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02 जून 2011

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VIJAY JI KI EK BAKVAS SI KAVIY]TA !!

क्या खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं
आओ साथियों, देशवासियो
भारत तुम्हें दिखाते हैं ॥
जिस गौ को गौमाता कहकर
गाँधी सेवा करते थे
जिसके उर में सभी देवता
वास हमेशा करते थे
हिन्द भले ही मुक्त हुआ हो
गौमाता बेहाल अभी
कटती गऊएँ किसे पुकारें
उनके सर है काल अभी
गौमाता की शोणित-बूँदें
जब धरती पर गिरती हैं
तब आज़ादी की व्याख्याएँ
ज्यों आरी से चिरती हैं
गौ भारत का जीवन-धन है
हिन्दू चिन्तन की धारा
गौमाता को जो काटे, वह
है माता का हत्यारा
कृष्ण कन्हैया की गऊओं की
गाथा करुण सुनाते हैं

ये ‘संसार’ ‘औजार’ है


ये ‘संसार’ ‘औजार’ है ‘अपने आप ·ो तराशने ·ा’... पूरा ए· सिस्टम है... पूरा ए· उद्योग है... ·ि आप अपने- आप ·ो ‘अंदर से’ ‘उन्नत’ ·र स·ें... दुनिया ·ी सारी दुनियादारी और सारी भौति·ता ·ो आप·ो- ·ैसे साधना है और ·ैसे अपनी जिंदगी ·ी उन्नति ·े लिए उस·ा सदुपयोग ·रना है यह आप·ा ·ाम है... यह ‘·ुशलता’ और ‘समझ’ होगी ·ि आप इस वैभवपूर्ण संसार ·ो ‘अपनी मुक्ति ·ा मार्ग’ बना स·े... ‘प्रभु’ ·ी लीला देखिये ·ि वह ‘मल’ ·ो ‘खाद्य’ ·ी सबसे पोष· वस्तु बनाता है... मलिन ·ीचड़ में पवित्र ·मल खिलाता है... ·ांटो ·े बीच सुंगधित गुलाब ·ो जन्मता है... तभी तो बेबा· शायर ·हता है... ‘‘·ैसे ·ी लैला या फरहाद ·ी शीरी ·ह लो, हम नहीं रांझा मगर हीर से बातें ·ी है।’’
परमात्मा हमें रत्न ·ी भांति दुनिया में- जन्म देता है... ·ि हम संसार में पहुंच·र ‘हीरे’ ·ी भांति अपने- आप·ो ‘तराशे’... इस दुनिया ·ा, हीरे तराशने ·ी मशीन ·ी- भांति उपयोग ·रें... और इतनी खूबसूरती से हम स्वंय ·ो तराशे ·ी ‘·ोहिनूर’ बन जाएं... मगर हम हैं ·ि हीरा तराशते नहीं बल्·ि हीरा तड़·ा बैठते हैं... उस·ी ·ीमत ही खत्म ·र बैठते हैं.. और संसा·र सागर ·ी सीपी- पत्थर बन·र ही रह जाते हैं... हम ‘परमात्मा’ ·ी ‘प्रति·ृति’ हैं... अपना अंश शामिल ·र·े विधाता ने हमें धरती पर उतारा हैं... और हम हैं ·ि जिंदा लाशो ·ा ही हिस्सा बन·र रह जाते हैं... तभी तो बयां हैं- ‘‘ मौत ·े डर से मैं खामोश रहंू, लानत है, जब·ि जल्लाद ·ी शमशीर से बातें ·ी हैं।’’
‘नासमझी’ और धोखा खाना हमारी फितरत है.. ‘ए·ांत’ ·ो हम ‘अ·ेला’ होमना समझते है... और ‘घबड़ा’ उठते हैं... यद्यपि सारी जिंदगी हमारी लगभग ‘अ·ेले ही’ ‘·टती है’,,, ‘घर’ है फिर भी अ·ेले हैं... ‘परिवार’ है फिर भी अ·ेले हैं... मां- बापस, भाई- बहन हैं फिर भी अ·ेले हैं... दोस्त- यार हैं फिर भी अ·ेले हैं... जिंदगी लगभग अ·ेले ·र रही है फिर भी अ·ेलेपन ·ा डर है... ·ैसी विडंम्बना है यह जिंदगी ·ी... ·ैसी वीभत्सता है ये जिंदगी ·ी... मगर इसे समझने ·ी जरुरत है.... थोड़ा चिंतन और मनन ·रने ·ी आवश्य· है... तभी बेबा· शायर ·हता है- ‘‘हमने तन्हाई में जंजीर से बाते ·ी हैं, अपनी सोई हुई त·दीर से बातें ·ी है।’’
जरा गौर ·ीजिए ·ि आप दुनिया में आते भी अ·ेले हैं और जाते भी अ·ेले है... उससे भी आर्थि· गौर ·रने लाय· है ·ि जितनी ए· बाहर ·ी दुनिया है उतनी ही ए· भीतर भी ·ी दुनिया है... जिससे आप ‘महसूस’ तो ·रते हैं... जिस·ा ‘अहसास’ आप·ो होता है... मगर जिसे ‘पाने ·ी’ लगभग ·ोई ·ोशिश आप नहीं ·रते हैं... उस ‘भीतर ·ी दुनिया’ ·ो पाने ·े लिए ‘ए·ांत’ ·ी जरुरत होती है... उस भीतर ·ी दुनिया में अ·ेले ही उतरना होता है... और उस भव सागर ·ो अ·ेले ही पार ·रना पड़ता है... तभी तो बयां है- ‘‘ मेरी नजर ही यारों रौशनी से डरती थी, न आफताब (सूरज) गलत था न माहताब (चांद) गलता।’’
‘ए·ांत’ और ‘अ·ेले’ ·ी ·ोशिश में जब जरा थ· जा, ऊब जा तो बाहर ·े संसार ·ी तरफ देख लो... उसें ‘टी- टाईम’ समझ ·े पीले... उसे ‘·ाफी हाउस ·ा ·ोना’ समझ ·े हल्·ा हो ले... उसे लंच बाक्स समझ·र एनर्जी प्राप्त ·र ले... मगर ‘दुनिया ·ी दु·ान’ और ‘भीड़’ में अट· मत... गंतव्य से भट· मत... गंतव्य तुझे ठहरने नहीं देंगा... तुझे बेचैन रखेगा... अंदर ·े समुंदर ·े ज्वार- भाटे और सुनामी ट·रा- ट·रा तुझे आवाज देते रहेगें ·ि मंजिल ·ही और है... सरलता, सहजता, निश्छलता, निस्·पटता, पवित्रता, शुचिता, श्रद्धा, प्रेम, वात्सल्य, ·रुणा- दया उस मंजिल ·े मील ·े पत्थर हैं... जिंदगी इन·े लिए ही बेचैनी रहती है... दुनिया ·े हर मु·ाम पर तुझे गंतव्य ·ा भाव मिलते चले जाना चाहिए, इसमें ही तेरी- ·ामयाबी है... ‘अंदर ·ा प्र·ाश’ दिखने लग जाए तो ‘बाहर’ ·ा अंधेरा अपने आप ·टने लगता है... इतना ही तो उस उपर- वाले ·ा खेल है... समझ स·े तो समझ ले... तभी तो बयां हैं ‘‘ मेरे नसीब में थी दोस्तों, ·िताब गलत, ·हीं सवाल गलत था ·हीं जवाब गलत।’’

01 जून 2011

ताकि वो नर तितलियों के शोषण से ख़ुद को बचा सकें

कुछ तितलियां अपने जीवन काल में सिर्फ़ एक बार ही सेक्स की प्रकिया से गुज़रती हैं. जापान में शोधकर्ताओं का कहना है कि तितलियां सेक्स को नज़रअंदाज़ करने के लिए अपने पंखों का सहारा लेती हैं.
ख़द को नर तितली की नज़र से बचाने का उनका तरीक़ा बड़ा अनोखा है. इसके लिए मादा तितली अपने रंग बिरंगे चमकदार पंखों को सिकोड़ लेती है यानि उन्हें बंद कर लेती हैं. जापानी शोधकर्ताओं के ये नतीजे ईथोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुए हैं.मादा तितलियां उस समय अक्सर अपने पंखों को बंद कर लेती हैं जब दूसरी तितलियों का झुंड उनके आस पास से गुज़रता है. ये तितलियां ऐसा एक रणनीति के तहत करती हैं ताकि वो नर तितलियों के शोषण से ख़ुद को बचा सकें. फ़ुकुडु स्थित कुरूम इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नालॉजी के प्रमुख शोधकर्ता युन या इडे ने शोध के दौरान ये पाया कि ये मादा तितलियां उस समय अक्सर अपने पंखों को बंद कर लेती हैं जब दूसरी तितलियों का झुंड उनके आस पास से गुज़रता है.
युन या इडे का ये भी कहना था कि ये मादा तितलियां ऐसा एक रणनीति के तहत करती हैं और ऐसा वो इसलिए करती है ताकि वो नर तितलियों के शोषण से ख़ुद को बचा सकें. शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग के लिए नर तितली के एक मॉडल का इस्तेमाल किया और इसके बाद मादा तितलियों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया.शोधकर्ता तितली के मॉडल को जब तितलियों के पास ले गए तो उन्होनें पाया कि मादा तितलियों ने अपने पंख बंद कर लिए. दूसरी ओर ऐसी तितलियां जो कुँवारी थी, जिन्हें सहयोगी की तलाश थी, उन्होंने अपने पंखों को बंद नही किया. इसका मतलब ये है कि वो सेक्स की इच्छुक थीं.

31 मई 2011

जय क्रांति जय हिंद

 
साथियों
जो आदमी अपने साथी मनुष्यों द्वारा किये जने वाले अत्याचार का विरोध करने के प्रयास में,अपनी जान पर खेलते हुए अपनी सारी जिंदगी न्योछाबर कर देता है
वह अत्याचार और अन्याय के सक्रिय और निष्क्रिय समर्थको की तुलना में एक संत है,भले ही उसके विरोध से अपनी जिंदगी के साथ साथ अन्य जिन्दगिया भी क्यों ना नष्ट हो जाती हो!ऐसे व्यक्ति पर पहला पत्थर वही मरने का हक़दार है जिसने कभी कोई पाप ना किया हो!
भगत सिंह जेल डायरी पेज नंबर २८७
जय क्रांति जय हिंद

गगन को अहंकार देने वाला

कुछ करने के लायक नहीं, जो उसको मित्र मिलता उसको वह शत्रु समझता स्वयं परेशान, घर परेशान, माता-पिता परेशान, घर में युध्द क्षेत्र बनाकर अपने अहंकार की लाठी लेकर, मन्यु क्या करूॅ, कैसे करूॅ, मित्रो के पास जाता, मित्र भी उसके अभिमान को चुर-चुर करने के लिए जाल बिछाकर बैठे है,कोई मार्ग नहीं दिखा रहा है, सारे मार्ग बंद होकर अपने आप की अंताहकर्ण में रोता, अपने आप को कोसता, मैं तो सबका भला करने वाला सबने मुझे बर्बाद कर दिया। ईश्वर का मार्ग अपनाता है और ईश्वर के सानिध्य में जाने का प्रयास करता है, ईश्वर दयालु, प्रेम का सागर अपनी राह में चलने का ज्ञान देना आरंभ करते है और ईश्वर से वो प्रश्न करता और ईश्वर उसे मार्गदर्शन करते, ईश्वर के सानिध्य में चलने वाला अभिमन्यु राहगीर बन गया है। स्वयं भटका हुआ दूसरो को सलाह देता और उनको ईश्वर के सानिध्य में जाने को कहता, पर संसार अपराधी उसकी बातो को न समझकर उसको पागल समझते है, पर अभिमन्यु उस कर्ता ईश्वर से प्रार्थक बनकर पूछता और लिखता, ईश्वर से पाया हुआ ज्ञान संसार के सम्मुख रखूॅगा, संसार भटका हुआ, लूटा हुआ कंगाल उनको धनवान बनाउॅगा, दुखियारे के दुख दूर करूॅगा। भटका हुआ अपराधी स्वयं राहगीर बनकर , ईश्वर का प्रार्थी बनकर, ईश्वर से संसार में चलने का ज्ञान पाने की ईश्वर से निवेदन करता है और पूछते है कि संसार में यह कुरूक्षेत्र बनाकर बैठे मेरे अपने बन्धु अपना जाल बिछाए, क्यों कर रहे है ऐसा? मैं तो उनका भला करना चाहता हूॅ, पर वे स्वयं अपना भला नहीं चाहते। स्वयं दुखी है, परेशान है। संसार को चलाने वाला ईश्वर, सबका न्याय करने वाला ईश्वर, अभिमन्यु को बता रहे है- मैं न्यायधीश हूॅ, सबका न्याय करने वाला मैं, सबको सजा देने वाला मैं, भूखे को दाना देने वाला मैं, सूर्य को तेज देने वाला मैं, चंद्र को सुंदरता देने वाला मैं, राहु को वीरता देने वाला मैं, केतु को मधुरता देने वाला मैं, मंगल को शुभ देने वाला मैं, बुध को समझ देने वाला मैं, गुरू को ज्ञान देने वाला मैं, शुक्र को सहनशीलता देने वाला मैं, शनि को शक्ति देने वाला मैं, जल को क्रोध देने वाला मैं, अग्नि को काम देने वाला मैं, वायु को मोह देने वाला मैं, पृथ्वी को लोभ देने वाला मैं, गगन को अहंकार देने वाला

दिलो मे रहता हिंदुस्तान

!! जिन का मन रहता है मीरा मे रसखान मे , 
जिनकी आखें भेद न करती राम और रहमान मे ,
इनकी खुसिया दूनी होती दीवाली -रमजान मे ,
ऐसे लोग बहुत रहते है मेरे हिन्दुस्तान मे |||
यही है देश जिसमे कण -कण मे भगवान् रहता है :यही है वाईवल-गीता यही कुरान रहता है " भले ही जाति-मजहब -भेष - भाषा भिन्न है सबकी :दिलो मे किन्तु सबके एक हिंदुस्तान रहता है |||

हमें जागना होगा !|||

कश्मीर में हिंदुओ का सफ़ाया हो गया पर हिंदू सोया रहा, बांग्ला देश में हिंदुओ
का सफ़ाया हो रहा है पर हिंदू निंद्रा मगन है, पाकिस्तान में हिंदू तो दूर
हिंदुओ के प्रतीक चिन्ह भी नही रहे पर हिंदू विश्राम अवस्था में है,
दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल अब हिन्दू राष्ट्र नही रहा,मंदिरो
में विस्फोट हों रहे है पर हमारी आँख है की खुलती नही, पाकिस्तानी लाल
क़िले और संसद भवन तक आ गये पर हमारा ख़ून है की खौलता नही, अयोध्या में
मस्जिद टूटती है तो कोहराम मच जाता है हर नेता वोट के लिए मुस्लिम परस्त
बन जाता है लेकिन राम सेतु के लिए कोई नही चिल्लाता, गुजरात दंगो की बार
बार CBI जाँच होती है पर गोधरा पीड़ितो की चीखे ना तो सरकार को सुनाई देती
है ना CBI को और ना ही स्वयं हिंदुओ को, कश्मीर जल रहा है कुछ हिंदू
अमरनाथ का सम्मान पाने के लिए तड़प रहे है पर बाक़ी देश के हिंदू सो रहे
है, हिंदू देवी देवताओ की नग्न तस्वीरे बन रही है परंतु हिंदू करवट नही
लेता, अफ़ज़ल गुरु के लिए दया है पर विस्फोट में मरने वालो औरतो और बच्चो
पे इन्हे दया नही आती !
हमें जागना होगा !|||

पैदा होने से पहले ही क्यों मर जाती है लड़कियां ?

अल्ट्रा साउंड की रिपोर्ट में आते ही
क्यों पैदा होने से पहले ही मर जाती है लड़कियां ?
कोख में जन्म लेते ही
दिल का नासूर क्यों बन जाती है लड़कियां ?
बेटी से बहु और बहु से सास बनकर
क्यों बदल जाती है लड़कियां ?
लड़कियां दे तो खुदा दौलत दे
क्या यंहा पैसे से तौली जाती है लड़कियां ?
मिट्टी के तेल, पेट्रोल या गैस से भी
क्या अधिक ज्वलनशील होती है लड़कियां ?

आधुनिक मजनुओं के प्यार में धोका खाकर
विष पीकर मीरा क्यों बन जाती है लड़कियां ?

योग्य वर की तलाश में पिता के
पांव का छाला क्यों बन जाती है लड़कियां ?

वन्दे-मातरम नही विषय है विवाद का।

वन्दे-मातरम नही विषय है विवाद का। 

मजहबी द्वेष का न ओछे उन्माद का।वन्दे-मातरम पे ये कैसा प्रश्न-चिन्ह है।माँ को मान देने मे औलाद कैसे खिन्न है। वन्दे-मातरम उठा आजादी के साज से।इसीलिए बडा है ये पूजा से नमाज से।वन्दे-मातरम कुर्बानियो का ज्वार है।
वन्दे-मातरम जो ना गए वो गद्दार है।वन्दे-मातरम के जो गाने के विरुद्ध हैं।
पैदा होने वाली ऐसी नसले अशुद्ध हैं।आबरू वतन की जो आंकते हैं ख़ाक की।
कैसे मान लें के वो हैं पीढ़ी अशफाक की।गीता ओ कुरान से न उनको है वास्ता।
सत्ता के शिखर का वो गढ़ते हैं रास्ता।हिन्दू धर्म के ना अनुयायी इस्लाम के।
बन सके हितैषी वो रहीम के ना राम के। गैरत हुज़ूर कही जाके सो गई है क्या।सत्ता माँ की वंदना से बड़ी हो गई है क्या।देश तज मजहबो के जो वशीभूत हैं।अपराधी हैं वो लोग ओछे हैं कपूत हैं।माथे पे लगा के माँ के चरणों की ख़ाक जी।चढ़ गए हैं फांसियों पे लाखो अशफाक जी।
वन्दे-मातरम कुर्बानियो का ज्वार है।
वन्दे-मातरम जो ना गए वो गद्दार है

Dipak sharma ki kavita

वैसे ही बहुत कम हैं उजालों के रास्ते,
फिर पीकर धुआं तुम जीतो हो किसके वास्ते,

माना जीना नहीं आसान इस मुश्किल दौर में
कश लेके नहीं निकलते खुशियों के रास्ते

जीन्नत नहीं अब मौत ही मिलती है रगड़ कर,
यूँ सूरती नहीं हाथों से रगड़ के फांकते ,

तेरी ज़िन्दगी के साथ जुडी कई और ज़िन्दगी,
मुकद्दर नहीं तिफ्लात के कभी लत में वारते ,

पी लूं जहाँ के दर्द खुदा कुछ ऐसा दे नशा ,
"दीपक" नहीं नशा कोई गाफिल से पालते ,

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जिन्नात : जिन्न , तिफ्लात : औलाद , गाफिल : उनीदा

30 मई 2011

संसद की मानसून सत्र

संसद की मानसून सत्र पर अच्छी लिखी एक कविता आप सब की नज़र है:
सुनते हैं दाउद फिर चर्चा में आएगा
अयोध्या का मुददा गरमाएगा
सीबीआई का नाम उछलेगा
पाकिस्तान पर बहस होंगे.
संसद में हंगामा होगा
राष्ट्रमंडल खेलों की खबर होगी
खबर देश के विकास और चमक की होगी
कुछ और बेवजह के मुद्दे होंगे.
संसद के अंदर-बाहर बहस होगी
बहस नहीं तो स्थगन होगा
अखबार टीवी का सदानंद होगा
बस बहस में गरीबी बेरोजगारी नहीं होगी
मजदूरों का खटना और भूखों मरना
युवाओं का भूखों भटकना नहीं होगा.
बस बहस में गरीबी बेरोजगारी नहीं होगी
और सब होगा और सब होगा|
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.........osho

तुम अकेले में बेचैन होते हो। कहते हो क्या करें, कहां जाए, किसको मिले? मित्र खोजते हो, क्लब जाते हो, होटल में बैठते हो, सिनेमा देख आते हो, मंदिर पहुंच जाते हो, लेकिन तुम्हारी खोज दूसरे की खोज है। कोई दूसरा मिल जाए तो थोड़ा अपने से छुटकारा हो, नहीं तो अपने से घबड़ाहट होने लगती हैं। अपनी ही अपने से ऊब पैदा हो जाती है। तुम अपने को झेल नहीं पाते। तुम अपने से परेशान हो जाते हो। तो पत्नी को खोजते हो, पति को खोजते हो, बच्चे पैदा करते हो--भीड़ बढ़ाते जाते हो, इसमें उलझे रहते हो।
अब मेरे पास लोग आते हैं। अगर वे अकेले हैं, तो दुखी। वे कहते हैं, हम अकेले हैं। अगर परिवार में हैं, तो दुखी हैं। वे कहते हैं, परिवार है। अकेले हैं तो अकेलापन काटता है। अकेलेपन से बचन के लिए भीड़ इकट्ठी कर लेते हैं, तो भीड़ सताती है। फिर वे कहते हैं दबे जा रहे हैं, व्यर्थ मरे जा रहे हैं, बोझ ढो रहे हैं, कोल्हू के बैल बन गयी हैं। पत्नी है, बच्चे हैं, अब इनको पालना है, शिक्षा दिलानी है, शादी करनी है, अब तो फंस गए! जब तक फंसे नहीं थे तब तक लगता था, क्या करें अपने-आप? अपने साथ क्या करें? कुछ सूझता न था। अकेले-अकेले ऊब मालूम पड़ती थी कुछ चाहिए करने का।
साध असंगी संग तजै। साधु तो वही है जो असंग को साधता है, अकेलेपन को साधता है। जो कहता है कि मैं अपने अकेले मैं आनंदित रहूंगा। जो धीरे-धीरे अपने निजरूप में उतरता है। जो अपने ही भीतर गहरा कुआं खोदता है, और उसमें डूबता है। एक ऐसी घड़ी आती है जब अपने ही केंद्र पर कोई पहुंच जाता है, तो फिर किसी के साथ की कोई जरूरत नहीं रह जाती।
इसका यह मतलब नहीं कि तुम जंगल भाग जाओ। जंगल भी वही भागता है जो पहले अपन से भागने के लिए भीड़ में फंसा। अब भीड़ से बचने के लिए जंगल भागता है। जंगल में फिर अकेला हो जाएगा, फिर भागेगा।
                   .........osho

osho

चौबीस घंटे किसी भी एक चीज को मत पकड़ लेना।
जीवन में दो घाट हैं, दो किनारे हैं जीवन की सरिता के। श्रम है, विश्राम है; जागना है, सोना है। इसीलिए तो पलक झपती है, बंद होती है। इसीलिए तो श्वास भीतर आती है, बाहर जाती है। इसीलिए तो जन्म होता है, मौत होती है। इसलिए तो स्त्रियां हैं, पुरुष हैं। जीवन पर दो घाट हैं। और दोनों का जो संतुलन में संभाल लेता है वही परमात्मा को उपलब्ध होता है।
एक को मत पकड़ लेना। एक को तुमने पकड़ा तो तुमने चुनाव कर लिया, आधे का पकड़ा आधे को तुमने छोड़ दिया। वह आधा भी परमात्मा है। 

                                       ..........osho

का़बलियत किसी जाति,धर्म या लिंग से नही आती.

का़बलियत किसी जाति,धर्म या लिंग से नही आती. जयललिता, मायावती, शीला
दीक्षित आदि पहले भी मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. सभी ने देखा है कि उन्होंने
क्या किया. उनके प्रदेश में कल्याण की बात तो छोड़ ही दीजिए, उन्होंने
महिलाओं के उत्थान के लिए क्या किया है? वहीं एक मुख्यमंत्री नीतिश कुमार
हैं जिन्होंने महिलाओं का कल्याण करने के साथ-साथ हर क्षेत्र मे उनसे कहीं
बेहतर काम किया है.

फिर भी मेरा देश महान

 देश में घोटाला, खुले घूम रहें हैं बेईमान
 देश के नेता चोर व बेईमान,फिर भी मेरा देश महान
 गरीब रोटी को तरसे, आत्महत्या करे किसान
लूटों मेरे देश के गद्दारों, फिर भी मेरा देश महान
 कभी धर्म के नाम पर कभी जाति के नाम पर
करो राजनीति खुलेआम, फिर भी मेरा देश महान
 भाजपा हो, या हो कांग्रेस सब के सब चोर व बेईमान
कहीं रिश्वत तो कहीं घोटाला, फिर भी मेरा देश महान
 राजा ने की 2G स्पेक्ट्रम घोटाला खुलेआम, बेच डाला ईमान
येदुरप्पा ने की जमीं घोटाला सरेआम,  फिर भी मेरा देश महान
 किसी ने खाया कफ़न सहिदों का, किसी ने की रक्षा घोटाला
सहिदों को भूल गए सब बेईमान, फिर भी मेरा देश महान
 दंगा सियासतदां तुम कराओ और झुलसे जनता आम
हमारी जख्मो पर करो सियासत, फिर भी मेरा देश महान
 किसी को घूसखोरी की आज़ादी कोई करे कत्ल सरेआम
इन्हें हैं आज़ादी बाकी सब गुलाम, फिर भी मेरा देश महान
                       -----------      अली सोहराब