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02 फ़रवरी 2011

census of india

       भारत के महारजिस्ट्रार के कार्यालय में हिंदी अनुभाग संविधान के अनुच्छेद ३४३ से ३५१ तक के प्रावधान के अनुरूप कार्य करते हुए संविधान की अपेक्षाओ की पूर्ति में संलग्न है । इसके लिए राजभाषा अधिनियम एवं नियमो के अनुरूप निदेशालय के मुख्यालय एवं महारजिस्ट्रार के अधीन विभिन्न जनगणना कार्य निदेशालय एवं भाषा प्रभाग कोलकाता में संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्वयन की निगरानी करता है । यथावश्यक मार्ग दर्शन भी उपलब्ध करता है । राजभाषा अधिनियम की धारा ३(३) के अंतर्गत आने वाले समस्त कागजातों तथा संकल्प, सामान्य आदेश नियम की अधिसूचनाएं, प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्टो, प्रेस विज्ञप्‍ति, संसद की किसी सदन या दोनों सदनों के समक्ष राखी जाने वाली रिपोर्टो, सरकारी कागजात, संविदाएं, करार, अनुज्ञप्‍तियां, अनुज्ञापन, टेंडर नोटिस तथा टेंडर फार्म आदि द्विभाषी जरी किये जाते है ।
हिंदी पखवाडा -२०१० :
पुरुष्कार वितरण समारोह के दौरान प्रतिभागियो को संबोधित करते हुए भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त डॉ सी. चंद्रमौलि साथ में बैठे हैं भारत के अपर महारजिस्ट्रार श्री रमेश चन्द्र सेठी
 
       केन्द्र सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों तथा उनसे संबंद्ध अधीनस्‍थ कार्यालयों एवं केन्‍द्र सरकार के स्‍वामित्‍व में या नियंत्रणाधीन निगमों/उपक्रमों/बैंकों आदि से राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम में दिए गए मूल पत्राचार के अनुरूप पत्राचार करता है। इस निदेशालय में ‘क’, ‘ख’ एवं ‘ग’ क्षेत्रों के साथ लगभग ९७% मूल पत्राचार हिंदी में किया जाता है जो लक्ष्‍य से थोड़ा कम है । यह कार्यालय राजभाषा नियम, ५ के अनुसार हिंदी में प्राप्‍त पत्रों का उत्‍तर हिंदी में देता है । फाइलों पर टिप्‍पणियां लक्ष्‍य के अनुसार हिंदी में लिखने का प्रयास महारजिस्‍ट्रार के कार्यालय द्वारा सतत् रूप में करने का प्रयास किया जाता है । हिंदी भाषा व हिंदी टाइपिंग व आशुलिपि की प्रशिक्षण के कार्यक्रमों को भी लक्ष्‍यानुसार चलाया जाता है । हिंदी में ई-बुक सहित महारजिस्‍ट्रार के कार्यालय में पुस्‍तकों की खरीद पर लक्ष्‍य के अनुरूप खर्च किया जाता है ।
       महारजिस्ट्रार के कार्यालय में कम्प्यूटर सहित सभी प्रकार के उपकरणों की खरीद राजभाषा विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप की जाती है । कम्प्यूटर में यूनीकोड के माध्यम से हिंदी सॉफ्टवेर डाउनलोड कर कम्प्यूटर पर हिंदी भाषा में काम करने की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है । वेबसाइट पर कार्यालय की महत्वपूर्ण सुचनाये व परिपत्र आदि देखे जा सकते है । महारजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा सूचना बोर्ड और होर्डिंग्स आदि नियमानुसार हिंदी/अंग्रेजी व क्षेत्रीय भाषाओ में बनाये जाते है ।
       जनगणना के प्रति देश के लोगों में जागरूकता एवं अभिरुचि पैदा करने के उद्देश्‍य से हिन्‍दी में श्‍लोगन तैयार किए गए जिसके माध्‍यम से जनगणना के वास्‍तविक लक्ष्‍य की ओर आम लोगों को आकर्षित किया गया। इस महत्‍वपूर्ण कार्य में जिलाधीशों व सरपंचों की भूमिका को समझते हुए उनका आहवान करने हेतु विशेष पत्र भारत के महारजिस्‍ट्रार की ओर से लिखे गए । इस प्रकार के पत्रों की सराहना हुई एवं परिणाम भी फलदायी रहा ।
       राजभाषा विभाग के निदेशों के अनुसार महारजिस्‍ट्रार के कार्यालय में वर्ष में चार बैठकें नियमित अंतराल पर की जाती है इन बैठकों में राजभाषा विभाग द्वारा जारी किए गए वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्‍यों के ऊपर विधिवत् चर्चा की जाती है और निर्णय लिए जाते हैं । तदनुसार कार्यालय में हिंदी कार्य को बढ़ावा देने की सतत् कोशिश की जाती है । बैठक में  लिए गए निर्णयों के कार्यान्‍वयन की जानकारी रिपोर्टों के माध्‍यम से ली जाती है और प्रत्‍येक बैठक में हर प्रभाग/अनुभाग की रिपोर्ट की गहनता से समीक्षा की जाती है ।
       लक्ष्‍य के अनुरूप महारजिस्‍ट्रार के कार्यालय  के अधीन कार्यरत जनगणना कार्य निदेशालयों में हिंदी के कार्यान्वयन की स्‍थिति का जायजा लेने के लिए संयुक्‍त निदेशक(रा.भा.) विभिन्‍न कार्यालयों का निरीक्षण करते हैं और निरीक्षण में पाई गई कमियों को दूर करने के लिए अनुवर्ती कार्रवाई के माध्‍यम से प्रयास करते हैं ताकि सभी कार्यालयों में प्रत्‍येक मद पर राजभाषा विभाग द्वारा निर्धारित लक्ष्‍य को प्राप्‍त किया जा सके । इसी क्रम में संयुक्‍त निदेशक(रा.भा.) ने उत्‍तर पद्रेश, पंजाब, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्‍थान, त्रिपुरा, उड़ीसा, तमिलनाडु आदि कार्यालयों का निरीक्षण किया । मुख्‍यालय के प्रशासन-1, प्रशासन-2, प्रशासन-3, प्रशासन-4, सामान्‍य अनुभाग, बजट अनुभाग, सीआरएस, सामाजिक अध्‍ययन प्रभाग, रोकड़ अनुभाग, जनगणना सैल, एमएनआईसी अनुभागों का निरीक्षण किया गया । निर्धारित लक्ष्‍य पाने की दिशा में मुख्‍यालय सहित सभी जनगणना कार्य निदेशालयों में 4 हिंदी कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है जिनमें अधिकारियों/ कर्मचारियों को हिंदी में टिप्‍पण आलेखन, मसौदा लेखन व अन्‍य कार्य करने के संबंध में जानकारी दी जाती है और अभ्‍यास भी कराया जाता है ।
       भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों/कार्यालयों में हिंदी के प्रगामी प्रयोग की स्‍थिति का जायजा लेने के लिए संसदीय राजभाषा समिति विभिन्‍न कार्यालयों का निरीक्षण करती है और आवश्‍यक बिन्‍दुओं पर सुझाव देती है व आश्‍वासन भी लेती है । इसी क्रम में वर्ष के दौरान संसदीय राजभाषा समिति की पहली उप समिति ने जनगणना कार्य निदेशालय, पुड्डुचेरी, मध्‍यप्रदेश, सिक्‍किम, केरल का निरीक्षण किया और पुड्डुचेरी तथा मध्‍यप्रदेश स्‍थित जनगणना कार्य निदेशालयों में हिंदी में किए जा रहे कार्य की सराहना की है । संसदीय राजभाषा समिति को उक्‍त निरीक्षणों में दिए गए आश्‍वासनों को समय से पूरा करने के संबंध में आवश्‍यक कार्रवाई की गई ।
       मुख्‍यालय में हिंदी के वातावरण को बनाए रखने के लिए सितम्‍बर महीने में 01 सितम्‍बर से 15 सितम्‍बर, 2010 तक हिंदी पखवाड़े का आयोजन किया गया । 14 सितम्‍बर, 2010 को हिंदी दिवस के रूप में मनाया गया । पूरे पखवाड़े के दौरान हिंदी में हिन्‍दी निबन्‍ध (हिन्‍दी भाषी), हिन्‍दी निबन्‍ध (हिन्‍दीतर भाषी),हिन्‍दी वर्तनी, सुलेख एवं श्रुतलेख, हिन्‍दी टिप्‍पण/आलेखन, पखवाड़े के दौरान सर्वाधिक काम करने जैसी विभिन्‍न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया जिसमें कार्यालय के लगभग 250 अधिकारियों/कर्मचारियों ने भाग लिया उनमें से 40 प्रतिभागियों को पुरस्‍कृत भी किया गया । इसी समय प्रश्‍न मंच प्रतियोगिता का आयोजन बड़ा ही उत्‍साहवर्धक एवं मनोहारी रहा जिसमें लगभग 100 प्रतिभागियों ने भाग लिया तथा 60 प्रश्‍नों के उत्‍तरदाताओं को तत्‍काल नकद पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया  गया । कार्यालय में प्रतिवर्ष की भांति चलाई जा रही वार्षिक प्रोत्‍साहन योजना जैसी प्रतियोगिताओं के प्रतिभागियों को भी पुरस्‍कार के लिए चुना गया । उक्‍त सभी प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्‍मानित करने के लिए दिनांक 24.09.2010 को पुरस्‍कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया । इस समारोह के मुख्‍य अतिथि डॉ. सी. चन्‍द्रमौलि, भारत के महारजिस्‍ट्रार एवं जनगणना आयुक्‍त ने अपने कर-कमलों से सभी प्रतिभागियों को पुरस्‍कार प्रदान किया और उनकी सफलता के लिए उन्‍हें बधाई दी । महारजिस्‍ट्रार महोदय ने हिंदी पखवाड़े की इस सफलता को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से कार्यालय के सभी अधिकारियों/कर्मचारियों में हिंदी में कार्य करने की प्रेरणा जगती है ।
       वर्ष के दौरान अनुभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों द्वारा भारत की जनगणना 2011 से संबंधित सभी कागजातों जैसे मकानसूचीकरण, मकानों को नम्‍बर देना, जनगणना 2011 के पूर्व परीक्षण से संबंधित मकान सूची और परिवार अनुसूची, राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर आदि का कार्य प्राथमिकता के आधार पर किया । इसके अलावा अन्‍य महत्‍वपूर्ण अनुवादों में परिवार अनुसूची को भरने के लिए अनुदेश पुस्‍तिका, मंत्रिमंडल टिप्‍पण, जनगणना-2011 के परिपत्र 1 से 24 तक, वार्षिक स्‍वास्‍थ्‍य सर्वेक्षण (एएचएस) दस्‍तावेज, सारणी करण योजना संबंधी परिपत्र -1, ईडीपी  संबंधी जनगणना परिपत्र- 2,  भर्ती नियम, सिविल रजिस्‍ट्रीकरण प्रणाली, वार्षिक कार्य योजना, संक्षिप्‍त मकान सूची सार, मास्‍टर ट्रेनर फैसिलीटेटर गाइड, मास्‍टर ट्रेनर गाइड आदि शामिल हैं ।
       मुख्‍यालय तथा जनगणना कार्य निदेशालयों में तैनात अधिकारियों/कर्मचारियों में रचनात्‍मक प्रतिभा को उभारने की दृष्‍टि से गृह पत्रिकाओं के प्रकाशन का कार्य किया जाता है। मुख्‍यालय का हिंदी अनुभाग जहां एक ओर अपने मार्ग दर्शन एवं सहयोग से विभिन्‍न जनगणना कार्यालयों में गृह पत्रिकाओं के प्रकाशन में सहभागी होता है वहीं दूसरी और मुख्‍यालय में भी गृह पत्रिका के प्रकाशन का कार्य संपन्‍न किया जाता है । पिछले दो वर्षों से जनगणना मंथन पत्रिका के प्रकाशन का कार्य इस दिशा में एक सराहनीय कदम है । जनगणना का प्रथम अंक जनवरी, 2010 तक प्रकाशित हुआ था । जनगणना मंथन का द्वितीय अंक भी दिसम्‍बर, 2010 में प्रकाशित हो गया । इस प्रकाशन के माध्‍यम से अधिकारियों/कर्मचारियों की सृजनात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति को बढ़ावा देने का पूर्ण प्रयास किया जा रहा है ताकि सभी अधिकारियों/कर्मचारियों में हिंदी में लिखने और कार्य करने की प्रवृति बढ़े। इस प्रयास के चलते अधिकारी/कर्मचारी अपना काम मूलरूप से हिंदी में करने के लिए उद्यत हो रहे हैं ।
       इस प्रकार उक्‍त प्रयासों के माध्‍यम से महारजिस्‍ट्रार के कार्यालय का हिंदी अनुभाग राजभाषा हिंदी के कार्यान्‍वयन की दिशा में अग्रणी भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है । भारत के  महारजिस्‍ट्रार एवं जनगणना आयुक्‍त स्‍वयं राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन की दिशा में समय-समय पर विशेष रूप से पहल करते रहते हैं जिससे प्रेरणा लेकर बाकी अधिकारी/कर्मचारी भी इस ओर अभिरुचि दिखा रहे हैं । विगत वर्षों की तुलना में राजभाषा हिंदी का कार्य दिनों-दिन आगे बढ़ रहा है और आशा है कि निकट भविष्‍य में महारजिस्‍ट्रार का कार्यालय हिंदी कार्यान्‍वयन की दिशा में उन सभी लक्ष्‍यों को प्राप्‍त कर लेगा जो राजभाषा विभाग द्वारा निर्धारित किए गये हैं । कार्यालय के सतत् प्रयासों से हिंदी को आगे बढ़ाने की दिशा में संविधान की मंशा के अनुरूप कार्य संपन्‍न हो रहे हैं । आगे आने वाले समय में संविधान निर्माताओं की उन भावनाओं को पूर्ण करने का प्रयास होगा जिसके तहत उन्‍होंने हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया है ।

06 जनवरी 2011

मौत के महासागर का अनसुलझा रहस्य

मौत के महासागर का अनसुलझा रहस्य 
अथाह समुद्र और ऊँचे आसमान में अजीबो-गरीब घटनाक्रम की बातें पहले भी सुनने में आई हैं, लेकिन अटलांटिक महासागर का एक हिस्सा ऐसा है, जिसकी गुत्थी आज तक कोई नहीं सुलझा सका है। पूर्वी-पश्चिम अटलांटिक महासागर में बरमूडा त्रिकोण है। यह भुतहा त्रिकोण बरमूडा, मयामी, फ्लोरिडा और सेन जुआनस से मिलकर बनता है। इस इलाके में आज तक अनगिनत समुद्री और हवाई जहाज आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए हैं और लाख कोशिशों के बाद भी उनका पता नहीं लगाया जा सका है। कुछ लोग इसे किसी परालौकिक ताकत की करामात मानते हैं, तो कुछ को यह सामान्य घटनाक्रम लग रहा है। यह विषय कितना रोचक है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस पर कई किताबें और लेख लिखे जाने के साथ ही फिल्में भी बन चुकी हैं।सदियों से चर्चा का विषय रहे इस त्रिकोण के क्षेत्रफल को लेकर भी तरह-तरह की बातें कही और लिखी गई हैं। इस मसले पर शोध कर चुके कुछ लेखकों ने इसकी परिधि फ्लोरिडा, बहमास, सम्पूर्ण केरेबियन द्वीप तथा महासागर के उत्तरी हिस्से के रूप में बाँधी है। कुछ ने इसे मैक्सिको की खाड़ी तक बढ़ाया है। शोध करने वालों में इसके क्षेत्रफल को लेकर सर्वाधिक चर्चा हुई है।
इस क्षेत्र में हवाई और समुद्री यातायात भी बहुतायत में रहता है। क्षेत्र की गणना दुनिया की व्यस्ततम समुद्री यातायात वाले जलमार्ग के रूप में की जाती है। यहाँ से अमेरिका, यूरोप और केरेबियन द्वीपों के लिए रोजाना कई जहाज निकलते हैं। यही नहीं, फ्लोरिडा, केरेबियन द्वीपों और दक्षिण अमेरिका की तरफ जाने वाले हवाई जहाज भी यहीं से गुजरते हैं। यही कारण है कि कुछ लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि इतने यातायात के बावजूद कोई जहाज अचानक से गायब हो जाए। ऐसे में कोई दुर्घटना होती है तो किसी को पता चल ही जाता है। 
मशहूर अन्वेषक क्रिस्टोफर कोलंबस पहले लेखक थे, जिन्होंने यहाँ के अजीबो-गरीब घटनाक्रम के बारे में लिखा था। बकौल क्रिस्टोफर- उन्होंने और उनके साथियों ने आसमान में बिजली का अनोखा करतब देखा। उन्हें आग की कुछ लपटें भी दिखाई दीं। इसके बाद समुद्री यात्रा पर निकले दूसरे लेखकों ने अपने लेखों में इस तरह के घटनाक्रम का उल्लेख किया।

16 सितंबर 1950 को पहली बार इस बारे में अखबार में लेख भी छपा था। दो साल बाद फैट पत्रिका ने ‘सी मिस्ट्री एट अवर बैक डोर’ शीर्षक से जार्ज एक्स. सेंड का एक संक्षिप्त लेख भी प्रकाशित किया था। इस लेख में कई हवाई तथा समुद्री जहाजों समेत अमेरिकी जलसेना के पाँच टीबीएम बमवर्षक विमानों ‘फ्लाइट 19’ के लापता होने का जिक्र किया गया था।

फ्लाइट 19 के गायब होने का घटनाक्रम काफी गंभीरता से लिया गया था। इसी सिलसिले में अप्रैल 1962 में एक पत्रिका में प्रकाशित किया गया था कि विमान चालकों को यह कहते सुना गया था कि हमें नहीं पता हम कहाँ हैं। पानी हरा है और कुछ भी सही होता नजर नहीं आ रहा है। जलसेना के अधिकारियों के हवाले से लिखा गया था कि विमान किसी दूसरे ग्रह पर चले गए। यह पहला लेख था, जिसमें विमानों के गायब होने के पीछे किसी परालौकिक शक्ति का हाथ बताया गया था। इसी बात को विंसेंट गाडिस, जान वालेस स्पेंसर, चार्ल्स बर्लिट्ज़, रिचर्ड विनर, और अन्य ने अपने लेखों के माध्यम से आगे बढ़ाया।

इस मामले में एरिजोना स्टेट विश्वविद्यालय के शोध लाइब्रेरियन और ‘द बरमूडा ट्रायंगल मिस्ट्रीः साल्व्ड’ के लेखक लारेंस डेविड कुशे ने काफी शोध किया तथा उनका नतीजा बाकी लेखकों के अलग था। उन्होंने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से विमानों के गायब होने की बात को गलत करार दिया। कुशे ने लिखा कि विमान प्राकृतिक आपदाओं के चलते दुर्घटनाग्रस्त हुए। इस बात को बाकी लेखकों ने नजरअंदाज कर दिया था।

ऑस्ट्रेलिया में किए गए शोध से पता चला है कि इस समुद्री क्षेत्र के बड़े हिस्से में मिथेन हाईड्राइड की बहुलता है। इससे उठने वाले बुलबुले भी किसी जहाज के अचानक डूबने का कारण बन सकते हैं। इस सिलसिले में अमेरिकी भौगोलिक सर्वेक्षण विभाग (यूएसजीएस) ने एक श्वेतपत्र भी जारी किया था। यह बात और है कि यूएसजीएस की वेबसाइट पर यह रहस्योद्‍घाटन किया गया है कि बीते 15000 सालों में समुद्री जल में से गैस के बुलबुले निकलने के प्रमाण नहीं मिले हैं। इसके अलावा अत्यधिक चुंबकीय क्षेत्र होने के कारण जहाजों में लगे उपकरण यहाँ काम करना बंद कर देते हैं। इससे जहाज रास्ता भटक जाते हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।

बहरहाल, तमाम शोध और जाँच-पड़ताल के बाद भी इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सका है कि आखिर गायब हुए जहाजों का पता क्यों नहीं लग पाया...उन्हें आसमान निगल गया या समुद्र लील गया...दुर्घटना की स्थिति में भी मलबा तो मिलता...ये प्रश्न अनुत्तरित हैं। 

11 दिसंबर 2010

वन्दे मातरम दोस्तों

सारी फिजा जहरीली हो गई, नफरतों के जहर से,
अमन का पैगाम लेकर, हम भी निकले हैं मगर .................

आदमी ही आदमी के, खून का प्यासा है आज,
प्यार के कुछ जाम लेकर, हम भी निकले हैं मगर............

लहू में पैवस्त हो गया, झूठ, धोखा और फरेव.
सफाई का पर काम लेकर, हम भी निकले हैं मगर.........

जाति, भाषा, प्रान्त, मजहब, आपस में है लड़ रहे,
शांति पिरय अवाम लेकर, हम भी निकले हैं मगर..............

जनता का खूँ चूसा बहुत, नेताओं ने होने अमर,
उनकी मौत का अंजाम लेकर, हम भी निकले हैं मगर .............

गायव जहां से हो चुके, दिन रात के जो दरम्यां,
वो हंसी शुबहों शाम लेकर, हम भी निकले हैं मगर....
नाग कितने डस गये, जीस्त की रंगीनियों को,
वो रंगीनियाँ तमाम लेकर, हम भी निकले हैं मगर................

जमाने बदलने के लिए, अवतार जन्मेंगे कहाँ तक,
संग आदमी आम लेकर, हम भी निकले हैं मगर .................

25 नवंबर 2010

5 में से सिर्फ 1 शहरी मोबाइल ग्राहक 3जी सेवा लेगा:






: पांच शहरी मोबाइल ग्राहकों में से सिर्फ एक ग्राहक ही तीसरी पीढ़ी (3जी) सेवा की ओर रुख

करेगा। अनुसंधान फर्म नील्सन कंपनी के आज जारी अध्ययन में यह जानकारी दी गई है।

नील्सन के अध्ययन में कहा गया है कि 3जी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है और इसकी तेज गति की इंटरनेट सेवा देने की क्षमता है, लेकिन इसके बावजूद देश में इस सेवा के आम मोबाइल ग्राहक तक पहुंचने में आठ से दस साल का समय लगेगा।

अध्ययन के अनुसार, 70 प्रतिशत शहरी मोबाइल ग्राहकों ने कहा कि वे 3जी सेवा के बारे में जानते हैं। नील्सन कंपनी के निदेशक (ग्राहक समाधान-भारत) अर्जुन उर्स ने कहा कि हालांकि ऑपरेटर ग्राहकों के बीच 3जी सेवा को लोकप्रिय बनाने में तो कामयाब रहे हैं, पर शुरुआत में ग्राहक इस सेवा को अपनाने के लिए उतना तैयार नहीं है।

सर्वेक्षण में शामिल 19 फीसदी उपभोक्ताका कहना था कि वे निश्चित रूप से 3जी सेवा का रुख करेंगे, वहीं 43 फीसदी ने कहा कि वे इस सेवा का अपना सकते हैं और नहीं भी। वहीं पांच प्रतिशत ने कहा कि वे इस सेवा की ओर रुख नहीं करेंगे।

उर्स ने कहा कि पेशेवर और प्रौद्योगिकी के प्रति जानकारी रखने वाले युवा सबसे पहले 3जी की ओर जाएंगे। अध्ययन में कहा गया है कि यदि ऑपरेटर 3जी सेवा को बढ़ाने के लिए इसकी कीमत घटाते हैं, तो इससे निश्चित रूप से उनका कारोबार बढ़ेगा।

09 नवंबर 2010

उच्च शिक्षा के लिए लोन

उच्च शिक्षा के लिए लोन लेना है तो कुछ जरूरी बातें जानना आपके लिए जरूरी है।
पात्रता : वह विद्यार्थी एजुकेशन लोन लेने का पात्र है जो भारतीय नागरिक हो अपना दाखिला पक्का कर चुका हो।
किन कोर्स के लिए मिलेगा लोन : भारत या विदेशों की मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी के सभी अंडर ग्रेजुएट कोर्स, पोस्ट ग्रेजुएट, डिस्टेंस लर्निंग या प्रोफेशनल कोर्र्सो के लिए लोन मिल सकता है।
अधिकतम कितना लोन मिलेगा
और कैसे : भारत और विदेशों में पढ़ाई के लिए क्रमश: 10 लाख व 20 लाख तक का लोन मिल सकता है। 4 लाख तक के लोन के लिए किसी सिक्युरिटी की जरूरत नहीं है। 7.5 लाख रुपए से ज्यादा के लोन के लिए कोलैट्रल सिक्युरिटी जरूरी होगी।
लोन में क्या कवर होता है और कैसे : कालेज की फीस, होस्टल चार्ज, परीक्षा, प्रयोगशाला व लाइब्रेरी का शुल्क। कोर्स के लिए जरूरी सभी एजूकेशनल आर्टिकल की खरीद का खर्च भी इसमें कवर होता है। यात्रा खर्च और कंप्यूटर खरीदने के लिए भी विद्यार्थी को पैसे दिए जाते हैं। आम तौर पर जब भी जरूरत होती है तब बैंक डिमांड ड्राफ्ट को सीधे यूनिवर्सिटी को भेज देती है।
ब्याज दर और वापसी : लोन की ब्याज दर अलग-अलग बैंक के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। हालांकि ब्याज दर 10 प्रतिशत से 12.50 प्रतिशत के बीच होगी। एसबीआई की ब्याज दर 11.25 प्रतिशत है और अभ्युदय बैंक की ब्याज दर 10.5 प्रतिशत है। कर्जदाता नौकरी मिलने के 6 महीने या कोर्स पूरा होने के एक साल बाद लोन चुकाना शुरू कर सकते हैं। लोन को 5 से 7 साल की अवधि में चुकाया जा सकता है।

mera bharat

चीन ने भी माना, भारत उसे पछाड़ सकता है
Source: बिजनेस ब्यूरो   |   Last Updated 13:56(09/11/10)
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इससे पहले

    * पैकेज घोषित नहीं मगर चीन को 8प्रतिशत विकास का भरोसा
    * विकास दर में चीन को पीछे छोड़ सकता है भारत
    * चीन में सरकार को 9.5फीसदी विकास दर का भरोसा



पिछले कुछ दिनों के दौरान ऐसी तमाम रिपोर्ट्स सामने आईं, जिनमें यह कहा गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था आने वाले दिनों में चीन से आगे निकल जाएगी। और अब चीन चीन को भी यह लगने लगा है कि वाकई ऐसा हो सकता है। चीन सरकार के प्रमुख नीतिगत अनुसंधान संस्थान डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर के उप निदेशक लियु शिनजिन ने ये कहा है कि विकास दर के मामले में भारत चीन को पछाड़ सकता है। लियु ने चिंता जताते हुए कहा कि उनके देश की विकास दर तीन से पांच साल में मौजूदा 10 से घटकर 7 फीसदी तक आ सकती है। वहीं इस दौरान भारत की विकास दर बढ़कर 9 फीसदी से ऊपर निकल जाएगी।


विश्व बैंक, मोर्गन स्टैनले समेत कई एजेंसियां भारतीय विकास दर के आगे निकलने का दावा पहले से ही कर रही हैं।


चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने लियु के हवाले से आगाह किया है कि अमेरिका में कर्ज सस्ता करने के फेडरल रिजर्व के ताजा कदमों से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का दबाव बढे़गा। इससे आने वाले समय में चीन को आर्थिक वृद्धि में गिरावट सहनी होगी। फेडरल रिजर्व 600 अरब डॉलर के सरकारी बांड खरीद कर बैंकों के पास कर्ज देने योग्य वित्तीय संसाधन बढ़ाएगा। चीन की अर्थव्यवस्था को अगले कुछ साल तक गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

ये हैं दुनिया के 5 सबसे अमीर देश

ये हैं दुनिया के 5 सबसे अमीर देश

Source: बिजनेस ब्यूरो   |   Last Updated 14:49(03/11/10)
 
 
 

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लंदन के लेगाटुम इंस्टीट्यूट ने दुनिया के 110 सबसे अमीर देशों की एक लिस्ट जारी की है। आर्थिक वृद्धि और लोगों के रहन सहन के स्तर को पैमाना बना कर वैश्विक समृद्धि सूचकांक नाम से जारी की गई इस रिपोर्ट में नॉर्वे का नाम दुनिया के सबसे संपन्न मुल्क के तौर पर सामने आया है।


नॉर्वे के बाद लिस्ट में दूसरे नंबर पर डेनमार्क को जगह मिली है। इसके बाद तीसरे नंबर फिनलैंड, चौथे नंबर पर ऑस्ट्रेलिया और पांचवे नंबर पर न्यूजीलैंड को जगह मिली है।


वहीं तेज आर्थिक तरक्की बावजूद भारत अमीरी के मामले में नीचे खिसक गया है। वैश्विक समृद्धि सूचकांक में इस बार भारत 88वें पायदान पर पहुंच गया है। पिछले साल इस सूचकांक में भारत को 78वां स्थान मिला था। यानी अब संपन्न के मामले में भारत दस पायदान नीचे हैं।






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08 नवंबर 2010

ओबामा को बातचीत से हटा लेंगे।

'इन 8 को भीतर बुलाओ वरना ओबामा नहीं आएंगे





नई दिल्ली. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की विनम्रता तो देखते ही बनती थी लेकिन उनके साथ चल रहे अधिकारियों की ऐंठ में कोई कमी नहीं थी। इसका नमूना उस समय देखने को मिला जब व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने अपने राष्ट्रपति को द्विपक्षीय बातचीत से हटाने तक की धमकी दे डालीयह नौबत आज उस समय आई जब दोनों देशों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता शुरू होने वाली थी और भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने व्हाइट हाउस के प्रेस वालों का कोटा आठ से घटाकर पांच तक कम कर दिव्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैटी लिली और अन्य अधिकारी इस बात पर अडे थे कि पहले से सहमत 8 संवाददाताओं को भीतर जाने दिया जाए। इस बीच व्हाइट हाउस के प्रवक्ता राबर्ट गिब्स अपना आपा खो बैठे और जोर जोर से चिल्लाकर कहने लगे कि अगर आप हमारे लोगों को भीतर नहीं जाने देंगे तो हम राष्ट्रपति ओबामा को बातचीत से हटा लेंगे।इतना ही नहीं गिब्स ने दरवाजे के सामने अपनी टांगे फंसा लीं और सुरक्षा अधिकारियों को ललकारा कि अगर उनकी मजाल है तो पैर हटाकर दिखाएं। उनका कहना था कि वह गंभीरता से कह रहे हैं कि अगर उनके आठ रिपोर्टरों को भीतर नहीं जाने दिया तो वह श्री ओबामा को बातचीत से हटाने के बारे में गंभीर हैंआखिरकार व्हाइट हाउस के आठ रिपोर्टर 11 बजकर 55 मिनट पर हैदराबाद हाउस में प्रवेश कर गए। व्हाइट हाउस के अधिकारियों के इस पूरे संवाद की रिपोर्ट वाल स्ट्रीट जनरल के व्हाइट संवाददाता जोनाथन वाइजमैन ने भी फाइल की है जो इस दौरे में श्री ओबामा के साथ चल रहे थे।

ips

ओबामा की सुरक्षा भेदने की कोशिश में फर्जी आईपीएस अफसर गिरफ्तार

Source: agencies   |   Last Updated 19:30(08/11/10)
 
 
 
 
 
 
 
मुजफ्फरनगर. खुद को आईपीएस अधिकारी बताकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने का प्रयास कर रहे एक युवक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस इस छात्र के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा रही है।

बीएससी प्रथम वर्ष का छात्र दिलीप कुमार यहां के डीएम आवास पहुंचा और कहा कि उसे ओबामा से मिलने के लिए दिल्ली जाना है और इसके लिए एक वाहन की जरूरत है। उसने कहा कि वाहन पर वीआईपी पास चस्पा होना चाहिए।

डीएम को उस पर शंका हुई और जब उन्होंने विस्तार से पूछताछ की तो उसका भेद खुल गया। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है।

अब पुलिस उससे जानकारी जुटा रही है कि क्या वाकई वह बराक ओबामा के करीब पहुंचना चाहता था और इसका उद्देश्य क्या था?

 

भारत से ऊंट और घोड़े साथ ले जाना चाहते हैं ओबामा, घर में मिशेल ही हैं बॉस

UNSC में भारत के दावे को ओबामा का समर्थन, पाक को लताड़ा

UNSC में भारत के दावे को ओबामा का समर्थन, पाक को लताड़ा

Source: dainikbhaskar.com   |   Last Updated 19:27(08/11/10)
 
 
 
 
 
 
 
नई दिल्‍ली. अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने भारत को संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद की स्‍थायी सदस्‍यता दिलाने की वकालत की है। ओबामा ने आज शाम संसद के दोनों सदनों के सदस्‍यों को संबोधित करते हुए कहा, 'अमेरिका चाहता है कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्‍थायी सीट‍ मिले। भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र की शांति सेना का अहम हिस्‍सा रहा है। हम भारत की स्‍थायी सदस्‍यता के दावे का स्‍वागत करते हैं। मैं भविष्‍य में सुरक्षा परिषद में सुधार की उम्‍मीद करता हूं।'

पाकिस्‍तान पर निशाना
मुंबई हमले का जिक्र करते हुए ओबामा ने कहा कि मुंबई हमलों के दोषियों को सजा जरूर मिलनी चाहिए। उन्‍होंने यह भी कहा, ' पाकिस्‍तान के भीतर आतंकियों के ठिकाने हमें मंजूर नहीं हैं। अल कायदा और उसके साथी संगठनों को हराना हमारा मकसद है।' ओबामा ने स्थिर और विकसित पाकिस्‍तान-अफगानिस्‍तान की वकालत की और कहा कि यह हम सबके हित में होगा। उन्‍होंने कहा, 'क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए हम भारत-पाक वार्ता के पक्ष में हैं।'

गांधी से प्रभावित
संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने संबोधन में ओबामा ने दोहराया कि वह भारत के राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी से बेहद प्रभावित हैं। उन्‍होंने कहा, ‘ मैं गांधी जी से बेहद प्रभावित हूं। मार्टिन लूथर किंग भी गांधी जी से बहुत प्रभावित थे। अहिंसा का सिद्धांत जरूरी और व्‍यवहारिक है।’  ओबामा ने अपने शानदार स्वागत के लिये एक अरब भारतीयों को धन्यवाद देते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में आना उनके लिये सम्मान की बात है। इस मौके पर उन्होंने यह भी कहा कि अपने कार्यकाल में इतनी जल्दी भारत आना उनके लिये बहुत खास है। उन्‍होंने कहा, 'एशिया दौरे में मेरा सबसे पहले यहां रुकना कोई संयोग नहीं है।'

21 सदी में भारत-अमेरिका की दोस्‍ती अहम

21वीं सदी में भारत और अमेरिका की दोस्‍ती को बेहद अहम बताते हुए ओबामा ने कहा, 'हिंदुस्‍तान ने सुपर कम्‍प्‍यूटर बनाए, चांद पर तिरंगा फहराया। शून्‍य की खोज भारत ने ही की थी। भूख का सामना करने के लिए भारत ने हरित क्रांति कर डाली। भारत के बदलने के साथ हमारे रिश्‍ते में भी बदलाव आया है। शीत युद्ध खत्‍म होने के बाद हमारे रिश्‍ते में बदलाव आया। दुनिया की खातिर दोनों देशों को एक दूसरे के करीब आना होगा। अमेरिका अपनी और साथी देशों की सुरक्षा चाहता है।'

'धन्‍यवाद' और 'जय हिंद' का संबोधन
अपने भाषण की शुरुआत 'धन्‍यवाद-' शब्‍द से करते हुए ओबामा ने कहा, ' भारत विकसित राष्ट्र बन चुका है और दुनिया में एक बड़ी ताकत के रुप में उभरा है। उन्‍होंने कहा, ' भारत आर्थिक शक्ति के तौर पर उभरा है। भारत दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था का इंजन बन चुका है। 21वीं सदी में दोनों देशों की दोस्‍ती बेहद जरूरी है।' ओबामा ने अपने भाषण का अंत 'जय हिंद' शब्‍द से किया। कार्यक्रम में उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी ने स्‍वागत भाषण दिया जबकि लोकसभा अध्‍यक्ष मीरा कुमार धन्‍यवाद ज्ञापन किया। 

उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा अध्‍यक्ष मीरा कुमार, संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने संसद भवन में ओबामा की अगवानी की। अमेरिकी राष्‍ट्रपति ने संसद में 'विजिटर बुक' यानी 'गोल्‍डन बुक' पर दस्‍तखत किए। ओबामा संसद को संबोधित करने वाले चौथे अमेरिकी राष्‍ट्रपति हैं।

30 अक्टूबर 2010

ये क्या है दोस्तों

Saturday, August 7, 2010

ये क्या है दोस्तों








शांक्सी चाइना
सभ्यता का एक पौराणिक केंद्र

Wednesday, July 28, 2010

खूबसूरती
























































































































Monday, July 19, 2010

आस्थाओं के बहाव से होती है भरपूर बारिश ?

बारिश नहीं हुई। ढोल धमाके और देवता मनाने का दौर प्रारंभ हुआ। पत्थर के बने भगवान् पानी मे डुबोये जाने लगे। गाँव वासियों ने शमशान मे हल चलाए । गधे पर बैठाकर गाँव भर मे सरपंच को घुमाया। ज़िंदा आदमी की शव यात्रा निकाली गई। मिटटी से मेंढक बनाकर मुकुट पहनाया, पालकी मे उसे बिठाकर यात्रा निकाली और
मेंढक राजा मेंढक दे
पानी की बरसात दे
के नारे लगाकर शहर भर मे घुमे । दरगाहों पर चादरे चढ़ी, ग्रन्थ साहिब का पाठ गुरुद्वारे मे हुआ चर्च मे प्रेयर की गई तो मंदिरों मे विविध धार्मिक आयोजन किये जाने लगे। सर्वधर्म प्रार्थना सभा का आयोजन भी हुआ। लोग शहर-गाँव छोड़ जंगल मे उजमनी मनाने यानी वहां जाकर भोजन बनाकर बारिश की दुआ करने लगे। मगर हाय रे बारिश ! होने का नाम ही नहीं लेती।
आज जब शहर गाँव छोड़ कर बाहर जंगल तलाशने पर पेड़ों का झुरमुट तक नजर नहीं आता और बारिश के प्रति हमारा स्वार्थ ? आस्थापरक? हम चाहते है बारिश हो बादल बरसे, चार महीने तक हमारे सर पर बने रहे। मगर हमारी करनी जो कहानी कहती है वो समस्त प्रकृति विरुद्ध ही है। हमें भूमि चाहिए मगर वृक्ष नहीं । हम खेती चाहते है , पानी चाहते है पर जंगल और जानवर नहीं ।
अब उजमानी की ही ले, रोज सवेरे बच्चो के लिए टिफिन तैयार होते हैं जिन्हें बच्चे सामूहिक रूप से रोज घर के बाहर जाकर खाते है, यह पूरे साल चलता है। अगर घर के बाहर जाकर भोजन सामूहिक रूप से करने से बारिश होती तो यह सारा देश रोज़ पानी की बरसात से लबरेज़ होता।
बारिश का एक पहलु यह भी है की वह अपने साथ विध्वंस भी लाती है। बाढ़ और सूखा उसके दो भिन्न पहलु हैं। जिन जगहों पर बारिश नहीं होती वहां के लोग बारिश होने की मन्नते करते हैं। जहां बाढ़ आ जाती वहां भगवान् से प्रार्थना की जाती है की कदापि धमाकेदार ना हो। अब भगवान् को यह समझ मे नहीं आता होगा की बारिश कहाँ करनी है और कहाँ नहीं । वे आखिर सुने तो किसकी ।
सन २००० से मध्य भारत के प्रान्त सूखे का सामना करते आ रहे हैं। मध्यप्रदेश मे जंगल लगातार कट रहे हैं बाघ की आबादी घट गई है, वृक्षों की लगातार बलि ली जा रही है। सड़कें फोरलेन होते ही जमीने महंगे दाम की हो गई। जमीनों का डायवर्शन होने लगा। सड़के बनाने के लिए किनारे लगे वृक्ष काट देने उपरान्त अब बीच मे बोगनवेलिया कनेर जैसी झाडीनुमा पौधे लगाए जाने लगे है और किनारों की सुध लेने की कोई कोशिश नहीं है ।
आज जब चिता की कीमत डेढ़गुना बढ़ गई है, महंगाई के नाम पर लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं ऐसे मे अजहर हाशमी साहब की कविता की पंक्तियाँ याद आती है जो पृथ्वी दिवस पर नईदुनिया अखबार मे छपी हैं, लिखते हैं :
बड़ी बड़ी बातों से
नहीं बचेगी धरती
वह बचेगी
छोटी-छोटी कोशिशों से
मगर हमारी मानसिकता का निरंतर छोटा प्रयास नहीं किया जा रहा है और वह प्रयास पौधों की परवरिश से सम्बंधित है.
चौथा स्तम्भ है कि वह लगातार यह बताता है की यह फोटो जिसमे पेड़ के ठूंठ नजर आ रहे हैं यह किस पेड़ के है, कब और कहाँ इन्हें काटा गया है। जिम्मेदार विभाग कौन है जिसके लापरवाह कर्मचारी हाथ पर हाथ धरे बैठे है। मगर यह कभी नहीं बताता की कहाँ पेड़ लगाए जा सकते हैं. उनकी सुचना ऐसी लगती है जैसे वे लक्कड़ चोरो से यारी किये बैठे है और उन्हें बताते रहते है कि और कहाँ कहाँ पर चोरी से लकडियाँ काटी जा सकती है. "जल ही जीवन है" का मन्त्र अब "जल ही जीवन के लिए आवश्यक उत्पाद है" मे बदल गया है. इसलिए कमर्शियल प्रयासों कि जरुरत है तुच्छ छोटे प्रयास करने के बजाय इश्वर आस्था पर निर्भर रहने कि जरूरत है । क्योंकी पानी मे आस्था का पत्थर डुबाने या अन्य टोटके की मानसिकता ही है जो मानसून के दिनों मे बरसात कराती है।

29 अक्टूबर 2010

ये समूह

मित्रो,

लिखते हुए, अक्सर किसी भाव या विचार को चुभलाते हुए, उसके स्वाद लायक़ उपयुक्त
शब्द की कमी हम सब ने महसूस की है, और ऐसा भी हुआ है कि शब्दकोश के पन्नो पर
फ़िसलती उंगलियाँ हमें सही अभिव्यक्ति तक ले जाने में असमर्थ हुई हैं। आभासी जगत
की इन नज़दीकियों ने जो हमें मौक़ा दिया है उसके ज़रिये हम एक-दूसरे को उसकी सही
अभिव्यक्ति तक पहुँचा सकते हैं।

ये समूह बस इसीलिए!

हिन्दी शब्दों के समान्तर अर्थ;
हिन्दी से उर्दू व उर्दू से हिन्दी में अर्थ;
अंग्रेज़ी से हिन्दी व हिन्दी से अंग्रेज़ी में अर्थ;
हिन्दी से अन्य भारतीय भाषाओं व अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अर्थ;
हिन्दी से अरबी-फ़ारसी व अरबी-फ़ारसी से हिन्दी में अर्थ
पर चर्चा का एक मंच।

28 अक्टूबर 2010

sms

आज दोपहर में मेरे मोबाईल पर एक कॉल आया, रिंग बजी मैने उठाया एक लड़की ने कहा कि आपने मुझे मेसेज क्यों भेजा? मैने कहा कि मेडम मैंने तो आपको कोई मेसेज नहीं भेजा, वो बोली आपने भेजा है, मैने कहा सच्ची नहीं भेजा, वो बोली मेरे मोबाईल में है मेसेज मैने कहां मेरे मोबाईल में तो आपका नम्बर ही नहीं है, पर वो थी की बहस पर बहस किये जा रही थी और कह रही थी की मेरे मोंबाईल में आपके द्वारा भेजे गये मेसेज है। मैंने सोचा मेरी कोई दोस्त होगी जो मजाक कर रही है। फिर थोड़ी देर में एक लड़के का कॉल आया उससे भी वैसी ही बहस हुई जैसी उस लड़की के साथ हुई थी। उसके बाद एक और लेडीज का कॉल आया उन्हे तो मैने पोलिस में जाने की धमकी भी दे दी, जवाब में उन्होने ने भी मुझे वैसी ही धमकी दी। अभी तक मेरे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर माजरा क्या है? क्यों लोग मेरे कभी कभार बजने वाले बेचारे गुपचुप मोबाईल को बजा बजाकर तंग कर रहे है। कहीं मेरे दोस्तो का कोई प्लान तो नहीं है? क्योंकि मैं बिना जाने पहचाने नम्बर्स के कॉल उठाता नहीं और मोबाईल से बात करना भी ज्यादा पसंद नहीं है, तो हो सकता है इसीलिए प्लान बनाया गया हो की आज इसे परेशान किया जाए?
    पर मेरा दिमाग तब ठनका जब देश के कुछ वीवीआईपी लोगो के कॉल भी मेरे मोबाईल पर आने लगे। अब तक तो मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे क्योंकि मेरे समझ आ चुका था कि आखिर माजरा क्या है। एक्चुअली आज सुबह-सुबह बॉस का फरमान आया की कोई ऐसा सॉफ्टवेयर या वेबसाईट ढूंण्डो जो फ्री में बल्क एसएमएस करता हो ताकि दीपावली की बधाई भेजी जा सके। मैने गूगल पे दे मारा सर्च अब दुनिया भर की वेबसाईटस और सॉफ्टवेयर्स पेज पर आ गये। अब मैं लगा सबको ट्राय करने। मेरी जानी पहचानी दो साईट्स sms-Gupshup गपसप और way2sms मुझे जंच गई क्योंकि इनका मैं पहले से ही मेंम्बर भी हूं। फिर मैं way2sms में ग्रूप एसएमएस ट्राय करने लगा। ये जांचने के लिए की एक साथ बहुत सारे एसएमएस जाते है की नही? मैने बॉस का मोबाईल लिया और सारे कांटेक्ट्स को सीएसवी फाईल फारमेट में बदलकर सीधे ही मेरी way2sms प्रोफाईल जो की मेरे मोबाईल नम्बर से रजिस्टर्ड थी में अपलोड कर दिया। उन कॉक्टेक्ट्स में पूरे देश विदेश के नेताओं, वीवीआईपी, वीआईपी, लोकल सारे के सारे नम्बर अपडेट हो गये।
    कांटेक्स अपलोडिंग के 5 मिनट में ही मेरी मुसिबत शुरू हो गई। सायद way2sms वेबसाईट से मेरे द्वारा जिन मोबाईल नम्बरो को मेरी प्रोफाईल में डाला गया उन्हे सूचना मेसेज गया होगा की उनका मोबाईल मेरी प्रोफाईल में एड किया गया है। उस मेसेज में मेरा नम्बर भी गया होगा। जिससे उन नम्बर वालो द्वारा मुझे वापस कॉल किया जा रहा था। चलों वैसे तो ये नेता और वीआईपी लोग सिर्फ भाषणों और फंक्सनों में ही सुने जाते है पर इसी बहाने मेरे मोबाईल ने भी इनकी आवाज सुनली।

काहे के लोक सेवक ??


फिलहाल यह कहना कठिन है कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा इकोनामी क्लास में हवाई सफर करने से उन केंद्रीय मंत्रियों को सही संदेश मिल गया होगा जो फिजूलखर्ची रोकने के कांग्रेस के अभियान को लेकर नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं। यदि सभी केंद्रीय मंत्री और विशेष रूप से कांग्रेस के मंत्री इकोनामी क्लास में हवाई सफर करना शुरू कर देते हैं तो भी इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि फिजूलखर्ची पर लगाम लग गई। यह समझ पाना कठिन है कि कांग्रेस किफायत बरतने के अपने अभियान को केवल अपने ही मंत्रियों और सांसदों तक क्यों सीमित रखना चाहती है? यदि मंत्रियों और सांसदों द्वारा फिजूलखर्ची की जा रही है तो फिर यह अभियान सभी पर लागू होना चाहिए और कम से कम उसका दायरा संप्रग तक तो जाना ही चाहिए। यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के मंत्री और सांसद अपने यात्रा खर्च को सीमित कर लेते हैं तो इसके जो भी नतीजे सामने आएंगे वे भी अत्यंत सीमित होंगे, क्योंकि फिजूलखर्ची केवल यात्राओं के दौरान ही नहीं होती। केंद्रीय मंत्रियों के यात्रा व्यय के अतिरिक्त अन्य अनेक खर्च ऐसे हैं जिनमें अच्छी-खासी धनराशि खर्च हो रही है। यदि केंद्रीय मंत्रियों के केवल यात्रा खर्च और अन्य खर्चो को शामिल कर लिया जाए तो यह राशि करीब दो सौ करोड़ रुपये पहुंच जाती है। यह खर्च किस तेजी से बढ़ता चला जा रहा है, इसका प्रमाण यह है कि वित्तीय वर्ष 2005-06 में वेतन और यात्रा खर्च और अन्य भत्तों में व्यय कुल राशि सौ करोड़ रुपये से भी कम थी।
यदि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता फिजूलखर्ची रोकने के प्रति वास्तव में गंभीर है तो उसे सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों में बुनियादी बदलाव करना होगा और साथ ही उन अनेक परंपराओं से पीछा छुड़ाना होगा जो एक लंबे अर्से से चली आ रही हैं। फिजूलखर्ची केवल मंत्रियों द्वारा ही नहीं, बल्कि शीर्ष नौकरशाहों द्वारा भी की जा रही है। नि:संदेह यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उच्च पदों पर बैठे नौकरशाह और नेतागण अपनी जीवनशैली को सामान्य व्यक्तियों की तरह ढाल लें, लेकिन यह भी नहीं होना चाहिए कि उनकी विशिष्टता राजसी ठाठ-बाट को मात देती नजर आए। यह भी विचित्र है कि फिजूलखर्ची रोकने का यह अभियान इस आधार पर शुरू किया गया है कि देश सूखे और मंदी का सामना कर रहा है। इस अभियान से तो यह प्रकट हो रहा है कि यदि सूखे और मंदी का दुर्योग एक साथ सामने नहीं आया होता तो कोई फिजूलखर्ची रोकने पर ध्यान नहीं देता। फिजूलखर्ची तो प्रत्येक परिस्थिति में रोकी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा न करने का अर्थ है संसाधनों की बर्बादी। एक ऐसे देश में जहां लगभग तीस प्रतिशत लोग भयावह निर्धनता से जूझ रहे हों वहां यह शोभा नहीं देता कि मंत्रीगण राजसी ठाठ-बाट में रहें। इससे भी अधिक अशोभनीय यह है कि जब इस ठाठ-बाट का उल्लेख किया जाए तो विरोध और नाराजगी के स्वर उभरें। इन स्वरों का उभरना यह बताता है कि हमारे आज के औसत राजनेता किस तरह अभी भी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। ऐसी मानसिकता वाले राजनेता उच्च पदों पर तो विराजमान हो सकते हैं, लेकिन उन्हें लोकसेवक नहीं कहा जा सकता।

25 अक्टूबर 2010

सुनियोजित अपराध की श्रेणी में शामिल हो मिलावटख़ोरी

जब सुनियोजित तरीके से किसी एक व्यक्ति की हत्या करने के आरोपी को सज़ा-ए-मौत या आजीवन कारावास जैसी सख्त सज़ा का सामना करना पड़ता है फिर मिठाई,जीवन रक्षक दवाईयां अथवा खाने-पीने की अन्य तमाम वस्तुओं में मिलावट करने वाले तथा इनमें ज़हरीली रासयानिक सामग्री मिलाकर सैकड़ों व हज़ारों लोगों की एक साथ सामूहिक हत्या का प्रयास करने वालों के विरुद्ध ऐसी ही सख्त सज़ा का प्रावधान क्यों नहीं है?
  भारत वर्ष को त्यौहारों व पर्वों का देश कहा जाता है। अपने सीमित संसाधनों में ही अनगिनत त्यौहारों के अवसर पर झूमने व खुशियां मनाने वाले भारतीय नागरिक इस विशाल देश के किसी न किसी क्षेत्र में किसी न किसी त्यौहार में अक्सर खुशियां मनाते देखे जा सकते हैं। ज़ाहिर है इन भारतीय त्यौहारों का खाने पीने, स्वादिष्ट व लज़ीज़ व्यंजनों खा़सतौर पर मिठाईयों से सीधा संबंध है। अत: अमीर भारतवासी से लेकर गरीब से गरीब व्यक्ति तक की यह कोशिश होती है कि वह त्यौहारों के अवसर पर अपने मित्रों,  रिश्ते-नातेदारों अथवा अपने परिवारवालों के लिए खाने हेतु किसी न किसी किस्म की मिठाई का तो अवश्य ही आदान प्रदान करे। गोया हम कह सकते हैं कि भारतीय समाज में मिठाई को त्यौहारों के शगुन के रूप में  स्वीकार कर लिया  गया है।
   परंतु हमारे ही देश में  हरामख़ोरी की कमाई का आदी हो चुका एक तीसरे दर्जे का गिरा हुआ वर्ग ऐसा भी है जिसे अपने चंद पैसों की कमाई की खातिर त्यौहारों में खुशियां मनाते व झूमते गाते आम लोगों की खुशी संभवत: सहन नहीं होती। और यह बेशर्म तबक़ा आम लोगों की खुशियों में रंग में भंग डालने का काम करता है। बजाए इसके कि यह वर्ग आम लोगों की खुशी में शरीक हो कर खुद भी खुशियां मनाए तथा आम लोगों को भी प्रोत्साहित करे। परंतु ठीक इसके विपरीत यह हरामख़ोर वर्ग आम लोगों को मिठाईयों के नाम पर ज़हर बेचने का काम करता है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी त्यौहारों के इन दिनों में देश में चारों तरफ से मिलावटी, सड़ी गली, बदबूदार, ज़हरीली तथा रासायनिक पद्धति से तैयार की गई मिठाइयों की बरामदगी के अफसोसनाक समाचार प्राप्त हो रहे हैं। जोधपुर,बीकानेर,चंडीगढ़,दिल्ली व कानपुर जैसे बड़े शहरों से लेकर अंबाला जैसे छोटे शहरों तक से प्रदूषित व ज़हरीली मिष्ठान सामग्री के बरामद होने के समाचार निरंतर प्राप्त हो रहे हैं।
   समाचार पत्रों व विभिन्न टीवी चैनल्स के माध्यम से यह बार बार चेतावनी दी जा रही है कि ऐसी मिलावटी,ज़हरीली व रासायनिक पद्धतियों से तैयार मिष्ठान सामग्रियों के सेवन से आम आदमी के स्वास्थय पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। स्वास्थय विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी मिलावटी मिठाईयां दिल की बीमारी,रक्तचाप,कैंसर,पीलिया,अलसर तथा चमड़ी रोग जैसी तमाम जानलेवा बीमारियों के द्वार तक पहुंचा देती हैं। परिणाम स्वरूप जाने अनजाने में तमाम लोग इन्हीं मिठाईयों के सेवन से मौत के मुंह तक पहुंच जाते हैं। परंतु मिलावट खोरी के इस कारोबार से जुड़े तथा ऐसी कमाई के आदी हो चुके व्यापारी इन सब बातों की परवाह किए बिना अपने इस काले कारोबार को पूर्ववत् जारी रखते हैं। और यदि कभी इत्तेफाक से कोई मिलावटखोर कहीं पकड़ा भी जाता है तो आम लोगों की जान से खेलने वाला वह व्यक्ति भारतीय कानून के अंतर्गत होने वाली नर्म व लचीली कार्रवाई का सामना करते हुए जल्द ही सलाखों से बाहर आ जाता है। बाद में वही अपराधी अपने उसी हौसले के साथ फिर मिलावटखोरी के काम में जुट जाता है। इस प्रकार कम लागत में अधिक पैसे कमाने का आदी हो चुका यह वर्ग आम लोगों की जान से निरंतर खिलवाड़ करने से हरगिज़ नहीं चूकता।
  सवाल यह है कि भारतीय समाज को ऐसे कलंकों से कभी मुक्ति मिलेगी भी या नहीं और यदि मिलेगी तो उसके उपाय क्या हो सकते हैं? भारतीय न्यायालयों में हत्या व हत्या के प्रयास को लेकर चलने वाले मुकद्दमों में आमतौर पर माननीय न्यायाधीश गवाहों के बयान व साक्ष्यों के आधार पर जहां यह जानने की कोशिश करते हैं कि अमुक व्यक्ति की हत्या या हत्या का प्रयास आरोपी व्यक्ति द्वारा अंजाम दिया गया है या नहीं। वहीं माननीय अदालतें मुकद्दमे के दौरान यह पता लगाने की भी पूरी कोशिश करती हैं कि आखिर जुर्म को अंजाम देने का कारण क्या था। अर्थात् जुर्म जानबूझ कर किया गया है या परिस्थितियों वश हो गया। और इन सभी नतीजों पर पहुंचने के बाद अदालतें  जुर्म की उसी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए दोषी को सज़ा सुनाती हैं। उस आरोपी को सबसे अधिक व सख्त सज़ा सुनाई जाती है जिसने जानबूझ कर तथा सुनियोजित ढंग से किसी अपराध को अंजाम दिया हो। यहां गौरतलब है कि किसी एक व्यक्ति की हत्या जैसे सुनियोजित षड्यंत्र रचने वाले अपराधी को फांसी या आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई जाती है।
  ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सुनियोजित तरीके से किसी एक व्यक्ति की हत्या करने के आरोपी को सज़ा-ए-मौत या आजीवन कारावास जैसी सख्त सज़ा का सामना करना पड़ता है फिर मिठाई,जीवन रक्षक दवाईयां अथवा खाने-पीने की अन्य तमाम वस्तुओं में मिलावट करने वाले तथा इनमें ज़हरीली रासयानिक सामग्री मिलाकर सैकड़ों व हज़ारों लोगों की एक साथ सामूहिक हत्या का प्रयास करने वालों के विरुद्ध ऐसी ही सख्त सज़ा का प्रावधान क्यों नहीं है? ज़ाहिर है इस प्रकार की मिलावटखोरी करने का इनका मकसद कम से कम लागत में ज्य़ादा से ज्य़ादा पैसे कमाना ही होता है। और अपने इस एक सूत्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह मिलावटखोर  व्यापारी प्रत्येक स्तर पर मिलावटखोरी को अंजाम देते हैं। यह भली भांति जानते हैं कि ऐसी मिठाईयों अथवा अन्य खाद्य सामग्रियों के खाने से स्वास्थय पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ेगा। परंतु मात्र धन कमाने की चाहत में यह वर्ग समाज को सामूहिक रूप से स्वास्थ्य क्षति पहुंचाने से कतई नहीं हिचकिचाता। अत: आम लोगों को ऐसी ज़हरीली व प्रदूषित खाद्य सामग्री बेचकर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा जानबूझ कर रचे जाने वाले षड्यंत्र का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।
  आज हम अपने ही समाज के बीच स्वास्थय संबंधी तरह-तरह की ऐसी समस्याएं देख रहे हैं जो प्राय: हमें हैरान कर देती हैं। उदाहरण के तौर पर छोटे बच्चों को दिल का दौरा पडऩे लगा है। कम उम्र में लोग पीलिया के शिकार हो रहे हैं। छोटी उम्र में ही कैंसर व अलसर जैसी बीमारियों के लक्षण पाए जा रहे हें। चर्म संबंधी रोगियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। समय पूर्व लोगों की आंखें कमज़ोर हो रही हैं तथा दांतों पर प्रभाव पड़ रहा है। और इस तरह की और समय पूर्व होने वाली तमाम बीमारियों से जूझने वाला आम आदमी कभी सही इलाज न मिल पाने के कारण तो कभी आर्थिक  संकट की बदौलत प्राय: अकाल मौत के मुंह तक चला जाता है। ज़रा कल्पना कीजिए  कि यदि हम आज किसी छोटे बच्चे को ऐसी ही मिलावटी मिठाईयां अथवा अन्य खाद्य सामग्रियां आज खिलाना शुरु करें तो बड़ा होते-होते उसके शरीर की बुनियाद आखिर  किन ज़हरीली खुराकों पर खड़ी होगी।
  लिहाज़ा मिलावटखोरी के इस निरंतर बढ़ते जा रहे नेटवर्क से आम लोगों को निजात दिलाने का एक ही उपाय है कि इसमें शामिल लोगों को पकड़े जाने पर एक तो उनकी ज़मानत हरगिज़ नहीं होनी चाहिए। और दूसरे यह कि ऐसे व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को हमेशा के लिए सील कर सरकार को अपने अधीन ले लेना चाहिए। और तीसरी व सबसे अहम बात यह कि मिलावटखोरी जैसे अपराध को भी फांसी या उम्रकैद जैसी सज़ा की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। जब तक ऐसी सख्त सज़ा का प्रावधान हमारे कायदे व कानूनों के अंतर्गत नहीं होता तब तक मिलावटखोरी के शिकंजे से मुक्ति पाने की कल्पना करना हमारे लिए बेमानी है। यहां एक बात यह भी गौरतलब है कि मिलावटखोरी के इस नेटवर्क में केवल आम आदमी ही नहीं पिस रहा बल्कि बड़े से बड़ा,विशिष्ट,रईस तथा स्वयं को वी आई पी समझने वाला व्यक्ति भी इस त्रासदी से अछूता नहीं है। इस समय बाज़ार में बिकने वाली तमाम मिलावटी वस्तुएं विशिष्ट व्यक्तियों के हिस्से में भी आती हैं। चाहे वह फल अथवा सब्ज़ी के रूप में या फिर दूध,खोया,पनीर या देसी घी की शक्ल में ही क्यों न हों।
  यहां एक बार फिर चीन में गत् वर्ष घटी उस घटना का उल्लेख करना ज़रूरी है जिसमें कि दूध में मिलावट करने वाले एक व्यापारी को मात्र 6 महीने तक मिलावटी कारोबार करने के आरोप में उसे मृत्युदंड दे दिया गया। यदि हमें देश व समाज के हितों का ध्यान रखना है तो हमारे देश में भी ऐसे ही सख्त कानून लागू होने की अविलंब ज़रूरत है। अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि हमारी नस्लें बचपन के बाद सीधे बुढ़ापे में ही कदम न रखने लग जाएं और जवानी उनके भाग्य में ही न लिखी जा सके। और यदि देश को ऐसे बुरे दिन देखने पड़े तो इन मिलावटखोरों से ज्य़ादा दोष हमारे देश के कानून तथा उस व्यवस्था का होगा जो इन हरामखोर मिलावटखोरों की सुनियोजित हरकतों को देखते हुए भी अंजान बना बैठा है तथा इन्हें सख्त दंड देने के बजाए इन्हें प्रोत्साहन या छूट देने की मुद्रा में नज़र आ रहा है।