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25 नवंबर 2010

5 में से सिर्फ 1 शहरी मोबाइल ग्राहक 3जी सेवा लेगा:






: पांच शहरी मोबाइल ग्राहकों में से सिर्फ एक ग्राहक ही तीसरी पीढ़ी (3जी) सेवा की ओर रुख

करेगा। अनुसंधान फर्म नील्सन कंपनी के आज जारी अध्ययन में यह जानकारी दी गई है।

नील्सन के अध्ययन में कहा गया है कि 3जी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है और इसकी तेज गति की इंटरनेट सेवा देने की क्षमता है, लेकिन इसके बावजूद देश में इस सेवा के आम मोबाइल ग्राहक तक पहुंचने में आठ से दस साल का समय लगेगा।

अध्ययन के अनुसार, 70 प्रतिशत शहरी मोबाइल ग्राहकों ने कहा कि वे 3जी सेवा के बारे में जानते हैं। नील्सन कंपनी के निदेशक (ग्राहक समाधान-भारत) अर्जुन उर्स ने कहा कि हालांकि ऑपरेटर ग्राहकों के बीच 3जी सेवा को लोकप्रिय बनाने में तो कामयाब रहे हैं, पर शुरुआत में ग्राहक इस सेवा को अपनाने के लिए उतना तैयार नहीं है।

सर्वेक्षण में शामिल 19 फीसदी उपभोक्ताका कहना था कि वे निश्चित रूप से 3जी सेवा का रुख करेंगे, वहीं 43 फीसदी ने कहा कि वे इस सेवा का अपना सकते हैं और नहीं भी। वहीं पांच प्रतिशत ने कहा कि वे इस सेवा की ओर रुख नहीं करेंगे।

उर्स ने कहा कि पेशेवर और प्रौद्योगिकी के प्रति जानकारी रखने वाले युवा सबसे पहले 3जी की ओर जाएंगे। अध्ययन में कहा गया है कि यदि ऑपरेटर 3जी सेवा को बढ़ाने के लिए इसकी कीमत घटाते हैं, तो इससे निश्चित रूप से उनका कारोबार बढ़ेगा।

09 नवंबर 2010

उच्च शिक्षा के लिए लोन

उच्च शिक्षा के लिए लोन लेना है तो कुछ जरूरी बातें जानना आपके लिए जरूरी है।
पात्रता : वह विद्यार्थी एजुकेशन लोन लेने का पात्र है जो भारतीय नागरिक हो अपना दाखिला पक्का कर चुका हो।
किन कोर्स के लिए मिलेगा लोन : भारत या विदेशों की मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी के सभी अंडर ग्रेजुएट कोर्स, पोस्ट ग्रेजुएट, डिस्टेंस लर्निंग या प्रोफेशनल कोर्र्सो के लिए लोन मिल सकता है।
अधिकतम कितना लोन मिलेगा
और कैसे : भारत और विदेशों में पढ़ाई के लिए क्रमश: 10 लाख व 20 लाख तक का लोन मिल सकता है। 4 लाख तक के लोन के लिए किसी सिक्युरिटी की जरूरत नहीं है। 7.5 लाख रुपए से ज्यादा के लोन के लिए कोलैट्रल सिक्युरिटी जरूरी होगी।
लोन में क्या कवर होता है और कैसे : कालेज की फीस, होस्टल चार्ज, परीक्षा, प्रयोगशाला व लाइब्रेरी का शुल्क। कोर्स के लिए जरूरी सभी एजूकेशनल आर्टिकल की खरीद का खर्च भी इसमें कवर होता है। यात्रा खर्च और कंप्यूटर खरीदने के लिए भी विद्यार्थी को पैसे दिए जाते हैं। आम तौर पर जब भी जरूरत होती है तब बैंक डिमांड ड्राफ्ट को सीधे यूनिवर्सिटी को भेज देती है।
ब्याज दर और वापसी : लोन की ब्याज दर अलग-अलग बैंक के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। हालांकि ब्याज दर 10 प्रतिशत से 12.50 प्रतिशत के बीच होगी। एसबीआई की ब्याज दर 11.25 प्रतिशत है और अभ्युदय बैंक की ब्याज दर 10.5 प्रतिशत है। कर्जदाता नौकरी मिलने के 6 महीने या कोर्स पूरा होने के एक साल बाद लोन चुकाना शुरू कर सकते हैं। लोन को 5 से 7 साल की अवधि में चुकाया जा सकता है।

mera bharat

चीन ने भी माना, भारत उसे पछाड़ सकता है
Source: बिजनेस ब्यूरो   |   Last Updated 13:56(09/11/10)
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इससे पहले

    * पैकेज घोषित नहीं मगर चीन को 8प्रतिशत विकास का भरोसा
    * विकास दर में चीन को पीछे छोड़ सकता है भारत
    * चीन में सरकार को 9.5फीसदी विकास दर का भरोसा



पिछले कुछ दिनों के दौरान ऐसी तमाम रिपोर्ट्स सामने आईं, जिनमें यह कहा गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था आने वाले दिनों में चीन से आगे निकल जाएगी। और अब चीन चीन को भी यह लगने लगा है कि वाकई ऐसा हो सकता है। चीन सरकार के प्रमुख नीतिगत अनुसंधान संस्थान डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर के उप निदेशक लियु शिनजिन ने ये कहा है कि विकास दर के मामले में भारत चीन को पछाड़ सकता है। लियु ने चिंता जताते हुए कहा कि उनके देश की विकास दर तीन से पांच साल में मौजूदा 10 से घटकर 7 फीसदी तक आ सकती है। वहीं इस दौरान भारत की विकास दर बढ़कर 9 फीसदी से ऊपर निकल जाएगी।


विश्व बैंक, मोर्गन स्टैनले समेत कई एजेंसियां भारतीय विकास दर के आगे निकलने का दावा पहले से ही कर रही हैं।


चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने लियु के हवाले से आगाह किया है कि अमेरिका में कर्ज सस्ता करने के फेडरल रिजर्व के ताजा कदमों से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का दबाव बढे़गा। इससे आने वाले समय में चीन को आर्थिक वृद्धि में गिरावट सहनी होगी। फेडरल रिजर्व 600 अरब डॉलर के सरकारी बांड खरीद कर बैंकों के पास कर्ज देने योग्य वित्तीय संसाधन बढ़ाएगा। चीन की अर्थव्यवस्था को अगले कुछ साल तक गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

ये हैं दुनिया के 5 सबसे अमीर देश

ये हैं दुनिया के 5 सबसे अमीर देश

Source: बिजनेस ब्यूरो   |   Last Updated 14:49(03/11/10)
 
 
 

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लंदन के लेगाटुम इंस्टीट्यूट ने दुनिया के 110 सबसे अमीर देशों की एक लिस्ट जारी की है। आर्थिक वृद्धि और लोगों के रहन सहन के स्तर को पैमाना बना कर वैश्विक समृद्धि सूचकांक नाम से जारी की गई इस रिपोर्ट में नॉर्वे का नाम दुनिया के सबसे संपन्न मुल्क के तौर पर सामने आया है।


नॉर्वे के बाद लिस्ट में दूसरे नंबर पर डेनमार्क को जगह मिली है। इसके बाद तीसरे नंबर फिनलैंड, चौथे नंबर पर ऑस्ट्रेलिया और पांचवे नंबर पर न्यूजीलैंड को जगह मिली है।


वहीं तेज आर्थिक तरक्की बावजूद भारत अमीरी के मामले में नीचे खिसक गया है। वैश्विक समृद्धि सूचकांक में इस बार भारत 88वें पायदान पर पहुंच गया है। पिछले साल इस सूचकांक में भारत को 78वां स्थान मिला था। यानी अब संपन्न के मामले में भारत दस पायदान नीचे हैं।






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08 नवंबर 2010

ओबामा को बातचीत से हटा लेंगे।

'इन 8 को भीतर बुलाओ वरना ओबामा नहीं आएंगे





नई दिल्ली. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की विनम्रता तो देखते ही बनती थी लेकिन उनके साथ चल रहे अधिकारियों की ऐंठ में कोई कमी नहीं थी। इसका नमूना उस समय देखने को मिला जब व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने अपने राष्ट्रपति को द्विपक्षीय बातचीत से हटाने तक की धमकी दे डालीयह नौबत आज उस समय आई जब दोनों देशों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता शुरू होने वाली थी और भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने व्हाइट हाउस के प्रेस वालों का कोटा आठ से घटाकर पांच तक कम कर दिव्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैटी लिली और अन्य अधिकारी इस बात पर अडे थे कि पहले से सहमत 8 संवाददाताओं को भीतर जाने दिया जाए। इस बीच व्हाइट हाउस के प्रवक्ता राबर्ट गिब्स अपना आपा खो बैठे और जोर जोर से चिल्लाकर कहने लगे कि अगर आप हमारे लोगों को भीतर नहीं जाने देंगे तो हम राष्ट्रपति ओबामा को बातचीत से हटा लेंगे।इतना ही नहीं गिब्स ने दरवाजे के सामने अपनी टांगे फंसा लीं और सुरक्षा अधिकारियों को ललकारा कि अगर उनकी मजाल है तो पैर हटाकर दिखाएं। उनका कहना था कि वह गंभीरता से कह रहे हैं कि अगर उनके आठ रिपोर्टरों को भीतर नहीं जाने दिया तो वह श्री ओबामा को बातचीत से हटाने के बारे में गंभीर हैंआखिरकार व्हाइट हाउस के आठ रिपोर्टर 11 बजकर 55 मिनट पर हैदराबाद हाउस में प्रवेश कर गए। व्हाइट हाउस के अधिकारियों के इस पूरे संवाद की रिपोर्ट वाल स्ट्रीट जनरल के व्हाइट संवाददाता जोनाथन वाइजमैन ने भी फाइल की है जो इस दौरे में श्री ओबामा के साथ चल रहे थे।

ips

ओबामा की सुरक्षा भेदने की कोशिश में फर्जी आईपीएस अफसर गिरफ्तार

Source: agencies   |   Last Updated 19:30(08/11/10)
 
 
 
 
 
 
 
मुजफ्फरनगर. खुद को आईपीएस अधिकारी बताकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने का प्रयास कर रहे एक युवक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस इस छात्र के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा रही है।

बीएससी प्रथम वर्ष का छात्र दिलीप कुमार यहां के डीएम आवास पहुंचा और कहा कि उसे ओबामा से मिलने के लिए दिल्ली जाना है और इसके लिए एक वाहन की जरूरत है। उसने कहा कि वाहन पर वीआईपी पास चस्पा होना चाहिए।

डीएम को उस पर शंका हुई और जब उन्होंने विस्तार से पूछताछ की तो उसका भेद खुल गया। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है।

अब पुलिस उससे जानकारी जुटा रही है कि क्या वाकई वह बराक ओबामा के करीब पहुंचना चाहता था और इसका उद्देश्य क्या था?

 

भारत से ऊंट और घोड़े साथ ले जाना चाहते हैं ओबामा, घर में मिशेल ही हैं बॉस

UNSC में भारत के दावे को ओबामा का समर्थन, पाक को लताड़ा

UNSC में भारत के दावे को ओबामा का समर्थन, पाक को लताड़ा

Source: dainikbhaskar.com   |   Last Updated 19:27(08/11/10)
 
 
 
 
 
 
 
नई दिल्‍ली. अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने भारत को संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद की स्‍थायी सदस्‍यता दिलाने की वकालत की है। ओबामा ने आज शाम संसद के दोनों सदनों के सदस्‍यों को संबोधित करते हुए कहा, 'अमेरिका चाहता है कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्‍थायी सीट‍ मिले। भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र की शांति सेना का अहम हिस्‍सा रहा है। हम भारत की स्‍थायी सदस्‍यता के दावे का स्‍वागत करते हैं। मैं भविष्‍य में सुरक्षा परिषद में सुधार की उम्‍मीद करता हूं।'

पाकिस्‍तान पर निशाना
मुंबई हमले का जिक्र करते हुए ओबामा ने कहा कि मुंबई हमलों के दोषियों को सजा जरूर मिलनी चाहिए। उन्‍होंने यह भी कहा, ' पाकिस्‍तान के भीतर आतंकियों के ठिकाने हमें मंजूर नहीं हैं। अल कायदा और उसके साथी संगठनों को हराना हमारा मकसद है।' ओबामा ने स्थिर और विकसित पाकिस्‍तान-अफगानिस्‍तान की वकालत की और कहा कि यह हम सबके हित में होगा। उन्‍होंने कहा, 'क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए हम भारत-पाक वार्ता के पक्ष में हैं।'

गांधी से प्रभावित
संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने संबोधन में ओबामा ने दोहराया कि वह भारत के राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी से बेहद प्रभावित हैं। उन्‍होंने कहा, ‘ मैं गांधी जी से बेहद प्रभावित हूं। मार्टिन लूथर किंग भी गांधी जी से बहुत प्रभावित थे। अहिंसा का सिद्धांत जरूरी और व्‍यवहारिक है।’  ओबामा ने अपने शानदार स्वागत के लिये एक अरब भारतीयों को धन्यवाद देते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में आना उनके लिये सम्मान की बात है। इस मौके पर उन्होंने यह भी कहा कि अपने कार्यकाल में इतनी जल्दी भारत आना उनके लिये बहुत खास है। उन्‍होंने कहा, 'एशिया दौरे में मेरा सबसे पहले यहां रुकना कोई संयोग नहीं है।'

21 सदी में भारत-अमेरिका की दोस्‍ती अहम

21वीं सदी में भारत और अमेरिका की दोस्‍ती को बेहद अहम बताते हुए ओबामा ने कहा, 'हिंदुस्‍तान ने सुपर कम्‍प्‍यूटर बनाए, चांद पर तिरंगा फहराया। शून्‍य की खोज भारत ने ही की थी। भूख का सामना करने के लिए भारत ने हरित क्रांति कर डाली। भारत के बदलने के साथ हमारे रिश्‍ते में भी बदलाव आया है। शीत युद्ध खत्‍म होने के बाद हमारे रिश्‍ते में बदलाव आया। दुनिया की खातिर दोनों देशों को एक दूसरे के करीब आना होगा। अमेरिका अपनी और साथी देशों की सुरक्षा चाहता है।'

'धन्‍यवाद' और 'जय हिंद' का संबोधन
अपने भाषण की शुरुआत 'धन्‍यवाद-' शब्‍द से करते हुए ओबामा ने कहा, ' भारत विकसित राष्ट्र बन चुका है और दुनिया में एक बड़ी ताकत के रुप में उभरा है। उन्‍होंने कहा, ' भारत आर्थिक शक्ति के तौर पर उभरा है। भारत दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था का इंजन बन चुका है। 21वीं सदी में दोनों देशों की दोस्‍ती बेहद जरूरी है।' ओबामा ने अपने भाषण का अंत 'जय हिंद' शब्‍द से किया। कार्यक्रम में उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी ने स्‍वागत भाषण दिया जबकि लोकसभा अध्‍यक्ष मीरा कुमार धन्‍यवाद ज्ञापन किया। 

उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा अध्‍यक्ष मीरा कुमार, संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने संसद भवन में ओबामा की अगवानी की। अमेरिकी राष्‍ट्रपति ने संसद में 'विजिटर बुक' यानी 'गोल्‍डन बुक' पर दस्‍तखत किए। ओबामा संसद को संबोधित करने वाले चौथे अमेरिकी राष्‍ट्रपति हैं।

30 अक्टूबर 2010

ये क्या है दोस्तों

Saturday, August 7, 2010

ये क्या है दोस्तों








शांक्सी चाइना
सभ्यता का एक पौराणिक केंद्र

Wednesday, July 28, 2010

खूबसूरती
























































































































Monday, July 19, 2010

आस्थाओं के बहाव से होती है भरपूर बारिश ?

बारिश नहीं हुई। ढोल धमाके और देवता मनाने का दौर प्रारंभ हुआ। पत्थर के बने भगवान् पानी मे डुबोये जाने लगे। गाँव वासियों ने शमशान मे हल चलाए । गधे पर बैठाकर गाँव भर मे सरपंच को घुमाया। ज़िंदा आदमी की शव यात्रा निकाली गई। मिटटी से मेंढक बनाकर मुकुट पहनाया, पालकी मे उसे बिठाकर यात्रा निकाली और
मेंढक राजा मेंढक दे
पानी की बरसात दे
के नारे लगाकर शहर भर मे घुमे । दरगाहों पर चादरे चढ़ी, ग्रन्थ साहिब का पाठ गुरुद्वारे मे हुआ चर्च मे प्रेयर की गई तो मंदिरों मे विविध धार्मिक आयोजन किये जाने लगे। सर्वधर्म प्रार्थना सभा का आयोजन भी हुआ। लोग शहर-गाँव छोड़ जंगल मे उजमनी मनाने यानी वहां जाकर भोजन बनाकर बारिश की दुआ करने लगे। मगर हाय रे बारिश ! होने का नाम ही नहीं लेती।
आज जब शहर गाँव छोड़ कर बाहर जंगल तलाशने पर पेड़ों का झुरमुट तक नजर नहीं आता और बारिश के प्रति हमारा स्वार्थ ? आस्थापरक? हम चाहते है बारिश हो बादल बरसे, चार महीने तक हमारे सर पर बने रहे। मगर हमारी करनी जो कहानी कहती है वो समस्त प्रकृति विरुद्ध ही है। हमें भूमि चाहिए मगर वृक्ष नहीं । हम खेती चाहते है , पानी चाहते है पर जंगल और जानवर नहीं ।
अब उजमानी की ही ले, रोज सवेरे बच्चो के लिए टिफिन तैयार होते हैं जिन्हें बच्चे सामूहिक रूप से रोज घर के बाहर जाकर खाते है, यह पूरे साल चलता है। अगर घर के बाहर जाकर भोजन सामूहिक रूप से करने से बारिश होती तो यह सारा देश रोज़ पानी की बरसात से लबरेज़ होता।
बारिश का एक पहलु यह भी है की वह अपने साथ विध्वंस भी लाती है। बाढ़ और सूखा उसके दो भिन्न पहलु हैं। जिन जगहों पर बारिश नहीं होती वहां के लोग बारिश होने की मन्नते करते हैं। जहां बाढ़ आ जाती वहां भगवान् से प्रार्थना की जाती है की कदापि धमाकेदार ना हो। अब भगवान् को यह समझ मे नहीं आता होगा की बारिश कहाँ करनी है और कहाँ नहीं । वे आखिर सुने तो किसकी ।
सन २००० से मध्य भारत के प्रान्त सूखे का सामना करते आ रहे हैं। मध्यप्रदेश मे जंगल लगातार कट रहे हैं बाघ की आबादी घट गई है, वृक्षों की लगातार बलि ली जा रही है। सड़कें फोरलेन होते ही जमीने महंगे दाम की हो गई। जमीनों का डायवर्शन होने लगा। सड़के बनाने के लिए किनारे लगे वृक्ष काट देने उपरान्त अब बीच मे बोगनवेलिया कनेर जैसी झाडीनुमा पौधे लगाए जाने लगे है और किनारों की सुध लेने की कोई कोशिश नहीं है ।
आज जब चिता की कीमत डेढ़गुना बढ़ गई है, महंगाई के नाम पर लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं ऐसे मे अजहर हाशमी साहब की कविता की पंक्तियाँ याद आती है जो पृथ्वी दिवस पर नईदुनिया अखबार मे छपी हैं, लिखते हैं :
बड़ी बड़ी बातों से
नहीं बचेगी धरती
वह बचेगी
छोटी-छोटी कोशिशों से
मगर हमारी मानसिकता का निरंतर छोटा प्रयास नहीं किया जा रहा है और वह प्रयास पौधों की परवरिश से सम्बंधित है.
चौथा स्तम्भ है कि वह लगातार यह बताता है की यह फोटो जिसमे पेड़ के ठूंठ नजर आ रहे हैं यह किस पेड़ के है, कब और कहाँ इन्हें काटा गया है। जिम्मेदार विभाग कौन है जिसके लापरवाह कर्मचारी हाथ पर हाथ धरे बैठे है। मगर यह कभी नहीं बताता की कहाँ पेड़ लगाए जा सकते हैं. उनकी सुचना ऐसी लगती है जैसे वे लक्कड़ चोरो से यारी किये बैठे है और उन्हें बताते रहते है कि और कहाँ कहाँ पर चोरी से लकडियाँ काटी जा सकती है. "जल ही जीवन है" का मन्त्र अब "जल ही जीवन के लिए आवश्यक उत्पाद है" मे बदल गया है. इसलिए कमर्शियल प्रयासों कि जरुरत है तुच्छ छोटे प्रयास करने के बजाय इश्वर आस्था पर निर्भर रहने कि जरूरत है । क्योंकी पानी मे आस्था का पत्थर डुबाने या अन्य टोटके की मानसिकता ही है जो मानसून के दिनों मे बरसात कराती है।

29 अक्टूबर 2010

ये समूह

मित्रो,

लिखते हुए, अक्सर किसी भाव या विचार को चुभलाते हुए, उसके स्वाद लायक़ उपयुक्त
शब्द की कमी हम सब ने महसूस की है, और ऐसा भी हुआ है कि शब्दकोश के पन्नो पर
फ़िसलती उंगलियाँ हमें सही अभिव्यक्ति तक ले जाने में असमर्थ हुई हैं। आभासी जगत
की इन नज़दीकियों ने जो हमें मौक़ा दिया है उसके ज़रिये हम एक-दूसरे को उसकी सही
अभिव्यक्ति तक पहुँचा सकते हैं।

ये समूह बस इसीलिए!

हिन्दी शब्दों के समान्तर अर्थ;
हिन्दी से उर्दू व उर्दू से हिन्दी में अर्थ;
अंग्रेज़ी से हिन्दी व हिन्दी से अंग्रेज़ी में अर्थ;
हिन्दी से अन्य भारतीय भाषाओं व अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अर्थ;
हिन्दी से अरबी-फ़ारसी व अरबी-फ़ारसी से हिन्दी में अर्थ
पर चर्चा का एक मंच।

28 अक्टूबर 2010

sms

आज दोपहर में मेरे मोबाईल पर एक कॉल आया, रिंग बजी मैने उठाया एक लड़की ने कहा कि आपने मुझे मेसेज क्यों भेजा? मैने कहा कि मेडम मैंने तो आपको कोई मेसेज नहीं भेजा, वो बोली आपने भेजा है, मैने कहा सच्ची नहीं भेजा, वो बोली मेरे मोबाईल में है मेसेज मैने कहां मेरे मोबाईल में तो आपका नम्बर ही नहीं है, पर वो थी की बहस पर बहस किये जा रही थी और कह रही थी की मेरे मोंबाईल में आपके द्वारा भेजे गये मेसेज है। मैंने सोचा मेरी कोई दोस्त होगी जो मजाक कर रही है। फिर थोड़ी देर में एक लड़के का कॉल आया उससे भी वैसी ही बहस हुई जैसी उस लड़की के साथ हुई थी। उसके बाद एक और लेडीज का कॉल आया उन्हे तो मैने पोलिस में जाने की धमकी भी दे दी, जवाब में उन्होने ने भी मुझे वैसी ही धमकी दी। अभी तक मेरे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर माजरा क्या है? क्यों लोग मेरे कभी कभार बजने वाले बेचारे गुपचुप मोबाईल को बजा बजाकर तंग कर रहे है। कहीं मेरे दोस्तो का कोई प्लान तो नहीं है? क्योंकि मैं बिना जाने पहचाने नम्बर्स के कॉल उठाता नहीं और मोबाईल से बात करना भी ज्यादा पसंद नहीं है, तो हो सकता है इसीलिए प्लान बनाया गया हो की आज इसे परेशान किया जाए?
    पर मेरा दिमाग तब ठनका जब देश के कुछ वीवीआईपी लोगो के कॉल भी मेरे मोबाईल पर आने लगे। अब तक तो मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे क्योंकि मेरे समझ आ चुका था कि आखिर माजरा क्या है। एक्चुअली आज सुबह-सुबह बॉस का फरमान आया की कोई ऐसा सॉफ्टवेयर या वेबसाईट ढूंण्डो जो फ्री में बल्क एसएमएस करता हो ताकि दीपावली की बधाई भेजी जा सके। मैने गूगल पे दे मारा सर्च अब दुनिया भर की वेबसाईटस और सॉफ्टवेयर्स पेज पर आ गये। अब मैं लगा सबको ट्राय करने। मेरी जानी पहचानी दो साईट्स sms-Gupshup गपसप और way2sms मुझे जंच गई क्योंकि इनका मैं पहले से ही मेंम्बर भी हूं। फिर मैं way2sms में ग्रूप एसएमएस ट्राय करने लगा। ये जांचने के लिए की एक साथ बहुत सारे एसएमएस जाते है की नही? मैने बॉस का मोबाईल लिया और सारे कांटेक्ट्स को सीएसवी फाईल फारमेट में बदलकर सीधे ही मेरी way2sms प्रोफाईल जो की मेरे मोबाईल नम्बर से रजिस्टर्ड थी में अपलोड कर दिया। उन कॉक्टेक्ट्स में पूरे देश विदेश के नेताओं, वीवीआईपी, वीआईपी, लोकल सारे के सारे नम्बर अपडेट हो गये।
    कांटेक्स अपलोडिंग के 5 मिनट में ही मेरी मुसिबत शुरू हो गई। सायद way2sms वेबसाईट से मेरे द्वारा जिन मोबाईल नम्बरो को मेरी प्रोफाईल में डाला गया उन्हे सूचना मेसेज गया होगा की उनका मोबाईल मेरी प्रोफाईल में एड किया गया है। उस मेसेज में मेरा नम्बर भी गया होगा। जिससे उन नम्बर वालो द्वारा मुझे वापस कॉल किया जा रहा था। चलों वैसे तो ये नेता और वीआईपी लोग सिर्फ भाषणों और फंक्सनों में ही सुने जाते है पर इसी बहाने मेरे मोबाईल ने भी इनकी आवाज सुनली।

काहे के लोक सेवक ??


फिलहाल यह कहना कठिन है कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा इकोनामी क्लास में हवाई सफर करने से उन केंद्रीय मंत्रियों को सही संदेश मिल गया होगा जो फिजूलखर्ची रोकने के कांग्रेस के अभियान को लेकर नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं। यदि सभी केंद्रीय मंत्री और विशेष रूप से कांग्रेस के मंत्री इकोनामी क्लास में हवाई सफर करना शुरू कर देते हैं तो भी इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि फिजूलखर्ची पर लगाम लग गई। यह समझ पाना कठिन है कि कांग्रेस किफायत बरतने के अपने अभियान को केवल अपने ही मंत्रियों और सांसदों तक क्यों सीमित रखना चाहती है? यदि मंत्रियों और सांसदों द्वारा फिजूलखर्ची की जा रही है तो फिर यह अभियान सभी पर लागू होना चाहिए और कम से कम उसका दायरा संप्रग तक तो जाना ही चाहिए। यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के मंत्री और सांसद अपने यात्रा खर्च को सीमित कर लेते हैं तो इसके जो भी नतीजे सामने आएंगे वे भी अत्यंत सीमित होंगे, क्योंकि फिजूलखर्ची केवल यात्राओं के दौरान ही नहीं होती। केंद्रीय मंत्रियों के यात्रा व्यय के अतिरिक्त अन्य अनेक खर्च ऐसे हैं जिनमें अच्छी-खासी धनराशि खर्च हो रही है। यदि केंद्रीय मंत्रियों के केवल यात्रा खर्च और अन्य खर्चो को शामिल कर लिया जाए तो यह राशि करीब दो सौ करोड़ रुपये पहुंच जाती है। यह खर्च किस तेजी से बढ़ता चला जा रहा है, इसका प्रमाण यह है कि वित्तीय वर्ष 2005-06 में वेतन और यात्रा खर्च और अन्य भत्तों में व्यय कुल राशि सौ करोड़ रुपये से भी कम थी।
यदि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता फिजूलखर्ची रोकने के प्रति वास्तव में गंभीर है तो उसे सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों में बुनियादी बदलाव करना होगा और साथ ही उन अनेक परंपराओं से पीछा छुड़ाना होगा जो एक लंबे अर्से से चली आ रही हैं। फिजूलखर्ची केवल मंत्रियों द्वारा ही नहीं, बल्कि शीर्ष नौकरशाहों द्वारा भी की जा रही है। नि:संदेह यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उच्च पदों पर बैठे नौकरशाह और नेतागण अपनी जीवनशैली को सामान्य व्यक्तियों की तरह ढाल लें, लेकिन यह भी नहीं होना चाहिए कि उनकी विशिष्टता राजसी ठाठ-बाट को मात देती नजर आए। यह भी विचित्र है कि फिजूलखर्ची रोकने का यह अभियान इस आधार पर शुरू किया गया है कि देश सूखे और मंदी का सामना कर रहा है। इस अभियान से तो यह प्रकट हो रहा है कि यदि सूखे और मंदी का दुर्योग एक साथ सामने नहीं आया होता तो कोई फिजूलखर्ची रोकने पर ध्यान नहीं देता। फिजूलखर्ची तो प्रत्येक परिस्थिति में रोकी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा न करने का अर्थ है संसाधनों की बर्बादी। एक ऐसे देश में जहां लगभग तीस प्रतिशत लोग भयावह निर्धनता से जूझ रहे हों वहां यह शोभा नहीं देता कि मंत्रीगण राजसी ठाठ-बाट में रहें। इससे भी अधिक अशोभनीय यह है कि जब इस ठाठ-बाट का उल्लेख किया जाए तो विरोध और नाराजगी के स्वर उभरें। इन स्वरों का उभरना यह बताता है कि हमारे आज के औसत राजनेता किस तरह अभी भी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। ऐसी मानसिकता वाले राजनेता उच्च पदों पर तो विराजमान हो सकते हैं, लेकिन उन्हें लोकसेवक नहीं कहा जा सकता।

25 अक्टूबर 2010

सुनियोजित अपराध की श्रेणी में शामिल हो मिलावटख़ोरी

जब सुनियोजित तरीके से किसी एक व्यक्ति की हत्या करने के आरोपी को सज़ा-ए-मौत या आजीवन कारावास जैसी सख्त सज़ा का सामना करना पड़ता है फिर मिठाई,जीवन रक्षक दवाईयां अथवा खाने-पीने की अन्य तमाम वस्तुओं में मिलावट करने वाले तथा इनमें ज़हरीली रासयानिक सामग्री मिलाकर सैकड़ों व हज़ारों लोगों की एक साथ सामूहिक हत्या का प्रयास करने वालों के विरुद्ध ऐसी ही सख्त सज़ा का प्रावधान क्यों नहीं है?
  भारत वर्ष को त्यौहारों व पर्वों का देश कहा जाता है। अपने सीमित संसाधनों में ही अनगिनत त्यौहारों के अवसर पर झूमने व खुशियां मनाने वाले भारतीय नागरिक इस विशाल देश के किसी न किसी क्षेत्र में किसी न किसी त्यौहार में अक्सर खुशियां मनाते देखे जा सकते हैं। ज़ाहिर है इन भारतीय त्यौहारों का खाने पीने, स्वादिष्ट व लज़ीज़ व्यंजनों खा़सतौर पर मिठाईयों से सीधा संबंध है। अत: अमीर भारतवासी से लेकर गरीब से गरीब व्यक्ति तक की यह कोशिश होती है कि वह त्यौहारों के अवसर पर अपने मित्रों,  रिश्ते-नातेदारों अथवा अपने परिवारवालों के लिए खाने हेतु किसी न किसी किस्म की मिठाई का तो अवश्य ही आदान प्रदान करे। गोया हम कह सकते हैं कि भारतीय समाज में मिठाई को त्यौहारों के शगुन के रूप में  स्वीकार कर लिया  गया है।
   परंतु हमारे ही देश में  हरामख़ोरी की कमाई का आदी हो चुका एक तीसरे दर्जे का गिरा हुआ वर्ग ऐसा भी है जिसे अपने चंद पैसों की कमाई की खातिर त्यौहारों में खुशियां मनाते व झूमते गाते आम लोगों की खुशी संभवत: सहन नहीं होती। और यह बेशर्म तबक़ा आम लोगों की खुशियों में रंग में भंग डालने का काम करता है। बजाए इसके कि यह वर्ग आम लोगों की खुशी में शरीक हो कर खुद भी खुशियां मनाए तथा आम लोगों को भी प्रोत्साहित करे। परंतु ठीक इसके विपरीत यह हरामख़ोर वर्ग आम लोगों को मिठाईयों के नाम पर ज़हर बेचने का काम करता है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी त्यौहारों के इन दिनों में देश में चारों तरफ से मिलावटी, सड़ी गली, बदबूदार, ज़हरीली तथा रासायनिक पद्धति से तैयार की गई मिठाइयों की बरामदगी के अफसोसनाक समाचार प्राप्त हो रहे हैं। जोधपुर,बीकानेर,चंडीगढ़,दिल्ली व कानपुर जैसे बड़े शहरों से लेकर अंबाला जैसे छोटे शहरों तक से प्रदूषित व ज़हरीली मिष्ठान सामग्री के बरामद होने के समाचार निरंतर प्राप्त हो रहे हैं।
   समाचार पत्रों व विभिन्न टीवी चैनल्स के माध्यम से यह बार बार चेतावनी दी जा रही है कि ऐसी मिलावटी,ज़हरीली व रासायनिक पद्धतियों से तैयार मिष्ठान सामग्रियों के सेवन से आम आदमी के स्वास्थय पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। स्वास्थय विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी मिलावटी मिठाईयां दिल की बीमारी,रक्तचाप,कैंसर,पीलिया,अलसर तथा चमड़ी रोग जैसी तमाम जानलेवा बीमारियों के द्वार तक पहुंचा देती हैं। परिणाम स्वरूप जाने अनजाने में तमाम लोग इन्हीं मिठाईयों के सेवन से मौत के मुंह तक पहुंच जाते हैं। परंतु मिलावट खोरी के इस कारोबार से जुड़े तथा ऐसी कमाई के आदी हो चुके व्यापारी इन सब बातों की परवाह किए बिना अपने इस काले कारोबार को पूर्ववत् जारी रखते हैं। और यदि कभी इत्तेफाक से कोई मिलावटखोर कहीं पकड़ा भी जाता है तो आम लोगों की जान से खेलने वाला वह व्यक्ति भारतीय कानून के अंतर्गत होने वाली नर्म व लचीली कार्रवाई का सामना करते हुए जल्द ही सलाखों से बाहर आ जाता है। बाद में वही अपराधी अपने उसी हौसले के साथ फिर मिलावटखोरी के काम में जुट जाता है। इस प्रकार कम लागत में अधिक पैसे कमाने का आदी हो चुका यह वर्ग आम लोगों की जान से निरंतर खिलवाड़ करने से हरगिज़ नहीं चूकता।
  सवाल यह है कि भारतीय समाज को ऐसे कलंकों से कभी मुक्ति मिलेगी भी या नहीं और यदि मिलेगी तो उसके उपाय क्या हो सकते हैं? भारतीय न्यायालयों में हत्या व हत्या के प्रयास को लेकर चलने वाले मुकद्दमों में आमतौर पर माननीय न्यायाधीश गवाहों के बयान व साक्ष्यों के आधार पर जहां यह जानने की कोशिश करते हैं कि अमुक व्यक्ति की हत्या या हत्या का प्रयास आरोपी व्यक्ति द्वारा अंजाम दिया गया है या नहीं। वहीं माननीय अदालतें मुकद्दमे के दौरान यह पता लगाने की भी पूरी कोशिश करती हैं कि आखिर जुर्म को अंजाम देने का कारण क्या था। अर्थात् जुर्म जानबूझ कर किया गया है या परिस्थितियों वश हो गया। और इन सभी नतीजों पर पहुंचने के बाद अदालतें  जुर्म की उसी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए दोषी को सज़ा सुनाती हैं। उस आरोपी को सबसे अधिक व सख्त सज़ा सुनाई जाती है जिसने जानबूझ कर तथा सुनियोजित ढंग से किसी अपराध को अंजाम दिया हो। यहां गौरतलब है कि किसी एक व्यक्ति की हत्या जैसे सुनियोजित षड्यंत्र रचने वाले अपराधी को फांसी या आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई जाती है।
  ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सुनियोजित तरीके से किसी एक व्यक्ति की हत्या करने के आरोपी को सज़ा-ए-मौत या आजीवन कारावास जैसी सख्त सज़ा का सामना करना पड़ता है फिर मिठाई,जीवन रक्षक दवाईयां अथवा खाने-पीने की अन्य तमाम वस्तुओं में मिलावट करने वाले तथा इनमें ज़हरीली रासयानिक सामग्री मिलाकर सैकड़ों व हज़ारों लोगों की एक साथ सामूहिक हत्या का प्रयास करने वालों के विरुद्ध ऐसी ही सख्त सज़ा का प्रावधान क्यों नहीं है? ज़ाहिर है इस प्रकार की मिलावटखोरी करने का इनका मकसद कम से कम लागत में ज्य़ादा से ज्य़ादा पैसे कमाना ही होता है। और अपने इस एक सूत्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह मिलावटखोर  व्यापारी प्रत्येक स्तर पर मिलावटखोरी को अंजाम देते हैं। यह भली भांति जानते हैं कि ऐसी मिठाईयों अथवा अन्य खाद्य सामग्रियों के खाने से स्वास्थय पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ेगा। परंतु मात्र धन कमाने की चाहत में यह वर्ग समाज को सामूहिक रूप से स्वास्थ्य क्षति पहुंचाने से कतई नहीं हिचकिचाता। अत: आम लोगों को ऐसी ज़हरीली व प्रदूषित खाद्य सामग्री बेचकर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा जानबूझ कर रचे जाने वाले षड्यंत्र का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।
  आज हम अपने ही समाज के बीच स्वास्थय संबंधी तरह-तरह की ऐसी समस्याएं देख रहे हैं जो प्राय: हमें हैरान कर देती हैं। उदाहरण के तौर पर छोटे बच्चों को दिल का दौरा पडऩे लगा है। कम उम्र में लोग पीलिया के शिकार हो रहे हैं। छोटी उम्र में ही कैंसर व अलसर जैसी बीमारियों के लक्षण पाए जा रहे हें। चर्म संबंधी रोगियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। समय पूर्व लोगों की आंखें कमज़ोर हो रही हैं तथा दांतों पर प्रभाव पड़ रहा है। और इस तरह की और समय पूर्व होने वाली तमाम बीमारियों से जूझने वाला आम आदमी कभी सही इलाज न मिल पाने के कारण तो कभी आर्थिक  संकट की बदौलत प्राय: अकाल मौत के मुंह तक चला जाता है। ज़रा कल्पना कीजिए  कि यदि हम आज किसी छोटे बच्चे को ऐसी ही मिलावटी मिठाईयां अथवा अन्य खाद्य सामग्रियां आज खिलाना शुरु करें तो बड़ा होते-होते उसके शरीर की बुनियाद आखिर  किन ज़हरीली खुराकों पर खड़ी होगी।
  लिहाज़ा मिलावटखोरी के इस निरंतर बढ़ते जा रहे नेटवर्क से आम लोगों को निजात दिलाने का एक ही उपाय है कि इसमें शामिल लोगों को पकड़े जाने पर एक तो उनकी ज़मानत हरगिज़ नहीं होनी चाहिए। और दूसरे यह कि ऐसे व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को हमेशा के लिए सील कर सरकार को अपने अधीन ले लेना चाहिए। और तीसरी व सबसे अहम बात यह कि मिलावटखोरी जैसे अपराध को भी फांसी या उम्रकैद जैसी सज़ा की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। जब तक ऐसी सख्त सज़ा का प्रावधान हमारे कायदे व कानूनों के अंतर्गत नहीं होता तब तक मिलावटखोरी के शिकंजे से मुक्ति पाने की कल्पना करना हमारे लिए बेमानी है। यहां एक बात यह भी गौरतलब है कि मिलावटखोरी के इस नेटवर्क में केवल आम आदमी ही नहीं पिस रहा बल्कि बड़े से बड़ा,विशिष्ट,रईस तथा स्वयं को वी आई पी समझने वाला व्यक्ति भी इस त्रासदी से अछूता नहीं है। इस समय बाज़ार में बिकने वाली तमाम मिलावटी वस्तुएं विशिष्ट व्यक्तियों के हिस्से में भी आती हैं। चाहे वह फल अथवा सब्ज़ी के रूप में या फिर दूध,खोया,पनीर या देसी घी की शक्ल में ही क्यों न हों।
  यहां एक बार फिर चीन में गत् वर्ष घटी उस घटना का उल्लेख करना ज़रूरी है जिसमें कि दूध में मिलावट करने वाले एक व्यापारी को मात्र 6 महीने तक मिलावटी कारोबार करने के आरोप में उसे मृत्युदंड दे दिया गया। यदि हमें देश व समाज के हितों का ध्यान रखना है तो हमारे देश में भी ऐसे ही सख्त कानून लागू होने की अविलंब ज़रूरत है। अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि हमारी नस्लें बचपन के बाद सीधे बुढ़ापे में ही कदम न रखने लग जाएं और जवानी उनके भाग्य में ही न लिखी जा सके। और यदि देश को ऐसे बुरे दिन देखने पड़े तो इन मिलावटखोरों से ज्य़ादा दोष हमारे देश के कानून तथा उस व्यवस्था का होगा जो इन हरामखोर मिलावटखोरों की सुनियोजित हरकतों को देखते हुए भी अंजान बना बैठा है तथा इन्हें सख्त दंड देने के बजाए इन्हें प्रोत्साहन या छूट देने की मुद्रा में नज़र आ रहा है।

22 अक्टूबर 2010

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बाजार सजने शुरू

नवरात्र की शुरुआत के साथ ही बाजार सजने शुरू हो गए हैं, या यूं कहें कि बाजार में फेस्टिव सीजन की शुरुआत हो गई है। ग्राहकों को बाजार में नए-नए तरह के सामानों का विकल्प मिलता है, तो दुकानदार भी ग्राहकों को अधिक से अधिक लुभाने के लिए ऑफरों की झड़ी लगा देते हैं। इसके बीच ग्राहक अगर थोड़ी समझदारी दिखाए तो ऑफर का लाभ भी उठा सकता है।

जीरो इंटरेस्ट का क्रेज
बाजार में कई तरह के ऑफर चलते हैं, लेकिन इनमें जो ग्राहकों को सबसे अधिक लुभाता है वह है जीरो इंटरेस्ट लोन, यानी किश्तों पर खरीदारी और वह भी बिना किसी ब्याज के । अगर बात सचमुच ऐसी ही हो जैसा तो क्या बात, लेकिन पड़ताल में डील इतनी सीधी नहीं दिखती।

जीरो इंटरेस्ट की हकीकत
जीरो इंटरेस्ट में कई पेच हैं। पहला यह कि नकद खरीदारी में कंपनियां ग्राहकों को सामान की कीमत पर अच्छा कैश डिस्काउंट देती हैं। जीरो इंटरेस्ट ईएमआई में जाने पर यह डिस्काउंट नहीं मिलता। फाइनेंसिंग के लिए कीमत के अलावा प्रोसेसिंग फीस के नाम पर भी रकम ली जाती है। अमूमन तीन से चार ईएमआई की रकम एडवांस में ले ली जाती है, यानि समूची रकम का लोन नहीं होता। इस तरह से आपको कैश डिस्काउंट भी नहीं मिलता है, ऊपर से प्रोसेसिंग के नाम पर और रकम देनी पड़ती है। इस घाटे की गणना करें, तो पाएंगे कि आप पर 18 से 20 फीसदी ब्याज के बराबर देनदारी बढ़ गई।

फाइनेंस कंपनी को क्या है लाभ
जिस तरह से ग्राहकों को कैश डिस्काउंट मिलता है उसी तरह कंपनियां फाइनेंस कंपनी को भी भारी डिस्काउंट देती हैं। उस डिस्काउंट की रकम फाइनेंस कंपनी की झोली में जाती है, जबकि ग्राहकों से वह सामान की पूरी कीमत पर ऑफर और ईएमआई की गणना करता है।

क्या सचमुच अच्छा नहीं होते जीरो फाइनेंस
ऐसा बिल्कुल नहीं है। मोलतोल में अगर कैश डिस्काउंट भी ले लिया जाए और प्रोसेसिंग के नाम पर अतिरिक्त रकम न देनी पड़े तो यह स्कीम अच्छी है। इसके अलावा महंगे कंज्यूमर ड्यूरेबल के लिए कई बार रकम पूरी नहीं पड़ती, ऐसे में चाहत की वस्तु लेने के लिए इस योजना को तो खराब नहीं कहा जा सकता।

टिप्स
फेस्टिव खरीदारी में कुछ खास बातों का खास ध्यान रखना चाहिए। सामान के उत्पादन और समाप्ति की तारीख जरूर देखनी चाहिए। सस्ते के चक्कर में वैसे उत्पाद कभी नहीं खरीदने चाहिए जिनका चलन खतम हो रहा हो या जो आउट ऑफ फैशन हो रहे हों। खाने-पीने के आयातित सामान में उत्पादन और समाप्ति की तारीख पर खास ध्यान रखना चाहिए। तकनीकी सामान में आफ्टर सेल सर्विस के विकल्प को जरूर जान लें।

फ्रिज में होता है वायरस व बैक्टीरिया

आमतौर पर फ्रिज में रखे सामान को सुरक्षित मान लेते हैं लोग। लेकिन ग्लोबल हाईजीन काउंसिल के ताजा अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि फ्रिज में रखे सामान 70 फीसदी गंदे होते हैं। जबकि 95 फीसदी बाथरूम में बैक्टीरिया और वायरस का साम्राज्य रहता है। इन बैक्टीरिया व वायरस के कारण आम भारतीय पेट की खराबी, सांस की तकलीफ, चर्म रोग, फुड प्वाइजनिंग और एलर्जी का शिकार हो रहे हैं।
काउंसिल के भारत प्रतिनिधि डॉ.नरेंद्र सैनी ने संवाददाताओं से कहा कि हाथ की सफाई ठीक से न होने के कारण बैक्टीरिया व वायरस तेजी से फैलता है। जिन सामान को ऐसे हाथों से छुआ जाता है उसमें बैक्टीरिया व वायरस चला जाता है। कंप्यूटर की 22 फीसदी की बोर्ड में वायरस का साम्राज्य रहता है। जबकि टेलिफोन पर 45 फीसदी वायरस पाया गया है। किचन में काम करने वाली महिलाएं एक ही तौलिए का उपयोग कई कामों में करती है और प्रतिदिन साफ नहीं करती है। जिसके कारण 75 फीसदी वायरस जमा रहता है। हाथ में जमा वायरस छह से 4

इस त्योहार खिल उठे दरो-दीवार

 हर कोई त्योहारों के लिए अपने घर को खास अंदाज में सजाना चाहता है ताकि उसका घर बिल्कुल अलग नजर आए। इसलिए त्यौहारों के शुरू होते ही लोग घर के मेकओवर में लग जाते हैं। कुछ लोग इस काम में प्रोफेशनल्स की मदद लेते हैं, तो कुछ लोग खुद ही इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। वैसे भी जरूरी नहीं कि हर बार घर के मेकओवर के लिए किसी एक्सपर्ट की ही मदद ली जाए। आप खुद भी अपनी सोच में रचनात्मकता लाकर अपने घर को एक अलग अंदाज में सजा सकती हैं और हर किसी की प्रशंसा भी पा सकती हैं।
चटख रंगों की राजस्थानी थीम
यदि आपको घर की सजावट में चटख रंग पसंद हैं, तो आपको राजस्थानी लुक जरूर पसंद आएगा। क्योंकि राजस्थानी थीम में चटख रंगों का ज्यादा प्रयोग किया जाता है। नक्काशीदार व चित्रकारी किया फर्नीचर, लकड़ी के झरोखे, खूबसूरत पेंटिंग्स, जिनमें राजस्थान के ग्रामीण पृष्ठभूमि का चित्रण होता है, लकड़ी व कपड़े से बनी कठपुतलियां, वॉल हैंगिंग्स आदि घर के इंटीरियर में जान डाल देते हैं। इसके अलावा बंधेज या चुनरी प्रिंट वाली चादरें, कुशन कवर और परदों से आप अपने घर को राजस्थानी रंग में रंग सकती हैं।
ग्रीनरी बनाम मेडिटरेनियन
घर में प्रकृति का एहसास करना चाहती हैं और ग्रीनरी पसंद है, तो मेडिटरेनियन थीम के आधार पर अपने घर को सजा सकती हैं। इसमें आंखों को सुकून देने वाले आसमानी, समुद्री ग्रीन, क्रीम, वाइबे्रंट ब्ल्यू रंगों का प्रयोग किया जाता है। साज-सज्जा में घास की चटाइयां, छोटी-छोटी रंग-बिरंगी मूर्तियां, आर्टिफिशियल फव्वारे, रंग-बिरंगे कुशंस/ तकिए, टेराकोटा के गमले आदि ले सकती हैं। रॉट आयरन के बने सोफा, टेबल, कैंडल्स होल्डर और अन्य कलात्मक चीजें घर को मेडिटरेनियन थीम
देती हैं।
विक्टोरियन थीम
घर को एलिगेंट लुक देना चाहती हैं, तो विक्टोरियन थीम भी ट्राई कर सकती हैं। घर की साज-सज्जा में बहुत सारे फूलों का प्रयोग किया जाता है। चादर हों या घर के परदे व कुशंस, इसमें फ्लावरी पैटर्न का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। फर्नीचर भी ऐसे इस्तेमाल किए जाते हैं, जिसमें ज्यादा कट्स या नक्काशी न हो। सजावट में सफेद बेस पर बड़े-बड़े प्रिंटों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। कमरों के कोने को हाईलाइट करने के लिए बड़े-बड़े वासेज का इस्तेमाल बढ़िया होता है। यदि घर में मम्मी के जमाने का पीतल का गागर हो, तो उस पर खूबसूरत पेंटिंग कर कमरे के किसी कोने में रख सकती हैं। इसी तरह और भी पॉट्स हाें, तो उन्हें घर में कलात्मक ढंग से सजा सकती हैं।
चाइनीज थीम
इस थीम के इंटीरियर में घर की पूरी सजावट में बेहद शोख रंगों का इस्तेमाल होता है, जिसमें मुख्यतः सुनहरे, लाल और काले रंग को प्रमुखता दी जाती है। साथ ही नीले, पीले और हरे रंगों का भी प्रयोग किया जाता है। सिरामिक और पॉटरी के साथ फैब्रिक या अपहोल्स्ट्री में फूल, पंछी, मछली और ड्रैगन जैसे डिजाइन सिल्क से कशीदाकारी किए होते हैं, जो पूरेघर को चाइनीज लुक देते हैं। साथ ही घर की खिड़कियों और हॉल में मिट्टी की विंड चाइम टांगें। या अन्य चाइनीज सजावटी वस्तुओं को घर की साज-सज्जा में शामिल कर सकती हैं।
मोरक्कन थीम
इस थीम में चमकीले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जो ऑरेंज, रेड, डीप ब्लू व ग्रीन, सैंड, गोल्ड और सिल्वर शेड्स लिए होते हैं। सजावट के लिए टेराकोटा टाइल्स, सिरामिक या टेराकोटा के पॉट्स, बुनी हुई टोकरियां, रंगीन मोजैक टाइल्स, शीशे के लालटेन, शीशे के जार में सजी बेहतरीन सुगंध देती एरोमा कैंडल्स, पाम के पौधों आदि का इस्तेमाल किया जाता है।
कुछ देसी हो जाए
घर की बैठक को पुराने जमाने के अंदाज में भी सजा सकती हैं। इसके लिए आपको ज्यादा खर्च करने की भी जरूरत नहीं है। पुरानी चौकी दीवार से लगाकर उसपर गद्दा रख दें। आकर्षक चादर बिछाने के बाद उस पर बड़े आकार के मसनद और विभिन्न शेप के कुशंस रखकर आरामदायक और देसी लुक दिया जा सकता है। डेकोरेटिव पीसेज में गणेश की मूर्ति, पिंजरा, लालटेन, मिट्टी की बनी घंटियाें आदि का प्रयोग कर सकती हैं। अगर आपके पास पुरानी बास्केट हो, तो उसे लेस या गोटा से सजा कर दीवार से टांग सकती हैं। कमरे में यदि गमला रखना चाहती हैं, तो पीतल के बने वासेज या मिट्टी के डिजाइनर गमलों को फूल से सजाकर रख सकती हैं। इस तरह अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल कर घर को देसी लुक दे सकती हैं।ह्ल
जापानी स्टाइल
बात जब घर का मेकओवर करने की हो, तो फर्नीचर को इसकी महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ऐसे में अगर आप जापानी थीम पर गौर करें, तो यह हर तरह के घर के लिए परफेक्ट होता है। क्योंकि जापानी इंटीरियर में भारी-भरकम फर्नीचर की जगह हलका फर्नीचर इस्तेमाल किया जाता है। ये ट्रेंडी होने के साथ-साथ किफायती भी होता है। इसमें फर्नीचर या अन्य साजो-सामान की वस्तुएं ज्यादातर बैंबू और सेरामिक की बनी होती हैं। वैसे तो इसमें ब्राउन, बेज और ग्रे जैसे हल्के रंगों का प्रयोग ज्यादा किया जाता है, लेकिन फर्नीचर आमतौर पर गहरे रंगों यानी डार्क वुड जैसे ब्लैक रंग में होता है। टी-पॉट्स, टी-सेट्स, पेपर से बने लालटेन, पेन होल्डर, पेपर फैन, इकेबाना जैसी एक्सेसरीज से घर को सजा सकती हैं।

'शिकारी' नेता आएगा, चुनावी जाल बिछाएगा

बिहार के सुपौल, मधेपुरा और सहरसा ज़िले को मिथिलांचल का कोसी अंचल भी कहा जाता है. दो साल पहले कोसी नदी ने नेपाल-बिहार सीमा क्षेत्र में कुसहा तटबंध तोड़कर बिहार के इन तीनों ज़िलों में भारी तबाही मचाई थी.

इस पीड़ा से जुड़े सवाल यहाँ के चुनावी मुद्दों वाली बहस में पीछे छूट गए लगते हैं.

इस बार छह चरणों में हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में ही कोसी अंचल के मतदाता वोट डालेंगे.

लेकिन वोट किसे और क्यों देंगे, इस सवाल पर बंटे हुए मतदाताओं के सामने प्राय सभी प्रमुख दलों ने जाति, व्यक्ति, पैसा और परिवार से जुड़े तमाम चारे डाल दिए हैं

चुनावी माहौल ऐसा बना दिया गया है कि कोसी-प्रलय के समय भारी जनाक्रोश से भयभीत सत्ता ने कोसी अंचल पुनर्निर्माण का वायदा अभियान चला कर उसे ठंडा किया.
लेकिन वो वायदा ऐसा ठंडा पड़ा कि फिर पांच साल के लिए जनादेश मांग रही उस सत्ता के सामने गरम सवाल बन कर खड़ा भी नहीं हो सका.
कोसी का प्रकोप


यहाँ तक कि विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (राजद), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और काग्रेस ने भी कोसी अंचल की इस त्रासदी को बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर यहाँ के लाखों बाढ़-पीड़ितों में बेहतर पुनर्वास की उम्मीदें जगाना ज़रूरी नहीं समझा.
कोसी-त्रासदी का सबसे ज़्यादा भुक्तभोगी ज़िला है मधेपुरा. वहाँ के मतदाता चुनाव के संदर्भ में इस क्षेत्र के रुख़ या रुझान का अपने ही नज़रिए से दो टूक विश्लेषण कर डालते हैं.
यहाँ भी राजपूत-ब्राह्मण को अंदर से लालू और नीतीश विरोधी बताने, मुस्लिम-यादव के बीच फिर से तालमेल होने या कांग्रेस के पक्ष में सवर्ण, दलित और मुस्लिम समाज के बढ़ते रुझान की ही चर्चा लोगों के बीच अधिक हो रही हैऐसे विश्लेषणों से अलग इस कोसी अंचल को राज्य का सबसे अधिक पिछड़ा इलाक़ा बनाए रखने वाली आपराधिक राजनीति की पहचान और उस पर चोट जैसी चुनावी समीक्षा इस ' पेड न्यूज़ ' के ज़माने में होती कहाँ हैलोक-राशि के वैध-अवैध उपभोग वाले राजसुख से जुड़ी राजनीति अपने तमाम चुनावी वायदों से बेपरवाह दिखती हैक्योंकि चुनाव के समय मतदाता भी अपने हक़ वाले असली मुद्दों से भटकते हुए फिर से तोते की तरह शिकारी नेता के चुनावी जाल में फंस जाते है.

20 अक्टूबर 2010

पुरुषों के लिए बहुत जरूरी सलाह

पुरुषों के लिए एक बहुत ही जरूरी सलाह। वे दोपहर के वक्त महिलाओं के साथ किसी भी कीमत पर उलझने से बचें। नहीं तो इस समय महिलाओं के साथ बहसबाजी में उन्हें मुंह की खानी पड़ सकती है।

जी हां, लोगों के मिजाज पर किए गए एक सर्वे के नतीजे पर यकीन करें तो पुरुषों को इस सलाह पर जरूर अमल करना चाहिए। वरना, उन्हें महिलाओं से मात मिल सकती है। अध्ययन के नतीजों में यह भी कहा गया है कि यदि महिलाएं पुरुषों से कुछ कहना चाहती हैं तो उन्हें शाम के छह बजे तक इंतजार करना चाहिए, क्योंकि यही वह समय है जब पुरु ष अपने करीबी लोगों की मांगों को पूरी करते हैं।

ब्रिटेन में हुए इस अध्ययन में 1,000 पुरु षों और महिलाओं को शामिल किया गया था। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जब किसी महिला को तनख्वाह में इजाफे या प्रोन्नति की बात अपने बॉस से कहनी हो तो वह यह काम सुबह में न कर दोपहर एक बजे करे। इस वक्त उनकी मांगें पूरी होने की ज्यादा संभावना रहती है।

नतीजों के मुताबिक, दोपहर एक बजे के बाद का समय ऐसा होता है जब प्रबंधक अपने कर्मचारियों की मांग के प्रति बहुत उदार होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘महिलाएं यह जानकर काफी खुश होंगी कि मूड में होने वाले उतार-चढ़ाव से सिर्फ वहीं पीड़ित नहीं हैं, बल्कि ऐसा पुरुषों में भी देखा जाता है।’

19 अक्टूबर 2010

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