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08 जून 2011

टूटेगा एक दिन यह माटी का भगोना

हँसना है रोना है
जिन्दगी एक खिलौना है
टूटेगा यह एक दिन
माटी का यह भगोना है
कितने प्यार से बनाया
कुम्हार ने इसे
मगर है तो खिलौना है
रंग भरे चाहत के इसमें
खुब इसे पकाया
वक़्त से पहले टूटे ना
खुद टूट इसे बचाया
काहें का अभिमान
क्या अपना यहाँ समान
फिर साथ क्या ढोना है
टूटेगा यह एक दिन
जिन्दगी एक खिलौना है
भर भाव ठंडक के
शीतल बन भुझा प्यास
मुसाफिर है भगोना है
टूटना मुझे भी एक दिन
''पवन'' भी तो खिलौना है
                                              ------पवन अरोड़ा------

पतंजलि योगपीठ फेज १ और फेज २ को सील

अभी अभी यह सूचना मिली है कि
पतंजलि योगपीठ फेज १ और फेज २ को सील कर दिया गया है। न तो किसी को अंदर
आने दिया जा रहा है और ना ही बाहर आने दिया जा रहा है। मीडिया को इस विषय
में जानकारी नही है। तेजी से इस खबर को फैलाएं।



इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.
जो ना समझ सके, उनके लिये “कौन”.
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.
दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.
सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.
आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हूँ

हरिवंशराय बच्‍चन की एक कविता



07 जून 2011

frontier

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wheel of time





रामदेव यादव को लाल सलाम-रणधीर सिंह सुमन

सरकारी योग के बाद नेता रामदेव यादव
भारतीय राजनीति में योगी, बाबा, औषधि निर्माता, और अब राजनेता रामदेव यादव का राजनीति के क्षेत्र में व्यापक स्वागत है लेकिन पुलिस ने अपनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का एक छोटा सा कारनामा दिखाया कि नेता जी आदमी से औरत की पोशाक में आ गए। इसलिए पुलिस ने नरमी दिखाई और अपने सम्पूर्ण टेलर नहीं दिखाया। अगर हमारे जिले के इस्पात राज्य मंत्री श्री बेनी प्रसाद वर्मा की दिल्ली में चली होती तो उनका चुतड योग (जो बाराबंकी जनपद में तो प्रसिद्द है ) उसका इस्तेमाल होता। राम नगर थाना जिला बाराबंकी में मंत्री जी के एक बडबोले विरोधी के ऊपर तत्कालीन थाना अध्यक्ष ने इसी योग का प्रयोग किया था। जब न्यायालय में उक्त नेता जी का चालान आया तो पेट के बल वो लेटाये हुए थे और जब माननीय मंत्री जी का चुनाव आया तो उसमें सबसे आगे आगे वही नेताजी उनका चुनाव प्रचार कर रहे थे। आप राजनीति में नए-नए आये हैं इसलिए राजनीति के योगों के बारे में जानकारी नहीं है। उत्तर प्रदेश में पुलिस पेट्रोल योग, करंट योग, पट्टा योग आये दिन करती रहती है और इसी कारण से प्रदेश में विपक्षी बडबोले नेता चाहे भाजपा के हों या लोकमंच के नेता अमर सिंह हों या क्षत्रिय शिरोमणि रघुराज प्रताप राजा भैया हों। सबको सरकारी योग से डर लगता है और ये सभी नेतागण निंदा करके अपना काम चला लेते हैं। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में प्रदेश सरकार ने आपके काफिले को रोककर वापस कर दिया। अगर आपने वहां हठ योग किया होता तो आपको उत्तर प्रदेश सरकार भट्ठा-परसोल योग का प्रशिक्षण दे देती। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने आपका पूरा समर्थन किया है और उन्होंने ने कहा है कि रामलीला मैदान में हुई कार्यवाई की उच्चतम न्यायालय जांच कराये क्योंकि अब केंद्र से न्याय की उम्मीद नहीं है। यह अमानवीय और निंदनीय है। अब मैं आपको उत्तर प्रदेश के सरकारी योग की एक झलक दिखा रहा हूँ।
लोकतंत्र का शमशानघाट है लखनऊ
धरना स्थल पर लाठीचार्ज
लाठीचार्ज से बेहोश कर्मचारी
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में झुलेलाल पार्क में प्रदेश के सभी धरना अनशन प्रदर्शन कार्यों को इकठ्ठा होकर अपनी बात कहने के लिये स्थल नियत किया गया है। 23 मई से नवीन ओखला ओद्योगिक विकास प्राधिकरण के कर्मचारी अपनी नौकरी के नियमतिकरण लिये धरना दिए हुए थे। शुक्रवार की सुबह धरनाकारी धर्मपाल की मृत्यु हो गयी। एस.पी ट्रांस गोमती नितिन तिवारी के कुशल नेतृत्व में सी.ओ महानगर, सी.ओ गुड़म्बा सहित कई थानों के थाना प्रभारी अपने-अपने नेम प्लेट उतारकर धरना स्थल पर बैठे हुए कर्मचारियों पर पुलिस, पी.एस.सी के बल पर लाठी चार्ज कर दिया जिसमें आधा दर्जन कर्मचारियों की हालत गंबीर स्तिथि में पहुँच गयी। डेढ़ सौ महिलाओं को इन अधिकारियो के नेतृत्व में पुलिस पी.एस.सी ने जमकर पीटा। सारे कानून नियम धरे के धरे रह गए।
लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने हमेशा समाज के हर तबके के ऊपर लाठी चार्ज किया है और किसी भी मामले में जिम्मेदार किसी भी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की गयी है। धरना स्थल पर धरनाकारी धर्मपाल की मौत के बाद पुलिस प्रशासन ने जिस तरह से धरनाकारी के ऊपर बुरी तरह से लाठीचार्ज किया है। उससे लगता है की उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ लोकतंत्र का शमशानघाट है और विपक्षी दलों की स्तिथि मुर्दों से भी बदतर है। जो न हिल सकते हैं न डुल सकते हैं अन्यथा सरकार की यह हिम्मत ही नहीं हो सकती थी कि वो हर सत्याग्रही के ऊपर लाठीचार्ज कर सके।
समाजवादी पार्टी के नेताजी को एस.एस.पी लखनऊ बूट योग सिखा रहे हैं
वहीँ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राज्य की सुनामी के तहत लखनऊ के डी.आई.जी डी.के.ठाकुर ने राज्य की सुनामी आनंद सिंह भदौरिया के ऊपर उतारी। भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डी.के. ठाकुर ने गिरफ्तारी के बाद आनंद सिंह भदौरिया को हजरतगंज में लाठियों से पीट कर सड़क पर लातों से रौंदा जिससे उत्तर प्रदेश सरकार तथा भारत सरकार के पुलिस अधिकारीयों का वास्तविक चेहरा जनता के सामने आया। कहने के लिये हम आप लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा हैं लेकिन वास्तव में राज्य का असली स्वरूप जब सामने आता है तो वह बड़ा वीभत्स होता है। इन स्तिथियों के बाद भारत सरकार में दम है कि इस पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाई कर सके। जनता के साथ पुलिस का व्यवहार यह होता है, वहीँ अभी कुछ दिन पहले राज्य के एक पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री का जूता साफ़ करते नजर आये थे। अगर बात मुख्यमंत्री की आ जाए तो महाबलशाली डी.आई.जी डी.के.ठाकुर उनकी चप्पलें साफ़ करते नजर आयेंगे। इन घ्रणित चेहरों का इलाज भारतीय लोकतंत्र में नहीं है ।
रही बात विदेशों से काला धन लाने की तो नेता जी मेरी एक सलाह है कि अगर आज की तारीख से देश में कला धन बनाने की प्रक्रिया रुक जाए तो भी देश काफी खुशहाल हो जायेगा। जब दो करोड़ रुपये की जमीन कोई खरीदता है तो नंबर एक रुपये में 60-70 लाख रुपये का भुगतान होता है बाकी भुगतान बेनामी होता है और इसी तरह हजारो हजार करोड़ रुपये ब्लैक मनी प्रतिदिन तैयार होती है मुख्य समस्या यह है। नेता जी आपने रामलीला मैदान 5000 लोगों को योग सिखाने के लिये लिया था। अनशन प्रदर्शन करने के लिये नहीं लिया था और वहां योग सिखने वाले लोगों को इस तरह की कार्यवाई की भी उम्मीद नहीं थी यदि किसी योग प्रशिक्षणार्थी की मृत्यु भी हो जाती तो उसकी भी जिम्मेदारी आपकी ही होती। आपके समर्थन में संघियों की मुखौटा पार्टी भाजपा पूरी तरीके से है। इसका अध्यक्ष बंगारू लक्षमण भी रहा है जिसका हाल आपने टेलीविजन पर देखा होगा। अगर आपके केंद्र में कांग्रेस की बजाये भाजपा की सरकार होती तो भाजपा आपको इससे बढ़िया नया योग सिखा चुकी होती। कांग्रेस भ्रष्टाचारियों का एक अड्डा है जिसमें शरद पवार जैसे मंत्रियों से लेकर दयानिधि मारन तक अब तक मंत्री हैं। प्रेस मीडिया प्रधानमंत्री के चेले चपाटे चाहे जो भ्रष्टाचार करें उनको ईमानदारी का प्रमाणपत्र जारी ही करेगी।हम, नेता जी आपके राजनीति में आने का स्वागत करते हैं लेकिन ये द्रष्टान्त आपके लिये लिखे हैं जिससे आप इन योगों का भी अभ्यास कर लें। जिससे भविष्य में आपको कोई कुंठा या निराशा न हो। राजनीति में सभी महायोगी होते हैं और आप अभी तक सिर्फ योगी हैं।

06 जून 2011

बाबा का धन कितना बड़ा मुद्दा ?

 योग गुरु बाबा रामदेव (जगदीश यादव) कभी हरिद्वार में साइकिलसे चलते थे, लेकिन आज उनके ट्रस्ट के पास अरबों की संपत्ति है। कभी साइकलपर चलते थे बाबा रामदेवबाबा रामदेव हरिद्वार में गुरु शंकर देव के शिष्य थे लेकिन गुरु शंकर देवका अब कुछ पता नहीं है। आज बाबा रामदेव के सबसे विश्वस्त साथी बालकिशनमहाराज हैं। बाबा के पीछे रहने वाले बालकिशन महाराज ने बाबा के आयुर्वेद का साम्राज्य खड़ा किया हैं। अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता बाबा हठयोगी ने हाल ही में बाबा रामदेव पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि एक दशकपहले रामदेव साइकिल पर चलते थे और उनके पास इतना पैसा भी नहीं रहता था किवे साइकिल का पंचर बनवा सकें। लेकिन आज वे हेलीकॉप्टर में चलते हैं।इसलिए हम उनकी संपत्ति की जांच की मांग करते हैं।करोड़ों की संपत्ति है बाबा रामदेव के पासबाबा रामदेव के आश्रमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हरिद्वार से दसकिलोमीटर की दूरी पर मौजूद आश्रम के अलावा हरियाणा में अरावली कीपहाड़ियों के नजदीक और स्कॉटलैंड में रामदेव के आश्रम बन चुके हैं। उनकाट्रस्ट दुनियाभर में दवाइयां और 'स्वास्थ्य को बेहतर बनाने वाले' कईउत्पाद बेचता है। बाबा रामदेव ने कहा था कि वह आयुर्वेद और योग का दुनियाका सबसे बड़ा केंद्र बनाना चाहते हैं जहां इलाज, शोध और अध्यापन किया
जाए। बाबा रामदेव ने स्कॉटलैंड में बीस लाख पाउंड स्टर्लिंग में एक टापू खरीदा है। कुंब्रे द्वीप विदेशों में उनके मुख्य केंद्र के तौर पर कामकरेगा। इस द्वीप का अधिग्रहण भारतीय मूल के स्कॉटिश दंपती सैम और सुनीतापोद्दार ने सितंबर, 2009 में किया था। इस द्वीप का कामकाज रामदेव केपतंजलि योगपीठ (यूके) ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।बाबा ने 21वीं सदी में देश में योग को नई पहचान दिलाई और घर घर मेंलोकप्रिय बनाया।टीवी के विभिन्न चैनलों ने उनकी लोकप्रियता बढ़ाने मेंमहत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सत्ता के गलियारों में पैठ रखने वाले बड़े लोगउनके संपर्क में आए। इसी दौरान बाबा रामदेव ने योग के लिए पतंजलि योगपीठट्रस्ट बनाया तथा भारत स्वाभिमान के नाम से आंदोलन की शुरुआत की। इसके बाद से बाबा की लोकप्रियता और उनके ट्रस्ट की संपत्ति दिन दूनी रातचौगुनी बढ़ती ही जा रही है। 

समलैंगिकों के लिए तो खूब बोलीं मगर बाबा पर नहीं खुला सेलिना जेटली मुंह!

हाल ही में पर्यावरण के प्रति अपना प्रेम दिखाने के लिए सेलिना जेटली एक इवेंट पर पेड़ लगाती हुयी नजर आयीं मगर जब उनसे भ्रष्टाचार  के खिलाफ अनशन पर बैठे बाबा रामदेव के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया|
सेलिना यूँ तो समाज से जुड़े हर मुद्दे पर अपनी राय देती हैं और खुद भी समाज सेवक हैं मगर बाबा रामदेव के अनशन पर उन्होंने अपना मुंह नहीं खोला|सेलिना पिछली बार तब सुर्ख़ियों में आई थीं जब उन्होंने समलैंगिकों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई थी मगर इस मुद्दे पर न जाने सेलिना को क्या हो गया है|इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मैं इस अनशन के बारे में कोई कमेंट नहीं देना चाही|पता नहीं उन्हें कौन सी वजह से वह इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त करने से बच रही हैं|लगता है इस मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते सेलिना इससे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझ रही हैं|

शादी का झांसा देकर नाबालिग छात्रा से करता रहा दुष्कर्


कांकेर/रायपुर.कक्षा दसवीं की नाबालिग छात्रा को गांव के एक युवक ने शादी का प्रलोभन देकर लगातार शारीरिक शोषण किया। छात्रा का गर्भ ठहरने के बाद युवक ने शादी से इंकार कर दिया। युवक के हवस का शिकार बनी छात्रा ने युवक के खिलाफ थाना में बलात्कार का मामला दर्ज कराया।
ग्राम बारदेवरी की कक्षा 10 वीं की 16 वर्षीय छात्रा ने अपने शिकायत में कहा कि गांव का युवक गंगाराम पिता सुक्ला राम पोटाई ने उसे शादी का प्रलोभन दिया तथा उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने लगा। गंगाराम उसके साथ 27 अप्रैल 2010 से शारीरिक संबंध बना रहा है। चार माह पूर्व उसका गर्भ ठहर गया।
गंगाराम को शादी करने कहने पर उसने इंकार कर दिया तथा किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी। समय बीतने पर गर्भ ठहरने की बात छात्रा के परिजनों को भी पता चली। मामले को लेकर 1 जून को गांव में बैठक आयोजित की गई जिसमें गंगाराम, छात्रा, दोनों के परिजनों के अलावा गांव के प्रमुख लोग उपस्थित हुए। बैठक में गंगाराम ने ग्रामवासियों के सामने छात्रा के शादी करने में सहमती जताई।
इस दौरान छात्रा तथा गंगाराम के मध्य लिखित में समझौता भी हुआ जिसमें गंगाराम ने स्वीकार किया की वह विगत दो वर्ष से छात्रा के साथ शारीरिक संबंध बना रहा था। वह छात्रा के साथ शादी के लिए तैयार है तथा इकरार नामा से मुकरने पर खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
गंगाराम के इस इकरार नामा में गांव के दस से अधिक लोगों ने गवाह के तौर पर अपने हस्ताक्षर भी किए है। समझौता होने के बाद युवक गंगाराम ने अपने इकरार नामा से मुकरते हुए छात्रा से शादी करने से इंकार कर दिया। शादी से इंकार करने पर छात्रा ने युवक के खिलाफ थाना में शिकायत कराई। पुलिस अपराध पंजीबद्ध कर तलाश कर रही है।

लड़की के जन्‍मदिन पर पहुंचे 1500 बिन बुलाए मेहमान

जर्मनी की एक लडकी थेसा के लिए जन्‍मदिन का निमंत्रण देना उस समय मुसीबत बन गया जब उसके घर 1500 अपरिचित लोग पहुंच गए। लडकी के घरवालों ने इतनी भीड देखकर निजी गार्ड लगाए व पुलिस को फोन कर बुलाया। हैबर्ग में इस घटना में पुलिस ने 11 लोगों को हिरासत में लिया है।
दरअसल थेसा ने अपने जन्मदिन का निमंत्रण फेसबुक पर दिया था लेकिन वो उस निमंत्रण पर प्राइवेट लिखना भूल गई थी। इसके बाद लोगों ने उस निमंत्रण को देखा और 1500 से अधिक लोग पार्टी में पहुंच गए।
पुलिस के अनुसार फ्लिप-फ्लॉप पहनकर आई बहुत सी लडकियों के पांव टूटे हुए कांच के टुकडों लग गए जिससे उनके पैर जख्मी हो गए और दो जगहों पर आग भी लग गई। इसके बाद फायब्रिगेड भी वहां पहुंची। इसके बाद भी पार्टी शानदार रही।
थेसा पार्टी से बाहर आकर अपना जन्मदिन बिना किसी को बतांए दादा-दादी के साथ मनाया।

कांग्रेस महासचिव को प्रेस कांफ्रेंस में दिखाया जूता

बाबा रामदेव कांड के बाद लोगों में कांग्रेस के खिलाफ फैला गुस्सा सोमवार को तब दिखा जब प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी पर एक शख्स ने जूता तान दिया। उसे तुरंत पकड़ लिया गया। जनार्दन द्विवेदी इस प्रेस कांफ्रेंस को संबोधत कर रहे थे। बताया जा रहा है कि जूता दिखाने वाला पत्रकार का नाम सुनील कुमार है। वह राजस्थान के झुंझूनू का रहने वाला हैदिल्ली में जनार्दन द्विवेदी प्रेस कॉन्फ्रेंस में रामदेव के खिलाफ की गई पुलिसिया कार्रवाई पर कांग्रेस का पक्ष रख रहे थे। उसी दौरान एक युवक मंच पर उनके बिल्कुल पास आ गया। उनके ठीक बगल में आकर उसने अपने हाथ में जूता ले लिया और धमकाने की मुद्रा में उन पर तान दिया। इससे पहले कि वह उन पर जूता फेंकता या जूते से उन पर हमला करता  ,  उसे पकड़ लिया गया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी पिटाई शुरू कर दी। लेकिन  ,  दिल्ली पुलिस ने जल्द ही उसे हिरासत में लिया।
आरोपी सुनील कुमार के बारे में बताया जा रहा है कि यह खुद को नवसंचार पत्रिका से जुड़ा होने के दावा कर रहा है, जबकि इसके बारे में बताया जा रहा है कि यह अंग्रेजी का टीचर है। लेकिन इसे तीन स्कूलों से निकाला जा चुका है। सुनील स्वभाव से काफी गुस्सैल है।  फिलहाल सुनील कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया है और मामले की जांच की जा रही है।

04 जून 2011

आंसू गैस के गोले दागे और लाठियां बरसाई

सरकार के साथ वार्ता टूटने के बाद पुलिस ने बाबा रामदेव का अनिश्चितकालीन अनशन खत्म करने के लिए आधी रात को रामलीला मैदान में कार्रवाई की और योगगुरु को हिरासत में ले लिया। पुलिस ने उनके समर्थकों पर आंसू गैस के गोले दागे और लाठियां बरसाई।सरकार और 46 वर्षीय योगगुरु ने बीती रात एक दूसरे पर आश्वासनों पर विश्वासघात का आरोप लगाया, जिसके बाद यह नाटकीय पुलिस कार्रवाई हुई। करीब एक बजे रात को यह ड्रामा तब शुरू हुआ जब बड़ी संख्या में पुलिस रामलीला मैदान में पहुंची जहां बाबा रामदेव विदेशों में छिपाकर रखे गए कालेधन को वापस लाने की मांग को लेकर अनशन पर बैठे थे। मध्य रात्रि से शुरू हुई कार्रवाई में पुलिस ने भोर होने से पहले बाबा के सभी समर्थकों से सत्याग्रह स्थल से बाहर कर दिया। हालांकि उनके समर्थकों ने इसका काफी प्रतिरोध किया।  दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने बताया कि बाबा रामदेव जब अनशन स्थल छोड़कर जा रहे थे तब उन्हें हिरासत में ले लिया गया। गुप्ता ने कहा कि कुछ सुरक्षा चिंताएं हैं और योगशिविर लगाने की अनुमति रद्द कर दी गई है। रामदेव के समर्थकों ने पथराव किया, जबकि पुलिस ने आंसूगैस के गोले छोड़ने के अलावा कोई बल प्रयोग नहीं किया। उधर, रामदेव के प्रमुख सहयोगी तिजरावाला ने आरोप लगाया कि पुलिस ने योगगुरु का अपहरण कर लिया है। प्रवक्ता ने योगगुरु की जान को लेकर चिंता जताई। उन्होंने प्रधान न्यायाधीश से रामदेव की सुरक्षा एवं रिहाई सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की।
पुलिस ने उनके योगशिविर के लिए अनुमति वापस ले ली और वहां निषेधाज्ञा लगा दी। दरअसल एक पुलिस अधिकारी का कहना था कि उनके विरोध प्रदर्शन को खत्म करने के लिए राजनीतिक निर्णय लिया गया, जिसके बाद यह कार्रवाई हुई। बीती रात सरकार और रामदेव ने एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाए थे। रामदेव को अनशन पर नहीं जाने के लिए मनाने के लिए उनसे वार्ता करने वाले केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने योगगुरु के करीब की ओर से लिखे गए उस पत्र को सार्वजनिक कर दिया जिसमें कहा गया है कि यदि सरकार कालेधन को वापस लाने और दोषियों के लिए कड़े कठोर दंड के कानून पर लिखित आश्वासन देती है तो वे शनिवार के शाम तक अनशन वापस ले लेंगे। रामदेव ने यह कहते हुए पलटवार किया कि सरकार ने उनके साथ धोखा और विश्वासघात किया है और उन्होंने जीवन में कभी भी सिब्बल से बातचीत नहीं करने की बात कही। उन्होंने कहा कि वह प्रधानमंत्री की ही बात मानेंगे। आरोप प्रत्यारोप के बाद सरकार ने शनिवार की रात को उनकी मांगों पर आश्वासन का एक ताजा पत्र भेजा और उनसे अनशन वापस लेने की अपील की।
आधी रात को टेलीविजन कैमरों के सामने हुए इस ड्रामा के दौरान रामदेव के समर्थकों को सोते से जगा दिया गया। उनके समर्थक पुलिस कार्रवाई के विरोध में उठ खड़े हुए। पुलिस के आंसू गैस के गोले दागने से कई वृद्ध महिलाएं बेहोश हो गईं। उनके 30 घायल समर्थक समीप के एक अस्पताल में भर्ती कराए गए हैं। कुछ समर्थकों ने बाबा रामदेव को अपने कंधों पर बैठा लिया। उन्हें वहां से हटाए जाने से और हिरासत में लिए जाने से पहले टेलीविजन पर उन्हें अंतिम बार देखा गया। इससे पहले रामदेव अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने अपील करते हुए देखे गए। जब आंसू गैस का एक गोला मंच पर गिरा तब मंच में भी मामूली आग लग गई। इस आग को तुरंत बुझा लिया गया।
 अपने समर्थकों को संबोधन में रामदेव ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अपील की कि उन्हें दिन में गिरफ्तार किया जाए। उन्होंने कहा कि मुझे बिना किसी सूचना के रात में क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है। मैं लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करता हूं। उन्होंने दिल्ली के लोगों से अनशन में बड़ी संख्या में आने की भी अपील की। समर्थकों ने पुलिसकर्मियों को मंच के करीब आने से रोकने के लिए बर्तन, ट्राइपॉड और माइक फेंके। पुलिस के आंसू गैस के गोले दागने के बाद भीड़ तितर-बितर हो गई। लोग मंच और आसपास के इलाके से जाते हुए देखे गए। समर्थकों ने दावा किया है कि बाबा को आचार्य बाल कृष्णन तथा भारत स्वाभिमान मंच के प्रमुख जयदीप आर्य के साथ गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने कहा कि बाबा रामदेव के बाद दूसरे स्थान पर आने वाले स्वामी संपूर्णानंद ने आंदोलन की कमान संभाल ली है और उन्होंने लोगों से जंतर-मंतर पर एकत्रित करने का आह्वान किया। पुलिस कार्रवाई के दौरान बैनर फाड़ दिए गए। गद्दे और फर्नीचर रामलीला मैदान में इधर-उधर बिखरे पड़े थे। रामलीला मैदान बाबा रामदेव ने योग शिविर के लिए 20 दिन के लिए बुक कराया था, लेकिन वह उनके सत्याग्रह आंदोलन का स्थल में बदल गया। आयोजक लोगों से पंडाल नहीं छोड़कर जाने तथा विरोध प्रदर्शन जारी रखने का आह्वान करते हुए नजर आए। रामदेव के आंदोलन से जुड़े कुछ उनके समर्थकों ने राज्य इकाईयों से पुलिस कार्रवाई के खिलाफ अगली सुबह को विरोध प्रदर्शन करने को कहा। रामलीला मैदान से बड़ी संख्या में लोग जाते हुए देखे गए। उनमें से कुछ पुलिसकर्मियों के साथ यह बहस करते हुए देखे गए कि जब उनका प्रदर्शन शांतिपूर्ण था तब उन्होंने ऐसी कार्रवाई क्यों की। बाद में सूत्रों ने बताया कि उन्हें दिल्ली से बाहर जाने दिया गया और उन्हें हेलीकॉप्टर के द्वारा हरिद्वार भेजा गया है। इससे पहले गृहसचिव जीके पिल्लै ने कहा था कि बाबा रामदेव को गिरफ्तार नहीं किया गया है और न ही उन्हें हिरासत में लिया गया है। मौके पर पहुंचे दिल्ली पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता ने भी यही बात दोहराई थी। पुलिस जब रैपिड ऐक्शन फोर्स के साथ अनशन स्थल पर पहुंची और रामदेव बाबा तक जाने लगी तब तक हंगामा और अफरातफरी का माहौल पैदा हो चुका था। योगगुरु वहां विशेष रूप से तैयार मंच पर सो रहे थे। जैसे ही यह खबर फैली की कि रामदेव को गिरफ्तार किया जा सकता है, महिलाओं समेत उनके समर्थकों ने पुलिस को उन तक पहुंचने से रोकने के लिए योगगुरु को चारों तरफ से घेर लिया।

रामलीला मैदान में

रामलीला मैदान में सरकारी तांडव 


सोये हुए लोगो पर बरसाई लाठी , 

 छोड़े अश्रु गैस .



पता नहीं क्या होगा मेरे देश का

03 जून 2011

BHARAT SVABHIMAN






क्या आप जानते है?
 इंडिया का वह स्थान जहाँ सबसे सस्ता भोजन उपलब्ध है ? ............
चाय = 1 रूपया प्रति चाय 
सूप = 5.50 रुपये 
दाल = 1.50 रूपया 
शाकाहारी थाली (जिसमे दाल, सब्जी 4 चपाती चावल/पुलाव, दही, सलाद ) = 12.50 रुपये 
मांसाहारी थाली = 22 रुपये 
दही चावल = 11 रुपये 
शाकाहारी पुलाव = 8 रुपये 
चिकेन बिरयानी = 34 रुपये
फिश कर्री और चावल = 13 रुपये
राजमा चावल = 7 रुपये
टमाटर चावल = 7 रुपये
फिश करी = 17 रुपये
चिकन करी = 20 .50 रुपये
चिकन मसाला = 24 .50 रुपये
बटर चिकन = 27 रुपये
चपाती = 1 रूपया प्रति चपाती 
एक पलते चावल = 2 रुपये
डोसा = 4 रुपये
खीर = 5.50 रुपये प्रति कटोरी 
फ्रूट केक = 9 .50 रुपये
फ्रूट सलाद = 7 रुपये
यह वास्तविक मूल्य सूची है
ऊपर
बताई गई सारी मदें " गरीब लोगों "केवल और केवल के लिए है जो कि भारत के 
संसद की केन्टीन में ही उपलब्ध है. ............. और इन गरीब लोगों की 
तनख्वाह 80,000 रुपये प्रति माह है . ......................... इसके अलावा
इन्हें बोनस के रूप में भारी से भारी घोटाले करके अरबों - खरबों रुपये 
हडपने की खुल्ली छूट है . 
.............. और ये सारा का सारा पैसा 
पब्लिक की जेब से जाता है
 जिसे हम और आप टैक्स के रूप में चुकाते 
है.............

टोल फ्री नंबर

भ्रष्टाचार के विरुद्ध पूज्य स्वामीजी के अनशन के समर्थन में आप अपना समर्थन टोल फ्री नंबर 02233081122  PAR DE SAKTE HAI............

02233081122   PLZ MISS CALL...............


बामुलाहिजा : बाबा रामदेव को रोको.





जातिवार जनगणना

आखिर जिसका अंदेशा था, वही हुआ। पिछले साल लगभग यही समय था, जब लोकसभा में जातिवार जनगणना पर बहस हुई थी। और यादव-त्रयी ने ही नहीं, जैसा कि आम तौर पर प्रचारित किया जाता है, बल्कि देश के तमाम राजनीतिक दल इस बात के लिए सहमत हो गए थे कि जनगणना में भारत की सामाजिक संरचना का लेखाजोखा होना चाहिए और इसके लिए जनगणना में जाति को शामिल किया जाना चाहिए। इस व्यापक सहमति में कांग्रेस और भाजपा से लेकर वाम दल और शिवसेना से लेकर तमाम क्षेत्रीय दल शामिल थे। इस प्रस्ताव का विरोध किसी भी पक्ष ने नहीं किया। ऐसा व्यापक आम सहमति के मौके संसदीय इतिहास में विरल होते हैं। इसे देखकर प्रधानमंत्री ने यह घोषणा भी कर दी कि सरकार सदन की भावना से अवगत है और कैबिनेट इस बारे में जल्द फैसला करेगी।
लोकसभा इस देश की सबसे बड़ी पंचायत है। देश की लोकतांत्रिक सत्ता की सबसे बड़ी पीठ। ऐसा कहा और माना जाता है कि लोकसभा में जो तय होता है, जैसा तय होता है, देश और सरकार उसी हिसाब से चलती है। जनगणना को लेकर लोकसभा में चर्चा मई, 2010 में हुई थी। एक साल बाद अब अगर देखें कि उस आम सहमति और प्रधानमंत्री के वादे का क्या हुआ, तो बेहद त्रासद तस्वीर सामने आती है। आज देखें स्थिति क्या है? हर दस साल पर होने वाली जनगणना 2011 की फरवरी में जाति संबंधी आंकड़े जुटाए बगैर संपन्न हो गई। इस जनगणना के लिए 25 लाख सरकारी शिक्षक देश में दरवाजे-दरवाजे गए। तमाम तरह के सवाल उन्होंने पूछे, लेकिन वह सवाल नहीं पूछा, जिसे पूछना लोकसभा में तय हुआ था। इस सवाल का जवाब अब किसी के पास नहीं है कि 2011 की जनगणना में जाति का कॉलम क्यों नहीं जोड़ा गया।
पीछे जाना तो संभव नहीं है, लेकिन बेहतर होता कि सरकार ने 2011 की फरवरी में ही जाति संबंधी आंकड़े जुटा लिए होते। इसकी कई वजहें हैं। भारत में जनगणना का काम जनगणना अधिनियम,1948 के तहत होता है। इस अधिनियम के तहत होने की वजह से जनगणना के काम में किसी भी सरकारी कर्मचारी अधिकारी को लगाने का वैधानिक अधिकार सरकार के पास होता है। इस कानून के तहत गलत सूचना देना अपराध है। हर दस साल पर होने वाली जनगणना के काम में सरकारी शिक्षकों को लगाया जा सकता है। लेकिन किसी और सर्वे के लिए उन्हें नहीं लगाया जा सकता। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत भी यह प्रावधान है कि सरकारी शिक्षकों को चुनाव और जनगणना के अलावा किसी सरकारी काम में नहीं लगाया जा सकता। साथ ही जनगणना कानून की वजह से कोई व्यक्ति जनगणना के फॉर्म पर जो जानकारी देता है, उसकी व्यक्तिगत जानकारी गोपनीय रखी जाती है। आंकड़ा संकलन में ही इस जानकारी का इस्तेमाल होता है, इस वजह से कोई व्यक्ति सहजता से खुद से जुड़ी जानकारियां जनगणना कर्मचारी को दे देता है। संसद में जब इस बारे में सवाल पूछा गया कि अलग से जातिवार गणना कराने का क्या फायदा है तो सरकार इसका कोई जवाब नहीं दे पाई।
अब क्या होने वाला है, इस पर विचार करें तो यह पाएंगे कि जाति संबंधी जानकारी इकट्ठा करने पर लोकसभा में बनी सहमति का सरकार ने पूरी तरह मजाक बना दिया है। कैबिनेट ने इस काम को जिस तरह से कराने का फैसला किया है, उस पर बिंदुवार विचार करने की जरूरत है।
इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पहलू है, सरकार की घोषणा का समय। प्रधानमंत्री ने जाति जनगणना के बारे में घोषणा संसद में की थी। लेकिन अब कैबिनेट ने ऐसे समय में जाति की गिनती का फैसला किया है, जब संसद का सत्र नहीं चल रहा है। सरकार ने कहा है कि यह गणना जून से दिसंबर 2011 के बीच कराई जाएगी। यानी जब संसद का मानसून सत्र शुरू होगा तब तक जाति के आंकड़े जुटाने का काम शुरू हो चुका होगा। यानी संसद के पास कैबिनेट के इस फैसले पर विचार करने का अवसर नहीं होगा। समय का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फरवरी 2011 की जनगणना से जाति को बाहर करने का फैसला 9 सितंबर, 2010 को आया था। संसद का सत्र उस समय भी नहीं चल रहा था और सितंबर की घोषणा के एक पखवाड़े के अंदर देश के उन जिलों में जनगणना शुरू कर दी गई, जहां सर्दियों में बर्फ गिरती है। यानी सरकार के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए संसद को कोई मौका ही नहीं मिला, क्योंकि शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ही जनगणना शुरू हो चुकी थी। उचित यह होता कि सरकार मानसून सत्र में संसद को यह बताती कि जाति की गिनती वह किस तरह कराना चाहती है, ताकि संसद में इस पर विचार-विमर्श होता और लोकतांत्रिक तरीके का पालन किया जाता। उम्मीद की जा सकती है कि मानसून सत्र में इस मसले पर संसद में जमकर बहस होगी और जाति गणना कुछ महीनों बाद ही सही, पर सलीके से संपन्न होगी।
सरकार की ताजा घोषणा में एक और पेंच यह है कि जाति गणना के काम को जनगणना अधिनियम से बाहर रखा गया है। इस वजह से जनगणना की प्रक्रिया को प्राप्त कानूनगत और प्रशासन संबंधी सुविधाएं प्राप्त नहीं होंगी। सरकार ने इसी वजह से कहा है कि जनगणना के काम में शिक्षकों को नहीं लगाया जाएगा। यह काम राज्य सरकारों के हवाले छोड़ दिया गया है। राज्य सरकारें इसमें अपने कर्मचारियों से लेकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तथा महात्मा गांधी नरेगा के मजदूरों का इस्तेमाल करेगी। अप्रशिक्षित लोगों को आंकड़ा संग्रह में लगाए जाने की वजह से इस प्रक्रिया में मिले आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध रहेगी। दूसरी प्रक्रियागत खामी यह है कि लोग जो जानकारी देंगे, उसे कागज पर नहीं भरा जाएगा। इस जानकारी को एक कंप्यूटरनुमा मशीन पर दर्ज करके तहसील स्तर पर कंप्यूटर सर्वर में डाला जाएगा। एक तो इतनी बड़ी संख्या में मशीन उपलब्ध कराना और फिर लोगों को प्रशिक्षित करना बेहद मुश्किल काम होगा। दूसरे, मशीन से आंकड़ा संग्रह करने के कारण इन आंकड़ों की दोबारा जांच की संभावना भी खत्म हो जाएगी।
सरकार जिस तरह से जाति गणना के साथ गरीबी रेखा से नीचे के लोगों का आंकड़ा जुटा रही है, उससे इस प्रक्रिया को लेकर सरकार की नीयत पर संदेह होता है। जाति जनगणना के साथ यह जरूरी है कि शिक्षा, रोजगार, सभी स्तरों की सरकारी नौकरियों और आर्थिक स्थिति से संबंधित जानकारियां जुटाई जाएं। अभी सरकार ने जो बताया है उसके हिसाब से इस तरह की जानकारियां नहीं मांगी जाएंगी। अगर सात महीने तक जाति गणना करने के बाद भी यह न मालूम हो कि देश में किस जाति में किस स्तर तक पढ़ाई करने वाले कितने लोग हैं और किन जातियों के लोग सरकारी नौकरियों में कम या ज्यादा हैं तथा अलग अलग वर्ग की नौकरियों में किन किन जातियों के लोग कितनी संख्या में हैं, तो इस कवायद का खास मतलब नहीं रह जाएगा। हजारों करोड़ रुपए खर्च करके सरकार जब आंकड़ा संग्रह करा रही है तो देश की सामाजिक सच्चाई पूरी विविधता के साथ सामने आनी चाहिए।
संसद में सभी दलों के सांसदों ने जातियों से संबंधित आर्थिक शैक्षणिक आंकड़े जुटाने की मांग की थी। इसका आदर किया जाना चाहिए। गरीबी रेखा को लेकर केंद्र सरकार की हमेशा शिकायत रही है कि राज्य सरकारें गरीबों की संख्या बढ़ाकर दिखाती है, ताकि केंद्र से ज्यादा आर्थिक मदद मिल सके। इसलिए सरकार गरीबों से संबंधित आंकड़ा जुटाना चाहती है। लेकिन इस काम को जाति जनगणना से साथ जोड़ना सही नहीं है। इसके लिए सरकार को अलग से एक आयोग बनाकर आंकड़े जुटाने चाहिए।
अब सरकार ने पूरे मामले को जहां पहुंचा दिया है उसमें यही हो सकता है कि वह 2021 की जनगणना में जाति को शामिल करने के बारे में अधिनियम पारित करे ताकि जाति के आंकड़े अलग से जुटाने में होने वाले खर्च और मुश्किलों से बचा जा सका। सरकार को इस संबंध में सारी आशंकाओं का जवाब देना चाहिए। फिलहाल सरकार यह कर सकती है कि अगले साल यानी 2012 की फरवरी में जाति जनगणना कराने की घोषणा करे। इस जनगणना में सामान्य जनगणना के तमाम सवालों के साथ ही जाति, शैक्षिक स्तर और विभिन्न वर्गों की नौकरियों के बारे में सवाल पूछे जाएं। यह काम जनगणना अधिनियम के तहत जनगणना आयुक्त के माध्यम से ही कराया जाए और इसमें सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ही आंकड़ा संग्रह करने के लिए लगाया जाए। इस वजह से विद्यार्थियों और शिक्षकों को होने वाली दिक्कतों के लिए सरकार को उनसे क्षमायाचना करनी चाहिए क्योंकि यही काम फरवरी 2011 में आसानी से पूरा हो सकता था। सरकार की मंशा इस मामले में शुरू से ही टालमटोल वाली रही है। कभी वह जाति का आंकड़ा जुटाने में होने वाली दिक्कतों की बात करती है तो कभी बायोमैट्रिक पहचान संख्या देने के क्रम में अगले कई सालों में जाति के आंकड़े जुटाने की बात करती है।
आजादी मिलने से पहले, 1941 में देश में जाति की आखिरी बार गिनती तो हुई थी, लेकिन विश्वयुद्ध की वजह से आंकड़ों का संकलन नहीं किया जा सका था। 1931 की जनगणना के जातिवार आंकड़ों के आधार पर देश में अब भी नीतियां बनती हैं, योजनाओं के लिए पैसे दिए जाते हैं। आजादी मिलने के समय देश में यह भावना जरूर रही होगी कि आधुनिक भारत में जाति का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। इसलिए 1951 की जनगणना में जाति की गिनती नहीं हुई। लेकिन यह सपना हकीकत में तब्दील नहीं हो पाया। जाति को लेकर आंख मूंदने से जाति खत्म होने की जगह मजबूत ही हुई है। इसलिए अब इस बात की जरूरत है कि जाति की हकीकत को स्वीकार किया जाए। इससे संबंधित आंकड़े जुटाए जाएं और नीति निर्माण में उन आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाए। जाति को गिना जाए, ताकि जाति को खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें। आंख बंद करने से यह दुश्मन पीछा छोड़ने वाला नहीं है। इसकी आंखों में आंखें डालकर इसे चुनौती देनी होगी। तभी जातिमुक्त भारत का महान सपना साकार हो पाएगा। सरकार को अब यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए।