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22 अक्टूबर 2011

रहिये तैयार कैन्सर से लड़ने के लिये



जी‌ हां, हमेशा, क्योंकि कैन्सर कोई इन्फ़ैक्शन से तो शायद ही होता हो.. यह तो कोशिकाओं का गुण है कि वे सख्या में बढ़ोत्तरी करती रहें ताकि हम बढ़ते रहें , हमारी मृत कोशिकाओं की क्षतिपूर्ति होती रहे । बस बात कोशिकाओं की बढ़त पर नियंत्रण की है और स्वस्थ्य कोशिकाएं आवश्यकता पूरी करने पर अपनी‌ बढ़त रोक देती हैं। जिस तरह मानव का स्वभाव है गलती करना उत्नी तो नहीं किन्तु यह कोशिकाएं भी करोड़ों में एकाध बार गलती कर देती हैं और अपनी बढ़त करती‌ जाती हैं। यही मौका है जब हमारा प्रतिरोधी तंत्र इनसे लड़ाई करता है, और यदि स्वस्थ्य रहा तो जीत जाता है।
बात प्रतिरोधी तंत्र के सशक्त होने की है। तम्बाकू शराब जं‌क फ़ूड या ड्रिंक, दूषित वातावरण, जल तथा आहार भी प्रतिरोधी तंत्र को दुर्बल करते हैं और बादाम, अखरोट, अंगूर, पपीता, अनार, नारंगी, केला, अमरूद आदि फ़ल, तथा हमारे मसाले, विशेषकर हलदी, मिर्च तथा शिमला मिर्च और अन्य सब्जियां प्रतिरोधी तंत्र को सशक्त करते हैं।
और शारीरिक व्यायाम भी हमेशा की तरह हमें रोगों से तथा कैन्सर से लड़ने की शक्ति देता है।
तो बस हमेशा रहिये तैयार कैन्सर से लड़ने के लिये ।

16 अक्टूबर 2011

Introducing the New Gifs: Soccer Throw Headshot

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Introducing the New Gifs: Spank Prank

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19 अगस्त 2011

नक्सलवाद भी एक फ़ोड़ा


नक्सलवाद भी एक फ़ोड़ा है को नासूर बन गया है।आज रात फ़िर छुटटी पर जा रहे 9 जवानों को लगभग डेढ सौ नक्सलियों ने घेर कर मौत के घाट उतार डाला।औपचरिकता के लिये मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के घर आला अफ़सरों की बैठक हो गई है। उन नौ जवानों के घर में आये आंसूओं के सैलाब को कौन थामेगा?क्या स्वामी जी को भ्रष्टाचार के आंदोलन से फ़ुरसत मिलेगी?वे नक्सलियों को कह पायेंगे कि निर्दोष जवानो का खून बहाना बंद करें।

18 अगस्त 2011

ANNA


जज्बात


अपने जज्बात को,
नाहक ही सजा देती हूँ...होते ही शाम,
चरागों को बुझा देती हूँ...
जब राहत का,
मिलता ना बहाना कोई...लिखती हूँ हथेली पे नाम तेरा,
लिख के मिटा देती हूँ......................

ई मीडिया को लेकर अक्सर ये सवाल उठते रहे हैं कि वो अपने दायित्व को ठीक से निभा नही रहा हैं,लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन को आज जन आंदोलन बनाने का किया हैं तो उसमें ई मीडया ने महती भूमिका निभाई है। ई मीडिया के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ हैं कि जब २४ घंटे तक कोई खबर के लिए बुलेटिन निकला हो और जिसका लाइव होता रहा। वास्तव में एक बार फिर से मीडिया अपनी ताकत का एहसास करा दिया हैं। जिस तरह से देश को आजादी दिलाने में पूर्व में अखबरो नें अपनी भूमिका निर्वहन किया था ठीक आज उसी तरह देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने में ई मीडिया अपनी भूमिका अदा कर रहा हैं। यह सत्य हैं कि आज भ्रष्टाचार हर कही और इससे मीडिया भी अछूता नहीं है बावजुद इसके जब मीडिया को एक मीडिया याने माध्यम या कहिए एक मंच अन्ना हजारे के रुप में मिला हैं तो उसनें भी इस मूहिम को अंजाम तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा हैं। यही मीडिया का सत्य हैं। जय अन्ना, जय मीडिया ।

08 अगस्त 2011

हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी



न भोगी हू न जोगी हूँ , मै निष्पाप कहानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ
मै ज्ञान नहीं मै ध्यान नहीं, अरमान नहीं भगवान् नहीं,
मत देख तू मुझको ऐसे प्यारे मै मजदूर के माथे वाला पानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ
हे मनु तू कितना निर्दयी तुने ये क्या भेद बनाया है,
हिन्दू में क्या रखा, जो मुस्लिम ने ना पाया है,
क्यों कहता इंसा इंसा से तू हिन्दुस्तानी मै पाकिस्तानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ
खून बहा जाने कितनो का इस अनचाहे बटवारे से
आसमान जैसे बिछड़ा कोई अपने प्यारे  तारे से
न शर्मा हू न वर्मा हू, मै शास्वत रूप से कर्मा हूँ
खान ना कहना मुझको प्यारे मै खान नहीं खानदानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ…..
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ……

जब गिलास बोला……


मै एक गिलास हूँ
हर पथिक की प्यास हूँ
न मुसलमान हूँ  ना इसाई हूँ
न हिन्दू हूँ न कसाई हूँ
मै धर्म नहीं देखता, मै कर्म नहीं देखता
मै तो अपने कर्मो का घड़ा भरता हूँ,
और निस्वार्थ भाव से आपकी सेवा करता हूँ
वो मियाँ अभी अभी मस्जिद से आये है
कुछ पावन लब्ज कुरान के अधरों पर छाए है
वह जिन्दगी जी रहे है,
मजे से जल पी रहे है
उनके अधरों को छू कर मेरे वारे न्यारे
वे गए पंडित काशीनाथ पधारे
क्या पावन एहसास मिला  है
एक पंडित का साथ मिला है
सूखे गले को तरण कर रहे है
वे भी जल ग्रहण कर रहे है
दोनों को जल पिला दिया
दोनों अधरों को मिला दिया
पर क्या सच में मिले है
शायद कुछ बैर पले है
पर क्यों ?
जब एक राह पर चल सकते है,
एक समान पल सकते है
एक समान बोलते है
एक समान सोचते है
एक से विचार है
एक सा आचार है
एक सा व्यवहार है
एक सा ही ज्ञान है
इससे भी बढ़कर दोनों इंसान है
मै निर्जीव हूँ, पर विचार से सजीव हूँ
जब मै हिन्दू  मुस्लिम में भेद नहीं करता,
समजल  देता हूँ कोई खेद नहीं करता
तो आप तो बुद्दिमान है, ज्ञानवान है,
उससे भी बढकर आप दोनों इंसान है
आज से सीख डालो,
अपने मन में प्रीत पालो
आप दोनों भाईचारे की शोभा है, आभा है
दोनों ही  धर्मा है, दोनों ही  कर्मा है
आप दोनों ही  गीता है, दोनों ही कुरान है
उससे भी बढकर आप दोनों इंसान है
उससे भी बढकर आप दोनों इंसान है ………..

06 अगस्त 2011

वफ़ा की राह में देखें , हमारा क्या ठिकाना है !!

दिया लेकर, भरी बरसात में, उस पार जाना है !
उधर पानी, इधर है आग, दोनों से निभाना है !!
करो कुछ बात गीली सी , ग़ज़ल छेड़ो पढो कविता !
किसी को याद करने का , बहुत अच्छा बहाना है !!
मेरा आईना भी मेरी, बहुत तारीफ करता है !
मुझे लगता है सोने से, इसे भी मुंह मढाना है !!
मुहब्बत की डगर सीधी , मगर दस्तूर उलटे है !
अगर चाहो इसे पाना ,तो फिर जी भर लुटाना है !!
ये मंज़र प्यार में तुमने , अभी देखे कहाँ होंगे !
 लिपटना है घटा से , प्यास, शबनम से बुझाना है !!
मुखौटे तोड़ने भी हैं , भरम जिंदा भी रखना है !
यहाँ पर कुफ्र है पीना , औ, लाजिम डगमगाना है !
ये आंसू भी तो स्वाँती, बूँद से कुछ कम नहीं मेरे !
संवर जाये तो मोती है , बिखर जाये फ़साना है !!
मेरी बेचारगी को माफ़ करना ऐ जहाँ वालो !
ये किस्सा है हसीनों का , मशीनों को सुनाना है !!
अभी तक तो नहीं पाई , किसी ने भी यहाँ मंजिल !
वफ़ा की राह में देखें , हमारा क्या ठिकाना है !!

झूठा प्रदर्शन मत करो वरना


किसी नगर में एक जमीदार का लड़का था , उसे पढ़ना-लिखना बहुत पसंद था | उसके पास दुनिया भर की किताबे भरी थी , उसको आपने ज्ञानी होने पर बहुत घमंड था और वो लोगो को चेलेंग भी करता रहता था | एक बार उसको किसी ने बताया की तुम्हारा ज्ञान अधुरा है , जब तक तुम स्वामी जी से ज्ञान ना लो ....... वो ऐसा सुनके स्वामी जी के पास ज्ञान लेने आ गया स्वामी जी उसके ज्ञान से प्रभावित हो गये उन्होंने कहा तुम को सब पता है ... मै तुम को कुछ नहीं दे सकता..... | वो दुखी हो गया ... ये देखकर स्वामी जी ने उसे 7 किताबे दे... दी... जिसे लेकर वो ख़ुशी -ख़ुशी घर आने लगा रस्ते में एक नदी थी जिसके पुल को पार करते वक़्त अचानक उसकी किताबे नदी में गिर गयी और वो जोर - जोर से चिल्लाकर रोने लगा... उसके आवाज सुनके एक गिलहरी आई उसने पूछा क्या हुआ ??... लड़का आश्चर्यचकित हो गया.. फिर भी उसने कहा मेरी किताबे नदी में गिर गयी... गिलहरी ने चिड़िया को आवाजमारी क्या तुमको इसकी किताबे दिख रही है...?? चिड़िया बोली नहीं.. मगरमछ से पुचो.. मगरमछ ने बताया .... लड़के तुम्हारी किताब ख़राब हो गई है... तुम नयी किताबे ले आओ | ये सुनते ही लड़का किताबो के लिए स्वामी जी के पास दौडा... जब स्वामी जी को उसने पूरी घटना बताई ... तो स्वामी जी हंसने लगे और कहा तुम पागल हो गये हो ... लड़के को क्रोध आ गया उसने जोर से कहा... मै सच बोल रहा हूँ... तब स्वामी जी ने कहा अगर ये सच है, तो तुम से बड़ा ज्ञानी कोई नहीं पर ये ज्ञान सभी के सामने नहीं दिखाना वरना लोग तुमको पागल कहेगे.... फिर उन्होंने बताया की तुम्हारे चारो तरफ ज्ञान ही ज्ञान है ... जितना तुम जानो उतना कम है , इसलिए जो भी है उसको बढ़ाते जाओ झूठा प्रदर्शन मत करो वरना लोग तुम को पागल कहेगे....

02 अगस्त 2011

आँखे नम हो जाती है

  हिंदुस्तान के कई वीरो ने अपनी धरती माँ की सेवा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी ,उन के बारे में जब भी चिंतन किया जाता है तो आँखे नम हो जाती है , इन वीरो को ये नहीं पता था की जिस देश के लिए हम जान दे रहे है उस देश में नेता के नाम पर चोर भर जायेंगे , उन शहीदों की आत्मा आज भी इस देश को देख कर तडपती होगी ,सोचता होगा भगत सिंह की किन लोगो के लिए मैंने अपने प्राण गवा दिए जिन को आपस में लड़ने से फुर्सत नहीं है वो देश का भला क्या करेंगे ,जो अपना घर भरने में लगे हो वो देश की चिंता क्यों करेंगे ,
सहादत अनमोल है इसका मोल मत लगाइए 
शहीदों की अमर गाथा को कमजोर मत बनाइये 
हमने नहीं माँगा कोई मोल सहादत का 
सहादत को इस दुनिया में मखोल मत बनाइये  
जय हिंद .............


उन्हें यह फ़िक्र है हरदम नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है

हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें,चर्ख से क्यों ग़िला करें

सारा जहाँ अदू सही,आओ! मुक़ाबला करें
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
 
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, माय रँग दे बसन्ती 
 
चोला।।

20 जुलाई 2011

nothing


क्या सचमुच सर्कस है जीवन....? ( शो तीन घंटे का ...पजल घंटा बचपन है दूसरा जवानी है और तीसरा बुडापा है..?)
Ravi Gurbaxani 19 जुलाई 18:46
क्या सचमुच सर्कस है जीवन....? ( शो तीन घंटे का ...पजल घंटा बचपन है दूसरा जवानी है और तीसरा बुडापा है..?)

15 जुलाई 2011

सुधारों के बहानें .....!?


 इन नीतियों ,सुधारों के अंतर्गत देश की केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे देश -प्रदेश के संसाधनों को , सावर्जनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को इन विशालकाय कम्पनियों को सौपती जा रही है |कृषि भूमि का भी अधिकाधिक अधिग्रहण कर वे उसे कम्पनियों को सेज टाउनशिप आदि के निर्माण के नाम पर सौपती आ रही हैं | उन्ही के हिदायतों सुझाव के अनुसार 6 से 8 लेन की सडको के निर्माण के लिए भी सरकारे भूमि का अधिग्रहण बढाती जा रही है | यह सब राष्ट्र के आधुनिक एवं तीव्र विकास के नाम पर किया जा रहा है | सरकारों द्वारा भूमि अधिग्रहण पहले भी किया जाता रहा है |पर वह अंधाधुंध अधिग्रहण से भिन्न था | वह मुख्यत: सावर्जनिक उद्देश्यों कार्यो के लिए किया जाने वाला अधिग्रहण था |जबकि वर्मान दौर का अधिग्रहण धनाड्य कम्पनियों , डेवलपरो , बिल्डरों आदि के निजी लाभ की आवश्यकताओ के अनुसार किया जा रहा है |उसके लिए गावो को ग्रामवासियों को उजाड़ा जा रहा है |कृषि उत्पादन के क्षेत्र को तेज़ी से घटाया जा रहा है |थोड़े से धनाड्य हिस्से के निजी स्वार्थ के लिए व्यापक ग्रामवासियों की , किसानो का तथा अधिकाधिक खाद्यान्न उत्पादन की सार्वजनिक हित की उपेक्षा की जा रही है |उसे काटा घटाया जा रहा है| कोई समझ सकता है की , निजी वादी , वैश्वीकरण नीतियों सुधारो को लागू करते हुए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया रुकने या कम होने वाली नही है |इसलिए कानूनों में सुधारों बदलाव का हो हल्ला मचाकर किसानो ग्रामवासियों और अन्य जनसाधरण लोगो को फंसाया व भरमाया जा सकता है , पर उनकी भूमि का अधिग्रहण रुकने वाला नही है| अत: अब निजी हितो स्वार्थो में किये जा रहे कृषि भूमि अधिग्रहण के विरोध के साथ -साथ देश में लागू होते रहे , वैश्वीकरण नीतियों ,सुधारों के विरोध में किसानो एवं अन्य ग्राम वासियों को ही खड़ा हो ना होगा| इसके लिए उनको संगठित रूप में आना होगा |

भूमि - अधिग्रहण कानून के संशोधन में आखिर अडचन कंहा हैं ?



अधिग्रहीत जमीनों का मालिकाना ले रही कम्पनियों के मुँह से ही उनकी अडचन सुन लीजिए
 कृषि भूमि अधिग्रहण को लेकर उठते विवादों ,संघर्षो का एक प्रमुख कारण ,मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून में बताया जाता रहा है |इस कानून को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा 1894 में बनाया व लागू किया गया था| भूमि अधिग्रहण के झगड़ो -विवादों को हल करने के लिए इसी कानून को सुधार कर नया कानून बनाने की बात की जा रही है| इस सन्दर्भ में पहली बात तो यह है कि 1894 के कानून में सुधार का कई वर्षो से शोर मच रहा है ,इसके बावजूद सुधार नही हो पा रहा है तो क्यों ? आखिर अडचन कंहा हैं ? 2007 से ही इस कानून को सुधारने ,बदलने का मसौदा बनता रहा है| उसके बारे में चर्चाये भी होती रही है|
उदाहरण स्वरूप .............................

इस सुधार की यह चर्चा आती रही हैं कि, सेज ,टाउनशिप आदि के लिए आवश्यक जमीनों के 70 % से लेकर 90 % तक के हिस्सों को कम्पनियों को किसानो से सीधे खरीद लेना चाहिए| उसमे सरकार भूमिका नही निभायेगी| बाकी 30 % या 10 % को सरकार अधिग्रहण के जरिये उन्हें मुहैया करा देगी| हालांकि अरबपति-खरबपति कम्पनियों को ,किसानो की जमीन खरीदकर उसका मालिकाना अधिकार लेना या पाना कंही से उचित नही हैं| क्योंकि कृषि भूमि का मामला किसानो व अन्य ग्रामवासियों की जीविका से जीवन से जुड़ा मामला है राष्ट्र की खाद्यान्न सुरक्षा से जुदा मामला हैं |इस सन्दर्भ में यह दिलचस्प बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि सरकारों ने हरिजनों कि जमीन को बड़ी व मध्यम जातियों द्वारा खरीदने पर रोक लगाई हुई हैं| वह भी इस लिए कि बड़ी जातिया उन्हें खरीद कर हरिजनों को पुन: साधनहीन बना देंगी| जो बात हरिजनों के अधिकार क़ी सुरक्षा के रूप में सरकार स्वयं कहती हैं ,उसे वह सभी किसानो क़ी जीविका क़ी सुरक्षा के रूप में कैसे नकार सकती है ? उसे खरीदने क़ी छूट विशालकाय कम्पनियों को कैसे दे सकती हैं ? दूसरी बात जब सरकार ने ऐसे सुधार का मन बना लिया था तो ,उसमे अडचन कंहा से आ गयी ? क्या उसमे किसानो ने या राजनितिक पार्टियों ने अडचन डाल दी ? नही| उसमे प्रमुख अडचन अधिग्रहण के लिए लालायित कम्पनियों ने डाली है |इसकी पुष्टि आप उन्ही के ब्यान से कर लीजिये |18 मई के दैनिक जागरण में देश के सबसे बड़े उद्योगों के संगठन सी0 आई0 आई0 ने कहा कि" कारपोरेट जगत अपने बूते भूमि अधिग्रहण नही कर सकता | यह उन पर अतिरिक्त दबाव डाल देगा |... कम्पनियों द्वारा 90 % अधिग्रहण न हो पाने पर पूरी योजना पर सवालिया निशान लग जाएगा |इससे न सिर्फ औधोगिक कारण ही बल्कि आर्थिक विकास दरप्रभावित होगा | सुन लीजिये ! ए वही कारपोरेट घराने है ,जो सार्वजनिक कार्यो के प्रति ,खेती -किसानी के प्रति ,सरकारी शिक्षा ,सिचाई के इंतजाम के प्रति ,सरकारी चिकित्सा आदि के प्रति सरकार कि भूमिकाओं को काटने ,घटाने कि हिदायत देते रहे है और सरकार उन्हें मानती भी रही है |जनसाधारण के हितो के लिए आवश्यक कामो से अपना हाथ भी खिचती रही है |लेकिन अब वही कारपोरेट घराने स्वयं आगे बढ़ कर जमीन का सौदा करने को भी तौयार नही है |वे चाहते है कि सरकार अपने शासकीय व कानूनी अधिकार से किसानो को दबाकर जमीन अधिग्रहण कर दे ताकि वह उसे कम से कम रेट पर प्राप्त कर उसका स्वछ्न्दता पूर्वक उपयोग , उपभोग करे |सरकारे और राजनितिक पार्टिया ,राष्ट्र के आर्थिक विकास के नाम पर कारपोरेट घराने के इस व एनी सुझाव को आडा- तिरछा करके मान भी लेंगे |कानून में सुधार भी हो जाएगा और कम्पनी हित में अधिग्रहण चलता भी रहेगा |
कयोंकि यह मामला कानून का है ही नही |बल्कि उन नीतियों सुधारों का है ,जिसके अंतर्गत पुराने भूमि अधिग्रहण के कानून को हटाकर या संशोधित कर नया कानून लागू किया जाना है |सभी जानते है की पिछले २० सालो से लागू की जा रही उदारीकरण विश्विक्र्ण तथा निजीकरण नीतियों सुधारों के तहत देश दुनिया की धनाड्य औधिगिक वणिज्य एवं वित्तीय कम्पनियों को खुली छुट दी जा रही है |

13 के तिलिस्‍म में जल रहा है भारत


देश में हुए कई बड़े धमाकों के लिये आतंकियों ने महिने के 13 और 26 तारीख को चुना है। 26 भी 13 की पूर्ण योगफल है। बुधवार को मुबई में सिलसिलेवार बम धमके भी 13 तारीख को ही किये गये। तो आईए 13 तारीख को हुए आतंकी हमलों पर एक नजर डालते हैं।

13 दिसम्‍बर 2001-  देश के संसद पर आतंकी हमला, 12 लोगों की मौत
26 मई 2007-       गोवाहटी में बम विस्‍फोट, 6 लोगों की मौत
13 मई 2008-      जयपुर में बम धमाका, 68 लोगों की मौत
26 जुलाई 2008-   अहमदाबाद में सिलसिलेवार बम धमाकों में 57 लोगों की मौत
13 सितम्‍बर 2008- दिल्‍ली में हुए सीरियल बम धमाकों में 26 लोगों की मौत
26 नवम्‍बर 2008-  मुंबई आतंकी हमले में 166 लोगों की मौत
13 फरवरी 2010-   पूणे में हुए बम ब्‍लास्‍ट में 17 लोगों की मौत
13 दिसम्‍बर 2004- असम के विधानसभा के बाहर धमाके में 2 लोगों की मौत

मैं पत्थर हूँ

मैं पत्थर हूँ मुझे जीना नहीं भगवान सा बनकर ।
मुझे रहना नहीं खुद में कोई मेहमान सा बनकर ।

कोई जीता यां हारा ख़ाक मेरी ही उडी हर पल ,
जीआ मैं ज़िन्दगी को जंग का मैदान सा बनकर ।

मेरी हर सोच में रहता है यह बाज़ार दुनिया का ,
मैं अप्पने घर पड़ा रहता हूँ बस सामान सा बनकर ।

13 जुलाई 2011

मौत का अस्‍पताल, रूहो का घर है वैवरले हिल्‍स

हर इंसान के दिमाग में इस पृथ्‍वी पर भूतों और आत्‍माओं के वास करने जैसे सवाल उठते रहते है। इस दुनिया में कई ऐसे लोग भी हैं जो कि गाहे बगाहे इन रूहो और आत्‍माओं से दो चार भी हो जाते हैं और उन्‍हे किसी अलग तरह की अनुभूति भी होती है। लेकिन कभी-कभी इंसान अपने आस-पास की किसी खास जगह के लिए अपने दिमाग में एक बात बैठा लेता है कि उस जगह पर भूत, आत्‍मा या किसी रूह का वास है। हम आपको उसी तरह की कुछ बातें बताएंगे और दुनिया भर के सबसे ज्‍यादा डरावनी जगहों की सैर करांएगे। यह एक सीरीज होगी जिसमें आपको रोजाना आपको एक अलग जगह के बारे में बताया जायेगा।आईऐ तैयार हो जाईये एक रोमांचकारी सफर के लिए। आज हम आपको संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के एक शहर लुईसविला शहर के एक ऐतिहासिक और मौत के अस्‍पताल वैवरले हिल्‍स की कहानी बताएंगे। यह अस्‍पताल एक ऐसा अस्‍पताल है जिसे लोगों के इलाज के लिए शुरू किया गया और जो कि लोगों की मौत की वजह बन गया और आज अस्‍पताल के भवन में आप आसानी से उन मौतों को महसूस कर सकते है।वैवरले हिल्‍स एक ऐसी इमारत है जो कि लोगों के लिए सदैव कौतूहल का विषय बनी रही। वैवरले हिल्‍स को सन 1883 में एक अमेरिकी नागरिक मेजर थामस एच हेज के द्वारा बनवाया गया था। मेजर थामस ने अपने बेटी के लिए एक व्‍यक्तिगत स्‍कूल का इस ईमारत में शुरू किया था। इस स्‍कूल की शिक्षक लेसी ली हेरिस थी और वहीं उस बच्‍ची को पढ़ाती थी। चूकि लेसी ली हेरिस वैवरले नाम की एक उपन्‍यास को उस बच्‍ची को बहुत पढ़ाती थी जो कि मेजर थामस को बहुत पसंद था। इसी वजह से मेजर अपने इस घर को वैवरले हिल्‍स कहते थे। और आज भी यह इमारत इसी नाम से जाना जाता है।
इमारत का इतिहास
हेज परिवार के बाद इस इमारत को बन्‍द कर दिया गया था यह इमारत उस घाटी में सबसे बड़ी इमारत थी। उसके बाद सन 1908 में इस इमारत को दूबारा शुरू किया गया और इस इमारत में लोगों के इलाज के लिए एक अस्‍पताल की शुरूआत की गयी। सन 1900 के आस-पास अमेरिका में एक विचित्र बिमारी जिसे उस समय सफेद मौत के नाम से जाना जाता था यानी की तपेदिक से बुरी तरह से ग्रस्‍त था। सन 1924 में वैवरले हिल्‍स को इस बिमारी से लड़ने के लिए चुना गया। इस दौरान हजारों की तादात में तपेदिक के मरीजों को यह भर्ती किया जाने लगा। इस इमारत को अस्‍पताल के तौर पर चुनने के कारण यहां का वातावरण था लोगो का मानना था कि उचांई पर होने के क‍ारण यह जगह मरीजों के ठिक होने में मदद करेगी। उस समय यह अस्‍पताल दुनिया भर में तपेदिक रोग के लिए सबसे बेहतर अस्‍पताल माना जाता था। इस अस्‍पताल में उस समय की सबसे बेहतर तकनिकी भी उपलब्‍ध थी।मरीजों को सूर्य के पैराबैगनी किरणो से भी इलाज किया जाता था। मौत से बचने के लिए दुनिया भर से हजारों की संख्‍या में इस अस्‍पताल में मरीजों की भर्ती कर ली गयी थी, लेकिन मौत से बचने के लिए आये इन मरीजों में से रोजाना सैकड़ो की मौत भी हो जाती थी। यही मौतें इस अस्‍पताल में रूहो का वास बनकर उभर गयी। इस अस्‍पताल में रोजाना हो रही मौतों के कारण रोजाना हजारों लाशे अस्‍पताल में तैयार हो जाती थीं।इन लाशों को कोई भी कहीं लेकर नहीं जाना चाहता था ताकि यह बिमारी और उग्र रूप न धर सके। इसके लिए अस्‍पताल में ही एक लम्‍बी सुरंग का निर्माण कराया गया। इस सुरंग के दरवाजे पर लाशों को टांग दिया जाता था और एक छोटी रेलगाड़ी (जैसा कि आजकल कोयले के खानों में प्रयोग किया जाता है) आती थी और लाशे उस पर गिर जाती थी और वो गाड़ी लाशों को ले जाकर अस्‍पताल के पिछले हिस्‍से में गिरा देती थी।इस इमारत की दिवारों में भी मौत का वास हो गया था और ऐसा माना जाता है कि आज भी उन मरीजों की चिखों को इस इमारत की दिवारों में आसानी से सुना जा सकता है। इस अस्‍पताल में जो सुरंग लाशों को ढोने के लिए बनायी गयी थी वो लगभग 500 फिट लम्‍बी थी और एक तरफ जिन्‍दगी और एक तरफ हजारों लाशों का ढे़र। इस सुरंग में आज भी रूहो और आत्‍माओं को आसानी से महसूस किया जा सकता है।
आज भी यहां रूहों का बसेरा
इस अस्‍पताल में कई बार प्रत्‍यक्षदर्शियों द्वारा भूतों या साया को देखा गया है इस इमारत के बारे में लोगों का मानना है कि यहां उस सुरंग के दिवार के बाहर से यदि कोई गुजरे तो उसे आज भी लाशों की बदबू और किसी अनजाने से डर से रूबरू होना पड़ सकता है। इस इमारत के अन्‍दर एक बच्‍चा जो कि हाथ में एक गेंद लिए हुए हो और उसके चेहरे से खून रिस रहा हो लोगों को कई बार देखने को मिला है।इस इमारत के पांचवी मंजील के बारे में भी लोगों में कई किवदंतिया मशहूर हैं। पांचवी मंजिल का कमरा नम्‍बर 502 इस इमारत की दूसरी सबसे डरावनी और खौफनाक जगह है। इस कमरे की कहानी भी कम रोचक नहीं है। ऐसा बताया जाता है क‍ि जब इस अस्‍पताल में इलाज किया जा रहा था उस वक्‍त इस पांचवी मंजिल के कमरा नंबर 502 में एक नर्स ने रात में खुद को फांसी लगा ली थी।उस नर्स की उर्म 29 साल थी और वो अविवाहीत थी उसके कुछ ही दिनों बाद ही एक और नर्स ने उसी कमरे में खुद को फांसी लगाकर आत्‍महत्‍या कर ली। उसके बाद से ही उस कमरे में कोई भी जाने से घबराता था और सप्‍ताह भर के अंदर ही उस कमरे में भर्ती सभी 29 मरीजों की मौत हो गयी। आज भी उस कमरे में उन दोनों नर्सो को कभी-कभी आपस में बातें करते हुए महसूस किया गया है इस ईमारत में इस तरह के साया या भूतों के होने के बारे में कई बार पुष्टि की गयी। इस क्रम में घोस्‍ट हंटर्स सोसायटी ने भी एक बार जांच पड़ताल की उनका भी मानना है कि उन्‍होने इमारत में कई जगह‍ कैमरों को लगाया था जो कि बाद में पता चला कि इस इमारत में कई जगहों पर अपने आप रौशनी या धुआ निकलता है इसके अलांवा भयानक छाया आदी भी देखने को मिलती है।कई साल तक यह इमारत बंद पड़ी रही। अब इस इमारत को लोगों को दिखाने के लिए खोल दिया गया है। इस इमारत में अब लोग प्रायोगिक रूप से भूतों और रूहों को महसूस करने के लिए आते है। इस बारे में कई लोगों ने अपनी राय वयक्‍त की है और उनका कहना है कि उस इमारत में उन्‍होने बुरी शक्तियों को महसूस किया है। इस इमारत की सैर के लिए आपको कुछ खास नियमों का भी पालन करना होगा जैसे कि इमारत के प्रबंधन के द्वारा बताए गये क्षेत्रों में ही आप प्रवेश कर सकते है इसके अलांवा अन्‍य जगहो पर लोगों के जाने की मनाही है।
कैसे कर सकते है सैर वैवरले हिल्‍स कीइस इमारत को घूमने और जिन्‍दगी में एक अलग तरह के अनुभव के लिए आप या तो सीधे टिकट प्राप्‍त कर सकते है या फिर यह आपको आनलाईन भी उपलब्‍ध है। आनलाईन आपको अपनी पुरी जानकारी देकर अपनी टिकट बुक करा सकते है। इमारत में घूमने का समय और टिकट के दाम। हाल्‍फ नाईट (इमारत में आधी रात) 4 घंटे 50 डालर, फुल नाईट ( इमारत में पुरी रात ) 8 घंटे 100 डालर।

BLACK MONEY


सुप्रीम कोर्ट ने काले धन के प्रश्न को संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में रखकर एक कारगर हस्तक्षेप किया है। न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर की टिप्पणियों से साफ है कि सर्वोच्च न्यायालय इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा अब तक उठाए गए कदमों से असंतुष्ट है।
इसलिए अब उसने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक तेरह सदस्यीय विशेष जांच दल बना दिया है। कोर्ट की राय में केंद्र सरकार की कार्रवाई विभिन्न क्षेत्राधिकार के विभागों और एजेंसियों में बंटी रही है और वह कहीं पहुंचती नहीं दिखती।
इसलिए अब विशेष जांच दल विभिन्न सरकारी संस्थाओं में तालमेल कायम करेगा और उन्हें समय के मुताबिक जरूरी आदेश देगा। हालांकि कोर्ट ने भी यह माना है कि विदेशों में जमा काले धन को वापस लाना आसान नहीं है, लेकिन अब कम से कम विश्वसनीयता का संकट खत्म होगा। यानी लोगों में भरोसा कायम होगा कि जनता के लूटे गए धन को वापस लाने की सचमुच कोशिश हो रही है। सामान्य स्थितियों में सुप्रीम कोर्ट के इस कदम को न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल माना जाता, मगर काले धन और भ्रष्टाचार का मुद्दा आज जनहित में इतना अहम हो गया है कि किसी भी हलके से ऐसी शिकायत उठने की शायद ही संभावना है। चूंकि जनता की नजर में इन मुद्दों पर सरकार की साख संदिग्ध बनी हुई है, इसलिए कोर्ट के हस्तक्षेप से आम लोग राहत महसूस कर रहे हैं। यह उम्मीद वाजिब है कि कार्रवाई का सूत्र सरकार के हाथ से निकलकर न्यायपालिका के हाथ में चले जाने का बेहतर परिणाम सामने आएगा। इसके बावजूद बाबा रामदेव और सिविल सोसायटी को अपनी सक्रियता बनाए रखने की जरूरत है, ताकि इस मुद्दे पर जनता की जागरूकता बढ़ती रहे और उसके परिणामस्वरूप सरकार पर दबाव भी बना रहे। संभवत: उससे ही इस गंभीर मसले का टिकाऊ हल निकल सकता है।

wah! re hitalar


लंदन। क्‍या आपने कभी सोचा होगा कि कोई सेनापति अपने सैनिकों को सेक्‍स करने के लिये डॉल देगा? नहीं ना! मगर य‍ह सच है, नाजी तानाशा‍ह एडोल्‍फ हिटलर अपने सैनिकों को सेक्‍स करने के लिये सेक्‍स डॉल्‍स देता था। लंदन के अखबर द सन के हवाले से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार हिटलर ने अपने सैनिकों की सेक्‍स से जुड़ी जरुरतों को पूरा करने के लिये सेक्‍स डॉल्‍स के आर्डर दिये थे। इसका कारण यह था कि नाजी सैनिकों ने पेरिस में तैनाती के दौरान फ्रेंच कॉल गर्ल्‍स से संबंध बनाने शुरु कर दिये थे जिससे उनमें तेजी से यौन सक्रमण फैला रहा था।
विश्‍व युद्ध के बाद जर्मन सेक्‍स डॉल पर रिसर्च के दौरान लेखक ग्रैगी डोनाल्‍ड को हिटलर ने इस गुप्‍त प्रोजेक्‍ट के बारे में बताया था। ब्रिटिश अखबार द सन में प्रकाशित खबर के अनुसार 1940 में नाजी वैज्ञानिक ने जर्मन सैनिकों के लिये आरामदायक सिंथेटिक डॉल बना लिये थे। उस समय यह सम्‍सया काफी गंभीर थी और यौन रोगों के चलते कई सैनिक जंग के मैदान में जाने योग्‍य नहीं थे।
अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार उस समय पेरिस में अधिक संख्‍या में कॉल गर्ल्‍स थी और देह व्‍यापार का धंधा काफी तेजी से चलता था। वह शिकार की तलाश में सैनिकों के कैंप तक आ जाती थी और उनसे संबंध स्‍थापित कर लेती थी। संबंध स्‍थापित करने के बाद सैनिक संक्रमित हो जाते थे और जंग पर जाने योग्‍य नहीं बचते थे।
इस लिये हिटलर ने उन्हें इस भटकाव से रोकने और संक्रमण से बचाने के लिये सेक्‍स डॉल्‍स का सहारा लिया। हालांकि, 1942 में जर्मन सैनिकों ने इन डॉल्स को अपने साथ ले जाने से मना कर दिया और इस प्रॉजेक्ट को बंद करना पड़ा। सैनिकों का कहना था कि युद्ध के दौरान अगर उन्हें ब्रिटिश सैनिकों ने पकड़ लिया तो सेक्स डॉल्स के चलते उन्हें भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।