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27 जून 2011

जनता ये बात बहुत ही अच्छी तरह से समझ चुकी है

पर राहुल से है उम्मीद
क्योकि उनमे सच्चाई की झलक दिखती है
अब जनता ये बात बहुत ही अच्छी तरह से समझ चुकी है कि सर्प सिर्फ़ अलग अलग रंगों की केंचुली धारण किए रहता है किंतु भीतर से तो वो सर्प ही रहता है और सांप के चरित्र के अनुरूप ही व्यवहार करता है । इसलिए उन्हें काबू में लाने के लिए अब कुछ कुशल सपेरों ने बागडोर थाम ली है । न सिर्फ़ थाम ली है बल्कि अब उन्होंने अपने अपने फ़ंदों में सत्ता और सरकार को फ़ंसाना भी शुरू कर दिया है । 
जनता तो पहले से ही परिवर्तन की बाट जोह रही थी , उसे तो ये मौका मानो मुंह मांगी मुराद की तरह मिल गया है । आज आम आदमी को इससे कोई फ़र्क नहीं पड रहा है कि वो जिनके पीछे चल कर सरकार के सामने सीना तानने जा रहा है , उसकी अपनी क्या व्याख्या है , वो तो बस उस जनाक्रोश का एक हिस्सा बन जाने को आतुर है ताकि कल को कोई ये न कहे कि जब क्रांति बुनी जा रही थी तो तुमने भी देखा तो था न यकीनन । सिविल सोसायटी , योग गुरू , स्वनिर्मित जनसगठनो का चेहरा लिए हुए आम जनता ने सरकार और सत्ता के सामने उन प्रश्नों को न सिर्फ़ रखना शुरू किया जिनका उत्तर वे बरसों से चाह रही थीं । पहले सूचना के अधिकार के लिए कानून की लडाई में मिली जीत और उससे आए बदलाव ने इस लडाई में एक उत्प्रेरक का काम किया । इसके बाद जनलोकपाल बिल के लिए टीम अन्ना द्वारा छेडा गया आंदोलन जल्दी ही पूरे देश भर का समर बन गया । इसके साथ ही योग गुरू रामदेव ने भी एक मुद्दा विदेशों मे काले धन की वापसी के लिए कठोर कानून बनाए जाने की मांग को लेकर एक नया आंदोलन छेड दिया । सबसे अहम बात जो सामने निकल कर आई वो ये कि इन और इन जैसे तमाम प्रयासों के साथ जिस तरह का सलूक सरकार और उसके मंत्रियों ने किया या अब भी कर रहे हैं और उससे भी बडी बात कि जिस तरह का घोर उपेक्षित रवैय्या , प्रधानमंत्री , यूपीए अध्यक्षा , और तेज़ तर्रार महासचिव और युवा लोगों में खासे लोकप्रिय माने जाने वाले युवा नेता ने अपना रखा है उससे तो स्थिति और स्पष्ट हो गई है आम जनता के सामने

यह युद्घ पूँजीवाद के ख़िलाफ़ है....


''......हम यह कहना चाहते है की युद्घ छिडा हुआ है और यह युद्घ तब तक चलता रहेगा ,जब तक की शक्तिशालीव्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगेचाहे ऐसे व्यक्तिअंग्रेज पूंजीपति,अंग्रेज शासक या सर्वथा भारतीय ही हो उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर राखी है । यदि शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा तब इस स्तिथि में कोई अन्तर नही पड़ता । यदि आप की सरकार कुछ नेताओं या भारतीय समाज के कुछ मुखियों पर प्रभाव ज़माने में सफल हो जायें ,कुछ सुविधाएं मिल जायें या समझौता हो जायें ,उससे स्तिथि नही बदल सकती। जनता पर इन सब बातो का प्रभाव बहुत कम पड़ता है ।
इस बात की भी हमे चिंता नही है कि एक बार फिर युवको को धोखा दिया गया है और इस बात का भी भय नही है कि हमारे राजनितिक नेता पथभ्रष्ट हो गए है और वे समझौते कि बात चीत में इन निरपराध ,बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गए है जिन्हें क्रन्तिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है। हमारे राजनीतिक नेता उन्हें अपना शत्रु समझते है ,क्योंकि उनके विचार से वे हिंसा में विश्वाश रखते है । उन्होंने बलिवेदी पर अपने पतियों को भेट किया,उन्होंने अपने आप को न्योछावर कर दिया ,परन्तु आप कि सरकार उन्हें विद्रोही समझतीं है । आपके एजेंट भले ही झूठी कहानिया गढ़कर उन्हें बदनाम कर दे और पार्टी की ख्याति को हानि पहुचने का प्रयास करें किंतु यह युद्घ चलता रहेगा। हो सकता है कि यह युद्घ भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण करे । कभी यह युद्घ प्रकट रूप धारण कर ले, कभी गुप्त दिशा में चलता रहे ,कभी भयानक रूप धारण कर ले ,कभी किसान के स्तर पर जारी रहे और कभी यह युद्घ इतना भयानक हो जाए कि जीवन और मरण कि बाजी लग जाए। चाहे कोई भी परिस्तिथि हो,इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा।

देश क्यों बटा?

विचार करने का विषय है कि जो देश हजारों वर्षों तक एक रहा, वह क्यों बटा? इस
प्रशन के विशलेषण करने पर इसे पुन: अखंड किया जा सकता है, इसका मार्ग निकल सकता है.
विशलेषण कि इस प्रक्रिया में एक पुरानी घटना का स्मरण करना अतिआवश्यक है.
१९११ में धर्म के आधार पर हुए बंगाल के विभाजन को अंग्रेजों को समाप्त करना पड़ा. इस
ऐतिहासिक घटनाक्रम के निहितार्थ आज कि परिस्थिति में विचारणीय और दिशादर्शक है,
क्योकि प्रत्येक चिन्तनशील व्यक्ति के मन में यह प्रशन कौंधता रहता है कि जिस देश
कि जनता ने १९०५ में धर्म के आधार पर एक प्रान्त के विभाजन को स्वीकार नहीं किया और
१९११ में वह विभाजन समाप्त करवाया, उस देश के नेताओं ने मात्र ३६ वर्षों के बाद
१९४७ में धर्म के आधार पर देश का विभाजन क्यों स्वीकार किया?
भाषा के प्रति भक्ति मनुष्य का सहज स्वभाव है. मातृभूमि के प्रति भक्तिभाव
प्रेरणा का स्रोत है. इसी भाव के कारन बंकिम चंद चटोपाध्याय ने आनंद मठ में स्वयं
ही 'दुर्गा दशप्रहरण धारिणी, कमला कमल दल विहारिणी, वाणी विद्यादायनी' कहते हुए
मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती के रूप में देखा तो श्री अरविन्द ने अखंड
भारत को अपना आराध्य माना. श्री अरविन्द के पांडिचेरी आश्रम में अखंड भारत का नक्शा
आज भी विधमान है. अखंड भारत का खंडित होना एक दु:स्वप्न के सामान था, क्योंकि
प्रकृति और परमात्मा ने हिमालय और सागर से आवेषटित इस भ-भाग को अखंड ही बनाया है.
अत: इसे तोड़ने का प्रयत्न करते समय अनेक विदेशियों ने भी इसका विरोध किया था. लार्ड
वेवेल ने कहा "गाड हैज क्रियेटेड दिस कंट्री एज वन, यू कुड नाट डीवाइड इट इनटू टू."
ब्रिटिश संसद में बहस करते हुए क्लीमेंट एटली ने कहा "दिस इज ए डीवाइनली डीजाइन्ड
ट्रेगल." अत: भारत का विभाजन एक कृत्रिम विभाजन है. जिसे श्री अरविन्द के शब्दों
में, 'किसी भी प्रकार से समाप्त करना चहिये.'

बनाओ अखंड  भारती .....!

करुण  कहानी विभाजन की, हे वीरों तुम्हे  पुकारती जाग उठो अब - जाग उठो अब, बनाओ अखंड भारती ,
चीख रही थी तब मानवता, पर चिंघाड़  रही  थी  दानवी ,
खून से लथपथ  वे मंजर,कंप-कप़ी आज भी छुडाते हैं ,
स्वतन्त्रता की वेदी  पर,  तब नरमूंडों से हुई थी  आरती!!
-----१-----

पंजाब बटा,बंगाल बटा  , सिंध गया, बलूच गया,
भारत माँ  को काट दिया, बेदर्दी से हत्यारों ने,
रावी की शपथ मौन  थी, अखंडता का वचन गोण   था,
सोच समझ का समय नहीं  , भागो-भागो मची देश  में,
-----२-----
 गैर रहे न बचें , इस शैतानीं  में , पाक में नपाक हेवानीं  थी ,
घरों पर हमले हुए, जिन्दा जलाये , क़त्ल हुए ,
भूखे - प्यासे राहों में भटके, खूब थके और खूब मरे ,
व्यवस्थित कोई बात न थी, अदला - बदली की सोगात न थी,
न राह दिखानेवाला, न कोई बचानेवाला,
गुंडों की गुंडागर्दी ही तब राज बनीं थी, ताज बनीं थी ,
-----३-----

माता बहिनों की मत पूछो, क्या - क्या उन पर जुल्म हुए,
लाज  गई, वेलाज  हुईं, तार तार शर्मसार हुईं ,
 कितनीं थीं वे जो आ पाईं , कितनीं थी वे जो नहीं आ पाईं ,
किसीने भी नहीं उनकी सूधली  , एक तरफ़ा व्यभिचार के मद में ,
हर साँस और सिसकी को ,उस समय चक्र ने घेरा था  ,
बेबस  चीखें, आज भी गूंजती हैं, नीरव श्मसानों  में ,
----------
दर्द था पर राहत नहीं थी, घाव था पर पट्टी नही थी ,
राह थी पर अंत नही था, पथ पर चलते जाना था... ,
कब भारतमाँ का आँचल मिले, हर  सांस इसी में विकल थी ,
कुछ आये,कुछ राह में रह गए,कुछ को चलने दिया नहीं,
वे दृश्य  वे मंजर , वे चीत्कारें , फिरसे दुनिया में न आयें ,
बार बार मानवता यह पुकारती ,
-----५-----
यह भीषण कथानक है , जो सुनाने में नहीं आता है ,
गाँव - गावं ख़तम हुए थे, शहर - शहर वीरान हुए थे ,
सोना चांदी रुपया पैसा, जमीन और जायदादें....,
लूट  सकता था वह सब लूट लिया शैतानों नें  ,
खून से लिखी इबारतें वे , छलकी आखें पढ़ नही पाती हैं ,
-----६-----
कहीं दया का दरिया नही था, ममता कहीं  मिलती नहीं थी ,
सब को अपना माने  ..., वह आंचल वह गिरेवान नहीं थे ,
 एक भारत भूमि  जिसने,सब को सदियों से अपना माना ,
अपना दामन  दिया सभी को , अपनीं गोदी  दी सबको ,
सबको अपनापन दिया , सबको सुख शांती दी ,
पर उसके बेटों को दुत्कार क्यूँ फटकार क्यूँ ...?
हर  मुल्क बने भारत जैसा , यही विश्व  भारती पुकारती |
-----७-----

न फूल चढ़े और न दीप जले, न उनकी कोई कहानीं है,
हे अनाम शहीदों, तुमने खूब लड़ी लडाई  और दी कुर्बानी है ,
नत मस्तक है माँ भारती , गर्व करती माँ भारती ,
नाज तुम पर सदा रहेगा,  तुम हो नव युग कि आरती ,
माफ़ करो हे वीरों , खण्डित हे माँ भारती ..!!
देश आजाद हुआ है लेकिन, अखंडता  लानी है बाक़ी ....  |
-----८-----
फिर कोई राणा प्रताप बनों , या बनों वीर शिवाजी ,
सुभाष , भगत सिंह , चंदशेखर , माता तुमें बुलाती ,
षड्यंत्रों नें हमको मारा , कमजोरी से देश है  हारा ,
आपसी फूट मिटाना होगा, दिल में जनून जगाना होगा ,
बंद  मुट्ठी करके लें द्रढ़ संकल्प, राह बनायेंगे , चाह  बनायेंगे ,
विभाजन को  ख़त्म करेंगे, अखंड भारत फिर बनायेंगे ..!
   -----९----- 

my hunk

Ano-Digital.
muscle look.












हर आदमी का सपना

यही है  हर आदमी का सपना
7 अंकों में तनख़्वाह[ वेतन ]
6 अंकों में बचत
5 बेडरूम का घर
4 पहियों की गाड़ी
3 हफ्ते की छुट्टियाँ
2 प्यारे बच्चे
और ……


1 गूंगी बीवी !

26 जून 2011

भारत, इंडिया या फिर हिंदुस्तान

भारत, इंडिया या फिर हिंदुस्तान, गृह मंत्रालय को नहीं मालूम क्या है हमारे देश का नाम

हमारे देश का नाम क्या है, भारत, इंडिया या फिर हिंदुस्तान। देश के गृह मंत्रालय को भी इसकी जानकारी नहीं है कि आखिर हमारे देश का वास्तविक नाम क्या है। गृह मंत्रालय ने इस बात को एक सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देते हुए स्वयं माना है। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि भारतीय संविधान में किसी राष्ट्रभाषा की कोई जानकारी नहीं है, जबकि संविधान में साफतौर पर लिखा है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है।
आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन रॉय ने गृह मंत्रालय में एक आवेदन देकर, गृह मंत्रालय से इसे स्पष्ट करने को कहा था। लेकिन मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा है कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है।  अंग्रेजी में इसे इंडिया, हिंदी में भारत और उर्दू में हिंदुस्तान कहा जाता है। रॉय ने बताया कि हमारे देश को कई नाम दिए गए हैं लेकिन अधिकृत नाम क्या है, यह जानने के लिए उन्होंने गृह मंत्रालय के पास आरटीआई फाइल की। लेकिन गृह मंत्रालय के जवाब से उन्हें झटका लगा है और अब वे इसे लेकर अदालत जाने का सोच रहे हैं। यदि एक सामान्य नागरिक भी नाम बदलता है तो उसे कानून प्रक्रिया पूरी करना होती है, लेकिन हमारे देश के नाम पर ही असमंजस है और यदि गृह मंत्रालय को भी इसकी जानकारी नहीं है, तो फिर यह गंभीर चिंता का विषय है। इसी आरटीआई में रॉय ने यह जानकारी भी मांगी थी कि हमारे देश की राष्ट्र भाषा क्या है और इसके जवाब में गृह मंत्रालय ने बताया कि संविधान में किसी राष्ट्रभाषा का कोई उल्लेख नहीं है। भारतीय संविधान के आर्टिकल 343 में साफ लिखा है कि हिंदी हमारे देश की राष्ट्रीय भाषा है। संविधान में 14 भाषाओं को मान्यता दी गई थी और बाद में इसमें कुछ और भाषा जोड़ी गईं। अब संविधान में कुल 22 भाषाओं का मान्यता प्राप्त भाषाओं के रूप में उल्लेख है। 

भारत में बनता हुआ इंडिया

भारत में बनता हुआ इंडिया


केन्द्रीय लोक सेवा आयोग ने हाल ही में एक आदेश जारी कर अंग्रेज़ी का एक प्रश्नपत्र अनिवार्य किया है. आयोग का यह आदेश अवश्य भारत सरकार की सहमति से जारी हुआ होगा. आयोग के इस षडयंत्र के खिलाफ कहीं कोई सुगबुगाहट नज़र नहीं आ रही है, जबकि इसके दूरगामी परिणाम बहुत साफ समझ में आ रहे हैं. आयोग का यह आदेश षडयंत्रपूर्ण इसलिये लगता है क्योंकि इसका कोई औचित्य आयोग या भारत सरकार सिद्ध नहीं कर सकती.
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आज़ादी के बाद केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी था ओर इस कारण भारतीय प्रशासनिक सेवा के चयनित लोगों का आम चरित्र भी अंग्रेज़ी प्रशासन जैसा ही था जिसमें बातचीत से लेकर नीति निर्माण ओर क्रियान्वयन की प्रक्रिया में ब्रिटिश ढॉंचे के अनुसार महानगरों - उच्च वर्ग व श्रेष्ठि वर्ग के लोगो की बहुतायत थी. राष्ट्रीय भाषा के बोलने वाले अपने ही राष्ट्र में प्रशासनिक सेवाओं से बाहर धकल दिये गये थे. देश की प्रादेशिक और क्षेत्रीय भाषाओं के उन्ही लोगों को प्रशासनिक सेवाओं में स्थान मिल पा रहे थे जो अंग्रेज़ी परस्त हो चुके थे. जन्म से अंग्रेज़ी बोलने बोलने वाले अफसरशाहों की संतानें, राजा महाराजा जो आमतौर पर आज़ादी के आंदोलन के खिलाफ थे और अंग्रेज परस्त थे के परिजन तथा कुछ ऐसे परिवारों के लोग जिनकी आर्थिक क्षमता ब्रिटेन या बिदेशों में पढ़ने के लिये समर्थ थी, के ही सदस्य पहुंच पाते थे.

भारतीय प्रशासनिक सेवायें केवल उस इंडिया की प्रतिनिधि प्रवक्ता थी, जिनमें भारत के गांव और गरीब का कोई हिस्सा न था और न ही कोई भूमिका थी. परन्तु पिछले कुछ वर्षों में जब से केन्द्रीय लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में परीक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी या ऐच्छिक हुआ था तब से भारत की प्रशासनिक सेवाओं में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी और देश के गांव गरीब किसानों कर्मचारियों और यहां तक कि चाय बेचने वाले छोटे दुकानदारों के बेटों का चयन भी प्रशासनिक सेवाओं में होने लगा था.

विदेशी भाषा की कसौटी योग्यता के चयन के लिये सही मापदण्ड नहीं हो सकता और इसलिये जब अंग्रेज़ी की बाध्यता समाप्त हो गई तब हिन्दी भाषी ओर भारतीय भाषा के यथा मराठी, गुजराती, तेलगू, मलयाली, कन्न्ड़, उड़िया, पंजाबी बौर उर्दू भाषियों के ग्रामीण किसान और मजदूर परिवार के नवयुवकों को भी बड़े पदों पर जाने का अवसर मिलने लगा. पिछले कुछ वर्षों में देश के गरीबों, किसानों के बच्चों ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर अंग्रेज़ी भाषा की कसौटी की बाध्यता न हो तो योग्यता, भारत के राष्ट्रªभाषा और भारतीय भाषाओं के बोलने वाले गांव ओर कस्बों के नौजवानों के पास कहीं ज़्यादा है और इसी को रोकने के लिये भारत सरकार और आयोग में बैठे अंग्रेज़ी के मानसिक गुलामों ने यह षड़यंत्र किया है.

कहने को तो अंग्रेज़ी का अनिवार्य पर्चा केवल 40 अंकों का है परन्तु समूची चयन प्रक्रिया को यह प्रभावित करेगा. यह एक सुविदित तथ्य है कि 2 से 3 प्रतिशत अंको में ही सारे चयनित प्रत्याशी सिमट जाते हैं. प्रतिस्पर्धा इतनी भारी होती है कि दशमलव 1-2 के अंतर में ही अनेकों प्रत्याशी मेरिट लिस्ट में रहते हैं और जब अंग्रेज़ी के प्रश्न पत्र में सीधे 20-20 अंकों का फर्क होगा तब स्वाभाविक है कि राष्ट्रभाषा और असली भारत की योग्यता पीछे कर दी जायेगी.

अगर अंग्रेज़ी के विशेष ज्ञान की आवश्यकता किन्ही पदों के लिये आयोग महसूस करता था तो उन पदों के लिये चयनित विद्यार्थियों को एक दो माह का अंग्रेज़ी के शिक्षण का विशेष कार्यक्रम चलाया जा सकता था परन्तु उद्देश्य तो कुछ और ही है. फिर एक प्रश्न यह भी है कि अगर अंग्रेज़ी का प्रश्न पत्र अनिवार्य कर रहे हैं तो राष्ट्रभाषा हिन्दी का भी एक प्रश्न पत्र अनिवार्य क्यों नहीं किया? अगर विदेशों से संपर्क के लिये अंग्रेज़ी आयोग की नजरों में ज़रुरी है तो यह भी नहीं भूलना चाहिये कि जिस भारत में नौकरी करना है, जिस भारत के पैसों से बड़ी-बड़ी तनख्वाह और सुविधायें मिलनी है, उस भारत से संपर्क व संवाद के लिये हिन्दी उससे कम ज़रुरी नहीं है.

क्या आयोग के और भारत सरकार के यह गौरांगदास महाप्रभु इस बात का भी उत्तर देंगे कि दुनिया तो छोड़ो यूरोप के कितने देश अंग्रेज़ी के पक्षधर हैं? क्या जर्मनी, फ्रांस में कोई अंग्रेज़ी बोलता है? या यूरोप के इन देशों में अंग्रेज़ी बोलना पसंद भी किया जाता है? सच्चाई तो यह है कि यूरोप के अधिकांश देश अंग्रेज़ी बोलने वालों को नफरत की हद तक नापंसद करते हैं तथा उसे अपनी राष्ट्रीयता के विरूद्ध मानते है. अंग्रेज़ी विश्व भाषा नहीं है वरन् वह विश्व व्यापार संगठन, अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष याने दुनिया के आर्थिक साम्राज्यवाद की भाषा है.
दूसरा इस प्रश्न का उत्तर आयोग व सरकार को देना चाहिये कि अगर ब्रिटेन से संर्पक करने के लिये भारतीय नौजवानों को अंग्रेज़ी का विशिष्ट ज्ञान अपरिहार्य है तो क्या ब्रिटेन के नौजवानों के लिये भारत से संपर्क के लिये हिन्दी का विशिष्ट ज्ञान ज़रुरी नहीं है? तब क्या हिन्दी का प्रश्न पत्र ब्रिटिश प्रशासनिक सेवाओं में अनिवार्य नहीं होना चाहिये?

भाषा का संबंध अगर योग्यता से है तो मात्र यही है कि व्यक्ति अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा में अपनी योग्यता को ज़्यादा ठीक ढंग से व्यक्त व सिद्ध कर सकता है. विदेशी भाषा की कसौटी तो योग्य को अयोग्य व अयोग्य को योग्य बनाने का षड़यंत्र होती है.

राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल करने वाले प्रशासनिक अधिकारी अपने देशवासियों की समस्याओं को ज़्यादा बेहतर समझ सकते हैं. तथा उनसे ज़्यादा संवेदनशील होने की अपेक्षा हो सकती है. और प्रशासनिक संवेदनशीलता व सहभागिता के दायरों को ज़्यादा बढ़ा सकते हैं. आज विकास का ढांचा अंग्रेज़ी के ऊंचे पायदानों पर खड़ा होता है और व्यापक अर्थों में राष्ट्र नीचे जमीन पर बिछा रह जाता है. इसीलिये विकास के नाम पर महानगरों के टापू तो बन जाते हैं परन्तु गांव की गलियां उपेक्षित और खाई बनी रह जाती है.

अंग्रेज़ी भारत में साम्राज्यवादी गुलामों के भेदभाव व शोषण की भाषा भी है ओर साथ ही भ्रष्टाचार की भाषा भी. बहुत सारे सामान्य लोग इसलिये शोषित होने को बाध्य हैं कि कानून अंग्रेज़ी में बोलता है. अदालतें अंग्रेज़ी सुनती हैं और न्याय अंग्रेज़ी में होता है. शासन की नीतियां व दफ़्तरों कर पत्रावलियां अंग्रेज़ी में दौड़ती हैं. यह अंग्रेज़ी के भक्त सैकड़ों वर्षों से देश के सामान्य व्यक्तियों के लिये डरावने व लूटने वाले ही लगते हैं. जब तक राष्ट्रभाषा, राज्यभाषा, जनभाषा एक नहीं होती तब तक न तो देश का की योग्यता का सही परीक्षण हो सकता है और न ही सही अर्थो में विकास हो सकता है.

आज़ादी के आंदोलन में महात्मा गांधी ने और आज़ादी के बाद डॉ. राममनोहर लोहिया ने अंग्रेज़ी हटाओ और भारतीय भाषायें लाओ का नारा दिया था. आज़ादी के तत्काल बाद गांधी ने एक संवाददाता को संदेश देते हुए कहा था कि “दुनिया को बता दो, गांधी अंग्रेज़ी भूल गया है.’’ इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि अगर मेरा बस चले तो एक क्षण में अंग्रेज़ी को हटाकर हिन्दी को लागू कर दूं. आज़ादी के बाद डॉ. लोहिया ने अंग्रेज़ी व अंग्रेज़ी मानसिकता को हटाने का जो आंदोलन चलाया था कि उसी का यह परिणाम हुआ कि केन्द्रीय लोकसेवा आयोग में अंग्रेज़ी परीक्षा की अनिर्वायता समाप्त हुई. प्रो.डी.एस. कोठारी को याद करना चाहिये, जिन्होंने अपनी रपट में केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेज़ी को समाप्त करने की सिफारिश की थी.

आज समूचा देश भ्रष्टाचार से पीड़ित और परेशान है और अक्सर अब लोग कहने लगे हैं कि नख से शिख तक याने नीचे से उपर तक भ्रष्टाचार फैल गया है. लोग यह भी कहते हैं कि भ्रष्टाचार का दीमक समूचे राष्ट्रीय जीवन को नष्ट कर रहा है. निःसंदेह इसमें सच्चाई है पर इस सच्चाई के साथ-साथ इसको भी स्वीकारना होगा कि अंग्रेज़ी का भ्रष्टाचार लाखों करोड़ों का है और विदेशी बैंकों में जमा अरबों रुपया काले धन की अर्थव्यवस्था का जनक है. हिन्दी व भारतीय भाषाओं का भ्रष्टाचार पटवारी सिपाही आदि का 100-500 वाला ही है. याने बड़ा भ्रष्टाचार अंग्रेज़ी वाला है. अंग्रेज़ी शैली और अंग्रेज़ी सभ्यता और अंग्रेज़ी के संपर्क आज काले धन की अर्थव्यवस्था की जनक, प्रसारक व संरक्षक और सबसे बड़े उपयोगकर्ता हैं.
क्या यह सत्य नहीं हैं कि अंग्रेज़ी की कोख से जन्मे यह देशी अंग्रेज आधे समय विदेशों में ही रहते हैं. उनके बच्चे विदेशों में पढ़तें हैं तथा अगर लूटने के लिये ज़रुरी ना हो तो ये विदेशों में ही बसना चाहते हैं. यह संबंध केवल भाषा का नहीं वरन् भारत के उपर इंडिया व विदेशी सभ्यता की गुलामी का है. सही अर्थों में यह साम्राज्यवादी मानसिकता से मुक्ति संघर्ष है. हमें केन्द्रीय लोकसेवा आयोग व भारत सरकार को बाध्य करना होगा कि अंग्रेज़ी के अनिवार्य किये गये प्रश्न पत्र को वापिस लें वरना भारत पर इंडिया का राज कायम रहेगा. भारत के बच्चे पटवारी बनेंगे. इंडिया के बच्चे अफसरशाह बनेंगे. भारत के बच्चे उन नीतियों के शिकार होंगे, जो उन्हें ना जिन्दा रहने देगी और न मरने देगी. उनके भीख के कटोरे में राहत के नाम पर कुछ दाने डाल दिये जायेंगे. नीतियों का निर्धारण इंडिया ही करेगा, जो सम्पन्नता के सागर में हिलोरें लेता रहेगा. समता जो अभी दूर का सपना है, शायद सपना भी नहीं रहेगा.

25 जून 2011

महंगाई

मुझ से हर लिहाज से बड़े हैं आमिर खान : अमिताभ बच्चन

बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन जब भी कुछ बोलते हैं तो उसमें वजन होता है। इस बार भी उनके मुंह से जो वाणी निकली है उसे सुनकर उनके बड़प्पन का एहसास होता है, शायद ये ही सोच रहे होंगे बॉलीवुड के सबसे समझदार एक्टर आमिर खान। जिनकी फिल्म देल्ही बेली और अमिताभ बच्चन की फिल्म बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप 1 जूलाई को यानी एक ही दिन प्रदर्शित हो रही है।
जहां आमिर की फिल्म एक हॉट सेक्स कॉमेडी है, युवाओं पर आधारित है तो वहीं अमिताभ की बुड्ढ़ा...एक पूरी मनोरंजक फिल्म है जिसमें खुद वो रंगीले रसिया बने हुए नजर आ रहे है। एक एक्टिंग का किंग है तो एक मार्केट में चीजें किस तरह बेची जाती है उस चीज का बादशाह इसलिए अमिताभ-आमिर के बीच में तुलना शुरू हो गई है। जिसका खंडन खुद अमिताभ ने किया है।
बिग बी ने ब्लॉग पर लिखा है कि उनका और आमिर का कोई मुकाबला नहीं है। दोनों की फिल्में भले ही एक दिन प्रदर्शित हो रही हो लेकिन दोनों में ही कोई समानता नहीं है। आमिर खान मुझसे हर लिहाज में काफी आगे है। उनकी और उनकी प्रोडक्शन कंपनी हमारी और हमारी प्रोडक्शन कंपनी से काफी बड़ी है, उन्हें मार्केट के बारे में काफी कुछ पता है जो मुझे नहीं आता । हमारी छोटी सी कंपनी है जिसने एक छोटे बजट की फिल्म बनाई है उम्मीद करता हूं कि लोग पसंद करेगें। लेकिन प्लीज मेरी और आमिर की फिल्म की तुलना बंद कर दीजिये।
खैर अमिताभ की इस बात सुनकर आमिर खान भी मंद-मंद मुस्कुरा रहे होगें। क्योंकि उनकी तारीफ जो बिग बी ने कर दी है। खैर दोनों की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर क्या गुल खिलायेगी ये तो आने वाले दिनों में पता चल जायेगा। लेकिन इतना आपको बता दें दोनों ही फिल्मों के प्रोमोस ने इस समय टीवी पर धमाल मचाया हुआ है।

22 जून 2011

अन्ना ने साधा केंद्र पर निशाना, शंकराचार्य ने उठाए आंदोलन पर सवाल


नई दिल्ली. अन्ना हजारे और सरकार के बीच लोकपाल बिल के मसौदे को लेकर जंग जारी है। बुधवार को केंद्र के खिलाफ अपने हमले तेज करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमिटी के सदस्य अन्ना हजारे ने सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाए जाने की मांग की। अन्ना ने बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए गंभीर नहीं है। अन्ना ने कहा कि सरकार की तरफ से पेश लोकपाल बिल के मसौदे में आम आदमी के हितों को नजरअंदाज किया गया है।
अप्रैल में अनशन करके सरकार को ड्राफ्टिंग कमिटी में सिविल सोसाइटी को शामिल करने पर मजबूर करने वाले वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हजारे ने कहा कि देश में मौजूद भ्रष्टाचार पाकिस्तान से ज़्यादा बड़ा दुश्मन है। हजारे ने बुधवार को कहा कि सरकार लोगों को गुमराह कर रही है।
अन्ना ने केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के उस आरोप का खंडन किया है, जिसमें कहा गया है कि वे एक समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं। अन्ना ने कहा कि हम एक मजबूत लोकपाल चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि लोकपाल सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की तरह स्वायत्त हो।
गौरतलब है कि अन्ना हजारे पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि वे १६ अगस्त से अनशन करेंगे। इससे पहले ३० जुलाई से राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ेंगे। वे कह चुके हैं कि एक मजबूत लोकपाल के बनने तक वह चैन से नहीं बैठेंगे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद सामाजिक कार्यकर्ता और लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी के सदस्य अरविंद केजरीवाल और पूर्व आईपीएस अफसर किरण बेदी ने भी सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि सरकार ने अब आम आदमी के हितों पर ध्यान देना बंद कर दिया है। बेदी ने कहा कि सरकारी मसौदे में गरीब आदमी के लिए कुछ भी नहीं है।
गौरतलब है कि मंगलवार को ड्राफ्टिंग कमिटी में शामिल सिविल सोसाइटी के सदस्यों और केंद्र सरकार के नुमाइंदों ने एक-दूसरे को अपना-अपना ड्राफ्ट सौंपा था। मंगलवार को ड्राफ्टिंग कमिटी की नौवीं और आखिरी बैठक के बावजूद दोनों पक्षों में कई अहम मसलों पर मतभेद कायम थे।
अब शंकराचार्य ने अन्ना के आंदोलन पर उठाए सवाल
मेरठ में मीडिया से मुखातिब होते हुए शंकराचार्य स्वरूपानंद ने अन्ना हजारे के आंदोलन पर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने अन्ना के आंदोलन को मीडिया द्वारा प्रायोजित बताया। उन्होंने कहा, अन्ना का अभियान मीडिया प्रायोजित है और एसएमएस और विज्ञापन के इस्तेमाल से दोनों की साझेदारी हो चुकी है।
आपकी राय
क्‍या सरकार लोकपाल के मुद्दे पर घिरती नज़र आ रही है? क्या अन्ना हजारे की टीम का सशक्त लोकपाल का सपना पूरा होगा? क्या सरकार के लिए अन्ना की मांगें दबाना आसान होगा? क्या सरकार को इस मुद्दे पर उभरती जनभावना को देखते हुए अन्ना हजारे की मांगें मान लेनी चाहिए? क्या अन्ना की कुछ मांगें संवैधानिक संकट पैदा कर सकती हैं? इन मुद्दों पर अपनी राय संतुलित शब्दों में जाहिर करें। आप अपनी टिप्पणी के लिए जिम्मेदार होंगे। 
भारत के सबसे बुजुर्ग योग गुरु का रामदेव पर योग को बेच कर भ्रष्‍ट करने का आरोप

जहां प्रिंसिपल थे, वहीं भीख मांगते मिले



रांची। जिस मैक्लुस्कीगंज के लिए डीआर कैमरून ने पत्नी व बच्चों को त्याग दिया था, आज वही उनसे दूर हो गया है। मैक्लुस्कीगंज की यह जानीमानी हस्ती कोलकाता के उसी स्कूल के सामने भीख मांगती मिली, जहां के कभी वे प्रिंसिपल थे। पूछने पर बस यही कहते हैं, ’आई एम नॉट फाइन हियर। मुझे यहां से ले चलो। मैं मैक्लुस्कीगंज में ही दफन होना चाहता हूं। आप मुझे वहां ले चलेंगे न..।’
मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया के रहने वाले कैमरून के बुरे दिन नब्बे के दशक के अंतिम वर्ष में शुरू हुए थे। बेरमो के पूंजीपति जगदीश पांडेय ने कैमरून से मैक्लुस्कीगंज के उनके गेस्ट हाउस ‘हाईलैंड’ और बंगले का सौदा किया था। सौदे के समय यह तय हुआ था कि जब तक कैमरून जिंदा रहेंगे, उन्हें गेस्ट हाउस का एक कमरा रहने के लिए निशुल्क दिया जाएगा। छह माह तो सब ठीक-ठाक रहा। इसके बाद उन्हें पीछे के एक बाथरूम में शिफ्ट कर दिया गया। वे बीमार हो गए। मई 2009 में जब यह बात ऑस्ट्रेलिया में उनके परिजनों को मिली, तो उन्होंने कैमरून को वहां बुला लिया।

कुछ दिन वहां रहने के बाद कैमरून का मन फिर मैक्लुस्कीगंज जाने के लिए बेताब होने लगा। फरवरी 2010 में वे मैक्लुस्कीगंज लौट आए। यहां उन्हें न ठौर मिला, न ठिकाना। वे इधर-उधर भटकने लगे। पैसे खत्म हुए तो मानसिक स्थिति भी गड़बड़ा गई। इसी क्रम में कोलकाता के खिदिरपुर पहुंच गए। यहां वे सेंट थॉमस स्कूल के आसपास भीख मांगने लगे। स्कूल की दाई रेहाना की नजर पर उन पर पड़ी, तो वह उन्हें पहचान गई। वह उन्हें अपने घर ले आई। इसके बाद उन्हें खिदिरपुर के ‘मेरी कुपर होम’ नामक वृद्धाश्रम में भर्ती करा दिया। इसकी जानकारी मिलने पर स्कूल की शिक्षिका श्रीमती घोष ने ऑस्ट्रेलिया में रह रहे परिजनों को कैमरून के बारे में बताया। सूचना पाकर उनका बेटा आया और वृद्धाश्रम का खर्च देने की बात कह कर लौट गया।

खदिरपुर वृद्धाश्रम में आसरा

दी ईस्ट इंडिया चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से चलने वाले इस वृद्धाश्रम के अधीक्षक लियो जार्डन हैं। इनकी पत्नी थ्रेडा जार्डन हैं। दोनों मिल कर इनकी सेवा करते हैं।

सत्तर के दशक में सिंबल थे

सत्तर के दशक में एक समय था, जब कैमरून मैक्लुस्कीगंज के सिंबल थे। यहां आने वाले पर्यटक और स्थानीय लोग उन्हें अंकल पुकारते थे। पर्यटक उनसे बिना मिले नहीं जाते थे।

मैक्लुस्कीगंज में बसती है जान

पेशे से शिक्षक कैमरून एंग्लोइंडियन हैं। उन्होंने देश-विदेश के कई नामी गिरामी स्कूलों में पढ़ाया। वे जहां भी रहे, लेकिन उनकी जान मैक्लुस्कीगंज में ही बसती थी। यही कारण है कि वे स्थाई रूप से यहीं बस गए। फैसले से नाराज उनकी पत्नी एंजेला आस्ट्रेलिया लौट गईं। कैमरून के तीन बेटे मार्क, जॉन और शेंड्रिक्स और एक बेटी मारिया है। सभी मैक्लुस्कीगंज छोड़ कर चले गए।

क्या भारत वास्तव में आजाद है.

 22 जून 1948 को भारत के दुसरे गवर्नर के रूप में चक्रवर्ती राजगोपालचारी ने निम्न
शपथ ली l
"मैं चक्रवर्ती राजगोपालचारी यथाविधि यह शपथ लेता हूँ की मैं सम्राट जार्ज षष्ठ
और उनके वंशधर और उत्तराधिकारी के प्रति कानून के मुताबिक विश्वास के साथ वफादारी
निभाऊंगा, एवं
मैं चक्रवर्ती राजगोपालचारी यह शपथ लेता हूँ की मैं गवर्नर जनरल के पद पर होते
हुए सम्राट जार्ज षष्ठ और उनके वंशधर और उत्तराधिकारी की यथावत सव्वा करूँगा  "
क्या भारत वास्तव में आजाद है.

भयंकर भूलें

--  भयंकर भूलें ....        
           महाराजा रणजीत सिंह के कालखंड में कश्मीर  के मुसलमानों ने अनुरोध किया कि 
                              वे अपने पूर्वजों के हिन्दू धर्म में लौटना चाहते हैं.महाराजा ने इसे स्वीकार भी कर लिया. जिस दिन मुसलमानों कि सामूहिक शुद्धी कि जनि थी, कुछ संकीरण विचारों के पंडित महाराजा के पास ए और कहा कि शुद्धी हुई तो वे सब आत्महत्या कर लेंगे तथा महाराजा को ब्रम्हहत्या का पाप लगेगा. महाराजा इस धमकी के आगे झुक गए और कश्मीर घाटी के मुस्लिम समाज को राष्ट्रियधारा में लाने का स्वर्णिम अवसर चला गया.  * देश के विभाजन के समय जिन्ना कश्मीर को भारत में मिलाना चाहता था. महाराजा हरी सिंह ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया तो कबाइलियों के वेश में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया. २६.१०.१९४७ को महाराजा ने कश्मीर का भारत में विलय करने का पत्र लिख दिया, तो भारतीय सेना अपने इस अंग के बच्व में उतरी. पाकिस्तानियों के छक्के छुडाते हुए हमारे सभी जवानों ने आक्रान्ताओं को पीछे धकेलना शुरू कर दिया, तभी ०१.०१.१९४८ को तात्कालिक प्रधानमंतरी पंडित जवाहर लाल नेहरू इस मामले को यु.एन.ओ. में ले गए. यह दूसरी भयंकर भूल थी, जिसके कारण आज कश्मीर एक नासूर बन गया है. सुरक्षा परिषद् ने भारतीय सेना के बढते कदम रोक दिए और कश्मीरियों को यह निर्णय करने (जनमत संग्रह) का अधिकार दे दिया, कि वे भारत में रहे या पाकिस्तान में रहें. 

                             कश्मीर का पुराना इतिहास 

* महर्षि कश्यप ने बसाया और उनके पुत्र नील कश्मीर
के पहले राजा थे.
* त्रेता युग में भगवन श्रीराम के पुत्र लव का शासन.
*
द्वापर में भगवन श्रीकृष्ण ने महारानी यशोमती का राज्याभिषेक किया.
* सम्राट
अशोक ने श्रीनगर बसाया और उनके पुत्र जालौक कश्मीर के शासक रहे.
* नागवंशी
नरेशों ने कुषाण राजा कनिष्क को निष्कासित किया.
* सम्राट समुन्द्र्गुप्त ने
मिहिरकुल को पराजित किया.
* ललितादित्य मुक्तपीड सबसे प्रतापी सम्राट बने.
*
अवन्तिवर्मन के शासन कल में कश्मीर समर्धि के शिखर पर.
* कश्मीर नरेश चन्द्रपीड
ने अरब हमलावरों को खदेड़ा.
* १४ वीं शताब्दी में मुस्लिम सुल्तानों का
अधिकार.
* महाराजा रणजीत सिंह ने विदेशियों को मर भगाया.
* सन १८४६ में डोगरा
वीर गोलब सिंह जम्मू कश्मीर के महाराजा बने. 

कैसे बताऊँ

मुझे तुम से मोहब्बत है, तुम्हे कैसे बताऊँ मैं
अकीदत है मुझे तुम से, यकीन कैसे दिलाऊं मैं
 

यह यक-तरफा मोहब्बत है,
फ़साना इस को कहते हैं

कहानी इस मोहब्बत की तुम्हे कैसे सुनाऊं मैं
किसी को "टूट कर चाहो" 
मोहब्बत हो ही जाएगी
किसी को टूट कर चाहना तुम्हे केसे सिखाऊं मैं.

ओशो प्रभात

यदि आप दुखी हैं, यदि आपको बोध होता है कि दुख है, तो उस दुख को झेलते मत चले जाइए, उस दुख को सहते मत चले जाइए। उस दुख के विरोध में खड़े होइए और उस दुख को विसर्जित करने का उपाय करिए।
साधारण मनुष्य दुख को पाकर जो काम करता है वह, और साधक जो काम करता है वह, दोनों में बहुत थोड़ा-सा भेद है। जब साधारण व्यक्ति के सामने दुख खड़ा होता है, तो वह दुख को भुलाने का उपाय करता है। और जब साधक के सामने दुख खड़ा होता है, तो वह दुख को मिटाने का उपाय करता है।
दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं। एक वे लोग, जो दुख को भुलाने का उपाय कर रहे हैं। और एक वे लोग, जो दुख को मिटाने का उपाय कर रहे हैं। परमात्मा करे, आप पहली पंक्ति में न रहें और दूसरी पंक्ति में आ जाएं।
दुख को भुलाने का उपाय एक तरह की मूर्च्छा है। आप चौबीस घंटे दुख को भुलाने का उपाय कर रहे हैं। आप लोगों से बातें कर रहे हैं, या संगीत सुन रहे हैं, या शराब पी रहे हैं, या ताश खेल रहे हैं, या जुए में लगे हुए हैं, या किसी और उपद्रव में लगे हुए हैं, जहां कि अपने को भूल जाएं, ताकि आपको स्मरण न आए कि भीतर बहुत दुख है।
हम चौबीस घंटे अपने को भुलाने के उपाय में लगे हुए हैं। हम नहीं चाहते कि दुख दिखाई पड़े। अगर हमें दुख दिखाई पड़ेगा, तो हम घबरा जाएंगे। तो हम दुख को भुलाने के और विलीन करने के उपाय में लगे हुए हैं। दुख भुलाने से मिटता नहीं है। दुख भुलाने से मिटता नहीं है, कोई घाव छिपा लेने से मिटता नहीं है। और अच्छे कपड़ों से ढांक लेने से कोई अंतर नहीं पड़ता है, वरन अच्छे कपड़ों से ढांक लेने से और घातक और विषाक्त हो जाता है।
तो घावों को छिपाएं न। उन्हें उघाड़ लें और अपने दुख का साक्षात करें। और उसे भुलाएं मत, उसे उघाड़ें और जानें और उसे मिटाने के उपाय में संलग्न हों। वे ही लोग जीवन के रहस्य को जान पाएंगे, जो दुख को मिटाने में लगते हैं, दुख को भुलाने में नहीं।
और मैंने कहा, दो ही तरह के लोग हैं। उन लोगों को मैं धार्मिक कहता हूं, जो दुख को मिटाने का उपाय खोज रहे हैं। और उन लोगों को अधार्मिक कहता हूं, जो दुख को भुलाने का उपाय खोज रहे हैं। आप स्मरण करें कि आप क्या कर रहे हैं? दुख को भुलाने का उपाय खोज रहे हैं? क्या आप सोचते हैं, अगर आपके सारे उपाय छीन लिए जाएं, तो आप बहुत दुखी नहीं हो जाएंगे?

 

love & wine

शराब का नशा विनाश की ओर ले जाता है.
पैसे का नशा अंहकार की ओर ले जाता है.
जीवन का नशा मृत्यु की ओर ले जाता है.
ज्ञान का नशा सम्मान की ओर ले जाता है.
लेकिन प्रेम का नशा परमात्मा की ओर ले जाता है.
 
रचनाकार: अख़्तर अंसारी
साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं

एक तस्वीर-ए-मुहब्बत है जवानी गोया
जिस में रंगो की इवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं
इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें
इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं

आस्माँ से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी
अब ये हालात हैं कि हम हँसते हुए डरते हैं
शेर कहते हो बहुत ख़ूब तुम "अख्तर" लेकिन
अच्छे शायर ये सुना है कि जवाँ मरते हैं
 
एक कविताः बेटियां ( रचनाकार: डॉ . अमिता नीरव )
photo
ना जाने कहां से आ जाती हैं ये 
कुछ ना हो फिर भी खिलखिलाती हैं बेटियां ना प्यार की गर्मी और ना चाहत की शीतलता 
फिर भी जीती जाती हैं बेटियां अभावों और दबावों के बीच भी 
दिन के दोगुने वेग से बढ़ती जाती है बेटियां भीड़ भरे मेले में हाथ छूट जाए 
फिर भी किसी तरह घर पहुंच जाती हैं बेटियां खुद को जलाकर भी 
घरों को रोशन करती जाती हैं बेटियां सीमाओं के आरपार खुद को फैलाकर 
पुल बन जाती हैं बेटियां शायद इसकी सजा पाते हुए 
कोख में ही मारी जाती हैं बेटियां ... ।

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समय का खेल है यारों समय के साथ जाना है.
जहाँ से सिखना है कुछ जहाँ को कुछ सिखाना है.

भले ही राह में दुःख हो उसे सहते ही जाना है
क्षितिज की चाह की है तो क्षितिज के पार जाना है.

नहीं कोई सफाई है, नहीं कोई बहाना है.
किया हमने जो वादा है, वही वादा निभाना है.

यही चाहत रहे अपनी, इसे हमको निभाना है.
नहीं जो कर सका कोई, उसे करके दिखाना है.

समय का खेल है यारों समय के साथ जाना है.
जहाँ से सिखना है कुछ जहाँ को कुछ सिखाना है.
 

फ़ॉर्मूला

 
ऐसा है पहले आप ऑरकुट न्यू वर्जन खोलो फिर वहा दाहिने तरफ जहा दोस्तों के नाम दिखाते है वहा जाओ वह आपको मैनेज लिखा होगा वहा आप क्लिक करो वह कोने में लिखा होगा एड फ्रेंड वह क्लिक करो जितने भी फ्रेंड के फोटो दिख रहे है वह क्लिक करो फिर सेव पर क्लिक करो फिर आप होम पे जाओ वह आपको मिलेगा अपडेट्स फ्राम वह क्लिक करो जिस नाम से अपने ग्रुप बनाया होगा वो नाम दिखाई देगा उसे सेलेक्ट करो फिर उसके बाद पोस्ट के ऊपर क्लिक करो फिर वही अपडेट्स फ्राम पे क्लिक करो फिर पोस्ट के ऊपर जोही आप क्लिक करोगे सरे लोगो का फोटो दिखने लगेगा फिर अपना स्क्रैप उसमे इंटर करो और पोस्ट कर दो देखने में इतना लम्बा स्टेप है करना आसन है ........................ फिर भी नहीं होगा तो मै फिर से बताउगा
ऐसा है पहले आप ऑरकुट न्यू वर्जन खोलो फिर वहा दाहिने तरफ जहा दोस्तों के नाम दिखाते है वहा जाओ वह आपको मैनेज लिखा होगा वहा आप क्लिक करो वह कोने में लिखा होगा एड फ्रेंड वह क्लिक करो जितने भी फ्रेंड के फोटो दिख रहे है वह क्लिक करो फिर सेव पर क्लिक करो फिर आप होम पे जाओ वह आपको मिलेगा अपडेट्स फ्राम वह क्लिक करो जिस नाम से अपने ग्रुप बनाया होगा वो नाम दिखाई देगा उसे सेलेक्ट करो फिर उसके बाद पोस्ट के ऊपर क्लिक करो फिर वही अपडेट्स फ्राम पे क्लिक करो फिर पोस्ट के ऊपर जोही आप क्लिक करोगे सरे लोगो का फोटो दिखने लगेगा फिर अपना स्क्रैप उसमे इंटर करो और पोस्ट कर दो

19 जून 2011

जब तक जिन्दगी है!!

जब तक जिन्दगी है तब तक हर रस्म निभाएंगे
आपको मनाने के लिए हम भगवान् के पास जायेंगे
जब तक दुआ पूरी न होगी तब तक वापस नहीं आयेंगे
हर आरजू हमेशा अधूरी नहीं होती है
दोस्ती में कभी दूरी नहीं होती है
जिनकी जिन्दगी मै हो आप जैसा दोस्त
उनको किसी की दोस्ती जरुरी  नहीं होती है

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा
कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा
काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा
किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा
देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा
और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

  vijay ki likhi ek kavita

15 जून 2011

चुडैल वाला कुआं


वैसे तो ये कुआं भी आम कुओं जैसा ही था, पर था बड़ा पुराना। कभी इसका पानी प्रयोग में आता होगा पर बरसों से इससे पानी नहीं निकाला गया था। इससे पानी लिया जाना कब बन्द किया गया था कोई निश्चित रूप से नहीं बता सकता। कहने का मलतब यह कि बरसो से वीरान पड़ा था ये कुआं। काफी गहरा और अंधेरा था ये कुआं। ऊपर से पत्थर गिराओं तो छपाक की आवाज होती थी जिससे लगता था कि कुयें की तली में थोड़ा बहुत पानी है।
बरसों पहले कुछ उत्साही युवकों ने इस कुये का पुन: चालू करने की मुहिम शुरू की थी। इसके लिये वे कमर में रस्सी बांध कर कुये के अंदर उतरे थे। ऊपर खड़े लोग इस रस्सी के दूसरे छोर को कस कर पकड़े थे कि जब नीचे से इशारा मिले तो वे रस्सी ऊपर खीच लें।  इसके अलावा तीन-चार बाल्टियां भी रिस्सयों से बांध कर कुयें में लटकाई गयीं थीं। योजना ये थी कि नीचे उतरे युवक तली पर की गंदगी इन बाल्टियों में भर कर, रस्सी हिला कर जब ऊपर की ओर इशारा करेंगे तो ऊपर खड़े लोग इन बािल्टयों को को ऊपर खीच लेंगे और बाहर निकाल कर खाली कर देंगे। इसके बाद वे इन खाली बाल्टियों को दोबारा कुयें में उन युवकों के पास पहुंचा देंगे। इस तरह से एक बार अगर कुयें की सफाई हो जायेगी तो इसका पानी पीने के काम आ सकेगा। अन्दर गये युवकों को अगर कोई परेशानी होगी तो अपनी कमर में बंधी रिस्सयों को हिला कर वे संकेत देंगे ताकि उन्हें जल्दी से ऊपर खींचा जा सके।
कुये बाहर अपार जनसमुदाय जमा था, किसी मेले का सा माहौल था। गांव की पीने के पानी की समस्या जो दूर होने वाली थी। पर ऊपर खड़े लोग प्रतीक्षा करते रहे समय बीतता रहा। जब बहुत देर तक बाल्टी वाली कोई रस्सी न हिली और न युवकों की कमर में बंधी रस्सी ही हिली तो उन्हें फिक्र होने लगी। उन्होने कुये में झांक कर देखने की कोशिश की पर कुआं इतना गहरा था कि उसके अन्दर कुछ नजर  ही न आता था। घबरा कर वे युवकों को आवाज देने लगे पर कुयें के अन्दर से कोई आवाज नहीं आई। उन्होने हड़बड़ाहट में रिस्सयां ऊपर खीचनी शुरू कीं। तीनों युवक ऊपर आ गये। पर ये क्या उनमें से कोई किसी तरह की हरकत नहीं कर रहा था। आनन-फानन में तीनों की कमर से रस्सी खोल कर उन्हें पास के अस्पताल में ले जाया गया जहां डाक्टरो ने दो को तो तुरंत मृत घोषित कर दिया। उत्सव का माहौल शोक में बदल गया।
तीसरे युवक को ठीक होने में समय लगा। पर मानसिक रूप से वह कभी स्वस्थ न हो पाया। अब वह पागलों की सी हरकतें करता है। कभी बोलता है तो बताता हैं कि कुये में कोई था जिसने सबकी गर्दन दबाई थी। कभी-अपनी ही गर्दन दबा कर कुये के अन्दर घटी घटना का विवरण देने की कोशिश करता है। उसकी बेतरतीब बातें सुन कर लोगों को यकीन हो चला है कि सचमुच कुये में कोई दैवी आत्मा निवास करती है जो नहीं चाहती कि कोई उस कुयें का पानी प्रयोग करे।
गांव की कुछ युवतियों ने जीवन से निराश होकर या किन्ही अन्य कारणों से जब से इस कुयें में कूद कर आत्म हत्या की है तब से तो लोगों का ये विश्वास पक्का हो गया है कि इस कुयें में कोई चुड़ैल निवास करती है। उनका कहना है कि लड़कियों ने आत्महत्या नहीं की थी वरन उनके अनुसार जब ये लड़कियां सबेरे शौच के लिये गयीं थी तो उन्होंने उस कुयें की मुडेर पर एक बूढ़ी स्त्री को बैठे देखा। उसने लड़की को अपने पास बुलाया। जब लड़की उस स्त्री के पास पहुंची तो उसने लड़की की आंखों में सीधे-सीधें झांका। बस फिर क्या था लड़की पूरी तरह से उसके बस में हो गयी। वह बूढी औरत कुयें में उतर गयी और अन्दर से आवाज देकर लड़की को अपने पास बुलाने लगी। लड़की तो जैसे अपने बस में नहींं थी सो कठपुतली की तरह आगे बढ़ी और झम्म से कुयें में कूद गई। यही एक-एक कर के उन सारी लड़कियों के साथ हुआ।
तरह-तरह से लोग उन लड़कियों से जुडी कहानियां सुनाते हैं और बाद में ये कहना नहीं भूलते कि वह औरत थोड़े ही थी वह तो कुयें के अन्दर की चुडैल थी जो अपने शिकार की तलाश में रोज सुबह की घुघलके में कुये की मुडेर पर आकर बैठती है। जितने मुंह उतनी बातें। पर कभी भी किसी ने ये सवाल नहीं किया कि इस घटना को खुद किसने अपनी आंखों से देखा था? अगर देखा था तो वह कैसे चुडैल के वश में आने से बच गया? क्यों नहीं उसने चीख पुकार मचा कर औरों का ध्यान खीचने की कोशिश की?
कभी-कभी कुछ लोग तो प्रत्यक्षदर्शी होने का दावा भी करते हैं और बताते हैं कि वे इस लिये बच गये कि उस औरत को देखते ही उन्होंने हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू कर दिया था। बीच में कछ नई विचारधारा के लोगों ने ऊपर से ही कुये के अन्दर झांकने की कोशिश की थी पर कुआं इतना गहरा था कि ऊपर से कुछ दिखाई ही नहीं दिया तब उन्होने दो तीन पेट्रोमेक्स तार में बांध कर कुयें के अन्दर डालने की कोशिश की। अचानक कुयें के अन्दर  से नीली हरी रोशनी निकलने लगी फिर एक विस्फोट हुआ। सारे लोग सिर पर पांव रख कर भागे।
मीडिया ने इस खबर को काफी बढ़ा-चढा कर प्रसारित किया और ये सिद्ध करने में कोई कसर नहीं रखी कि कुयें में किसी चुडैल का निवास है। बहुत से वैज्ञानिक सोच वाले लोगों ने इसके खण्डन की कोशिश भी की पर जनसाधरण में आज भी ये मान्यता है कि उस कुयें में चुडैल रहती है। जो सबेरे के घुंधलके में तरह-तरह के रूप (इंसान से लेकर जानवर तक के) बनाकर अपनें शिकार के लिये कुये से बाहर आती है।
अब हाल ये है कि रात की तो बात दूर दिन में भी लोग उस कुये के पास से नहीं निकलते। अगर निकलना भी पडे तो वहां से गुजरते समय हुनमान चालीसा पढ़ते रहते हैं। लोग अब उसे  बाकायदा चुडैल वाला कुआं कहने लगे हैं। संयोग से एक बार ऐसा हुआ कि कुयें के पास जिस किसान का खेत था उसे सबेरे के धुंधलके में उस खेत हल चलाते समय शायद सांप ने डंस लिया। चुडैल के डर से उसका इलाज नहीं करवाया गया था। तमाम झाड-फूंक  के बाद उसकी मृत्यु हो गयी। गांव के लोगों ने उपचार के आभाव में हुई इस मृत्यु को कुयें वाली चुडैल  के खाते में ही लिख दिया। अब तो हालत ये है कि लोग ये सोच कर डरे रहते हैं कि गांव पर कोई आपत्ति आने वाली है। जब भी गांव में कोई शादी-ब्याह, किसी के यहां बच्चे का जन्म या कोई और मांगलिक कार्यक्रम होता है तो लोग उस समय इस कुयें वाली चुडैल का हिस्सा निकालना नहीं भूलते। इस हिस्से को एक काले कपड़े में बांध कर शनिवार के दिन उस कुयें में डाल दिया जाता है और प्रार्थना की जाती है कि माता हम पर कृपा रखना। हमारे इस मांगलिक कार्य में कोई विघ्न न डालना।
बरसों से इस कुयें वाली चुडैल के बारे में अनेक कथायें कहीं-सुनी जाती हैं। हर साल उनमें एक दो घटनायें और जुड़ जाती हैं। प्रशांत मूलत: इसी गांव का रहने वाला है।चूंकि उसके पिता सरकारी सेवा में हैं अत: वह अपने परिवार के साथ शहर में ही रहता है। वहीं के एक स्कूल में आठवी कक्षा में पढ़ता है। चूंकि ये शहर गांव से बहुत दूर है इसलिये वह अपने परिवार के साथ सिर्फ गर्मी की लम्बी छुट्टियों में ही गांव आता है। गांव आते ही उसे उसके ताऊ जी चेतावनी देते हैं, "खबरदार, चुडैल वाले कुयें की तरफ न जाना।"
उसने भी अपनी दादी और ताऊ के मुह से चुडैल की बहुत सारी कहानियां सुनीं है। लेकिन प्रशान्त का मन है कि मानता नहीं। वह देखना चाहता है कि आखिर चुडैल वाले कुये में है क्या ? उसे डर भी लगता है, एक तरफ तो चुडैल से तो दूसरी तरह उसे भी ज्यादा ताऊ जी से।
पिछली बार जब उसने अपने गांव में कही जाने वालीं ये चुडैल की कहानियां अपने विज्ञान के अध्यापक को सुनाईं थीं तो वे खूब हंसे थे। प्रशांत चिढ़ गया, "आप मानोगे नहीं पर ये सब सच है। मेरे गांव के कितने लोगों ने तो उसे देखा तक है।"
उसके विज्ञान अध्यापक काफी देर तक उसे समझाते रहे कि ये सब कहानिया कोरी गप्पें हैं पर प्रशान्त तर्क पर तर्क दिये जा रहा था। अतत: वे बोले, "ठीक है इस बार मैं भी चलूंगा तुम्हारे साथ, तुम्हारे गांव, तुम्हारी इस चुडैल आंटी से मिलने।"
इसी सिलसिले में वे एक दिन प्रशांत के परिवार के साथ उसके गांव गये। वे लोग जब गांव पहुंंचे तो शाम हो चुकी थी।
"कल दिन में ही चलेंगे कुयें पर," अध्यापक जी ने सुझाव दिया।
 

"हां यही ठीक रहेगा। क्योंकि सबेरे को तो चुडैल निकल कर कुये की मुडेर पर बैढ़ती  हैं शिकार की तलाश में। खतरा उठाना ठीक नहीं," प्रशांत के ताऊ जी ने समर्थन किया।

अध्यापक जी हंसे, "नहीं वह बात नहीं। मैं तो दिन में इसलिये जाना चाहता था क्योंकि दिन में काफी रोशनी होती है। ऐसे में नजरों का धोखा होने की सम्भावना नहीं होगी।"

"मतलब आप समझते हैं कि ये बस हम लोगों की नजरों का धोखा है?"

"शायद।"

"और ये धोखा हम सालों से खाते आ रहे हैं?" प्रशांत के ताऊ जी चिढ़ गये।

"हो सकता है," अध्यापक जी ने शान्त स्वर में उत्तर दिया।

"सारे नफा नुकसान की जिम्मेदारी आपकी होगी, आप ही जानिये," ताऊ जी ने चेताया।

"कहें तो स्टाम्प पेपर पर लिख कर दे दूँ," अध्यापक जी ने जबाब दिया।

ताऊ जी पैर पटकते वापस चले गये।

रात को अध्यापक जी प्रशांत के साथ गांव के कुछ और बुजुर्गों‌ से चुडैल वाले कुयें की जानकारी लेने निकले। लोगों ने चुडैल के बारे में एक से बढ़कर एक कहानियां अध्यापक जी का सुनाईं। कुछ ने तो उन्हें डराने की कोशिश भी की तो कुछ ने उन्हें समझाया कि वहां जाते समय अपने साथ लोहे का चाकू या और कोई लोहे की चीज जरूर लेते जायें, साथ में हनुमान चालीसा भी पढ़ते रहें।"

"हमारें शरीरों मे कुदरती तौर पर काफी लोहा होता है। क्या उतना काफी नहीं है आप लोगों की इस चुडैल के लिये," अध्यापाक जी ने मुस्करा कर जबाब दिया। कुछ लोगों ने तो उन्हें चेतावनी तक दे डाली, "आप बेकार में इस मसले टांग अड़ा रहे हैं। अगर चुडैल नाराज हो गयी तो हमारे गांव पर कहर बरपा कर देगी. .  .गावं पर कोई मुसीबत आई तो इसके जिम्मेदार आप होंगे. . . अगर गांव पर मुसीबत आई तो छोंडेंगे हम आपको भी नहीं।" आदि धमकियां सुन कर वापस लौटते समय अध्यापक जी चुप थे।

प्रशांत ने ही चुप्पी तोड़ी, "यही ठीक रहेगा सर कि आप इसमें कुछ न करें।"

"कल देखा जायेगा,  अभी तो चल कर सोते हैं, थकान काफी हो रही हैं," अध्यापक जी शांन्त थे।

 उस रात प्रशान्त को काफी देर से नींद आई वह भी कुछ समय बाद कुत्ते भौंकने की आवाज से खुल गई। उसने उठ कर, अध्यापक जी जिस खाट पर सो रहे थे वहां आकर झांका, चारपायी खाली थी।

"कहां गये होंगे वे," उसने सोचा, "कहीं चुडैल उन लड़कियों की तरह अपने वशीभूत कर के तो नहीं ले गई उन्हें?"

उसे डर लगने लगा। उसने हड़बड़ाहट में ताऊ जी और अपने पिता को जगाया।

"मैंने पहले ही मना किया था इस मास्टर को, अब देखना क्या  हो," वे भुंनभुना रहे थे।

तय ये हुआ कि आस-पड़ोस के आठ दस लोगों को लेकर चुडैल वाले कुयें की तरफ चला जाय और इस मास्टर को ढूंढा जाये। पर इसकी जरूरत नहीं पड़ी। इन सारे लोगों के जाने के लिये तैयार होने से पहले ही मास्टर जी लौट आये, हाथ में एक झोला लिये और एक टार्च पकडे।

"कहिये कैसी रही," ताऊ जी ने आगे बढ़कर व्यंग किया।

"हम लोग काफी डर गये थे हमें तो लगा था कि ..."

"चुडैल पकड़ ले गई मुझे यहीं न," प्रशांत के पिता की बात काट कर उत्तर देते हुये अध्यापक जी मुस्कराये।

"मुझे अभी वापस जाना है,"  अध्यापक जी ने एकाएक कहा।

"अभी इस रात में, सबेरे चले जाइयेगा," प्रशांत के ताऊ जी ने सुझाव दिया।

"नहीं अभी जाना जरूरी है। आप बस बस अड्डे तक पहुचवाने की व्यवस्था कर दें। वहां से कोई न कोई सवारी मिल ही जायेगी। मैं फिर चार-पांच दिन बाद आऊंगा।

अध्यापक जी को उसी समय भिजवाने की व्यवस्था कर दी गई।

"लगता हैं उस मास्टर की मुलाकात हो गयी है चुडैल से। तुमने उसका चेहरा देखा? लगता था कि चुडैल ने उठा-उठा कर पटका है उसे," ताऊ जी हंस रहे थे। "देखना  वह मास्टर अब इस गांव की ओर  दोबारा मुँह न करेगा," ताऊ जी फिब्तयां कस रहे थे, प्रशांत का चेहरा ग्लानि से लाल हो रहा था।

पर अध्यापक जी फिर वापस लौटे। अब की बार वे अकेले न थे। उनके साथ कई और लोग थे जिनमें कुछ वैज्ञानिक थे। वे अपने साथ एक क्रेन और खुदाई वाली मशीन भी लाये थे। उन लोगों ने गांव वालों से छाते मांगे। छाते खोल कर रिस्सयों में बांध कर उल्टे करके वे उन्हें कुयें में डालते फिर बाहर खींच लेते। करीब आधे घंटे ये क्रम चला। इसके बाद उन्होने बड़ी पावर के बल्ब तारों के सहारे से कुयें में लटकाये और बाहर से अपने साथ लाये जेनेरेटर से उनमें बिजली पहुंचाई। सारा कुआं रोशनी से भर गया। लोग कौतूहल से सब कुछ देख रहे थे। जिस-जिस को खबर लगती वह चुडैल वाले कुयें की तरफ दौड़ा आता। दोपहर होते -होते वहां हजारों की भीड जमा हो गयी।

पीठ पर आक्सीजन का सिलेन्डर लगा, मुंह पर मास्क लगा कर दो लोग अपनी कमर में रिस्सयां बांध कर उस जगमगाते कुये में उतर गये। इधर क्रेन के द्वारा लोहे की रस्सी में बंधी लोहे की बड़ी-बड़ी बाल्टियां कुये में लटकाई गईं। कुयें में उतरे लोगों ने इनमें कुये का कचरा भरना शुरू किया। धीरे-धीरे ढ़ेर सारा मलबा कुयें के अन्दर से निकाला गया। कुयें को उसके सोते तक खोदने का काम पूरा किया गया। इसमें काफी समय लगा।

ये सब होते -होते शाम हो गई। अध्यापक जी के साथ आये और लोग तो लौट गये पर अध्यापक जी उस दिन गॉव में ही रूक गये। सारे क्षेत्र में इस घटना की चर्चा थी। कहीं से भनक पाकर दूरदर्शन की एक टोली भी गांव में आ गई। आज मास्टर जी सबके हीरो थे। सब जानना चाहते थे कि आखिर मास्टर जी ने ये सब किया कैसे? कहां गई वह चुडैल? अगर वह चुडैल नहीं थी तो अब तक की सारी घटनायें क्या थीं। हर आदमी के मन में एक सवाल था।

शाम को दूरदर्शन की टोली के आग्रह पर प्रधान की चौपाल पर जमावड़ा हुआ। अध्यापक जी बताने लगे, "पहली बार जब प्रशांत ने इस कुयें के बारे में मुझसे बात की तो मुझे लगा था कि शायद कुयें में कोई ऐसी गैस भर गई हो जिससे कुयें में उतरने वाले व्यक्ति को सांस लेने के लिये आक्सीजन न मिल पाती हो और उनकी मौत हो जाती हो। मैने पढ़ा था कि जब कहीं भरा पानी सूखने लगता हैं तो नीचे दलदल बन जाती है। इस दलदल में जब पत्तिया, वनस्पतियां या जानवर गिर कर सड़ने लगते हैं तो यहां पर एक तरह की गैस बनने लगती है  जिसे "मार्श गैस" या "दलदल की गैस" कहते हैं। इस गैस में मुख्यत: मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड होती हैं। इसे "प्राकृतिक या नेचुरल गैस" भी कहते हैं।"
"और शायद इन्हीं जहरीली गैसों की वजह से इस कुयें में उतरे लोगों की मौत हुई होगी," दूरदर्शन का ऐंकर अध्यापक जी की बात पूरी करने की कोशिश कर रहा था। "नहीं ये गैसें, खासकर मीथेन, जहरीली नहीं होती। कुयें में उतरे लोगों की मौत तो इसलिये हुई होगी कि वहां उन्हें सांस लेने के लिये आक्सीजन नहीं मिली होगी क्योंकि हवा की जगह तो वहां ये मार्श गैस भरी होगी।"
"पर उनमें से एक आदमी तो मरा नहीं था पर पागल हो गया था, वह तो कुछ और ही कहानी बताता है," एक ग्रामीण ने शंका जाहिर की।
"दरअसल जब सांस लेने लिये आक्सीजन न हो तो पहले दिमाग की कोशिकाओं में सूजन आती है, फिर वे गलने लगती हैं। उनका पर से नियंत्रण खत्म हो जाता है। चुंकि हमारा मस्तिष्क ही सांस लेने व दिल धड़कने की क्रियाओं को चलाता है फलत: ऐसा होने पर सांस और  दिल धड़कने की क्रिया बंद हो जाती है और उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यदि ऐसे में किसी व्यक्ति को बचा भी लिया जाये तो कभी-कभी उसके मस्तिष्क को कुछ भागों की कोशिकायें आक्सीजन की कमी से हमेशा-हमेशा के लिये नष्ट हो जाती हैं या सूख जाती हैं। मस्तिष्क की कोशिकाओं की  खासियत ये होती हैं कि एक बार नष्ट हो जाने पर वे पुनर्जीवित नहीं हो पातीं इसलिये मस्तिष्क का वह प्रभावित भाग हमेशा-हमेशा के लिये खराब  हो जाता है।  इसलिये ऐसा व्यक्ति तरह -तरह की असामान्य हरकतें करने लगता है जिसे आप पागल होना भी कहते हैं।"
"पर  इस कुयें में लालटेन डालते ही पूरा कुंआ नीली रोशनी से भर गया था और वह विस्फोट,"  किसी ने पूछा।
खुली जगह पर जब दलदलों में ऐसी गैस बनती है तो वह हवा के साथ उड़ जाती है और किसी को इसका पता भी नहीं लगता पर कुयें जैसी बन्द जगहों में ये पानी के ऊपर पीले धुंधलके की तरह तैरती रहती है। अगर ऐसे में इसका सम्पर्क खुली आग से हो जाये, जैसा कि लालटेन अन्दर लटकाने के साथ हुआ होगा तो ये ऐसी बंद जगह में नीली लौ के साथ जलनें लगती है और इसमें विस्फोट हो जाता है।"
"पर आपने ये बात कैसे जाना कि ये गैस मीथेन ही है," एक दूरदर्शन संवाददाता शक जाहिर कर रहा था।
"शक तो मुझे पहले से ही था पर इसको परखना भी जरूरी था। दूसरे आप सब लोगों का कहना था कि सबेरे के धुंधलके में चुडैल से भी मुलाकात हो जाती हैं तो उससे मुलाकात करनी भी जरूरी थी।"
लोगों में हंसी की एक लहर दौड़ गयी।
"मैने सोचा कि चुडैल से मिलने और गांव वाले तो मेरे साथ जाने से रहे तो मैने अकेले ही भोर में कुयें पर जाने की योजना बनाई, साथ मे था ये पतला तार, पांच सेल की टार्च, 50 मिलीलीटर की डाक्टरी सिरिंज और इसके मुह पर लगी ये प्लाटिक की पतली ट्यूब।मैं इसको लेकर कुयें पर गया। मैने पहले पतले तार में बांध कर अपनी टार्च जलाकर कुयें में लटकाई। वहां न नीली रोशनी थी और न कोई विस्फोट हुआ क्योंकि टार्च में लालटेन की तरह कोई खुली आग तो होती नहीं। कोई और असमान्य बात भी नजर नहीं आई। फिर मैने उस प्लास्टिक की पतली ट्यूब के अलगे सिरे पर लकडी का टुकड़ा बांधकर कुयें में लटकाया।"
"लकडी का टुकड़ा क्यों," किसी ने पूछा।
"ताकि इस प्लास्टिक ट्यूब का अलगा हिस्सा मुड़े नहीं और ट्यूब आसानी से कुयें की तली तक पहुंच जाये। इसे मैने 50 मिलीलीटर की सिरिज में लगाकर नीचे से गैस सिरिज में भरने की कोिशश की। कई बार प्रयास करने पर जब मुझे लगा कि कुयें की गैस इस सिरिंज में आ गई होगी तो मैने तेजी से इसकें मुंह पर लगी सिरिज के मुंह से प्लास्टिक की नली हटाकर एक मोमबत्ती का टुकडा फंसा दिया ताकि इसमें भरी गैस वापस न निकल जाये। सिरिज के दूसरे हिस्से को भी मैने पिघली मोम से भरकर सील कर दिया। इस सिरिज को लेकर मैं तुरंत रात में ही अपनी प्रयोगशाला को चला गया ताकि गैस लीक न हो जाये। वहां मेरा शक सही निकला। परीक्षणों में पता चला कि सिरिंज में भरी गैस "मार्श गैस" ही है, मुख्यत: मीथेन।
"आपकी चुडैल से मुलाकात हुई उस दिन?" किसी ने चुटकी ली।
"हां हुई।"
"क्या!" कई लोगों ने आश्चर्य से कहा।
 

"हां, जब मैं कुयें की तरफ बढ़ रहा था तो अंधेरे में मुझे दो आंखें चमकती दिखाई दीं। मैनें टार्च की रोशनी उन पर डाली तो सारा मामला समझ में आया।"

"कैसा मामला?"

"कुये पर पहले कभी घिर्री लगाने के लिये उसकी जगत पर दो खम्भे बनाये गये होंगे। वक्त के साथ एक खम्भा तो गिर गया है पर एक अभी खड़ा है।"

सबने स्वीकृति में सिर हिलाया।

"उसी खम्भे पर आकर बैठती थी ये बिल्ली"

"बिल्ली?" कई आवाजें एक साथ आईं।

"हां बिल्ली यानि कि आपकी चुडैल। बिल्ली की आंखों में एक खास किस्म का पदार्थ होता है जिससे उसकी आंखें अंधेरे में भी चमकती हैं। आप लोगो ने देखा होगा?" भीड में से बहुत से लोगों ने सहमति में सिर हिलाया।

"जब ये बिल्ली उस खम्भे पर चढ़कर आंखें चमकाती थी तो अंधेरे में ये खम्भा आपको नारी आकृति जैसा लगता था और उस पर बैठी बिल्ली की आंखे आपको उसकी आंखों जैसी दिखती थीं। टार्च की रोशनी पड़ते ही घबराकर भागी ये चुडैल।"

लोगों में एक बार फिर हंसी की लहर दौड़ गई।

"पर उन लडकियों की मौतें, उस किसान की मौत?" भीड़ में कुछ खिसियाये लोग ऐसे भी थे जो अभी भी हार मानने को तैयार नहीं थे।

"लड़कियों की मौत तो निश्चित रूप से आत्महत्या ही रही होगी। कारण तो उनके घर-परिवार वाले या मित्र-परिचित ही बेहतर जानते होंगे और उस किसान को तो आप भी जानते हैंं, सांप ने काटा था। अगर झाड़-फूंक की जगह उसका इलाज कराया होता तो शायद वह भी आज जिंदा होता।"

"कुदरत ने कैसा अजीब खेल खेला है इस गांव में," किसी ने टिप्पणी की।

"नहीं ये इस तरह की पहली घटना नहीं है। दलदली क्षेत्रों में तो ऐसी घटनायें आम हैं। जब कभी इस मार्श गैस मेंं आग लग जाये तो ये दलदल के ऊपर  के पानी पर नीली लौ के साथ जलने लगती है। कई देशों में ऐसी घटनाओं पर बहुत सारी किंवदंंतियां प्रचलित हैं। जिनमें आयरलैंड, स्काटलैण्ड व इन्गलैण्ड के कुछ भागों में प्रचलित "विल ओ विस्प" और न्यूफाउन्डलेण्ड में दिखने वाली "जैक-ओ- लेन्टर्न" जैसी रहस्यमयी दलदली रोशनियां बहुत मशहूर हैं। हमारे देश में ही आपने कई बार अखबारों में पढ़ा होगा कि पुराने बरसों से बंद पड़े कुयें की सफाई करने लोग उसमें उतरे और उनकी मौत हो गई।"

दूरदर्शन के एंकर ने सहमति मे सिर हिलाया।

"ऐसे कुओं की सफाई करने से पहले उनमें खुले छातों को उल्टा लटका कर बार-बार बाहर खींचना चाहिये ताकि इस तरह से उनके अन्दर भरी मार्श गैस बाहर निकल सके। इसके बाद कुयें के अन्दर जलती आग डालें। अगर नीली रोशनी न दिखे या विस्फोट न सुनाई दे तभी कुयें में उतरा जाये। हो सके तो ऐसे कुओं की सफाई के लिये इस कार्य के विशेशज्ञों का सहारा लिया जाये।"

इसके बाद महफिल बर्खास्त हो गई।

इस घटना को कई साल हो चुके हैं। कुआं खूब पानी दे रहा है। गांव वालों की पीने के पानी की समस्या काफी हद तक हल हो गयी है। अब आदमी, जानवर, बच्चे उस कुये के आस-पास ही जमे रहते हैं। अब न दिन में, न रात में कोई भी उस कुये के पास जाने से नहीं डरता। सब कुछ बदल गया है। अगर नहीं बदला हैं तो उस कुयें का नाम। लोग अब भी उसे चुडैल वाला कुआं ही कहते हैं।

बिकनी पर बहुत हुआ हंगामा मल्लिका कुछ अभिनय भी दिखा

 malika act against kangna


मुम्बई। बॉलीवुड में एक बार फिर से मल्लिका शेरावत को लेकर खासा बवाल हो गया है। बॉलीवुड के हर कोने में इन दिनों मल्लिका ही मल्लिका छाई हुई हैं। वैसे भी आजकल के पीआरओ इतने ज्यादा व्यावसायिक हैं कि वे अपने ग्राहक को सन्तुष्ट करने का तरीका बखूबी जानते हैं।
बॉलीवुड का हर निर्माता आजकल अपनी फिल्म को प्रदर्शित करने से पूर्व उसकी बातों को लेकर कुछ-न-कुछ ऎसा मसाला मीडिया को परोसते रहते हैं जिससे उनकी फिल्म चर्चा में चलती रही, दर्शकों का ध्यान उस पर अटका रहे और प्रदर्शन के प्रथम तीन दिन वे उसका फायदा उठा सकें। हालांकि यह फायदा उन्हीं फिल्मों को मिलता है जो वास्तव में ध्यानाकर्षण वाली होती हैं। ऎसी ही एक फिल्म आगामी 24 जून को प्रदर्शित होने वाली है जिसके प्रोमोज आजकल दर्शकों को हंसाने में कामयाब हो रहे हैं। इन प्रोमोज को देखने के बाद दर्शक यह कहता है कि जब झलक ऎसी है तो पूरी फिल्म क्या होगी। हम बात कर रहे हैं निर्देशक इन्द्रकुमार की फिल्म धमाल के सी`ल डबल धमाल की जिसमें बॉलीवुड की मçल्लका शेरावत जलेबी बाई बनकर आ रही हैं। कहा जा रहा है कि उनके जलेबी बाई की चर्चा खत्म होने से प्रचार में कुछ ठहराव सा गया था इसलिए अब फिल्म के प्रचारकर्ताओं ने उनके बिकनी दृश्यों को प्रचार का हथकंडा बना लिया है।
कहा जा रहा है कि फिल्म में संजय दत्त की पत्नी का किरदार निभाने वाली मçल्लका इस फिल्म में आधी बिकनी में नजर आने वाली हैं। इस वजह से वे फिर से चर्चा में आ गयी हैं और बॉलीवुड के साथ-साथ दर्शक भी यह देखने को बेताब हैं कि देखें आखिर वह किस अंदाज में नजर आने वाली हैं। वैसे एक अरसे बाद धमाल के जरिए मçल्लका दर्शकों को पूरे समय फिल्म में दिखाई देंगी। इस फिल्म में उनके साथ एक और अभिनेत्री कंगना राणावत भी हैं। बिकनी पहन कर हंगामा बरपाने वाली मल्लिका को चाहिए कि अब अपने करियर को वे वास्तव में संवारना चाहती हैं तो जिस्म की नुमाइश को बंद कर दें और अभिनय की नुमाइश शुरू करें जिससे दर्शक उन्हें सिर्फ आइटम गर्ल के रूप में याद न करके एक अच्छी अभिनेत्री के रूप में याद करें। उन्हें इस बात को गहराई से समझ जाना चाहिए कि उनके सामने कंगना भी हैं जिन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों को अपना बना रखा है ऎसा न हो कि दर्शक उनको जलेबी बाई के रूप में ही देख और बाकी सारा प्यार कंगना पर लुटा दे।