्यायालय में वाद दाखिल किया गया।
टीस इस परियोजना से उतनी नहीं है, हिन्दु तो अपनी आस्था, विश्वास और अधिकार क्षेत्र से भी ज्यादा अपनी सहनशीलता के बलबूते बहुत कुछ बरदास्त करता आया है। दिल को धक्का तो तब लगा जब ''सेतु समुद्रम'' योजना का सैद्धांतिक विरोध करने वाली याचिका के जवाब में सितंबर 2007 में कांग्रेसनीत सरकार ने न्यायालय के समक्ष हलफनामा दायर करके मर्यादापुरूषोत्तम भगवान श्री राम के अस्तित्व को ही नकार दिया, साथ ही यह भी दावा किया कि उनके जीवन आधारित जीवनी ''रामायण'' का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। ''रामसेतु'' के बारे में उनका तर्क था कि ये मानव निर्मित न होकर प्रकृति निर्मित है। ''रामायण, वेद, पुरान'' जैसे स्वंयंसिद्ध ग्रंथो में श्रीरामसेतु का वर्णनजिस स्थान पर होने की व्याख्या है, सेतु वही पर और उसी अवस्था में पाया गया, जिसे भी सरकार ने प्रकृति निर्मित मानकर नकार दिया। कई विद्वावन भूगोलविदों के तर्को को नकार दिया गया। यहां यह स्पस्ट तथ्य है कि पथ्थरों एवं चट्टानों से निर्मित वह सेतु समूद्रीय भूंमि-चट्टानों से मेंल नहीं खाता अर्थात सेतु प्रकृति निर्मित नहीं है। दूसरा हमारे पूर्वजो के पास वर्तमान तकनिक या अमेरिकी सेटेलाईट नहीं था जिससे उन्होने श्रीलंका और भारत को जोडऩे वाले पुल की तस्वीर लेकर और उसी आधार पर ''रामायण'' जैसें ग्रन्थ की रचना कर डाली हो। निश्चिंत ही उन्होने कुछ देखा, सुना, महसूस किया और उसे अपनी लेखनी में समाहित किया होगा। प्रकृति निर्मित पुल और मानव निर्मित पूल की पहचानने के लिए किसी इंजिनियरिंग की आवश्यकता नहीं है इसे एक सामान्य मनुष्य आसानी से सत्यता जांच सकता है।
सरकार ने ''सेतु समुद्रम'' परियोजना की आड़ में अपने तर्को के आधार पर मर्यादापुरूषोत्तम भगवान श्रीराम का अस्तित्व नकारा तो उसी के साथ हिन्दु धर्म के अस्तित्व पर ही प्रश्र चिन्ह लगा दिया। 'उस भवन का अस्तित्व ही क्या जिसकी नीव को ही नकार दिया गया हो? सिर्फ इतना ही नहीं कांग्रेस समर्थित तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने तो अपने कद और हद से ही आगे निकलकर हिन्दुओं से यह प्रश्र कर लिया कि राम ने इंजीनियरिंग की डिग्री कहां से ली थी? महाशय को कौन बताए जिस विधाता ने इस पृथ्वी पर जीवन का निर्माण किया तब भी उसे किसी डिग्री की जरूरत नहीं पड़ी तो क्या उसे एक पुल के लिए डिग्री की जरूरत पड़ेगी? क्या उनके मत में इंजिनियर को ही लाइसेंस है कि वो पुल बना सके? जब इंजिनियरिंग कालेज नहीं बने थे तब पुल, भवन और नई चीजे कैसे बनाई जाती थी? ऐसे कई प्रश्र है जिनका समाधान बड़बोले और पथभ्रष्ट नेता कभी नहीं कर सकते। फिर भी सनातन धर्मिंयों ने उनके बड़बोलेपन और मुर्खतापूर्ण कथनों को इस तरह बरदास्त कर लिया मानों एक पागल के चिल्लाने से सत्य बदल नहीं जाता। हमारें देश के भ्रष्ट और निकम्मे शासनकर्ताओं ने भारत के उन महान नेताओं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो की बातों को भी झुटला दिया जिन्होने श्रीराम चरित्र से प्रेरणा एवं शक्ति लेकर भारतमाता के चरणों की सेवा करते हुए महान कार्य किये। हालांकि केंद्र सरकार ने बाद में अपना हलफनामा वापस ले लिया और श्री करूणानिधि ने भी अपने शब्द वापस ले लिये। लेकिन यह तो उनकी विश्वसनियता पर ही प्रश्र चिन्ह लगाता है। यदि वे ''श्रीराम'' और ''रामायण'' के पात्रो के काल्पनिक होने की अपनी दलील का कोई साक्ष्य रखते थे तो उन्हे अपनी बात पर अटल रहना चाहिए था और अपनी बात सिद्ध करना था। परन्तु हुआ ये कि वे 'बिन पेंदी के लोटे' की तरह जिधर वजन उधर वे पलट गये।
चाहे ''वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद)'' हो, उपनिषद् हो, ''पुरान'' हो या ''रामायण'' हो इन्होने हमेशा ही वैज्ञानिक सिद्धांतो की आधारसिला रखी है। चाहे वह खगोल, विज्ञान, आयुर्वेद, तकनीकी, रचनात्मक, शिक्षा पद्धति, जीवन, मरन, हर क्षेत्र के लिए प्रतिपादित एवं सिद्ध सिद्धांत दिये है। अमेरिकी ''राष्ट्र्रीय वैमानिकी और अन्तरिक्ष प्रबंधन'' (नासा) ने भी वेदों में छिपे ज्ञान को प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक माना है। हमारे वेदो द्वारा दी हुई व्यवस्था को ही तोड़मरोड़कर विश्व पटल का जीवन सिद्धांत गड़ा गया है यह हम ''विश्व गुरू'' होने के नाते गर्व से कह सकते है। कभी हमारे वेदो में संशोधन की आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि हमारे वेदो ने कभी भी ऐसा कोई अवैज्ञानिक, सिद्धांतहीन या आधारहीन, विचारधारा या व्यवस्था नहीं दी जो सत्य से परे हो। जैसा कि विश्व में फले-फूले कुछ धर्म ग्रंथों के सिद्धांतो, व्यवस्थाओं में कुछ खामियां देखी जा सकती है जिन्हे या तो सुधारा गया या फिर आज भी चलन में है, जैसे की पृथ्वी का गोल नहीं चपटा होना, ''खून के बदले खुन वाली न्याय व्यवस्था, नारी जाती के हाथो में बेडिय़ा डालकर मानव अधिकारों का हनन करने वाली व्यवस्था। हिन्दूओं ने बलात धर्मान्तरण और प्रशासनिक कुचक्रो को सदियों से सहा है, पर कभी हमें यह शिक्षा नहीं दी गई कि दूसरे धर्माे के अनुयाईयों को काम, दाम, दम्भ, भेद का लालच और डर दिखाकर अपने धर्म में मिलाकर और पूरे विश्व को धर्मांतरित किया जाय। आज हमारे देश मे चारो ओर विभिन्न धर्मो के बीच हिन्दू अनुयायियों पर अपना-अपना धर्म थोपकर अपनी जनसंख्या बढ़ाने का कुसडय़त्र चल रहा है। यह कुसंडय़ंत्र एक मिशन के रूप में चलाया जा रहा है। हमारे वेदो, पुरानों आदि धर्म ग्रंथो ने हमें ''सर्वे भवन्तु सुखीन: सर्वे सन्तु निरामया'', ''सर्व धर्म समभाव'' और ''अयं निज: परोवेति, गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥''
का संदेश दिया है, और सिर्फ बाते ही नहीं की उसे कैसे व्यवहार में उतारा जाता है उसकी विधि भी बताई है। कभी भी हमें वर्गो में या धर्मो में बांटने की कोशीष नहीं की। हम भरतवंशियों ने 'वेदाज्ञा' का कभी उलंघन किया हो ऐसा वाक्या मुझे कहीं नजर नहीं आता। जब हमारे मूल ग्रन्थ हमें जीवन और मृत्यू के स्वयंसिद्ध सिद्धांत हमें दे रही है तो फिर क्यूं नहीं इन्हे ब्रम्हवाक्य माना जाये? क्यों हम इन पथभ्रष्ट राजनेताओं, विदेशियों का मुह ताके? क्यों हम अपने इतिहास के प्रमाणिकता के लिए किसी न्यायालय में पैर रगड़े?
हमारे देश की संस्कृति को जितना इस्लामी आक्रमणकारी, अंग्रेजो की दमनकारी नीतियां भी नुकसान नहीं कर पाई उतना नुकसान हमारे अपने लोगों ने किया है। विश्व साम्राज्य से सिमटकर आज हम एक छोटे से भू-भाग में संकुचित होकर रह गये है, तो इसका दोष हम किसी को नहीं दे सकते इसके लिए हमें खुद अपने अन्दर झांकना होगा। जो सत्य होता है उसे ही बार-बार सिद्धता की परिक्षा देनी पड़ती है, ऐसा चलन होता जा रहा है। वेदो, पुरानों, उपनिषदों, रामायण और हिन्दू इतिहास हमेशा स्वयं सिद्ध रहा है और वक्त आने पर हमेशा ही अपनी सत्यता सिद्ध की है। सत्य को कभी कानून से बांधकर खेला नहीं जा सकता। जैसा कि राजनैतिक स्वार्थवस अपने हित साधने के लिए मर्यादापुरूषोत्तम आराध्य भगवान श्रीराम के अस्तित्व को नकारने की कोशीष की गई। हमारे नीव को नकार दिया जाता तो कंगूरे तो खुद गिर जाते, पर ''अंत भला तो सब भला'' उसी कानून ने अंतत: श्री विष्णु अवतार भगवान श्रीराम की प्रमाणिकता को स्वयंसिद्ध माना। आखिर हमें एक बार फिर ''आधार कार्ड'' मिल ही गया।
अंतत: मेरा यही मत है कि यदि हम विदेशी गुलाम मानसिकता, शासन पद्धति और शिक्षा व्यवस्था को स्वंतत्र कराकर भरतवंशी राजतंत्र की वापसी करा पाये तो निश्चित ही हमारा देश विश्व का अग्रणी हो जाएगा। जिस हालत में अभी हमारा देश है अगर उसी हालत में हम आगे बढ़ भी गये तो हमारे अस्तित्व का कोई आधार नहीं होगा, क्योंकि 'गुलाम' अगर 'धन्ना सेठ' हो भी गया तो भी वह अपनी गुलामीं की मानसिकता नहीं छोड़ पाता। इसलिए आओं हम फिर भारतवंशी राजतंत्र की ओर चले और अपने ''विश्व गुरू'' की छवी को सार्थक करे।

बच्चो को दे प्यार और विश्वास

बच्चो को दे प्यार और विश्वास

 महिला एवं शिशु विकास मंत्रालय ने युनिसफ़ और कुच्छ एनजीओ के साथ मिलकर हाल ही मै चाइल्ड येब्युस के मामले मै भारत के १६ राज्यों का सर्वे किया है ! इस सर्वे मै शामिल ५३% बच्चो ने माना की वे कभी ना कभी शारीरिक शोषण करने वालो में से ५०% जान पहचान वाले लोग ही थे ! बचियों  की तुलना में बच्चे शारीरिक शोषण का ज्यादा शिकार हो रहे हैं !
                                         ये हमारे देश मै नहीं दुनिया भर मै घटने वाली जटिल समस्या है जिसको हम किसी भी तरह नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते जिसकी खबर हम हर रोज़ अख़बार , टेलीविज़न के माध्यम से देखते और सुनते हैं ! कितना प्यार करते हैं हम अपने बच्चो से ? हमारा जवाब होता है ''''''''बहुत ज्यादा ;;;;; कितना ख्याल रखते हैं हम अपने बच्चो का ? हमारा फिर वही जवाब '''''बहुत ज्यादा ! फिर ये सब  केसे हो जाता है ? कही न कही तो हम उनकी देख रेख मै चुक कर ही रहे हैं जिसका भुगतान हमारे मासूम बच्चो को उठाना पड़ता है ! कोन सी है हमारी वो भूल ? हमे अपने बच्चो के साथ एक दोस्त की तरह रहना चाहिए अपने रोज़ -मर्रा की जिंदगी मै से कुच्छ पल उनके साथ व्यतीत करना चाहिए उनके खट्टे - मीठे पालो को उनके साथ बाँटना चाहिए ! उनका विश्वास जीतना चाहिए क्युकी हर इन्सान अपने साथ घटित घटना को किसी न किसी के साथ बंटाना चाहता है और उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहता है ! जब हम अपने बच्चो के करीब जायेंगे उनके एहसासों को बाँटेंगे तभी हम उनके जीवन की गतिविधियों से अवगत रह पाएंगे और वो हमसे खुल कर अपने दिल की बात कह पाएंगे ! हमे एसा करके उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान देकर उनकी हिम्मत को बढाना है जिससे वो अपने खिलाफ होने वाले शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठा सके और दोषी को अपनी हिम्मत से पस्त कर सके ! हमे  अपने बच्चो की नीव इतनी मजबूत करनी होगी की वो थोड़े से ही हिलाने से गिरे नहीं बल्कि उसे ही गिरा दे जो उनकी नीव को हिलाना चाहता है और ये काम कोई और नहीं हम माँ-बाप ही अच्छी तरह कर सकते हैं क्युकी वो किसी ओर की नहीं हमारी और आपकी जिमेदारी है जब हम ही उन्हें संरक्षण नहीं दे पाएंगे तो हम दोषी को सजा केसे दिला पाएंगे ! 
  बच्चो मै शोषण के मामले अधिकांशतः घर की चार दिवारी से कभी बाहर निकल ही नहीं पाते दोषियों के खिलाफ केस दर्ज करवाने की बात तो बहुत दूर की है ,पर जब तक हम उनके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएंगे येसे मामले खत्म होने का नाम ही नहीं ले सकते और येसे लोगो की हिम्मत बढती चली जाएगी !ये बात १००% सच है की जितने भी इस तरह के शोषण होते हैं वो हमारे करीब के लोग ही होते हैं ! और इस मै हर वर्ग के लोग आते हैं !कुच्छ लोगो का कहना है की येसे लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं पर मेरा ये सोचना है की अगर वो मानसिक रूप से बीमार होते हैं तो अपने और दुसरे के बचो मै फर्क केसे कर लेते हैं उस वक़्त उनकी बीमारी ठीक  केसे रहती है ये सिर्फ एक क्षण की भूख भर है जो आदमी को अँधा बना देती है और मासूम का जीवन तबहा  कर देती है ! येसे व्यक्ति को बिलकुल माफ़ नहीं करना चाहिए ! हमे अपने बच्चो को अपने करीबी लोगो से हमेशा सतर्क रहना सीखना चाहिए ! जिससे वो उनकी मसुमियता का फायदा कभी अंकल ,चाचा या भाई बन कर न उठा सके ! हमे इन लोगो से ज्यादा विश्वास अपने बच्चो की बातो पर करना होगा जिससे कोई बाहर का आदमी हमसे मीठी -२ बाते करके हमारे बच्चो के साथ दुराचार न कर सके ! उन्हें इज़त करना सिखाना है पर अगर उस की आड़ मै उनसे कोई गलत व्यव्हार करे तो उसका जवाब देना भी सीखना होगा !ये सब  हमारे और आपके प्रयत्न से ही पूरा हो सकता है ! बस हमारा काम है बच्चो के अन्दर विश्वास और हिम्मत जगाने की जिससे उन्हें हमारी मदद  की जरुरत होने पर अपना मुह बंद न रखना पड़े उनका हम पर  विश्वास ही उन्हें हमसे संपर्क बनाने मै मदद करेगा !

     बच्चो को प्यार देने का अर्थ ये नहीं की हम उन्हें समय से खाना दे देना या उनके नम्बरों का लेखा जोखा देख लिया इन सब के साथ -२ हमे उनमे आने वाले बदलाव पर भी नज़र रखनी चाहिए की कही हमारा बच्चा किसी तरह की परेशानी से तो नहीं जूझ रहा या चुप -चाप क्यु रहने लगा है आदि हम ये सब काम उन्हें अपना थोडा सा समय दे  कर आसानी से कर सकते हैं और अपने बच्चो को एक सुरक्षित जीवन प्रदान कर सकते हैं !


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03 अक्टूबर 2010

आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग

पिछड़े वर्ग की पड़ताल
भारतीय समाज आज भी छोटे-छोटे समुदायों में बंटा हुआ है। वर्तमान परिस्थितियों में यह लगातार जातियों के दीर्घ समुच्चयों से छिटककर अनेक उपजातियों के लघु समुच्चयों में बंटता जा रहा है। किसी भी समाज का अध्ययन निश्चित रूप से उनके उत्थान के उद्देश्य से ही किया जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में जातिगत व्यवस्था को लेकर अनेक प्रश्न खड़े होते रहे है या किए जाते रहे हैं। इतिहासकारों एवं विद्वानों में वर्ण व्यवस्था को लेकर प्राचीन काल से ही विवाद एवं संघर्ष की स्थिति बनी रही, यहां तक कि वर्णों के वर्गीकरण की प्रक्रिया भी समानान्तर  रूप से चलती रही। कहा जाता है कि इतिहास हमारे दिमाग में होता है जो वर्तमान परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप भविष्य के लिए लिखा जाता है। भारत में स्वतंत्रता के पूर्व से ही समाज के पिछड़े वर्ग का वर्णीकरण प्रारंभ हुआ। इसका परिणाम वृहत्तर रूप में आधुनिक भारत में देखने मिल रहा है। इसी पिछड़ा वर्ग में बढ़ती वर्णोत्तरीकरण की प्रक्रिया और पिछड़े वर्ग की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान स्थिति को रेखांकित करती है संजीव खुदशाह की पुस्तक ''आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग''। जैसा कि पुस्तक के उपशीर्षक में स्पष्टï रूप से कहा गया है (पूर्वग्रह, मिथक एवं वास्तविकताएं) उसी के अनुरूप यह पुस्तक चार अध्याय में पिछड़े वर्ग की मीमांसा करती है।
लेखक ने अपनी प्रस्तावना में स्पष्टï रूप से स्वीकार किया है कि यह एक शोध प्रबंध है। शोध प्रकल्प के रूप में लेखक ने काफी संदर्भ सामग्री एकत्रित की है। इन संदर्भों में वेग, स्मृति ग्रंथों से लेकर आधुनिक इतिहासकारों एवं विचारकों के उद्धहरण व मान्यताएं शामिल हैं, मगर मुख्य रूप से यह पुस्तक डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा प्रतिपादित मान्यताओं को आधार बनाकर लिखी गई कही जा सकती है। मुख्य रूप से चार अध्याय में पिछड़े वर्ग की स्थिति की पड़ताल करती इस पुस्तक का प्रथम अध्याय पिछड़े वर्ग की उत्पत्ति और इस वर्ग के वर्गीकरण पर है। प्रथम अध्याय में मानव की उत्पत्ति पर विभिन्न धार्मिक व वैज्ञानिक मान्यताओं की चर्चा है इसमें हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था के प्रारंभिक सोपान का उल्लेख है। डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रतिस्थापित सिर्फ तीन वर्ण को मान्यता देते हुए लेखक संपूर्ण पिछड़े वर्ग को चौथे वर्ण में शामिल करता है। इस मान्यता को आगे बढ़ाते हुए प्रथम अध्याय में चौथे वर्ण में कार्य के आधार पर उत्पादक व अनुत्पादक जातियों के रूप में चौथे वर्ण का वर्गीकरण किया गया है एवं उनके उत्पादक मूल्य के आधार पर ही वर्ण व्यवस्था में उन्हें पृश्य या अस्पृश्य माना गया है।
प्रारंभिक अवधारणा के पश्चात पिछड़े वर्ग में शामिल विभिन्न पिछड़ी जातियों के गोत्र को लेकर मान्यताओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। मनुस्मृति द्वारा निर्धारित विभिन्न वर्णों के अंतरसंबंधों से उत्पन्न संकर जातियों की विस्तृत सारणी दी गई है। रक्त मिश्रण के कारण एवं इसके उत्पादों के वर्ण व वर्ग निर्धारण की पौराणिक मान्यताओं का विस्तार से अध्ययन कर उसकी पड़ताल की गई है जो काफी रोचक व जानकारीपूर्ण है। इसके साथ ही वर्तमान में शक्तिशाली और संपन्न जातियों कायस्थ, मराठा एवं कुछ अन्य पिछड़ी जातियों द्वारा स्वयं को गोत्र के आधार पर उच्च वर्ण में शामिल किए जाने की अवधारणा पर प्रश्न खड़े किए हैं। इस अध्याय में संदर्भों का हवाला देते हुए लोक मान्य देवी देवताओं को सवर्णों द्वारा स्वीकार किए जाने के पीछे निहित स्वार्थ व समाज पर उच्च वर्ण का दबदबा बनाए रखने की साजिश पर प्रकाश डाला गया है। उपलब्ध गजट एवं अभिलेखों के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अंग्रेजों द्वारा अपनी सुविधा हेतु पहली बार जातीय आधार पर भारत की जनगणना करवाई गई। दरअसल 1857 के संग्राम के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर भारत जब सीधे ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हुआ तो प्रशासनिक व्यवस्था अपने अनुरूप करने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने भारतीय समाज को जातीय आधार पर वर्गीकृत कर दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ की। इस दौर में शासक की निगाह में उच्च स्थान प्राप्त करने के उद्देश्य से सवर्णों के साथ-साथ पिछड़े वर्गों में भी जातीय अस्मिता और प्रतिष्ठा के गौरव गान की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। लेखक ने अपने शोध में यह बताया है कि पौराणिक काल से लगातार पिछड़े वर्ग को दलित पतित रखने की कोशिशों को अंग्रेजों ने विराम लगाया और मानव को मानव समझते हुए भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की दिशा में सार्थक पहल प्रारंभ की। हालांकि इस पर कुछ विद्वानों की राय यह भी है कि अंग्रेजों द्वारा धार्मिक बंटवारे के साथ-साथ समाज को जातीय आधार पर बांटने का यह कुत्सित प्रयास था। इस संदर्भ में लेखक ने डॉ. अम्बेडकर व महात्मा गांधी के पूना पैक्ट का भी जिक्र किया है। पूना पैक्ट आज भी कई दलित, पिछड़े वर्ग एवं कई सामान्य वर्ग के विचारकों की निगाह में पिछड़ों की हार माना जाता है जबकि वृहत्तर रूप में पूना पैक्ट हिन्दोस्तान को जातीय आधार पर बंटवारे से बचाने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम करार दिया जाता है। आधुनिक संदर्भ में यह दुखद है कि एक बाद फिर जातीय अस्मिता को वर्तमान सत्ताधारियों द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है। जिस पूना पैक्ट के तहत पिछड़ों या दलितों के लिए मुसलमानों की तरह पृथक निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था पर विराम लगाया गया था वह आज नए रूप में हमारे सामने है।
संजीव खुदशाह अपनी पुस्तक के इस अध्याय में आरक्षण व्यवस्था की पड़ताल करते हुए विभिन्न जातियों की अधिकृत सूची के साथ ही इस सूची में शामिल होने आतुर जातियों की चर्चा भी करते हैं। काका कालेलकर आयोग से लेकर मंडल आयोग की सिफारिशों पर तथ्यों और संभावनाओं की चर्चा की गई है। यहां लेखक 1931 में अंग्रेजों द्वारा जातीय आधार पर करवाई गई जनगणना के आंकड़े नहीं उद्धत करते जो पुस्तक को और मजबूती प्रदान करते। जबकि प्रथम अध्याय में अंग्रेजों द्वारा 1872 में करवाए गए जातीय दस्तावेजों का उल्लेख किया गया है। दरअसल यह बात काबिले गौर है कि वे आयोग स्वतंत्र भारत में गठित किए गए जो कि आधुनिक भारत के निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में समाज का लगभग हर पिछड़ा तबका अपनी उन्नति और प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि अगड़ी जाति के कई संवेदनशील लोग भी इस आंदोलन में पिछड़े वर्ग के साथ हैं। लेखक की किताब भी उन्हीं लोगों को समर्पित है जो भारतीय समाज में मनुष्यों को समान दर्जा दिलाए जाने के लिए संघर्षरत हैं। यह समर्पण उनकी मंशा व मानसिकता को पाठकों के सामने उद्घाटित करता है।
भारतीय समाज के पिछड़े वर्ग में राजनैतिक महात्वाकांक्षाओं का आगाज गुलामी के दौर में ही दक्षिण में हो चुका था मगर उत्तर भारत में लंबे समय तक कांग्रेस राजनैतिक क्षेत्र में पिछड़े वर्ग की हिमायती के रूप में अपना स्थान बनाए रखी। मंडल आयोग के गठन एवं उसकी सिफारिशों के पश्चात कांशीराम ने उन सिफारिशों के क्रियान्वयन हेतु पिछड़े वर्ग को संगठित कर नए समीकरण की शुरूआत की। इस पुस्तक में इस जागृति और आंदोलन पर भी चर्चा करते हुए यह बताया गया है कि कांशीराम के उदय से भारतीय राजनीति में न सिर्फ हिन्दू बल्कि मुसलमानों के भी पिछड़े वर्ग की प्रतिष्ठïा पुन:स्थापित होने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। दरअसल आदिकाल से उत्तर भारत में सामाजिक आंदोलन कभी भी व्यापक रूप से परिवर्तन कर पाने में सक्षम नहीं रहे। उत्तर भारत में राजनैतिक सत्ता ही जातीय प्रतिष्ठïा या सामाजिक व्यस्था में जातीय समीकरण के उत्थान व पतन की कारक रहीं। इस बात पर लेखक ने कुछ पिछड़ी जनजातियों की शासक व विजयी जातियों एवं समुदाय के वीर पुरुषों का जिक्र किया है।
अंतिम अध्याय में लेखक पिछड़े वर्ग में शामिल जातियों की हड़ताल करते हुए एक बार फिर कार्य के आधार पर जातियों की व्याख्या एवं वर्गीकरण करते हुए मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार अधिकृत रूप से पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों का विस्तृत विवरण देते हैं। इस सूची में सभी धर्मों एवं समुदाय की पिछड़ी जातियों का विवरण है। इसी अध्याय में वे पिछड़े वर्ग की समस्याओं के कारणों एवं उसके समाधान की संक्षिप्त चर्चा करते हैं। आरक्षण के पक्ष विपक्ष में प्रश्नोत्तरी के माध्यम से चर्चा की गई है। आरक्षण के समर्थन में उनके तर्क एवं व्याख्या समीक्षा में शामिल नहीं किए जा सकते क्योंकि ये उनके अपने विचार हैं जो किसी शोध के नहीं अपितु नैतिक व समतामूलक समाज की पक्षधरता को रेखांकित करते हैं। लेखक के इन विचारों से पाठक अपनी समझ या मानसिकता के अनुसार सहमत या असहमत होने का पूरा अधिकार रखता है।
संजीव खुदशाह छत्तीसगढ़ के हैं। इस बात का उल्लेख दो कारणों से आवश्यक सा लगता है। पहला इसलिए कि पूरी पुस्तक की भाषा बहुत सौम्य और विनय प्रधान है। स्वर कहीं भी आक्रामक या आरोपात्मक नहीं होते जबकि हाल के वर्षों में इस तरह का अधिकतर लेखन आक्रामक ही रहा है। यह शायद इसलिए भी है कि छत्तीसगढ़ में प्राचीनकाल से ही प्रचलित सामाजिक व्यवस्था उस आक्रामक व वीभत्स रूप से नहीं रही, मगर इस जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र में उत्तरीय औपनिवेशकों के आगमन के साथ वर्ण व्यवस्था की जड़ें फैलती गई। दूसरा महत्वपूर्ण कारण इस क्षेत्र से होने के बावजूद संजीव खुदशाह की पिछड़े वर्ग की इस वृहत्तर शोधपरक पुस्तक में स्थानीय पिछड़े वर्ग की लगभग अनदेखी निराश करती है। छत्तीसगढ़ में भी पिछड़े वर्ग के पुनरुत्थान के लिए लगातार संघर्ष हुए हैं। हालांकि उनकी पुस्तक प्रांतीय या क्षेत्रीय सीमाओं में बांधकर नहीं देखी जा सकती मगर विभिन्न समाज सुधारकों के संक्षिप्त परिचय में छत्तीसगढ़ के ख्यातनाम और सतनाम के प्रवर्तक गुरु घासीदास की अनुपस्थिति कुछ निराश करती है।
आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग पुस्तक में लेखक ने बहुत परिश्रम व लगन से शोध कार्य किया है। यह पुस्तक संजीव खुदशाह की पूर्व कृति ''सफाई कामगार समुदाय'' की अगली कड़ी के रूप में सामने आई है। ''सफाई कामगार समुदाय'' काफी चर्चित पुस्तक रही है। यह पुस्तक उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए पिछड़े वर्ग की वर्तमान स्थिति को उजागर करती है। लेखक ने सभी वर्ण व वर्ग की व्याख्या में पूरी तटस्थता बरती है। उनकी खोजपूर्ण पुस्तक में हालांकि सभी तथ्यों एवं उद्धहरण को शामिल किया जा पाना संभव नहीं हो सकता फिर भी यह एक गंभीर विमर्श की मगर पठनीय पुस्तक है। प्रथम कृति ''सफाई कामगार समुदाय'' के पश्चात लेखक संजीव खुदशाह की ''आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग'' लंबे अंतराल के पश्चात आई है मगर इस पुस्तक के लिए की गई मेहनत के परिणामस्वरूप शोधार्थियों के साथ ही आम पाठकों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।

27 सितंबर 2010

चपरासी से भी कम वेतन सरकारी शिक्षकों क

सुनने में कुछ अजीब लगेगा, परंतु कड़वा सच है कि बिहार में एक लाख से अधिक सरकारी शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन मिलता है। इन शिक्षकों को चपरासी भी ताने देते हैं, उन्हें आंखें दिखाते हैं। सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले चपरासी के वेतन आठ हजार से कम नहीं, परंतु इन शिक्षकों को चार से सात हजार ही मिलते हैं।
पंचायत, ग्राम पंचायत, नगर पंचायत व प्रखंड के अनट्रेंड शिक्षकों को 4000, ट्रेंड को 5000 एवं हाईस्कूल के शिक्षकों को 6000 मानदेय के रूप में मिलते हैं। वहीं, प्लस टू के शिक्षकों को 7000 मानदेय, वो भी हर माह नहीं। कभी छह माह तो कभी आठ माह पर। इन शिक्षकों ने जब मानदेय बढ़ाने के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू किया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो टूक शब्दों में कहा कि जिन्हें नौकरी करनी है करें, वर्ना दूसरी ढूंढ़ लें। उन्होंने यह भी कहा कि चपरासी सरकारी कर्मचारी  हैं।
शिक्षक सरकारी नहीं हैं। ये शिक्षक पंचायत, नगर निगम, जिला परिषद के अधीन कार्यरत हैं। नीतीश ने कहा कि मानदेय बढ़ाने के पहले शिक्षकों की दक्षता की जांच की जाएगी। एनुअल और सप्लीमेंट्री की तर्ज पर परीक्षा होगी। मानव संसाधन विभाग के प्रधान सचिव ने कहा कि शिक्षक नियोजन नियमावली 2006 में स्पष्ट प्रावधान है कि नवनियोजित शिक्षकों का तीन वर्ष बाद मूल्यांकन किया जाएगा। इसी आधार पर शिक्षकों का मानदेय 400 से 500 बढ़ाया जाएगा। इधर, शिक्षकों के वेतन मामले को हवा दे रहे हैं राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद। लोकसभा  चुनाव में करारी हार के बाद चुनाव के लिए उन्हें एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।
चंद माह बाद ही बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है। ऐसे में नीतीश सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या बन सकती है? नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में 2005 में बिहार की सत्ता संभाली। तब उन्हें विरासत में मिली सूबे की टूटी सड़कें, गरीबी, बेरोजगारी। उस समय सूबे के सभी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी थी। दूसरी ओर टीचर ट्रेनिंग किए हजारों युवा बेरोजगार थे। कई ने तो टीचर ट्रेनिंग बीस साल पहले किया था, परंतु अब भी बेरोजगार थे।
नीतीश कुमार ने चुनाव के पहले इन सभी को रोजगार देने की बात कही थी। सत्ता में आने के बाद इतने शिक्षकों की बहाली उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद नीतीश सरकार ने निर्णय लिया कि शिक्षकों की बहाली की जाएगी। आनन-फानन में एक लाख से अधिक शिक्षकों की बहाली कर दी। उस समय बेरोजगारों ने यह नहीं देखा कि वे शिक्षक तो बन रहे हैं, पर वेतन उन्हें चपरासी से भी कम मिलेगा? इतने पैसे में उनका गुजारा कैसे होगा? दूसरी ओर नीतीश सरकार की सोच थी कि इन शिक्षकों को उन्हीं के शहर या गांव में पोस्टिंग कर दी जाए। बहाल शिक्षकों की कोई परीक्षा नहीं ली गयी बल्कि डिग्री देख उनकी बहाली कर दी गई।
इसमें ऐसे शिक्षक भी शिक्षक बन गए, जो पठन-पाठन भूल चुके थे। जब शिक्षकों ने स्कूलों में योगदान दिया तो वहां पहले से मौजूद शिक्षकों को पन्द्रह-बीस हजार मासिक मिल रहे थे। यह देख उन शिक्षकों की आत्मा ने धिक्कारा, जो वास्तव में योग्य थे। चाहे जो कुछ हो यह सही है कि शिक्षक बनने के बाद हजारों लड़कियों की शादी बिना दहेज हो गई।

कुंआरे बाप बन रहे छात्र‌-

‌सुनकर चौंकना स्वाभाविक है। परंतु सच है कि भारत में कई छात्र हर माह कुंआरे बाप बन रहे हैं। इसके लिए न इन्हें शादी रचाने की जरूरत है और न ही किसी महिला से संबंध बनाने की। बाप बनने के लिए समाज इन्हें बुरा-भला भी नहीं कर रहा बल्कि शाबाशी के साथ इन्हें मिल रहे रुपए, ‌कभी हजार तो कभी पांच  हजार।
दिल्ली, ‌मुंबई, ‌कोलकाता सहित कई बड़े राज्यों में खुले स्पर्म बैंक में डोनर अधिकतर कम उम्र के छात्र हैं। ये धड़ल्ले से अपना स्पर्म बेच रहे हैं। संबंधित बैंक पहले इनका चेकअप करता है-मसलन कहीं इन्हें एडस,हेपेटाइटिस तो नहीं। इसके पश्चात ही इनका स्पर्म लिया जाता है। बता दें कि भारत में स्पर्म बैंक तो खुल गए, ‌मगर लोक-लाज के भय से इज्जतदार लोग यहां आने से कतराते हैं। ऐसे में छात्र वर्ग की तरफ स्पर्म बैंक का रुझान ज्यादा है। छात्रों को चाहिए रुपए। ये पाकेट खर्च के लिए स्पर्म बेच खुश हो रहे हैं। वे इसके निगेटिव पहलू से बिल्कुल अनजान हैं। बकौल चिकित्सक कई नि:‌संतान दंपति सुंदर बच्चे चाहते हैं। ऐसे में वे यह भी देखते हैं कि डोनर स्वस्थ हो। इसके लिए वे मनमानी रकम देने के लिए भी तैयार रहते हैं।
इधर, ‌डोनेट करने वाले कुछ छात्रों का कहना है कि इससे उनका पाकेट खर्च निकल जाता है। यह पूछने पर कि क्या इसकी जानकारी उनके अभिभावकों को है-वे ना में सिर हिलाते हैं। वास्तव में स्पर्म बैंक की परिकल्पना वैसी नि:‌संतान दंपतियों के लिए की गई थी।, ‌जिनके आंगन में कुछ कारणवश बच्चे किलकारी नहीं भर सकें।
दुनिया के कई देशों में यह पूरी तरह कामयाब  भी है। भारत में भी इसकी शुरुआत बेहतरी के लिए ही हुआ था। यह अलग बात है कि स्थापना के साथ ही यह व्यवसाय बन गया। इसके संस्थापक मोटी रकम वसूल रहे। हालांकि सूत्र बता रहे हैं कि यह अभी पूरी तरह कामयाब नहीं हो सका है।
सरकार को इसपर ध्यान देने की जरूरत है। चंद रुपयों के लिए लोभ में पड़नेवाले छात्रों को भी अपने अभिभावक से परामर्श के पश्चात ही कोई कदम उठाना चाहिए। साथ ही स्पर्म डोनेट करने के लिए लोगों को आगे आना चाहिए ताकि भारत में भी स्पर्म बैंक की परिकल्पना पूरी तरह से साकार हो सके।

26 सितंबर 2010

देश का 17 लाख करोड़ रुपया लूटा जाता है प्रतिवर्ष : राजीव दीक्षित

इनके रहते स्वतंत्रता व स्वराज्य बेमानी है। उन्होंने बलपूर्वक कहा कि देश का 72 लाख करोड़ रुपया स्विस बैंक में जमा है जहां 80 हजार खाते इस देश के नेताओं और अधिकारियों के हैं। इस धन को वापस लाना और राष्ट्र की सम्पत्ति घोषित करवा विकास में लगाने का लक्ष्य भारत स्वाभिमान मंच ने रखा है।
उन्होंने कहा कि इसीलिए हमने तय किया है कि आगामी 2014 के लोकसभा के चुनावों में भारत स्वाभिमान चुनिंदा लोगों को चुनाव लड़ाकर संसद में पहुंचाएगा जिससे देश में गुलामी की व्यवस्था स्थापित करने के लिए बनाए गए 34 हजार से भी अधिक कानूनों को बदला जा सके और 63 वर्षों से अंग्रेजों से मुक्त होने के बाद भी भ्रष्टाचार में डूबी इस व्यवस्था को बदलकर एक नये भारत का निर्माण किया जा सके। इससे पूर्व स्वाभिमान ट्रस्ट के सचिव ने जिला के गांव रिसालियाखेड़ा में एक सम्मेलन को सम्बोधित किया।

ऑस्कर के लिए भारतीय प्रविष्टि होगी ‘पीपली लाइव’

भारत में कर्ज में डूबे किसानों की समस्याओं का चित्रण करने वाली फिल्म ‘पीपली लाइव’ को अगले साल के ऑस्कर पुरस्कारों की सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म श्रेणी में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर चुना गया है। भारतीय फिल्म फेडरेशन के महासचिव सुप्राण सेन ने बताया, ‘पीपली लाइव को ऑस्कर के लिए 27 फिल्मों में से भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर चुना गया है।’ नवोदित निर्देशक अनुषा रिजवी की इस फिल्म में रंगमंच के कलाकारों ने अभिनय किया है।   आमिर खान के लिए यह तीसरा मौका है जब उनकी फिल्म को इस बाबत चुना गया है। इससे पहले उनकी फिल्म ‘लगान’ (2001) और ‘तारे जमीन पर’ (2007) ने भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

मेरा भारत अपने पैरों पर खड़ा है

ताकत का अंदाजा इसी बात से ही लग जाता है की रिश्वत खोरों के इतना लूटने के बाद भी मेरा भारत अपने पैरों पर खड़ा है शायद लूटने वाले जानते हैं कि समुद्र से एक लोटा पानी ही ले रहे हैं काश वे समझ सकते कि लोटा भरने वाला वही एक नहीं कई हैं अगर सारे पानी भरना बंद कर दें तो देश आसानी से तरक्की कर सकेगा