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09 जुलाई 2011

40 फीसद किसान खेती छोड़ अन्य रोजगार चाहते हैं

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कहता है कि देश के 40 फीसद किसान खेती छोड़कर अन्य वैकल्पिक रोजगार पाना चाहते हैं। महँगे कृषि उपकरण, खाद, बीज, सिंचाई की व्यवस्था का भार कृषकों के लिए असहनीय हो गया है। ऐसे में कृषक अपने व्यवसाय के प्रति उदासीन हो रहे हैं। कहने को तो अब भी देश की आधे से अधिक ग्रामीण जनसंख्या कृषि पर ही केंद्रित है। किसानों का जीविकोपार्जन का अस्तित्व अब खतरे में है।

किसानों के ऊपर अब अतिरिक्त वित्तीय बोझ है। 1997 से 2009 के बीच 216500 किसानों ने स्थिति से तंग आकर आत्महत्या कर ली। फसलों के उचित भंडारण के लिए संसाधनों का अभाव कृषकों की समस्या बढ़ाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल का आयोजन जब हम करा सकते हैं तो उस स्तर के भंडारण गृहों का निर्माण क्यों नहीं करा सकते। किसानों के समक्ष एक और प्रमुख समस्या है फसल के लिए उपयुक्त बाजार का न होना।

सरकार फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है परंतु उन्हें इस मूल्य पर खरीदने के लिए एकमात्र भारतीय खाद्य निगम ही है। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य निगम की पहुंच अतिसीमित है।

जहां पर एफसीआई के क्रय केंद्र हैं, वहां भी भ्रष्टाचार के कारण योजना फलीभूत नहीं हो पाती। आमतौर पर किसानों को निर्धारित मूल्य देकर उपज खरीदने का वादा तो किया जाता है परंतु एवज में उन्हें उचित मूल्य नहीं दिया जाता है या फिर परेशान किया जाता है। इससे कृषक गांवों में ही कम मूल्य पर सुविधाजनक तरीके से उपज बेचने पर बाध्य हो जाते हैं। यह अन्याय और किसानों का शोषण है। आज खाद्य सुरक्षा को लेकर भयावह तस्वीर पेश की जा रही है। खाद्यान्ना उत्पादकों के प्रति हमारी नीतियां संतोषजनक नहीं हैं।

किसानों के लिए कई सरकारी योजनाएँ हैं जिससे किसानों को राहत मिली भी है पर उनके सामने उनकी वित्त व्यवस्था की समस्या विकट चुनौती के रूप में है। इसका हल वित्तीय समावेशन के अंतर्गत हो सकता है। 2008 में वित्तीय समावेशन के लिए गठित समिति के अध्यक्ष डॉ. रंगराजन ने वित्तीय समावेशन को परिभाषित करते हुए कहा था कम आय वाले व कमजोर वर्ग के लिए ऋण और वित्तीय सेवाओं तक उनकी समस्या सुगमतापूर्वक पहुंचना ही वित्तीय समावेशन है।

यह वास्तविकता है कि किसान ऊंची ब्याज दरों पर साहूकारों से ऋण प्राप्त करते हैं जिनसे उनको सहूलियत कम होती है जबकि उन्हें इसके लिए शोषण के एक जटिल फंदे में फंस जाना होता है। इसके विकल्प के रूप में सरकार ने किसानों को अल्पकालीन सुविधापूर्ण ऋण प्रदान करने के लिए 1998 में किसान क्रेडिट योजना शुभारंभ की। मगर ये योजना भी विफल ही साबित हुई। इन सारी योजनाओं के बावजूद किसानों की आत्महत्या में बढ़ोतरी हो रही है।

मौत का लाइव वीडियो,इसे जिसने भी देखा वो...

 
 
न्यूयॉर्क.अमेरिका स्थित टेक्सस रेंजर्स बॉलपार्क में चल रहे बेस बॉल मैच के दौरान एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी है।खबर है कि मैच के दौरान एक खिलाडी द्वारा खेले गए शॉट(गेंद) को पकड़ने के चक्कर में एक 39 वर्षीय व्यक्ति (दर्शक) सीधे 20 फुट नीचे जा गिरा।



अचानक हुई यह घटना इतनी आश्चर्यचकित कर देने वाली थी कि शुरुआत में किसी को कुछ समझ ही नहीं आया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश भी इस मैच को देखने आए थे और यह सारी घटना उनकी आंखों के सामने हुई।
पेशे से फायरमैन शैनोन स्टोन (39) टेक्सस रेंजर्स बॉलपार्क में अपने छह साल के लडके साथ यह मैच देखने आए थे। स्टेडियम की लाबी से नीचे गिरे शैनोन को आनन् फानन में अस्पताल ले जाया गया लेकिन तब तक उनकी जान जा चुकी थी। अंग्रेजी वेबसाइट डेलीमेल ने इस घटना को प्रमुखता से छापा है, डेलीमेल के अनुसार मरने से पहले शैनोन स्टोन के आखिरी शब्द थे," मेरे बेटे का ध्यान रखना"।

पद्मनाभस्वामी मंदिर: तहखाने के पीछे नागराज हैं या जलप्रलय?


तिरुअनंतपुरम। एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय में पद्मनाभस्वामी मंदिर के छठे तहखाने को खोलने के सवाल पर सुनवाई चल रही थी तो दूसरी तरफ पद्मनाभस्वामी मंदिर के सामने लोग पूजा-पाठ और हवन कर रहे थे। इन्हें डर था कि अगर सर्वोच्च न्यायालय ने छठे दरवाजे को खोलने की इजाजत दे दी और दरवाजा तोड़ा गया तो भगवान पद्मनाभस्वामी नाराज हो जाएंगे और फिर होगा...सर्वनाश!  सन 1930 में एक अखबार में छपा एक लेख बेहद ही डरावना था। लेखक एमिली गिलक्रिस्ट हैच के मुताबिक 1908 में जब कुछ लोगों ने पद्मनाभस्वामी मंदिर के छठे तहखाने के दरवाजे को खोला गया तो उन्हें अपनी जान बचाकर भागना पड़ा क्योंकि तहखाने में कई सिरों वाला किंग कोबरा बैठा था और उसके चारों तरफ नागों का झुंड था। जान बचाने के लिए सारे लोग दरवाजा बंद करके जान बचाकर भाग खड़े हुए।  तहखाने में छुपा है कई सिरों वाला नाग   कहा जा रहा है कि एक विशालकाय किंग कोबरा जिसके कई सिर हैं और उसकी जीभ कांटेदार है वो मंदिर के खजाने का रक्षक है। अगर छठे दरवाजे के तहखाने को खोला गया तो वो किंग कोबरा बिजली की रफ्तार से पानी के अंदर से निकलेगा और सब कुछ तहसनहस कर देगा। वैसे नागों के जानकारों का कहना है कि तहखाने के अंदर किसी भी किंग कोबरा के जिंदा रहने की संभावना नामुमकिन है। क्योंकि बंद तहखाने के अंदर ऑक्सीजन न के बराबर है और न ही खाने-पीने का कोई सामान है। ऐसे हालात में किंग कोबरा प्रजाति का कोई भी नाग जिंदा नहीं रह सकता है। लेकिन धार्मिक मान्यताएं और आस्थाएं इन दलीलों को नहीं मानतीं इसलिए लोग किसी भी अनहोनी को टालने के लिए लगातार पूजा-पाठ कर रहे हैं।  ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि नाग धन का रक्षक है इसलिए पहले नाग प्रतिमा की पूजा की जानी चाहिए वरना तहखाना खोलने की कोशिश खतरनाक भी साबित हो सकती है। इससे तिरुअनंतपुरम और पूरे राज्य पर संकट आ सकता है। वैसे बंद तहखाने को खोलने के लिए शास्त्रों में विधि बताई गई है। सबसे पहले सांप की पहचान की जाए, जो खजाने की रक्षा कर रहा है। इसके बाद वैदिक और शास्त्रों की पद्धतियों से नाग की उस जाति की पूजा कर उसे प्रसन्न किया जाए। इसके बाद तहखाना खोला गया तो किसी प्रकार के अपशकुन से बचा जा सकता है।  आ सकती है भीषण बाढ़  मान्यता के मुताबिक करीब 136 साल पहले तिरुअनंतपुरम में अकाल के हालात पैदा हो गए थे। तब मंदिर के कर्मचारियों ने इस छठे तहखाने को खोलने की कोशिश की थी और उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी थी। अचानक उन्हें मंदिर में तेज रफ्तार और शोर के साथ पानी भरने की आवाजें आने लगी थीं। इसके बाद उन्होंने तुरंत दरवाजे को बंद कर दिया था। शहर के लोगों का मानना है कि मंदिर का ये छठा तहखाना सीधे अरब सागर से जुड़ा है जो इस पूरे राज्य को पश्चिमी दुनिया से जोड़ता है। माना जाता है कि त्रावणकोर शाही घराने ने अपने वक्त के बड़े कारीगरों से एक तिलिस्म बनवाया है जिसमें समंदर का पानी भी शामिल है। वजह ये कि अगर उस वक्त कोई खजाने को हासिल करने के लिए छठा दरवाजा तोड़ता तो अंदर मौजूद समंदर का पानी बाकी खजाने को बहा ले जाता और किसी के हाथ कुछ नहीं लगता।  महान आत्माएं जाग जाएंगी  
सभी छह तहखाने मंदिर के मुख्य देवता अनंतपद्मनाभ स्वामी की मूर्ति के चारों तरफ मौजूद हैं। इनमें से A और B तहखाने मूर्ति के सिर की तरफ मौजूद हैं। मान्यता है कि छठा तहखाना महान आत्माओं की समाधि है। और अगर इसे खोला गया तो वो महान आत्माएं जाग जाएंगी और विनाश होगा। इन्हीं मान्यताओं की वजह से यहां लोग छ

08 जुलाई 2011

सूचना प्रौद्योगिकी--- सावधान! बड़े भाई देख रहे हैं।

बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आती है। “एक चोर अपने छोटे बेटे के साथ चोरी करने निकला। वे एक घर में घुसे। चोर ने बेटे को बाहर की निगरानी करने को कहते हुए पूछा कि कोई देख तो नहीं रहा है। बेटे ने जवाब दिया कि भगवान देख रहा है। चोर डर गया।” वह जानता था कि भगवान हर जगह रहते हैं और हमेशा हम पर निगाह जमाए रहते हैं।
यह कहानी उन दिनों की है जब आदमी अपने विवेक की पहरेदारी में जीवनयापन करता था। तब से अब तक आदमी काफी बदल गया है, उसी अनुपात में विवेक की पकड़ ढीली पड़ गई है। पहरेदारी करना इसकी कूवत में नहीं रह गया। अब पहरेदारी करने का जिम्मा प्रौद्योगिकी के जरिए उपलब्ध कराए गए उपकरणों का है।

बहुत सारे भविष्यवादी, विज्ञानकथाओं के लेखक और गोपनीयता के हिमायती चिन्तित हैं कि  भविष्य में गोपनीयता हमारे नसीब में नहीं उपलब्ध रहेगी।। वे चेतावनी देते रहे हैं------ " सावधान! बड़े भाई साहब सब देख रहे हैं।" हम कब कहाँ होते हैं, मोबाइल फोन के जरिए सहज रूप से जाना जा पाता है। दुनिया के हर कोने में फैलते जा रहे सी.सी.टी.वी.(Close Circuit Television) कैमरा अकसर हमारी हरकत बताते रहते हैं। हमारे ट्रांजिट पास और क्रेडिट पास डिजिटल चिह्न छोड़ जाया करते हैं।, डेविड ब्रिन ने सन 1998 ई. में प्रकाशित अपनी किताब ‘दि ट्रांसपैरेण्ट सोसाइटी’ में लिखा है,“हमारे जीवन का करीब हर कोना रोशन रहनेवाला है।”।

अब सवाल यह नहीं है कि निगरानी प्रौद्यौगिकी के प्रसार को कैसे रोका जाए, बल्कि यह कि ऐसी दुनिया में कैसे जिया जाए जहाँ कि हमारे हर कदम पर नजर रखी जाने की पूरी सम्भावना है।

पिछले कुछ सालों में कुछ अजीब बातें हुई हैं। मोबाइल फोन, डिजिटल कैमरा और इण्टरनेट के प्रसार का नतीजे में निगरानी प्रौद्यौगिकी, जिस पर कभी राज्य का एकाधिकार हुआ करता था, आज काफी विस्तृत रूप से उपलब्ध हो गया है। सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रुस स्नियर कहते हैं,”सरकारी निगरानी के बारे में बहुत काफी लिखा जा चुका है, पर हमें अधिक साधारण किस्म की निगरानी की सम्भावना के प्रति भी सावधान होने की जरूरत है। निगरानी टेक्नॉलॉजियों के उपकरणों के छोटे होते जा रहे आकारों, गिरती हुई कीमतें और रोजबरोज उन्नत होती हुई पद्धतियों से अधिक से अधिक जानकारी के संग्रहित होते रहने का रास्ता प्रशस्त होता जा रहा है। इसका नतीजा होगा कि “निगरानी की योग्यताएँ जो अभी तक सरकारी क्षेत्र तक सीमित थीं, हर किसीके हाथों में हैं या जल्दी ही होंगी।”

कैमरा-फोन एवम् इण्टरनेट की तरह की डिजिटल टेक्नॉलॉजी अपने समरूप अन्य टेक्नॉलॉजियों से बहुत अलग होती है। आसानी और शीघ्रता से डिजिटल तसवीरों की प्रतिलिपियाँ बनाया और दुनिया के किसी भी हिस्से में भेजा जाना सहज सी बात है। ऐसा पारम्परिक तसवीरों के साथ नहीं हो सकता।( हकीकत तो यह है कि डिजिटल छवि को इ-मेल करना उसके मुद्रण करने से अधिक आसान है।) एक बड़ा फर्क यह है कि यह डिजिटल यंत्र बहुत अधिक व्यापक हो गया है। आज बहुत ही कम लोग फिल्म कैमरा हर वक्त अपने साथ रखते हैं। दूसरी ओर आज बिना कैमरा वाला मोबाइल फोन मिलना बहुत कठिन है।--- और अधिकतर लोग फोन अपने साथ लिए चला करते हैं। डिजिटल कैमरा की गति एवम् सर्वव्यापकता उन्हें ऐसे कामों को करने की ताकत देती है जो फिल्म पर आधारित कैमरा से नहीं किए जा सकते। उदाहरण के लिए टेनेसी, नैशविले में राहजनी के एक भुक्तभोगी ने अपने मोबाइल फोन के कैमरा से लुटेरे और उसकी गाड़ी की तस्वीरें खींच ली। ये तसवीरें पुलिस को दिखलाई गई, जिसने लुटेरे और उसकी गाड़ी का वर्णन प्रसारित कर दिया, और दस मिनट के भीतर लुटेरा पकड़ा गया। इसी तरह की बहुत सी घटनाओं की कहानियाँ हम हमेशा सुना करते हैं।

आपके हर कदम पर निगाह बनी हुई है। 
निगरानी का गणतंत्रीकरण मिश्रित वरदान है। कैमरा फोन से ताक झाँक को बढ़ावा मिला है फलस्वरूप लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए नए कानून बनाए जा रहे हैं। अमेरिकी कॉंग्रेस ने सन 2004 में विडियो वॉयुरिज़्म विधेयक(“Video voyeurism Act) ग्रहण किया। इसके जरिए किसी व्यक्ति की अनुमति के बग़ैर उसके नंगे बदन के विभिन्न भागों के तस्वीर खींचे जाने को प्रतिबंधित किया गया है। कैमरा फोन के व्यापक प्रसार शयन-कक्षों, सार्वजनिक शौचालयों एवम् अन्य स्थानों में गुप्त कैमरों के होने की घटनाओं के कारण इस विधेयक की जरूरत महसूस की गई। इसी तरह जर्मनी के संसद ने विधेयक ग्रहण किया है जो इमारतों के भीतर अनधिकृत तस्वीरें खींचने को प्रतिबंधित करता है। साउदी अरब में कैमरा फोन के आयात और विक्रय को अश्लीलता फैलाने के आरोप पर अवैध घोषित कर दिया गया है । एक विवाह समारोह में कोहराम मच गया जब एक मेहमान ने अपने कैमरा से तस्वीरें खींचनी शुरु कर दी।  ऐसी घटनाओं को कम करने की दिशा में दक्षिणी कोरियाई सरकार ने निर्माताओं को ऐसे फोन बनाने की हिदायत दी है जिनसे तस्वीर खींचे जाते वक्त सीटी की आवाज निकले।

सस्ती निगरानी प्रौद्यौगिकी  दूसरे किस्म के अपराधों की राह हमवार करती है। ब्रिटिश कोलम्बिया में एक पेट्रोल पंप के दो कर्मचारियों ने कार्ड-रीडर के ऊपर की छत पर एक गुप्त कैमरा गला लिया और हज़ारों ग्राहकों के पिन ( personal Identification Number) की चोरी कर ली। उन्होंने ऐसा एक यंत्र भी स्थापित कर दिया जो उपभोक्ताओं के खातों के विवरण की नकल तब कर लेता है जब वे अपने प्लास्टिक कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। इस दो व्यक्तियों ने पकड़े जाने के पूर्व 6,000 से अधिक लोगों के खातों के विवरण इकट्ठा कर लिए थे तथा साथ ही 1,000 बैंक कार्ड्स की जालसाजी कर ली थी।

निगरानी प्रौद्योगिकी दुधारी तलवार है।
लेकिन निगरानी प्रौद्यौगिकी के प्रसार के लाभदायक परिणाम भी हैं। खासकर पारदर्शिता एवम् जवाबदेही बढ़ाने में योगदान कर सकता है। आज स्कूलों में कैमरों की संख्या में रोजबरोज वृद्धि होती जा रही है. अमेरिका की सैकड़ों शिशु देखभाल केन्द्रों के कैमरों से पैरेण्टवाच.कॉम और किण्डरकैम.कॉम जैसी वेब पर आधारित सेवाएँ जुड़ी रहती हैं, ताकि माता-पिता देखते रह पाएँ कि उनके बच्चे और उनकी देखभाल करने वाले कर्मचारी क्या कर रहे हैं। स्कूलों की कक्षाओं में भी वेबकैम लगाए जा रहे हैं। औद्योगिक कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों के रेस्तराओं में वेबकैम लगाए हैं ताकि रेस्तराओं में भीड़ रहने पर कर्मचारी वहाँ भोजन करने जाने में देर कर सकें।
अबु ग़रीब जेल में युद्ध-बन्दियों पर पाशविक अत्याचार का पर्दाफाश विडियो प्रौद्योगिकी के कारण ही मुमकिन हो पाया है।

निगरानी प्रौद्योगिकी के प्रसार के सामाजिक परिणाम अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। श्री ब्रिन के सुझाव के अनुसार यह स्वतः-नियामक हो सकता है। यह तो जगजाहिर है कि ताक-झाँक करने वाले लोगों को इज्जत की निगाह से नहीं देखा जाता। किसी रेस्तराँ में घूरते हुए पकड़ा जाना बड़ा ही शर्मनाक होता है। दूसरी ओर कैमरों और निगरानी के अन्य उपकरणों के सर्वव्यापी होने से व्यक्तियों के अधिक परम्परावादी होने की सम्भावना भी बढ़ सकती है। क्योंकि अपने ऊपर बहुत ज्यादा ध्यान पड़ने से बचने के लिए लोग अपने व्यक्तिगत खूबियों को जाहिर करने से बचने की कोशिश करेंगे।

जैसा कि एकान्तता के हिमायती बहुत पहले से चेतावनी देते रहे है कि निगरानी समिति का आधिपत्य छाने ही वाला है। लेकिन इसका रूप उनकी धारणा के अनुरूप नहीं हुआ है। रोजबरोज सिर्फ बड़े भाई ही नहीं बहुत से छोटे भाई भी निगरानी करने में लगे हुए हैं।

07 जुलाई 2011

आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है ?

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार, और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे  कहिए के आरज़ू  क्या है ? 

वो चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाय बादा-ए-गुल-फाम-ए-मुश्कबू क्या है ?
 
रगों में  दौड्ते फिरने  के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है ?
 
 जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते  हो जो अब  राख,  जूस्तजू क्या  है ?
 
 हर एक बात पे कहते हो तुम के  तू क्या है ?
तुम्हीं कहो के ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है  ? 

05 जुलाई 2011

जुर्म के दलदल में कूद गया बेवफाई से नाराज़ किन्नर

उसलापुर में किन्नर के मकान से आटो चालक की लाश मिलने की गुत्थी पुलिस ने सुलझा ली है। चालक का किन्नर के साथ अनैतिक संबंध था और चालक उससे छुटकारा पाना चाह रहा था। बेवफाई से नाराज किन्नर ने अपने भांजे के साथ मिलकर आटो चालक की हत्या कर दी। किन्नर अभी भी फरार है, उसके भांजे को गिरफ्तार कर लिया गया है।
शनिवार सुबह उसलापुर फाटक के पास शकीला की मकान से आटो चालक जार्ज एंथोनी (20 वर्ष) की लाश मिली थी। लाश दो दिन पुरानी थी। सिर पर धारदार हथियार के निशान थे। पुलिस ने हत्या का जुर्म दर्ज कर मामले की जांच शुरू की। घर से फरार किन्नर पुलिस को शुरू से ही संदिग्ध लग रहा थी। पुलिस को जांच के दौरान पता चला किन्नर के घर जार्ज हमेशा आता जाता था।
गुरुवार को भी वह यहां आया था और उसका किन्नर से विवाद हुआ था। इस समय किन्नर का भांजा जयराम निर्मलकर भी मौजूद था। पुलिस ने जयराम को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो उसने सारे राज उगल दिए। जयराम खुद इस मामले का आरोपी निकला। वह जार्ज की हत्या करने में किन्नर को मदद की थी। पुलिस ने जयराम व शकीला के खिलाफ धारा 302 के तहत जुर्म दर्ज जयराम को गिरफ्तार कर लिया, वहीं फरार शकीला की तलाश जारी है।
खून से रंगे कपड़े व ईंट जब्त:
पुलिस ने जयराम की निशानदेही पर खून से शर्ट, पेंट व ईंट जब्त कर ली है। वारदात के बाद जयराम ने अपने कपड़े धो दिए थे, फिर भी उसमें खून के धब्बे थे। हत्या के लिए जिस खुखरी का उपयोग किया था, उसे शकीला अपने साथ ही ले गई है।
किन्नर के पीछे पुलिस :
शनिवार की रात पुलिस ने किन्नर शकीला की तलाश में लोरमी सहित कोरबा व चांटीडीह में दबिश दी। लोरमी में उसका घर है, लेकिन वह वारदात के बाद वहां नहीं पहुंची है। चांटीडीह में उसकी सहेलियां रहती हैं। पुलिस को उनसे पता चला कि गुरुवार की रात शकीला उनके पास आई थी। उसके कपड़ों पर खून के धब्बे थे। उसने बताया कि वह एक्सीडेंट में घायल हो गई। इसके बाद वह कहां गई, यह किसी को पता नहीं। पुलिस उसकी तलाश में कुछ और स्थानों पर दबिश देने की तैयारी में है।
बड़े भांजे ने की तस्दीक:
किन्नर शकीला का बड़ा भांजा दिलहरण निर्मलकर भी उसके घर में कभी-कभी सोता था। घटना की रात उसने अपने भाई जयराम को फोन किया तो उसने झगड़े की जानकारी देते हुए उसे वहां आने से मना कर दिया। दिलहरण ने यह जानकारी पुलिस को दी है।
बर्दाश्त नहीं कर सकी
आटो चालक जार्ज एंथोनी व शकीला के बीच पिछले दो साल से अनैतिक संबंध थे। शकीला ने ऑपरेशन के जरिए लिंग परिवर्तन कराया था। जार्ज पहले रोज शकीला के घर जाता था, लेकिन पिछले 10-12 दिनों से अचानक शकीला के घर जाना बंद कर दिया। वह शकीला से किसी तरह छुटकारा पाना चाहता था। इससे शकीला बेचैन हो गई। वह किसी भी कीमत पर जार्ज को नहीं खोना चाहती थी।
29 जून को शकीला उसकी तलाश में निकली। जार्ज उसे सत्यम टाकीज के पास मिल गया। यहां शकीला ने पहले तो उससे घर न आने का कारण पूछा। जार्ज ने बहाना बनाकर टाल दिया, लेकिन शकीला उसका इरादा जान चुकी थी। शकीला उस रात किसी तरह जार्ज को बहलाकर अपने घर ले गई। यहां शकीला का छोटा भांजा जयराम निर्मलकर (20 वर्ष) भी मौजूद था।
शकीला ने जयराम से शराब मंगाई और फिर तीनों ने शराब पी। इसी दौरान शकीला ने जार्ज से झगड़ा शुरू कर दिया। शकीना पहले ही जार्ज की बेवफाई से नाराज थी। शकीला ने जार्ज की हत्या करने की ठान ली। इसमें उसने अपने भांजे की मदद ली।
जार्ज पर नशा चढ़ते ही शकीला व जयराम ने उस पर हमला शुरू कर दिया। जयराम ने ईंट से वार किया तो शकीला उस पर खुखरी से हमला कर दिया। जार्ज लहुलुहान होकर गिर पड़ा। इसी बीच दोनों ने मिलकर उसका गला दबा दिया। उसकी मौत के बाद जयराम घर चला गया और शकीला घर का दरवाजा बंद कर कहीं चली गई।

जिन लड़कियों को आए थे देखने उन्हें बनाया बहन

रायपुर.गर्ल्स स्कूल और कालेज के आसपास मंडराने वाले युवक सोमवार को बुरे फंसे।सादे लिबास में मौजूद महिला पुलिस कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और जमकर क्लास ली।आइंदा गर्ल्स स्कूल के करीब नजर नहीं आने का वादा करने के बाद ही उन्हें छोड़ा गया।
हालांकि पुलिस के जाल में फंसने के बाद युवकों ने कई तरह के बहाने बनाने की कोशिश की। महिला पुलिस के दस्ते के आगे उनकी कोई बहानेबाजी नहीं टिक सकी।शर्मिदगी से बचने के लिए उन्हें पुलिस कर्मियों के सामने तौबा करनी पड़ी। महिला पुलिस कर्मियों ने दो-तीन दिन पहले ही इस तरह के अभियान चलाने का संकेत दे दिया था।
इसके बावजूद मनचले किस्म के युवकों पर कोई असर नहीं हुआ और वे स्कूल लगने और छूटने के समय आस-पास मंडराने लगे। महिला पुलिस कर्मियों ने सादे लिबास में घेरेबंदी की।सबसे पहले अमला डिग्री गर्ल्स कालेज पहुंचा। उसके बाद दानी गल्र्स स्कूल के पिछले वाले रास्ते अमला तैनात हुआ।
पुलिस कर्मियों का नेतृत्व महिला सेल की प्रभारी एसआई प्रतिमा सिंह कर रही थीं। स्कूल आने-जाने वाले रास्ते पर उन्होंने कई युवकों को रोका और कारण पूछा।कई युवक वजह नहीं बता सके। हालांकि उन्होंने अजब-गजब तरह के बहाने बताए और अपनी ही बातों में फंस गए।
बहन को लेने दोस्त के साथ
डिग्री गर्ल्स कालेज के सामने पकड़े गए युवक बुरी तरह घबरा गए थे। घबराहट में एक युवक ने कह दिया कि मैं तो अपनी बहन को लेने आया हूं। महिला पुलिस कर्मियों ने जब नाम पूछा तो वे हड़बड़ा गए और नाम तक नहीं बता सके। उनकी गाड़ी की चाबी निकालकर जब्त कर ली गई।
महिला पुलिस कर्मियों ने उन्हें वहीं खड़े रहने को कहा। वे दूसरे युवकों से पूछताछ करने जुट गईं, इसका फायदा उठाकर युवकों ने दूसरी चाबी निकाली और वहां से फरार हो गए।
पहुंच की धौंस भी दिखाई
पकड़े जाने के बाद युवकों ने राजनीतिक पहुंच की धौंस दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने महिला पुलिस कर्मियों से यहां तक कह दिया कि वे उन्हें जानती नहीं है।उनका ऐसा करना भारी पड़ सकता है।परंतु महिला सेल वालों ने जब परिजनों को बुलाने का प्रयास किया तो वे सीधे रास्ते पर आ गए।
यहां भी हुई जांच
महिला पुलिस कर्मियों ने पेंशन बाड़ा स्कूल, डागा कालेज, दिशा कालेज, शैलेंद्र नगर स्थित गल्र्स स्कूल के सामने भी दबिश दी। मोतीबाग स्थित सालेम गल्र्स स्कूल के सामने सबसे ज्यादा युवक नजर आए। यहां एक घंटे तक पूछताछ चली।कार्रवाई के दौरान स्कूल-कालेज के बाहर इंतजार कर रहे कई रिश्तेदारों से भी पूछताछ की गई।
इसलिए फंसे युवक
महिला सेल की टीम सादे लिबास में थी। पूरी टीम की सदस्या अलग-अलग जगह फैली थीं। इस वजह से कॉलेजों के बाहर खड़े मनचले युवक पुलिस कर्मियों को पहचान नहीं सके और फंस गए। कालीबाड़ी स्कूल के आसपास के इलाके में मनचलों की हरकतों की शिकायत लगातार पुलिस को मिल रही थी। कार्रवाई की शुरुआत भी यहीं से की गई।

04 जुलाई 2011

love

एक गाँव में एक किसान परिवार रहा करता था. परिवार में अधेड़ किसान दंपति के अतिरिक्त एक पुत्र एवं पुत्रवधू भी थे। पुत्र निकट के नगर में एक सेठ का सेवक था।एक दिन की बात है तीन वृद्ध कहीं से घूमते घामते आए और किसान की आँगन में लगे कदम के पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे। किसान की पत्नी जब बाहर लिकली तो उसने इन्हे देखा, उसने सोचा की वे भूखे होंगे। उसने उन्हे घर के अंदर आकर भोजन ग्रहण करने का अनुरोध किया। इसपर उन वृद्धों ने पूछा, क्या गृहस्वामी घर पर हैं? किसान की पत्नी ने उत्तर दिया, नहीं, वे बाहर गये हुए हैं।
वृद्धों ने कहा कि वे गृहस्वामी की अनुपस्थिति में घर के अंदर नहीं आएँगे। स्त्री अंदर चली गयी कुछ देर बाद किसान आया। पत्नी ने सारी बातें बताईं। किसान ने तत्काल उन्हें अंदर बुलाने को
कहा। स्त्री ने बाहर आकर उन्हें निमंत्रित किया। उन्होंने कहा “हम तीनों एक साथनहीं आएँगे, जाओ अपने पति से सलाह कर बताओ कि हममें से कौन पहले आए”। वो जो दोनों
हैं, एक “समृद्धि” है, और दूसरे का नाम “सफलता”। मेरा नाम “प्रेम” है”। पत्नी ने
सारी बातें अपने पति से कही। किसान यह सब सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने कहा, यदि
ऐसी बात है तो पहले “समृद्धि” को बुला लाओ। उसके आने से अपना घर धन धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा। उसकी पत्नी इसपर सहमत नहीं थी। उसने कहा, क्यों ना “सफलता” को
बुलाया जाए ।
उनकी पुत्रवधू एक कोने में खड़े होकर इन बातों को सुन रही थी। वो
बहुत ही समझदार थी उसने कहा, अम्माजी आप “प्रेम” को क्यों नहीं बुलातीं।
किसान ने कुछ देर सोचकर पत्नी से कहा “चलो बहू क़ी बात मान लेते हैं”।
पत्नी तत्काल बाहर गयी और उन वृद्धों को संबोधित कर कहा “आप तीनों मे जो “प्रेम” हों, वे कृपया अंदर आ जाए। “ प्रेम” खड़ा हुआ और चल पड़ा। बाकी दोनों, “सफलता” और “समृद्धि” भी पीछे हो लिए। यह देख महिला ने प्रश्न किया अरे ये क्या है, मैने तो केवल “प्रेम” को ही आमंत्रित किया है। दोनों ने एक साथ उत्तर दिया ” यदि आपने “समृद्धि” या “सफलता”
को बुलाया होता तो हम मे से दो बाहर ही रहते। परंतु आपने “प्रेम” को बुलाया इसलिए हम साथ चल रहे हैं। हम दोनो उसका साथ कभी नहीं छोड़ते।

प्यारया फिर करियर


जब भी कोई युवक या युवती प्यार के चक्कर में पड़ता है तो उसके सामने दो विकल्प रहते हैं, एक तो यह कि वे अपने प्यार को परवान चढ़ने पर ध्यान दें या फिर अपने करियर पर। करियर बनाने की उम्र में प्यार में पड़े युवक-युवतियाँ प्यार को ही तवज्जो देने लगते हैं।
प्यार की खातिर अपने करियर को दाँव पर लगाने वाले युवक-युवतियाँ भूल जाते हैं कि प्यार करने के लिए तो सारी जिंदगी है, पर एक बार करियर छूट गया तो उसे सँवारना बड़ा मुश्किल है।
कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है, लेकिन यदि आप विवेक से काम लें तो अपने बढ़ते कदम रोक सकते हैं। माना कि आप वयस्क हैं, आपको प्यार करने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसके लिए कितनी बड़ी कीमत चुका रहे हैं। आप जरा इस बात पर भी गौर फरमाइए।
प्यार के पचड़े में पड़कर अपना करियर बर्बाद करने वाले युवक-युवतियाँ शायद यह नहीं जानते कि उनके इस आचरण से उनके परिजनों का कितना दिल दुखेगा। अपने बच्चों का करियर बनाने के लिए की गई जद्दोजहद व्यर्थ होते देख उन्हें कैसा महसूस होगा? उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता देख उन्हें कितनी ठेस पहुँचेगी।
जीवन में हर कार्य का एक समय होता है और उसे तब ही करने में भलाई है। जब आप कॉलेज में एडमिशन लेते हैं तो आपका लक्ष्य करियर बनाना होना चाहिए। आपस में दोस्ती होना बुरा नहीं है, लेकिन दोस्ती और प्यार के बीच एक सीमा रेखा है जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए। जो युवक-युवतियाँ पढ़ाई के दौरान प्यार में पड़ जाते हैं वे अपना करियर समाप्त कर लेते हैं, क्योंकि दोनों का ही ध्यान पढ़ाई से उचट जाता है। ऐसे युवक-युवतियों को चाहिए कि वे पहले अपने करियर पर ध्यान दें।
एक बार आप अपनी मंजिल हासिल कर लें, उसके बाद प्यार करें तो वे अपने प्यार को भी समय दे पाएँगे व उसके साथ न्याय कर सकेंगे। करियर की ओर ध्यान नहीं देने से अच्‍छी नौकरी नहीं मिलेगी व आय का कोई साधन नहीं रहेगा। रोजी-रोटी और गृहस्थी के लिए अच्‍छा करियर होना बहुत जरूरी है अन्यथा प्यार में अंधे होकर किए गए प्रेम-विवाह का हश्र बहुत बुरा होता है। हाथों की मेहँदी छूटने के पहले ही अलगाव की स्थिति बन जाती है। इसलिए आप अपनी जिंदगी के फैसले सोच-समझकर लें।
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लड़कियों के डर भी अजीब होते हैं
भीड़ में हों तो लोगों का डर
अकेले में हों तो सुनसान राहों का डर
गर्मी में हों तो पसीने से भीगने का डर
हवा चले तो दुपट्टे के उड़ने का डर
कोई न देखे तो अपने चेहरे से डर
कोई देखे तो देखने वाले की आँखों से डर
बचपन हो तो माता-पिता का डर
किशोर हो तो भाइयों का डर
यौवन आये तो दुनिया वालो का डर
राह में कड़ी धुप हो तो,चेहरे के मुरझाने का डर
बारिश आ जाये तो उसमें भीग जाने का डर
वो डरती हैं और तब तक डरती हैं
जब तक उन्हें कोई जीवन साथी नहीं मिल जाता
और वही वो व्यक्ति होता हैं जिसे वो सबसे ज्यादा डराती है!!!!!!!!!!

30 जून 2011

गाँधी जी के नाम सुखदेव की यह खुली चिट्ठी


 गाँधी जी के नाम सुखदेव की यह खुली चिट्ठी मार्च १९३१ में गाँधी जी और वायसराय इरविन के बीच हुए समझैते के बाद लिखी गई थी जो हिंदी नवजीवन 30 अप्रैल 1931 के अंक में प्रकाशित हुई थी }
परम कृपालु महात्मा जी ,

आजकल की ताज़ा खबरों से मालूम होता है कि{ ब्रिटिश सरकार से } समझौते की बातचीत कि सफलता के बाद आपने क्रन्तिकारी कार्यकर्ताओं को फिलहाल अपना आन्दोलन बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौका देने के लिए कई प्रकट प्राथनाए कई है |वस्तुत ; किसी आन्दोलन को बन्द करना केवल आदर्श या भावना में होने वाला काम नहीं हैं |भिन्न -भिन्न अवसरों कि आवश्यकता का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता हैं |
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान , आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष किया ,न इसे छिपा ही रखा की समझौता होगा |में मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिलकुल आसानी के साथ यह समझ गये होंगे कि आप के द्वारा प्राप्त तमाम सुधारो का अम्ल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले -मकसूद पर पहुच गये हैं | सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक न मिले ,तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए कांग्रेस महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बंधी हुई हैं | उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझैता सिर्फ काम चलाऊ युद्ध विराम हैं |जिसका अर्थ येही होता होता हैं कि अधिक बड़े पएमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोडा विश्राम हैं ........
किसी भी प्रकार का युद्ध -विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआवो का हैं | लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आप ने फिलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा हैं |इसके वावजूद भी वह प्रस्ताव तो कायम ही हैं |इसी तरह 'हिन्दुस्तानी सोसलिस्ट पार्टी ' के नाम से ही साफ़ पता चलता हैं कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाजवादी प्रजातन्त्र कि स्थापना करना हैं |यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नही हैं |जब तक उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो , तब तक वे लड़ाई जरी रखने के लिए बंधे हुए हैं |परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध .निति बदलने को तैयार अवश्य होंगे |क्रन्तिकारी युद्ध ,जुदा ,जुदा रूप धारण करता हैं |कभी गुप्त ,कभी केवल आन्दोलन -रूप होता हैं ,और कभी जीवन -मरण का भयानक सग्राम बन जाता हैं |ऐसी दशा में क्रांतिवादियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए विशेष कारणहोने चाहिए |परन्तु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया |निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतीवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नही होता ,हो भी नही सकता |

नकली दवाएं बेचने का गोरखधंधा

.राज्य में नकली दवाएं बेचने का गोरखधंधा एक बार फिर उजागर हो गया। दवा दुकानों में अर्से से बेची जा रही कफ सिरप कॉफजेड दिल्ली की प्रयोगशाला में जांच के बाद नकली मिली। खांसी कम करने वाले इस सिरप में दवा के घटक नहीं मिले।

खाद्य एवं औषधि विभाग ने तत्काल प्रभाव से सिरप की बिक्री पर पाबंदी लगा दी है। इस सिरप का निर्माण लेडरली कंपनी करती थी, जो पांच साल पहले बंद हो चुकी है। यही बात हैरान करने वाली है कि पांच साल पहले बंद हो चुकी कंपनी के नाम से दवाएं विभाग और जिला प्रशासन की नाक के नीचे बिकती रहीं और पूरा विभाग सोया रहा।

इस सनसनीखेज खुलासे से दवा बाजार में हड़कंप है। दवा कारोबारियों के अनुसार इस सिरप की सबसे ज्यादा खपत गांव और छोटे कस्बों के मेडिकल स्टोर्स में है। यानी संगठित रैकेट के जरिये खामोशी से छोटे स्थानों पर नकली दवा खपाने का खेल चल रहा था।

खाद्य एवं औषधि विभाग ने बिलासपुर के आउटर से कफ सिरप का सैंपल लिया था। इसे जांच के लिए दिल्ली स्थित केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला भेजा गया। मंगलवार को मिली जांच रिपोर्ट देखकर खाद्य एवं औषधि विभाग के अफसर दंग रह गए। दवा के बारे में सुराग ड्रग कंट्रोलर के. सुब्रमणियम को मिला था।

उन्होंने जांच के लिए टीम भेजी। कॉफजेड का निर्माण बहुराष्ट्रीय कंपनी लेडरली करती थी। यह पांच साल पहले जान वाइथ में मर्ज हो चुकी है। उसके बाद से लेडरली कंपनी के नाम से दवाएं आना बंद हो गई थी। नकली दवा का धंधा करने वालों ने कंपनी के नाम का फायदा उठाया।

विभाग भी संदेह के दायरे में

नकली दवाओं का कारोबार करने वाला गिरोह पांच साल पहले बंद हो चुकी मल्टीनेशनल कंपनी लेडरली के नाम से कफ सिरप तैयार कर बाजार में खपा रहा था। यह बात सैंपल भेजने के पहले ही औषधि विभाग को पता थी या नहीं इसकी पड़ताल होनी चाहिए। विभाग का कहना है कि दवा तैयार करने वाले गिरोह ने कंपनी के नाम के आगे लेडरली दिल्ली लिख दिया है। इस बारे में दिल्ली पत्र लिखकर पूछा जाएगा कि क्या यह दवा कंपनी यहां रजिस्टर्ड है या नहीं।

जांच में यह निकला

> लेबल में लिखा गया एक भी घटक दवा में नहीं मिला।

> जो घटक मिले, उसकी मात्रा भी बेहद कम।

> डिस्मोनिया या खांसी के दौरान सांस अटकने जैसी गंभीर बीमारी के मरीजों को दवा देने पर उसकी जान खतरे में पड़ सकती है।

"भारत सरकार की रिपोर्ट की सूचना राज्य के सभी दवा कारोबारियों को भेजी जाएगी। तमाम दवा कारोबारियों को बताया जाएगा कि कॉफजेड सिरप प्रतिबंधित कर दी गई है।"

एस. बाबू,
डिप्टी ड्रग कंट्रोलर

गरीब देश अमीर भगवान

बहुत ही अमीर हैं इस देश में भगवान
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं,
चाहे वो फिर नेता हों या अभिनेता हों,
मंत्री हों या जनता के संतरी हों,
योगा सिखलाएँ या प्रवचन सुनाएं,
जनता चाहे इनके आगे नतमस्तक है,
पर यह बस सिर्फ सत्ता के ही करीब हैं,
इस देश के भगवन आज बहुत ही अमीर हैं.

भूखी है जनता पर गोदामों में अनाज है सड़ता,
त्राहि है मची पर इन्हें क्या फर्क है पड़ता,
भरें हैं पेट इनके, सारे बैंक बैलेंस भी भरे,
जनता को अब कौन देखे,
वो जिए तो जिए, मरती है तो फिर मरे.बातें ही बस जिन्दा, मगर मरे सारे जमीर हैं,
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं.
मोमबत्ती भी जलाई, नारे भी लगाए,
राजघाट पर सोते बापू भी जगाये,
पर सोते रहना ही था जिनको, नहीं जगे वो,
देश है गिरा पर उन्हें कौन कैसे उठाये.
गिरना, रोना, आंसू बहाना,
अब यही देश की किस्मत, तकदीर है.
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं..!!
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं..!!

हर इंसान के अन्दर राजनीति

कुछ राजनीति के बारे मैं .....

राजनीति हर इंसान के अन्दर थोड़ा न थोड़ा, किसी न किसी रूप मैं छुपी रहती है. बस सही वक्त का इन्तजार करता है हर इन्सान का चरित्र. अतः राजनीति और राजनेताओं को कोसने से कोई फायदा नहीं क्योंकि राजनीति का अपना कोई चरित्र नहीं होता बल्कि इसका चरित्र उसका वरण करने वाले के चरित्र पर निर्भर करता है :

ये राम के लिए भक्ति का साधन थी,
तो कृष्ण के लिए युक्ति का साधन,
गांधी के लिए शक्ति का साधन थी,
तो सुभाष-भगत के लिए मुक्ति का साधन !!
पर अफ़सोस आज ये लोगों के सिर्फ़ सम्पति का साधन है.
.   .   .   .   .  .  .  
 - - - अर्थशास्त्र (Economics) - - - -     

गरीब पैंसे के लिए काम करता है, जबकि अमीर के लिए पैंसा काम करता है !!

28 जून 2011

शहीदों की चिताओं पर ....नहीं लगते हैं अब मेले

शहीदों की चिताओं पर ....नहीं लगते हैं अब मेले
from भड़ास blog by Ajit Singh Taimur
दोस्तों आज 28 जून है ....हम लोगों के लिए एक और सामान्य सा दिन ........ आज सुबह सो कर उठे तो बूंदा बंदी हो रही थी ........बारिश की सुबह कितनी रोमांटिक होती है .........अपनी पत्नी के साथ आज बालकनी में बैठ के चाय पीते हुए अखबार देख रहा था ......दो दो अखबार देख डाले ........कहीं कोई ज़िक्र नहीं था ....कल टीवी पे सारे news channels खंगाले ....कुछ नहीं था .....हिन्दुस्तान gas और diesel के दामों में उलझा हुआ है ..........मेरी पत्नी मेरे भावों को पढ़ लेती है ........... उसने पूछा क्या हुआ .....अचानक इतने serious क्यों हो गए ..........मैंने कहा कितनी रोमांटिक लगती है न ये बूंदा बांदी .....बारिश की ये फुहार .........उस दिन भी हलकी बूंदा बांदी हो रही थी ....जब वो लोग .....उस रात अपने घर आखिरी ख़त लिख रहे थे ..........आज से 12 साल पहले ......सब 20 से 25 के बीच थे .......यानी मेरे बेटे से सिर्फ 2 -3 साल बड़े .........मेरा बेटा तो मुझे बच्चा लगता है अभी..... आखिर 20 - 22 साल भी कोई उम्र होती है जान देने की ........
दोस्तों शहादत दिवस है आज .........major P P Acharya ,Capt kenguruse और Capt Vijayant Thaapar ....सिपाही जगमाल सिंह और नायक तिलक सिंह का ....12 साल पहले आज की रात वो सब शहीद हुए थे वहां दूर .....drass में ....knoll नामक चोटी को फतह करते हुए .........कारगिल युद्ध में .........27 जून को एक पूरी प्लाटून शहीद हो गयी थी उसी चोटी पर .........शाम की roll call खुद commanding officer ..... colonel M B Ravindra naathan ने ली ...........वहां ये बताया की आज हमारी पूरी प्लाटून शहीद हो गए knoll पर .......सबने 2 मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी .........फिर colonel ने कहा ......कल के assault में जो जाना चाहता है ...एक कदम आगे आयेगा ....बाकी अपनी जगह खड़े रहेंगे ...........पूरी regiment एक कदम आगे आ गयी .......तब major आचार्य ने कहा की कल A कंपनी ने assault किया था .......आज B कंपनी करेगी .......और फिर उन्होंने अपनी टीम बनाई .........और कहा की चूंकि मैं कंपनी कमांडर हूँ इसलिए मैं लीड करूँगा .........उनकी टीम में 12 लोग थे...... अगले दिन सुबह निकलना था .....उस रात सबने अपने घर चिट्ठी लिखी .....major आचार्य ने भी लिखा था ....अपने पिता को .......हतॊ वा पराप्स्यसि सवर्गं जित्वा वा भॊक्ष्यसे महीम.........तस्माद उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः......गीता का ये श्लोक quote किया था ..........उस रात वो लोग जानते थे की लौट कर नहीं आयेंगे .............और नहीं आये ......capt थापर ने जो पत्र अपने घर लिखा था ....उस पर मैं पहले ये लेख .....http://akelachana.blogspot.com/2011/03/chief-of-army-staff.html लिख चुका हूँ ...........उन्होंने भी लिखा था की जब तक ये पत्र आप लोगों को मिलेगा ...मैं वहां अप्सराओं के बीच स्वर्ग का सुख भोग रहा होऊंगा ......... वो जानते थे की लौट के नहीं आएंगे ..........फिर भी गए .......उस रात हलकी बूंदा बांदी हो रही थी .........पर अगली सुबह मौसम साफ़ था एकदम ...और उस रात जब उन्होंने चढ़ना शुरू किया ................full moon night थी .......full moon night भी रोमांटिक लगती है कुछ लोगों को ............चाँद आसमान में चमक रहा था ........रात में भी सब कुछ साफ़ साफ़ दिख रहा था ..........हमें भी और दुश्मन को भी .........भयंकर गोला बारी हो रही थी .....सबसे आगे major आचार्य थे ......वही सबसे पहले शहीद हुए .....फिर सिपाही जगमाल सिंह ........वो अर्दली था capt थापर का ......major आचार्य ने उसे अपनी टीम में चुना नहीं था .....उस रात जब उसे पता चला की उसे नहीं चुना गया है तो वो खुद major आचार्य के टेंट में गया .......अगर मेरे साहब जायेंगे ....(यानी capt थापर) ......तो मैं भी जाऊंगा .......वो capt थापर से पहले शहीद हुआ उस रात .........उनकी बाहों में .........२२ साल उम्र थी उसकी ......आजकल इस उम्र के लड़के सारी रात अपनी girl friends को SMS भेजने में बिता देते हैं .......उनमे एक capt kenguruse था ....25 साल का .....वो नागा था ....नागालैंड का .......सुना है नागालैंड में लोग नफरत करते हैं ....हिन्दुस्तान से और हिन्दुस्तानी फ़ौज से ........graduation के बाद सरकारी स्कूल में teacher हो गया था ........दो साल मास्टरी की भी ......फिर बोला फ़ौज में जाऊंगा ........हिन्दुस्तानी फ़ौज में ....उस फ़ौज में जिससे उसका समाज नफरत करता है ...दिल से ......उस रात एक LMG चढ़ानी थी ऊपर .....बहुत फिसलन थी उस नंगे पहाड़ पे ......उस कडकडाती ठण्ड में ........अपने जूते उतार दिए उसने ......जिससे की पैरों को अच्छी पकड़ मिले चट्टानों पे .......सबसे पहले ऊपर चढ़ा, चोटी पे .........नंगे पाँव...... फिर कमर में बंधी रस्सी से अकेले दम वो LMG ऊपर खींची ......मरियल सा था ....मुश्कल से 50 किलो का .......5 फुट दो इंच का .......फिर उसी रस्सी को पकड़ के पूरी प्लाटून ऊपर आयी .....वहां दो पाकिस्तानी rifle से मारे और एक को अपनी उस नागा खुकरी से .....hand to hand combat में .......एकदम नज़दीक एक हथगोला फटा ...पेट में splinter लगा .......उस खड़े पहाड़ से 100 फुट नीचे गिरा .....वहां शहादत हुई .......capt थापर को बाईं आँख में गोली लगी थी ........जब body घर पहुंची तो चश्मा पहना दिया था ......दाढ़ी बढ़ी हुई थी .....6 फुट 1 इंच height थी .......इतना सजीला और ख़ूबसूरत जवान अपनी जिंदगी में नहीं देखा मैंने ............शहादत से दो दिन पहले का फोटो है उसी दाढ़ी में ........अगर फ़ौज में न होता तो मॉडल होता ....या फिर फिल्म स्टार .....24 साल की उम्र में शहादत दे दी ......वो जो आखिरी चिट्ठी लिखी उसने अपने माँ बाप को ...उसमें भी सब कुछ दे गयादेश को ......मरने के बाद भी ...........निकाल लेना सारे अंग ....फूंकने से पहले .....ताकि काम आ सकें किसी के .......
आज सुबह के अखबार देख के बहुत दुःख हुआ ..........इतनी जल्दी भुला दिया इस अहसान फरामोश मुल्क ने ..........पूरे देश में चर्चा है आज ........ऐश्वर्या राय pregnent हो गयी है .......major आचार्य की बीवी भी pregnent थी .........जब उसका पति शहीद हुआ .........तीन महीने बाद जन्मी वो बच्ची ...........क्या सोच रही होगी वो लड़की आज के अखबार देख के ...........उस रात .......उस खड़ी चट्टान से 100 फुट नीचे गिर कर ......ज़िदगी के उन आखिरी क्षणों में .....मरने से पहले .....क्या कुछ सोचा होगा उस नागा लड़के ने ..........संवेदना शून्य हो जाता होगा ऐसी स्थिति में दिमाग आदमी का ........आज जैसे हमारा हो गया है ....जीते जागते भी .........वो लड़के उस रात अच्छी तरह जानते थे की वापस नहीं आयेंगे लौट के .....फिर भी गए .....क्या जज्बा होता होगा .......देश के प्रति ......क्या सोच के गए होंगे .........क्यों पैदा नहीं होता वो जज्बा हम लोगों में ....अपने देश के प्रति ......
सलाम है ....कारगिल शहीदों के उस जज्बे को ............13 july को capt विक्रम बत्रा का शहीदी दिवस है ....पूर्व में एक लेख उनपे भी लिख चूका हूँ ......http://akelachana.blogspot.com/2011/03/r.html ......इस बार 13 जुलाई को उनके घर पालम पुर जाने का विचार है ........ सुना था की ...शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ....वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा ...........अब तो कमबख्त वो मेले लगने भी बंद हो गए .....upa सरकार कारगिल विजय की बरसी नहीं मनाती .......चलो हम ही मना लें ......


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एक और जनांदोलन....................Right to recall

      एक और जनांदोलन जन्म लेने को है .......  
               Right to recall              



सबसे अहम बात जो सामने निकल कर आई वो ये कि इन और इन जैसे तमाम प्रयासों के साथ जिस तरह का सलूक सरकार और उसके मंत्रियोंने किया या अब भी कर रहे हैं और उससे भी बडी बात कि जिस तरह का घोर उपेक्षित रवैय्या , प्रधानमंत्री , यूपीए अध्यक्षा , और तेज़ तर्रार महासचिव और युवा लोगों में खासे लोकप्रिय माने जाने वाले युवा नेता ने अपना रखा है उससे तो स्थिति और स्पष्ट हो गई है आम जनता के सामने । जनलोकपाल बिल और विदेशों में छिपे काले धन के बिल को लाए जाने के दबाव को बेशक सरकार कुछ दिनों के लिए टला हुआ मान रही हो, लेकिन ऐसा है नहीं वास्तव में । बल्कि अब तो ये साफ़ हो गया है कि सरकार को अपना वजूद और सत्ता को बचाए रखने के लिए दो में से एक रास्ता चुनना होगा । भ्रष्टाचार के पाले में खुद को रखें या फ़िर कि जनता द्वारा मांगे जा रहे कानूनी अधिकारों को बना कर उनके साथ रहें । सरकार को ये ध्यान में रखना चाहिए कि , जनलोकपाल बिल, विदेशों मे छिपे काले धन को वापस लाने के लिए कानून और राईट टू रिकॉल यानि प्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून , जैसे नियम और अधिकार जनता ने अपने किसी फ़ायदे के लिए नहीं मांगे हैं , ये उसी लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए बहुत जरूरी है जिसकी रक्षा करने का दावा , इनका पुरज़ोर विरोध करने वाले राजनेता दशकों से करते आए हैं । अब वक्त आ गया है कि जनता सरकार की आंखों में आंखें डाल के पूछे कि बताओ , ये कानून क्यों नहीं बन सकता , और कब कैसे बनेगा ?इस मुहिम को एक और अस्त्र देते हुए हमने एक नई लडाई की योजना बनाई है - Right to recall - यानि जनप्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून । सीधे सरल शब्दों में समझा जाए तो राजनेताओं सेीक बार चुनाव जीत कर,उन कुर्सियों पर बैठे रहने का अधिकार छीन लेना जिन्हें पाते ही वे सत्ता के मद में न सिर्फ़ चूर हो जाते हैं बल्कि देश , समाज और कानून से भी बहुत दूर हो जाते हैं । आज राजनेताओं के लिए राजनीति समाज सेवा नहीं बल्कि विशुद्ध मुनाफ़े वाला कारोबार मात्र बन कर रह गया है । अब आकलन विश्लेषण किया जाता है कि यदि छोटे स्तर पर चुनाव जीतने में पैसा लगाया जाए तो कितना मुनाफ़ा होगा और बडे स्तर पर कितना , कारण एक सिर्फ़ एक , एक बार कुर्सी मिल जाए बस । तो क्यों न उनके सरों पर एक अनिश्चितता की ऐसी तलवार टांगी जाए कि जिसकी धार उसे अपने कर्तव्य को न भूलने के लिए विवश कर सके । इसी उद्देश्य के साथ फ़ेसबुक पर एक समूह का गठन किया गया है   ..Right to recall;   यहां ये जानना समीचीन होगा कि इस कानून को अमेरिका के अठारह राज्यों में मान्यता मिली हुई है अब तक दो राज्यों की सरकार इस अधिकार के उपयोग से जनता ने गिरा दी । भारत में भी कई स्तरों पर मध्यप्रदेश , और छत्तीसगढ जैसे राज्यों में इसे सफ़लतापूर्वक आजमाया जा चुका है ।

जैसी भावना..

जैसी रही भावना जिसकी


एक प्रसिद्द वेश्यालय था, जो किसी मंदिर के सामने ही स्थित था. वेश्यालय में नित्य प्रति गायन-वादन-नृत्य आदि होता रहता था, जो की वह वेश्या अपने ग्राहकों की प्रसन्नता के लिए प्रस्तुत करती थी और बदले में बहुत सारा धन व कीमती उपहार उनसे प्राप्त करती थी. इस प्रकार उसकी समस्त भौतिक इच्छाएं तो पूर्ण थी, लेकिन कठोर मनुवादी व्यवस्था के अंतर्गत उसका मंदिर में प्रवेश वर्जित था और उसे वहां पूजा-पाठ आदि करने की अनुमति नहीं थी.वेश्यालय में तो उसे ग्राहकों से ही फुर्सत नहीं थी, कि वह किसी प्रकार देव पूजन संपन्न कर सकें. उसके मन में एक ही इच्छा शेष रह गयी थी, कि वह किसी प्रकार देव पूजन संपन्न कर सकें. उसके मन में एक ही इच्छा शेष रह गयी थी, कि वह किसी प्रकार मंदिर में स्थापित देव मूर्ति का दर्शन कर ले और धीरे-धीरे समय के साथ उसकी यह इच्छा एक प्रकार की व्याकुलता में बदल गयी. जब मंदिर में आरती के समय बजने वाली घंटियों की आवाज उसके कानों में पड़ती, तो वह अत्यंत व्यग्र हो उठती, उसका हृदय रूदन कर उठता और भगवान् दर्शन की उत्कंठा उसके नेत्रों से बरसने लगती. वेश्या के गायन-नृत्य आदि की स्वर लहरिया मंदिर तक भी पहुंचती थी. मंदिर का पुजारी कभी तो अत्यंत क्रोधित होता, कि उस नीच कर्मों में रत स्त्री की आवाज़ से मंदिर के वातावरण की पवित्रता में विघ्न उपस्थित हो रहा हैं और कभी वासना के वशीभूत उसी वेश्या के आगोश में पहुँच कर उसके रूप-रस का पान करने की कल्पना में डूब जाता, लेकिन मनुवादी स्समजिक मर्यादा के कारन ऐसा संभव नहीं था.संयोगवश उस वेश्या और पुजारी, दोनों की मृत्यु एक ही समय हुयी. यमराज उस पुजारी को नरक के द्वार पर छोड़ कर वेश्या को स्वर्ग की और ले जाने लगे.पुजारी को इस पर बहुत क्रोध आया और उसने यमराज से पूछा – “मैं जीवन भर मंदिर में देव मूर्तियों का पूजन करता रहा, फिर भी मुझे नरक में जगह दी जा रही हैं और यह वेश्या जीवन भर पाप कर्मों में लिप्त रही, फिर भी इसे स्वर्ग ले जाया जा रहा हैं. ऐसा क्यों? यमराज ने उत्तर दिया – “देव मूर्तियों की पूजा करते हुए भी तुम्हारा चित्त सदा इस वेश्या में ही लगा रहा, जबकि पाप कर्मों में लिप्त रहते हुए भी इसका चित्त देव मूर्ति में ही लगा रहा. यही वजह हैं, कि इसे स्वर्ग मिल रहा हैं और तुम्हें नरक.”वस्तुतः कर्म के साथ विचारों का भी जीवन में अत्यधिक महत्त्व हैं. जब तक चित्त वेश्यागामी रहेगा (अर्थात भौतिक भोगों में लिप्त रहेगा), तब तक देव पूजन, जप, साधना आदि के उपरांत भी स्वर्ग (अर्थात देवत्व. श्रेष्ठता, सफलता, पूर्णता) की प्राप्ति संभव नहीं हैं.
\किसी साधना आदि में असफलता प्राप्त होने के पीछे कारन ही यही होता हैं, कि कहीं न कहीं उसके विश्वास, श्रद्धा, समर्पण आदि में न्यूनता रहती हैं एवं चित्त साधनात्मक चिंतन से न्यून हो कर भोगेच्छाओं में लिप्त होता हैं अतः साधक का यह पहला कर्त्तव्य हैं, कि वह प्रतिक्षण गुरु या इष्ट चिंतन करता हुआ, मन को नियंत्रित करें, तभी श्रेष्ठता की और अग्रसर होने की क्रिया संभव हो पायेगी.