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04 जुलाई 2011

love

एक गाँव में एक किसान परिवार रहा करता था. परिवार में अधेड़ किसान दंपति के अतिरिक्त एक पुत्र एवं पुत्रवधू भी थे। पुत्र निकट के नगर में एक सेठ का सेवक था।एक दिन की बात है तीन वृद्ध कहीं से घूमते घामते आए और किसान की आँगन में लगे कदम के पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे। किसान की पत्नी जब बाहर लिकली तो उसने इन्हे देखा, उसने सोचा की वे भूखे होंगे। उसने उन्हे घर के अंदर आकर भोजन ग्रहण करने का अनुरोध किया। इसपर उन वृद्धों ने पूछा, क्या गृहस्वामी घर पर हैं? किसान की पत्नी ने उत्तर दिया, नहीं, वे बाहर गये हुए हैं।
वृद्धों ने कहा कि वे गृहस्वामी की अनुपस्थिति में घर के अंदर नहीं आएँगे। स्त्री अंदर चली गयी कुछ देर बाद किसान आया। पत्नी ने सारी बातें बताईं। किसान ने तत्काल उन्हें अंदर बुलाने को
कहा। स्त्री ने बाहर आकर उन्हें निमंत्रित किया। उन्होंने कहा “हम तीनों एक साथनहीं आएँगे, जाओ अपने पति से सलाह कर बताओ कि हममें से कौन पहले आए”। वो जो दोनों
हैं, एक “समृद्धि” है, और दूसरे का नाम “सफलता”। मेरा नाम “प्रेम” है”। पत्नी ने
सारी बातें अपने पति से कही। किसान यह सब सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने कहा, यदि
ऐसी बात है तो पहले “समृद्धि” को बुला लाओ। उसके आने से अपना घर धन धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा। उसकी पत्नी इसपर सहमत नहीं थी। उसने कहा, क्यों ना “सफलता” को
बुलाया जाए ।
उनकी पुत्रवधू एक कोने में खड़े होकर इन बातों को सुन रही थी। वो
बहुत ही समझदार थी उसने कहा, अम्माजी आप “प्रेम” को क्यों नहीं बुलातीं।
किसान ने कुछ देर सोचकर पत्नी से कहा “चलो बहू क़ी बात मान लेते हैं”।
पत्नी तत्काल बाहर गयी और उन वृद्धों को संबोधित कर कहा “आप तीनों मे जो “प्रेम” हों, वे कृपया अंदर आ जाए। “ प्रेम” खड़ा हुआ और चल पड़ा। बाकी दोनों, “सफलता” और “समृद्धि” भी पीछे हो लिए। यह देख महिला ने प्रश्न किया अरे ये क्या है, मैने तो केवल “प्रेम” को ही आमंत्रित किया है। दोनों ने एक साथ उत्तर दिया ” यदि आपने “समृद्धि” या “सफलता”
को बुलाया होता तो हम मे से दो बाहर ही रहते। परंतु आपने “प्रेम” को बुलाया इसलिए हम साथ चल रहे हैं। हम दोनो उसका साथ कभी नहीं छोड़ते।

प्यारया फिर करियर


जब भी कोई युवक या युवती प्यार के चक्कर में पड़ता है तो उसके सामने दो विकल्प रहते हैं, एक तो यह कि वे अपने प्यार को परवान चढ़ने पर ध्यान दें या फिर अपने करियर पर। करियर बनाने की उम्र में प्यार में पड़े युवक-युवतियाँ प्यार को ही तवज्जो देने लगते हैं।
प्यार की खातिर अपने करियर को दाँव पर लगाने वाले युवक-युवतियाँ भूल जाते हैं कि प्यार करने के लिए तो सारी जिंदगी है, पर एक बार करियर छूट गया तो उसे सँवारना बड़ा मुश्किल है।
कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है, लेकिन यदि आप विवेक से काम लें तो अपने बढ़ते कदम रोक सकते हैं। माना कि आप वयस्क हैं, आपको प्यार करने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसके लिए कितनी बड़ी कीमत चुका रहे हैं। आप जरा इस बात पर भी गौर फरमाइए।
प्यार के पचड़े में पड़कर अपना करियर बर्बाद करने वाले युवक-युवतियाँ शायद यह नहीं जानते कि उनके इस आचरण से उनके परिजनों का कितना दिल दुखेगा। अपने बच्चों का करियर बनाने के लिए की गई जद्दोजहद व्यर्थ होते देख उन्हें कैसा महसूस होगा? उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता देख उन्हें कितनी ठेस पहुँचेगी।
जीवन में हर कार्य का एक समय होता है और उसे तब ही करने में भलाई है। जब आप कॉलेज में एडमिशन लेते हैं तो आपका लक्ष्य करियर बनाना होना चाहिए। आपस में दोस्ती होना बुरा नहीं है, लेकिन दोस्ती और प्यार के बीच एक सीमा रेखा है जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए। जो युवक-युवतियाँ पढ़ाई के दौरान प्यार में पड़ जाते हैं वे अपना करियर समाप्त कर लेते हैं, क्योंकि दोनों का ही ध्यान पढ़ाई से उचट जाता है। ऐसे युवक-युवतियों को चाहिए कि वे पहले अपने करियर पर ध्यान दें।
एक बार आप अपनी मंजिल हासिल कर लें, उसके बाद प्यार करें तो वे अपने प्यार को भी समय दे पाएँगे व उसके साथ न्याय कर सकेंगे। करियर की ओर ध्यान नहीं देने से अच्‍छी नौकरी नहीं मिलेगी व आय का कोई साधन नहीं रहेगा। रोजी-रोटी और गृहस्थी के लिए अच्‍छा करियर होना बहुत जरूरी है अन्यथा प्यार में अंधे होकर किए गए प्रेम-विवाह का हश्र बहुत बुरा होता है। हाथों की मेहँदी छूटने के पहले ही अलगाव की स्थिति बन जाती है। इसलिए आप अपनी जिंदगी के फैसले सोच-समझकर लें।
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लड़कियों के डर भी अजीब होते हैं
भीड़ में हों तो लोगों का डर
अकेले में हों तो सुनसान राहों का डर
गर्मी में हों तो पसीने से भीगने का डर
हवा चले तो दुपट्टे के उड़ने का डर
कोई न देखे तो अपने चेहरे से डर
कोई देखे तो देखने वाले की आँखों से डर
बचपन हो तो माता-पिता का डर
किशोर हो तो भाइयों का डर
यौवन आये तो दुनिया वालो का डर
राह में कड़ी धुप हो तो,चेहरे के मुरझाने का डर
बारिश आ जाये तो उसमें भीग जाने का डर
वो डरती हैं और तब तक डरती हैं
जब तक उन्हें कोई जीवन साथी नहीं मिल जाता
और वही वो व्यक्ति होता हैं जिसे वो सबसे ज्यादा डराती है!!!!!!!!!!

30 जून 2011

गाँधी जी के नाम सुखदेव की यह खुली चिट्ठी


 गाँधी जी के नाम सुखदेव की यह खुली चिट्ठी मार्च १९३१ में गाँधी जी और वायसराय इरविन के बीच हुए समझैते के बाद लिखी गई थी जो हिंदी नवजीवन 30 अप्रैल 1931 के अंक में प्रकाशित हुई थी }
परम कृपालु महात्मा जी ,

आजकल की ताज़ा खबरों से मालूम होता है कि{ ब्रिटिश सरकार से } समझौते की बातचीत कि सफलता के बाद आपने क्रन्तिकारी कार्यकर्ताओं को फिलहाल अपना आन्दोलन बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौका देने के लिए कई प्रकट प्राथनाए कई है |वस्तुत ; किसी आन्दोलन को बन्द करना केवल आदर्श या भावना में होने वाला काम नहीं हैं |भिन्न -भिन्न अवसरों कि आवश्यकता का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता हैं |
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान , आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष किया ,न इसे छिपा ही रखा की समझौता होगा |में मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिलकुल आसानी के साथ यह समझ गये होंगे कि आप के द्वारा प्राप्त तमाम सुधारो का अम्ल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले -मकसूद पर पहुच गये हैं | सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक न मिले ,तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए कांग्रेस महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बंधी हुई हैं | उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझैता सिर्फ काम चलाऊ युद्ध विराम हैं |जिसका अर्थ येही होता होता हैं कि अधिक बड़े पएमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोडा विश्राम हैं ........
किसी भी प्रकार का युद्ध -विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआवो का हैं | लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आप ने फिलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा हैं |इसके वावजूद भी वह प्रस्ताव तो कायम ही हैं |इसी तरह 'हिन्दुस्तानी सोसलिस्ट पार्टी ' के नाम से ही साफ़ पता चलता हैं कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाजवादी प्रजातन्त्र कि स्थापना करना हैं |यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नही हैं |जब तक उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो , तब तक वे लड़ाई जरी रखने के लिए बंधे हुए हैं |परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध .निति बदलने को तैयार अवश्य होंगे |क्रन्तिकारी युद्ध ,जुदा ,जुदा रूप धारण करता हैं |कभी गुप्त ,कभी केवल आन्दोलन -रूप होता हैं ,और कभी जीवन -मरण का भयानक सग्राम बन जाता हैं |ऐसी दशा में क्रांतिवादियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए विशेष कारणहोने चाहिए |परन्तु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया |निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतीवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नही होता ,हो भी नही सकता |

नकली दवाएं बेचने का गोरखधंधा

.राज्य में नकली दवाएं बेचने का गोरखधंधा एक बार फिर उजागर हो गया। दवा दुकानों में अर्से से बेची जा रही कफ सिरप कॉफजेड दिल्ली की प्रयोगशाला में जांच के बाद नकली मिली। खांसी कम करने वाले इस सिरप में दवा के घटक नहीं मिले।

खाद्य एवं औषधि विभाग ने तत्काल प्रभाव से सिरप की बिक्री पर पाबंदी लगा दी है। इस सिरप का निर्माण लेडरली कंपनी करती थी, जो पांच साल पहले बंद हो चुकी है। यही बात हैरान करने वाली है कि पांच साल पहले बंद हो चुकी कंपनी के नाम से दवाएं विभाग और जिला प्रशासन की नाक के नीचे बिकती रहीं और पूरा विभाग सोया रहा।

इस सनसनीखेज खुलासे से दवा बाजार में हड़कंप है। दवा कारोबारियों के अनुसार इस सिरप की सबसे ज्यादा खपत गांव और छोटे कस्बों के मेडिकल स्टोर्स में है। यानी संगठित रैकेट के जरिये खामोशी से छोटे स्थानों पर नकली दवा खपाने का खेल चल रहा था।

खाद्य एवं औषधि विभाग ने बिलासपुर के आउटर से कफ सिरप का सैंपल लिया था। इसे जांच के लिए दिल्ली स्थित केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला भेजा गया। मंगलवार को मिली जांच रिपोर्ट देखकर खाद्य एवं औषधि विभाग के अफसर दंग रह गए। दवा के बारे में सुराग ड्रग कंट्रोलर के. सुब्रमणियम को मिला था।

उन्होंने जांच के लिए टीम भेजी। कॉफजेड का निर्माण बहुराष्ट्रीय कंपनी लेडरली करती थी। यह पांच साल पहले जान वाइथ में मर्ज हो चुकी है। उसके बाद से लेडरली कंपनी के नाम से दवाएं आना बंद हो गई थी। नकली दवा का धंधा करने वालों ने कंपनी के नाम का फायदा उठाया।

विभाग भी संदेह के दायरे में

नकली दवाओं का कारोबार करने वाला गिरोह पांच साल पहले बंद हो चुकी मल्टीनेशनल कंपनी लेडरली के नाम से कफ सिरप तैयार कर बाजार में खपा रहा था। यह बात सैंपल भेजने के पहले ही औषधि विभाग को पता थी या नहीं इसकी पड़ताल होनी चाहिए। विभाग का कहना है कि दवा तैयार करने वाले गिरोह ने कंपनी के नाम के आगे लेडरली दिल्ली लिख दिया है। इस बारे में दिल्ली पत्र लिखकर पूछा जाएगा कि क्या यह दवा कंपनी यहां रजिस्टर्ड है या नहीं।

जांच में यह निकला

> लेबल में लिखा गया एक भी घटक दवा में नहीं मिला।

> जो घटक मिले, उसकी मात्रा भी बेहद कम।

> डिस्मोनिया या खांसी के दौरान सांस अटकने जैसी गंभीर बीमारी के मरीजों को दवा देने पर उसकी जान खतरे में पड़ सकती है।

"भारत सरकार की रिपोर्ट की सूचना राज्य के सभी दवा कारोबारियों को भेजी जाएगी। तमाम दवा कारोबारियों को बताया जाएगा कि कॉफजेड सिरप प्रतिबंधित कर दी गई है।"

एस. बाबू,
डिप्टी ड्रग कंट्रोलर

गरीब देश अमीर भगवान

बहुत ही अमीर हैं इस देश में भगवान
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं,
चाहे वो फिर नेता हों या अभिनेता हों,
मंत्री हों या जनता के संतरी हों,
योगा सिखलाएँ या प्रवचन सुनाएं,
जनता चाहे इनके आगे नतमस्तक है,
पर यह बस सिर्फ सत्ता के ही करीब हैं,
इस देश के भगवन आज बहुत ही अमीर हैं.

भूखी है जनता पर गोदामों में अनाज है सड़ता,
त्राहि है मची पर इन्हें क्या फर्क है पड़ता,
भरें हैं पेट इनके, सारे बैंक बैलेंस भी भरे,
जनता को अब कौन देखे,
वो जिए तो जिए, मरती है तो फिर मरे.बातें ही बस जिन्दा, मगर मरे सारे जमीर हैं,
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं.
मोमबत्ती भी जलाई, नारे भी लगाए,
राजघाट पर सोते बापू भी जगाये,
पर सोते रहना ही था जिनको, नहीं जगे वो,
देश है गिरा पर उन्हें कौन कैसे उठाये.
गिरना, रोना, आंसू बहाना,
अब यही देश की किस्मत, तकदीर है.
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं..!!
इस देश के भगवान आज बहुत ही अमीर हैं..!!

हर इंसान के अन्दर राजनीति

कुछ राजनीति के बारे मैं .....

राजनीति हर इंसान के अन्दर थोड़ा न थोड़ा, किसी न किसी रूप मैं छुपी रहती है. बस सही वक्त का इन्तजार करता है हर इन्सान का चरित्र. अतः राजनीति और राजनेताओं को कोसने से कोई फायदा नहीं क्योंकि राजनीति का अपना कोई चरित्र नहीं होता बल्कि इसका चरित्र उसका वरण करने वाले के चरित्र पर निर्भर करता है :

ये राम के लिए भक्ति का साधन थी,
तो कृष्ण के लिए युक्ति का साधन,
गांधी के लिए शक्ति का साधन थी,
तो सुभाष-भगत के लिए मुक्ति का साधन !!
पर अफ़सोस आज ये लोगों के सिर्फ़ सम्पति का साधन है.
.   .   .   .   .  .  .  
 - - - अर्थशास्त्र (Economics) - - - -     

गरीब पैंसे के लिए काम करता है, जबकि अमीर के लिए पैंसा काम करता है !!

28 जून 2011

शहीदों की चिताओं पर ....नहीं लगते हैं अब मेले

शहीदों की चिताओं पर ....नहीं लगते हैं अब मेले
from भड़ास blog by Ajit Singh Taimur
दोस्तों आज 28 जून है ....हम लोगों के लिए एक और सामान्य सा दिन ........ आज सुबह सो कर उठे तो बूंदा बंदी हो रही थी ........बारिश की सुबह कितनी रोमांटिक होती है .........अपनी पत्नी के साथ आज बालकनी में बैठ के चाय पीते हुए अखबार देख रहा था ......दो दो अखबार देख डाले ........कहीं कोई ज़िक्र नहीं था ....कल टीवी पे सारे news channels खंगाले ....कुछ नहीं था .....हिन्दुस्तान gas और diesel के दामों में उलझा हुआ है ..........मेरी पत्नी मेरे भावों को पढ़ लेती है ........... उसने पूछा क्या हुआ .....अचानक इतने serious क्यों हो गए ..........मैंने कहा कितनी रोमांटिक लगती है न ये बूंदा बांदी .....बारिश की ये फुहार .........उस दिन भी हलकी बूंदा बांदी हो रही थी ....जब वो लोग .....उस रात अपने घर आखिरी ख़त लिख रहे थे ..........आज से 12 साल पहले ......सब 20 से 25 के बीच थे .......यानी मेरे बेटे से सिर्फ 2 -3 साल बड़े .........मेरा बेटा तो मुझे बच्चा लगता है अभी..... आखिर 20 - 22 साल भी कोई उम्र होती है जान देने की ........
दोस्तों शहादत दिवस है आज .........major P P Acharya ,Capt kenguruse और Capt Vijayant Thaapar ....सिपाही जगमाल सिंह और नायक तिलक सिंह का ....12 साल पहले आज की रात वो सब शहीद हुए थे वहां दूर .....drass में ....knoll नामक चोटी को फतह करते हुए .........कारगिल युद्ध में .........27 जून को एक पूरी प्लाटून शहीद हो गयी थी उसी चोटी पर .........शाम की roll call खुद commanding officer ..... colonel M B Ravindra naathan ने ली ...........वहां ये बताया की आज हमारी पूरी प्लाटून शहीद हो गए knoll पर .......सबने 2 मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी .........फिर colonel ने कहा ......कल के assault में जो जाना चाहता है ...एक कदम आगे आयेगा ....बाकी अपनी जगह खड़े रहेंगे ...........पूरी regiment एक कदम आगे आ गयी .......तब major आचार्य ने कहा की कल A कंपनी ने assault किया था .......आज B कंपनी करेगी .......और फिर उन्होंने अपनी टीम बनाई .........और कहा की चूंकि मैं कंपनी कमांडर हूँ इसलिए मैं लीड करूँगा .........उनकी टीम में 12 लोग थे...... अगले दिन सुबह निकलना था .....उस रात सबने अपने घर चिट्ठी लिखी .....major आचार्य ने भी लिखा था ....अपने पिता को .......हतॊ वा पराप्स्यसि सवर्गं जित्वा वा भॊक्ष्यसे महीम.........तस्माद उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः......गीता का ये श्लोक quote किया था ..........उस रात वो लोग जानते थे की लौट कर नहीं आयेंगे .............और नहीं आये ......capt थापर ने जो पत्र अपने घर लिखा था ....उस पर मैं पहले ये लेख .....http://akelachana.blogspot.com/2011/03/chief-of-army-staff.html लिख चुका हूँ ...........उन्होंने भी लिखा था की जब तक ये पत्र आप लोगों को मिलेगा ...मैं वहां अप्सराओं के बीच स्वर्ग का सुख भोग रहा होऊंगा ......... वो जानते थे की लौट के नहीं आएंगे ..........फिर भी गए .......उस रात हलकी बूंदा बांदी हो रही थी .........पर अगली सुबह मौसम साफ़ था एकदम ...और उस रात जब उन्होंने चढ़ना शुरू किया ................full moon night थी .......full moon night भी रोमांटिक लगती है कुछ लोगों को ............चाँद आसमान में चमक रहा था ........रात में भी सब कुछ साफ़ साफ़ दिख रहा था ..........हमें भी और दुश्मन को भी .........भयंकर गोला बारी हो रही थी .....सबसे आगे major आचार्य थे ......वही सबसे पहले शहीद हुए .....फिर सिपाही जगमाल सिंह ........वो अर्दली था capt थापर का ......major आचार्य ने उसे अपनी टीम में चुना नहीं था .....उस रात जब उसे पता चला की उसे नहीं चुना गया है तो वो खुद major आचार्य के टेंट में गया .......अगर मेरे साहब जायेंगे ....(यानी capt थापर) ......तो मैं भी जाऊंगा .......वो capt थापर से पहले शहीद हुआ उस रात .........उनकी बाहों में .........२२ साल उम्र थी उसकी ......आजकल इस उम्र के लड़के सारी रात अपनी girl friends को SMS भेजने में बिता देते हैं .......उनमे एक capt kenguruse था ....25 साल का .....वो नागा था ....नागालैंड का .......सुना है नागालैंड में लोग नफरत करते हैं ....हिन्दुस्तान से और हिन्दुस्तानी फ़ौज से ........graduation के बाद सरकारी स्कूल में teacher हो गया था ........दो साल मास्टरी की भी ......फिर बोला फ़ौज में जाऊंगा ........हिन्दुस्तानी फ़ौज में ....उस फ़ौज में जिससे उसका समाज नफरत करता है ...दिल से ......उस रात एक LMG चढ़ानी थी ऊपर .....बहुत फिसलन थी उस नंगे पहाड़ पे ......उस कडकडाती ठण्ड में ........अपने जूते उतार दिए उसने ......जिससे की पैरों को अच्छी पकड़ मिले चट्टानों पे .......सबसे पहले ऊपर चढ़ा, चोटी पे .........नंगे पाँव...... फिर कमर में बंधी रस्सी से अकेले दम वो LMG ऊपर खींची ......मरियल सा था ....मुश्कल से 50 किलो का .......5 फुट दो इंच का .......फिर उसी रस्सी को पकड़ के पूरी प्लाटून ऊपर आयी .....वहां दो पाकिस्तानी rifle से मारे और एक को अपनी उस नागा खुकरी से .....hand to hand combat में .......एकदम नज़दीक एक हथगोला फटा ...पेट में splinter लगा .......उस खड़े पहाड़ से 100 फुट नीचे गिरा .....वहां शहादत हुई .......capt थापर को बाईं आँख में गोली लगी थी ........जब body घर पहुंची तो चश्मा पहना दिया था ......दाढ़ी बढ़ी हुई थी .....6 फुट 1 इंच height थी .......इतना सजीला और ख़ूबसूरत जवान अपनी जिंदगी में नहीं देखा मैंने ............शहादत से दो दिन पहले का फोटो है उसी दाढ़ी में ........अगर फ़ौज में न होता तो मॉडल होता ....या फिर फिल्म स्टार .....24 साल की उम्र में शहादत दे दी ......वो जो आखिरी चिट्ठी लिखी उसने अपने माँ बाप को ...उसमें भी सब कुछ दे गयादेश को ......मरने के बाद भी ...........निकाल लेना सारे अंग ....फूंकने से पहले .....ताकि काम आ सकें किसी के .......
आज सुबह के अखबार देख के बहुत दुःख हुआ ..........इतनी जल्दी भुला दिया इस अहसान फरामोश मुल्क ने ..........पूरे देश में चर्चा है आज ........ऐश्वर्या राय pregnent हो गयी है .......major आचार्य की बीवी भी pregnent थी .........जब उसका पति शहीद हुआ .........तीन महीने बाद जन्मी वो बच्ची ...........क्या सोच रही होगी वो लड़की आज के अखबार देख के ...........उस रात .......उस खड़ी चट्टान से 100 फुट नीचे गिर कर ......ज़िदगी के उन आखिरी क्षणों में .....मरने से पहले .....क्या कुछ सोचा होगा उस नागा लड़के ने ..........संवेदना शून्य हो जाता होगा ऐसी स्थिति में दिमाग आदमी का ........आज जैसे हमारा हो गया है ....जीते जागते भी .........वो लड़के उस रात अच्छी तरह जानते थे की वापस नहीं आयेंगे लौट के .....फिर भी गए .....क्या जज्बा होता होगा .......देश के प्रति ......क्या सोच के गए होंगे .........क्यों पैदा नहीं होता वो जज्बा हम लोगों में ....अपने देश के प्रति ......
सलाम है ....कारगिल शहीदों के उस जज्बे को ............13 july को capt विक्रम बत्रा का शहीदी दिवस है ....पूर्व में एक लेख उनपे भी लिख चूका हूँ ......http://akelachana.blogspot.com/2011/03/r.html ......इस बार 13 जुलाई को उनके घर पालम पुर जाने का विचार है ........ सुना था की ...शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ....वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा ...........अब तो कमबख्त वो मेले लगने भी बंद हो गए .....upa सरकार कारगिल विजय की बरसी नहीं मनाती .......चलो हम ही मना लें ......


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एक और जनांदोलन....................Right to recall

      एक और जनांदोलन जन्म लेने को है .......  
               Right to recall              



सबसे अहम बात जो सामने निकल कर आई वो ये कि इन और इन जैसे तमाम प्रयासों के साथ जिस तरह का सलूक सरकार और उसके मंत्रियोंने किया या अब भी कर रहे हैं और उससे भी बडी बात कि जिस तरह का घोर उपेक्षित रवैय्या , प्रधानमंत्री , यूपीए अध्यक्षा , और तेज़ तर्रार महासचिव और युवा लोगों में खासे लोकप्रिय माने जाने वाले युवा नेता ने अपना रखा है उससे तो स्थिति और स्पष्ट हो गई है आम जनता के सामने । जनलोकपाल बिल और विदेशों में छिपे काले धन के बिल को लाए जाने के दबाव को बेशक सरकार कुछ दिनों के लिए टला हुआ मान रही हो, लेकिन ऐसा है नहीं वास्तव में । बल्कि अब तो ये साफ़ हो गया है कि सरकार को अपना वजूद और सत्ता को बचाए रखने के लिए दो में से एक रास्ता चुनना होगा । भ्रष्टाचार के पाले में खुद को रखें या फ़िर कि जनता द्वारा मांगे जा रहे कानूनी अधिकारों को बना कर उनके साथ रहें । सरकार को ये ध्यान में रखना चाहिए कि , जनलोकपाल बिल, विदेशों मे छिपे काले धन को वापस लाने के लिए कानून और राईट टू रिकॉल यानि प्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून , जैसे नियम और अधिकार जनता ने अपने किसी फ़ायदे के लिए नहीं मांगे हैं , ये उसी लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए बहुत जरूरी है जिसकी रक्षा करने का दावा , इनका पुरज़ोर विरोध करने वाले राजनेता दशकों से करते आए हैं । अब वक्त आ गया है कि जनता सरकार की आंखों में आंखें डाल के पूछे कि बताओ , ये कानून क्यों नहीं बन सकता , और कब कैसे बनेगा ?इस मुहिम को एक और अस्त्र देते हुए हमने एक नई लडाई की योजना बनाई है - Right to recall - यानि जनप्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून । सीधे सरल शब्दों में समझा जाए तो राजनेताओं सेीक बार चुनाव जीत कर,उन कुर्सियों पर बैठे रहने का अधिकार छीन लेना जिन्हें पाते ही वे सत्ता के मद में न सिर्फ़ चूर हो जाते हैं बल्कि देश , समाज और कानून से भी बहुत दूर हो जाते हैं । आज राजनेताओं के लिए राजनीति समाज सेवा नहीं बल्कि विशुद्ध मुनाफ़े वाला कारोबार मात्र बन कर रह गया है । अब आकलन विश्लेषण किया जाता है कि यदि छोटे स्तर पर चुनाव जीतने में पैसा लगाया जाए तो कितना मुनाफ़ा होगा और बडे स्तर पर कितना , कारण एक सिर्फ़ एक , एक बार कुर्सी मिल जाए बस । तो क्यों न उनके सरों पर एक अनिश्चितता की ऐसी तलवार टांगी जाए कि जिसकी धार उसे अपने कर्तव्य को न भूलने के लिए विवश कर सके । इसी उद्देश्य के साथ फ़ेसबुक पर एक समूह का गठन किया गया है   ..Right to recall;   यहां ये जानना समीचीन होगा कि इस कानून को अमेरिका के अठारह राज्यों में मान्यता मिली हुई है अब तक दो राज्यों की सरकार इस अधिकार के उपयोग से जनता ने गिरा दी । भारत में भी कई स्तरों पर मध्यप्रदेश , और छत्तीसगढ जैसे राज्यों में इसे सफ़लतापूर्वक आजमाया जा चुका है ।

जैसी भावना..

जैसी रही भावना जिसकी


एक प्रसिद्द वेश्यालय था, जो किसी मंदिर के सामने ही स्थित था. वेश्यालय में नित्य प्रति गायन-वादन-नृत्य आदि होता रहता था, जो की वह वेश्या अपने ग्राहकों की प्रसन्नता के लिए प्रस्तुत करती थी और बदले में बहुत सारा धन व कीमती उपहार उनसे प्राप्त करती थी. इस प्रकार उसकी समस्त भौतिक इच्छाएं तो पूर्ण थी, लेकिन कठोर मनुवादी व्यवस्था के अंतर्गत उसका मंदिर में प्रवेश वर्जित था और उसे वहां पूजा-पाठ आदि करने की अनुमति नहीं थी.वेश्यालय में तो उसे ग्राहकों से ही फुर्सत नहीं थी, कि वह किसी प्रकार देव पूजन संपन्न कर सकें. उसके मन में एक ही इच्छा शेष रह गयी थी, कि वह किसी प्रकार देव पूजन संपन्न कर सकें. उसके मन में एक ही इच्छा शेष रह गयी थी, कि वह किसी प्रकार मंदिर में स्थापित देव मूर्ति का दर्शन कर ले और धीरे-धीरे समय के साथ उसकी यह इच्छा एक प्रकार की व्याकुलता में बदल गयी. जब मंदिर में आरती के समय बजने वाली घंटियों की आवाज उसके कानों में पड़ती, तो वह अत्यंत व्यग्र हो उठती, उसका हृदय रूदन कर उठता और भगवान् दर्शन की उत्कंठा उसके नेत्रों से बरसने लगती. वेश्या के गायन-नृत्य आदि की स्वर लहरिया मंदिर तक भी पहुंचती थी. मंदिर का पुजारी कभी तो अत्यंत क्रोधित होता, कि उस नीच कर्मों में रत स्त्री की आवाज़ से मंदिर के वातावरण की पवित्रता में विघ्न उपस्थित हो रहा हैं और कभी वासना के वशीभूत उसी वेश्या के आगोश में पहुँच कर उसके रूप-रस का पान करने की कल्पना में डूब जाता, लेकिन मनुवादी स्समजिक मर्यादा के कारन ऐसा संभव नहीं था.संयोगवश उस वेश्या और पुजारी, दोनों की मृत्यु एक ही समय हुयी. यमराज उस पुजारी को नरक के द्वार पर छोड़ कर वेश्या को स्वर्ग की और ले जाने लगे.पुजारी को इस पर बहुत क्रोध आया और उसने यमराज से पूछा – “मैं जीवन भर मंदिर में देव मूर्तियों का पूजन करता रहा, फिर भी मुझे नरक में जगह दी जा रही हैं और यह वेश्या जीवन भर पाप कर्मों में लिप्त रही, फिर भी इसे स्वर्ग ले जाया जा रहा हैं. ऐसा क्यों? यमराज ने उत्तर दिया – “देव मूर्तियों की पूजा करते हुए भी तुम्हारा चित्त सदा इस वेश्या में ही लगा रहा, जबकि पाप कर्मों में लिप्त रहते हुए भी इसका चित्त देव मूर्ति में ही लगा रहा. यही वजह हैं, कि इसे स्वर्ग मिल रहा हैं और तुम्हें नरक.”वस्तुतः कर्म के साथ विचारों का भी जीवन में अत्यधिक महत्त्व हैं. जब तक चित्त वेश्यागामी रहेगा (अर्थात भौतिक भोगों में लिप्त रहेगा), तब तक देव पूजन, जप, साधना आदि के उपरांत भी स्वर्ग (अर्थात देवत्व. श्रेष्ठता, सफलता, पूर्णता) की प्राप्ति संभव नहीं हैं.
\किसी साधना आदि में असफलता प्राप्त होने के पीछे कारन ही यही होता हैं, कि कहीं न कहीं उसके विश्वास, श्रद्धा, समर्पण आदि में न्यूनता रहती हैं एवं चित्त साधनात्मक चिंतन से न्यून हो कर भोगेच्छाओं में लिप्त होता हैं अतः साधक का यह पहला कर्त्तव्य हैं, कि वह प्रतिक्षण गुरु या इष्ट चिंतन करता हुआ, मन को नियंत्रित करें, तभी श्रेष्ठता की और अग्रसर होने की क्रिया संभव हो पायेगी.

27 जून 2011

जनता ये बात बहुत ही अच्छी तरह से समझ चुकी है

पर राहुल से है उम्मीद
क्योकि उनमे सच्चाई की झलक दिखती है
अब जनता ये बात बहुत ही अच्छी तरह से समझ चुकी है कि सर्प सिर्फ़ अलग अलग रंगों की केंचुली धारण किए रहता है किंतु भीतर से तो वो सर्प ही रहता है और सांप के चरित्र के अनुरूप ही व्यवहार करता है । इसलिए उन्हें काबू में लाने के लिए अब कुछ कुशल सपेरों ने बागडोर थाम ली है । न सिर्फ़ थाम ली है बल्कि अब उन्होंने अपने अपने फ़ंदों में सत्ता और सरकार को फ़ंसाना भी शुरू कर दिया है । 
जनता तो पहले से ही परिवर्तन की बाट जोह रही थी , उसे तो ये मौका मानो मुंह मांगी मुराद की तरह मिल गया है । आज आम आदमी को इससे कोई फ़र्क नहीं पड रहा है कि वो जिनके पीछे चल कर सरकार के सामने सीना तानने जा रहा है , उसकी अपनी क्या व्याख्या है , वो तो बस उस जनाक्रोश का एक हिस्सा बन जाने को आतुर है ताकि कल को कोई ये न कहे कि जब क्रांति बुनी जा रही थी तो तुमने भी देखा तो था न यकीनन । सिविल सोसायटी , योग गुरू , स्वनिर्मित जनसगठनो का चेहरा लिए हुए आम जनता ने सरकार और सत्ता के सामने उन प्रश्नों को न सिर्फ़ रखना शुरू किया जिनका उत्तर वे बरसों से चाह रही थीं । पहले सूचना के अधिकार के लिए कानून की लडाई में मिली जीत और उससे आए बदलाव ने इस लडाई में एक उत्प्रेरक का काम किया । इसके बाद जनलोकपाल बिल के लिए टीम अन्ना द्वारा छेडा गया आंदोलन जल्दी ही पूरे देश भर का समर बन गया । इसके साथ ही योग गुरू रामदेव ने भी एक मुद्दा विदेशों मे काले धन की वापसी के लिए कठोर कानून बनाए जाने की मांग को लेकर एक नया आंदोलन छेड दिया । सबसे अहम बात जो सामने निकल कर आई वो ये कि इन और इन जैसे तमाम प्रयासों के साथ जिस तरह का सलूक सरकार और उसके मंत्रियों ने किया या अब भी कर रहे हैं और उससे भी बडी बात कि जिस तरह का घोर उपेक्षित रवैय्या , प्रधानमंत्री , यूपीए अध्यक्षा , और तेज़ तर्रार महासचिव और युवा लोगों में खासे लोकप्रिय माने जाने वाले युवा नेता ने अपना रखा है उससे तो स्थिति और स्पष्ट हो गई है आम जनता के सामने

यह युद्घ पूँजीवाद के ख़िलाफ़ है....


''......हम यह कहना चाहते है की युद्घ छिडा हुआ है और यह युद्घ तब तक चलता रहेगा ,जब तक की शक्तिशालीव्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगेचाहे ऐसे व्यक्तिअंग्रेज पूंजीपति,अंग्रेज शासक या सर्वथा भारतीय ही हो उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर राखी है । यदि शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा तब इस स्तिथि में कोई अन्तर नही पड़ता । यदि आप की सरकार कुछ नेताओं या भारतीय समाज के कुछ मुखियों पर प्रभाव ज़माने में सफल हो जायें ,कुछ सुविधाएं मिल जायें या समझौता हो जायें ,उससे स्तिथि नही बदल सकती। जनता पर इन सब बातो का प्रभाव बहुत कम पड़ता है ।
इस बात की भी हमे चिंता नही है कि एक बार फिर युवको को धोखा दिया गया है और इस बात का भी भय नही है कि हमारे राजनितिक नेता पथभ्रष्ट हो गए है और वे समझौते कि बात चीत में इन निरपराध ,बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गए है जिन्हें क्रन्तिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है। हमारे राजनीतिक नेता उन्हें अपना शत्रु समझते है ,क्योंकि उनके विचार से वे हिंसा में विश्वाश रखते है । उन्होंने बलिवेदी पर अपने पतियों को भेट किया,उन्होंने अपने आप को न्योछावर कर दिया ,परन्तु आप कि सरकार उन्हें विद्रोही समझतीं है । आपके एजेंट भले ही झूठी कहानिया गढ़कर उन्हें बदनाम कर दे और पार्टी की ख्याति को हानि पहुचने का प्रयास करें किंतु यह युद्घ चलता रहेगा। हो सकता है कि यह युद्घ भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण करे । कभी यह युद्घ प्रकट रूप धारण कर ले, कभी गुप्त दिशा में चलता रहे ,कभी भयानक रूप धारण कर ले ,कभी किसान के स्तर पर जारी रहे और कभी यह युद्घ इतना भयानक हो जाए कि जीवन और मरण कि बाजी लग जाए। चाहे कोई भी परिस्तिथि हो,इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा।

देश क्यों बटा?

विचार करने का विषय है कि जो देश हजारों वर्षों तक एक रहा, वह क्यों बटा? इस
प्रशन के विशलेषण करने पर इसे पुन: अखंड किया जा सकता है, इसका मार्ग निकल सकता है.
विशलेषण कि इस प्रक्रिया में एक पुरानी घटना का स्मरण करना अतिआवश्यक है.
१९११ में धर्म के आधार पर हुए बंगाल के विभाजन को अंग्रेजों को समाप्त करना पड़ा. इस
ऐतिहासिक घटनाक्रम के निहितार्थ आज कि परिस्थिति में विचारणीय और दिशादर्शक है,
क्योकि प्रत्येक चिन्तनशील व्यक्ति के मन में यह प्रशन कौंधता रहता है कि जिस देश
कि जनता ने १९०५ में धर्म के आधार पर एक प्रान्त के विभाजन को स्वीकार नहीं किया और
१९११ में वह विभाजन समाप्त करवाया, उस देश के नेताओं ने मात्र ३६ वर्षों के बाद
१९४७ में धर्म के आधार पर देश का विभाजन क्यों स्वीकार किया?
भाषा के प्रति भक्ति मनुष्य का सहज स्वभाव है. मातृभूमि के प्रति भक्तिभाव
प्रेरणा का स्रोत है. इसी भाव के कारन बंकिम चंद चटोपाध्याय ने आनंद मठ में स्वयं
ही 'दुर्गा दशप्रहरण धारिणी, कमला कमल दल विहारिणी, वाणी विद्यादायनी' कहते हुए
मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती के रूप में देखा तो श्री अरविन्द ने अखंड
भारत को अपना आराध्य माना. श्री अरविन्द के पांडिचेरी आश्रम में अखंड भारत का नक्शा
आज भी विधमान है. अखंड भारत का खंडित होना एक दु:स्वप्न के सामान था, क्योंकि
प्रकृति और परमात्मा ने हिमालय और सागर से आवेषटित इस भ-भाग को अखंड ही बनाया है.
अत: इसे तोड़ने का प्रयत्न करते समय अनेक विदेशियों ने भी इसका विरोध किया था. लार्ड
वेवेल ने कहा "गाड हैज क्रियेटेड दिस कंट्री एज वन, यू कुड नाट डीवाइड इट इनटू टू."
ब्रिटिश संसद में बहस करते हुए क्लीमेंट एटली ने कहा "दिस इज ए डीवाइनली डीजाइन्ड
ट्रेगल." अत: भारत का विभाजन एक कृत्रिम विभाजन है. जिसे श्री अरविन्द के शब्दों
में, 'किसी भी प्रकार से समाप्त करना चहिये.'

बनाओ अखंड  भारती .....!

करुण  कहानी विभाजन की, हे वीरों तुम्हे  पुकारती जाग उठो अब - जाग उठो अब, बनाओ अखंड भारती ,
चीख रही थी तब मानवता, पर चिंघाड़  रही  थी  दानवी ,
खून से लथपथ  वे मंजर,कंप-कप़ी आज भी छुडाते हैं ,
स्वतन्त्रता की वेदी  पर,  तब नरमूंडों से हुई थी  आरती!!
-----१-----

पंजाब बटा,बंगाल बटा  , सिंध गया, बलूच गया,
भारत माँ  को काट दिया, बेदर्दी से हत्यारों ने,
रावी की शपथ मौन  थी, अखंडता का वचन गोण   था,
सोच समझ का समय नहीं  , भागो-भागो मची देश  में,
-----२-----
 गैर रहे न बचें , इस शैतानीं  में , पाक में नपाक हेवानीं  थी ,
घरों पर हमले हुए, जिन्दा जलाये , क़त्ल हुए ,
भूखे - प्यासे राहों में भटके, खूब थके और खूब मरे ,
व्यवस्थित कोई बात न थी, अदला - बदली की सोगात न थी,
न राह दिखानेवाला, न कोई बचानेवाला,
गुंडों की गुंडागर्दी ही तब राज बनीं थी, ताज बनीं थी ,
-----३-----

माता बहिनों की मत पूछो, क्या - क्या उन पर जुल्म हुए,
लाज  गई, वेलाज  हुईं, तार तार शर्मसार हुईं ,
 कितनीं थीं वे जो आ पाईं , कितनीं थी वे जो नहीं आ पाईं ,
किसीने भी नहीं उनकी सूधली  , एक तरफ़ा व्यभिचार के मद में ,
हर साँस और सिसकी को ,उस समय चक्र ने घेरा था  ,
बेबस  चीखें, आज भी गूंजती हैं, नीरव श्मसानों  में ,
----------
दर्द था पर राहत नहीं थी, घाव था पर पट्टी नही थी ,
राह थी पर अंत नही था, पथ पर चलते जाना था... ,
कब भारतमाँ का आँचल मिले, हर  सांस इसी में विकल थी ,
कुछ आये,कुछ राह में रह गए,कुछ को चलने दिया नहीं,
वे दृश्य  वे मंजर , वे चीत्कारें , फिरसे दुनिया में न आयें ,
बार बार मानवता यह पुकारती ,
-----५-----
यह भीषण कथानक है , जो सुनाने में नहीं आता है ,
गाँव - गावं ख़तम हुए थे, शहर - शहर वीरान हुए थे ,
सोना चांदी रुपया पैसा, जमीन और जायदादें....,
लूट  सकता था वह सब लूट लिया शैतानों नें  ,
खून से लिखी इबारतें वे , छलकी आखें पढ़ नही पाती हैं ,
-----६-----
कहीं दया का दरिया नही था, ममता कहीं  मिलती नहीं थी ,
सब को अपना माने  ..., वह आंचल वह गिरेवान नहीं थे ,
 एक भारत भूमि  जिसने,सब को सदियों से अपना माना ,
अपना दामन  दिया सभी को , अपनीं गोदी  दी सबको ,
सबको अपनापन दिया , सबको सुख शांती दी ,
पर उसके बेटों को दुत्कार क्यूँ फटकार क्यूँ ...?
हर  मुल्क बने भारत जैसा , यही विश्व  भारती पुकारती |
-----७-----

न फूल चढ़े और न दीप जले, न उनकी कोई कहानीं है,
हे अनाम शहीदों, तुमने खूब लड़ी लडाई  और दी कुर्बानी है ,
नत मस्तक है माँ भारती , गर्व करती माँ भारती ,
नाज तुम पर सदा रहेगा,  तुम हो नव युग कि आरती ,
माफ़ करो हे वीरों , खण्डित हे माँ भारती ..!!
देश आजाद हुआ है लेकिन, अखंडता  लानी है बाक़ी ....  |
-----८-----
फिर कोई राणा प्रताप बनों , या बनों वीर शिवाजी ,
सुभाष , भगत सिंह , चंदशेखर , माता तुमें बुलाती ,
षड्यंत्रों नें हमको मारा , कमजोरी से देश है  हारा ,
आपसी फूट मिटाना होगा, दिल में जनून जगाना होगा ,
बंद  मुट्ठी करके लें द्रढ़ संकल्प, राह बनायेंगे , चाह  बनायेंगे ,
विभाजन को  ख़त्म करेंगे, अखंड भारत फिर बनायेंगे ..!
   -----९----- 

my hunk

Ano-Digital.
muscle look.












हर आदमी का सपना

यही है  हर आदमी का सपना
7 अंकों में तनख़्वाह[ वेतन ]
6 अंकों में बचत
5 बेडरूम का घर
4 पहियों की गाड़ी
3 हफ्ते की छुट्टियाँ
2 प्यारे बच्चे
और ……


1 गूंगी बीवी !

26 जून 2011

भारत, इंडिया या फिर हिंदुस्तान

भारत, इंडिया या फिर हिंदुस्तान, गृह मंत्रालय को नहीं मालूम क्या है हमारे देश का नाम

हमारे देश का नाम क्या है, भारत, इंडिया या फिर हिंदुस्तान। देश के गृह मंत्रालय को भी इसकी जानकारी नहीं है कि आखिर हमारे देश का वास्तविक नाम क्या है। गृह मंत्रालय ने इस बात को एक सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देते हुए स्वयं माना है। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि भारतीय संविधान में किसी राष्ट्रभाषा की कोई जानकारी नहीं है, जबकि संविधान में साफतौर पर लिखा है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है।
आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन रॉय ने गृह मंत्रालय में एक आवेदन देकर, गृह मंत्रालय से इसे स्पष्ट करने को कहा था। लेकिन मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा है कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है।  अंग्रेजी में इसे इंडिया, हिंदी में भारत और उर्दू में हिंदुस्तान कहा जाता है। रॉय ने बताया कि हमारे देश को कई नाम दिए गए हैं लेकिन अधिकृत नाम क्या है, यह जानने के लिए उन्होंने गृह मंत्रालय के पास आरटीआई फाइल की। लेकिन गृह मंत्रालय के जवाब से उन्हें झटका लगा है और अब वे इसे लेकर अदालत जाने का सोच रहे हैं। यदि एक सामान्य नागरिक भी नाम बदलता है तो उसे कानून प्रक्रिया पूरी करना होती है, लेकिन हमारे देश के नाम पर ही असमंजस है और यदि गृह मंत्रालय को भी इसकी जानकारी नहीं है, तो फिर यह गंभीर चिंता का विषय है। इसी आरटीआई में रॉय ने यह जानकारी भी मांगी थी कि हमारे देश की राष्ट्र भाषा क्या है और इसके जवाब में गृह मंत्रालय ने बताया कि संविधान में किसी राष्ट्रभाषा का कोई उल्लेख नहीं है। भारतीय संविधान के आर्टिकल 343 में साफ लिखा है कि हिंदी हमारे देश की राष्ट्रीय भाषा है। संविधान में 14 भाषाओं को मान्यता दी गई थी और बाद में इसमें कुछ और भाषा जोड़ी गईं। अब संविधान में कुल 22 भाषाओं का मान्यता प्राप्त भाषाओं के रूप में उल्लेख है। 

भारत में बनता हुआ इंडिया

भारत में बनता हुआ इंडिया


केन्द्रीय लोक सेवा आयोग ने हाल ही में एक आदेश जारी कर अंग्रेज़ी का एक प्रश्नपत्र अनिवार्य किया है. आयोग का यह आदेश अवश्य भारत सरकार की सहमति से जारी हुआ होगा. आयोग के इस षडयंत्र के खिलाफ कहीं कोई सुगबुगाहट नज़र नहीं आ रही है, जबकि इसके दूरगामी परिणाम बहुत साफ समझ में आ रहे हैं. आयोग का यह आदेश षडयंत्रपूर्ण इसलिये लगता है क्योंकि इसका कोई औचित्य आयोग या भारत सरकार सिद्ध नहीं कर सकती.
upsc
आज़ादी के बाद केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी था ओर इस कारण भारतीय प्रशासनिक सेवा के चयनित लोगों का आम चरित्र भी अंग्रेज़ी प्रशासन जैसा ही था जिसमें बातचीत से लेकर नीति निर्माण ओर क्रियान्वयन की प्रक्रिया में ब्रिटिश ढॉंचे के अनुसार महानगरों - उच्च वर्ग व श्रेष्ठि वर्ग के लोगो की बहुतायत थी. राष्ट्रीय भाषा के बोलने वाले अपने ही राष्ट्र में प्रशासनिक सेवाओं से बाहर धकल दिये गये थे. देश की प्रादेशिक और क्षेत्रीय भाषाओं के उन्ही लोगों को प्रशासनिक सेवाओं में स्थान मिल पा रहे थे जो अंग्रेज़ी परस्त हो चुके थे. जन्म से अंग्रेज़ी बोलने बोलने वाले अफसरशाहों की संतानें, राजा महाराजा जो आमतौर पर आज़ादी के आंदोलन के खिलाफ थे और अंग्रेज परस्त थे के परिजन तथा कुछ ऐसे परिवारों के लोग जिनकी आर्थिक क्षमता ब्रिटेन या बिदेशों में पढ़ने के लिये समर्थ थी, के ही सदस्य पहुंच पाते थे.

भारतीय प्रशासनिक सेवायें केवल उस इंडिया की प्रतिनिधि प्रवक्ता थी, जिनमें भारत के गांव और गरीब का कोई हिस्सा न था और न ही कोई भूमिका थी. परन्तु पिछले कुछ वर्षों में जब से केन्द्रीय लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में परीक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी या ऐच्छिक हुआ था तब से भारत की प्रशासनिक सेवाओं में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी और देश के गांव गरीब किसानों कर्मचारियों और यहां तक कि चाय बेचने वाले छोटे दुकानदारों के बेटों का चयन भी प्रशासनिक सेवाओं में होने लगा था.

विदेशी भाषा की कसौटी योग्यता के चयन के लिये सही मापदण्ड नहीं हो सकता और इसलिये जब अंग्रेज़ी की बाध्यता समाप्त हो गई तब हिन्दी भाषी ओर भारतीय भाषा के यथा मराठी, गुजराती, तेलगू, मलयाली, कन्न्ड़, उड़िया, पंजाबी बौर उर्दू भाषियों के ग्रामीण किसान और मजदूर परिवार के नवयुवकों को भी बड़े पदों पर जाने का अवसर मिलने लगा. पिछले कुछ वर्षों में देश के गरीबों, किसानों के बच्चों ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर अंग्रेज़ी भाषा की कसौटी की बाध्यता न हो तो योग्यता, भारत के राष्ट्रªभाषा और भारतीय भाषाओं के बोलने वाले गांव ओर कस्बों के नौजवानों के पास कहीं ज़्यादा है और इसी को रोकने के लिये भारत सरकार और आयोग में बैठे अंग्रेज़ी के मानसिक गुलामों ने यह षड़यंत्र किया है.

कहने को तो अंग्रेज़ी का अनिवार्य पर्चा केवल 40 अंकों का है परन्तु समूची चयन प्रक्रिया को यह प्रभावित करेगा. यह एक सुविदित तथ्य है कि 2 से 3 प्रतिशत अंको में ही सारे चयनित प्रत्याशी सिमट जाते हैं. प्रतिस्पर्धा इतनी भारी होती है कि दशमलव 1-2 के अंतर में ही अनेकों प्रत्याशी मेरिट लिस्ट में रहते हैं और जब अंग्रेज़ी के प्रश्न पत्र में सीधे 20-20 अंकों का फर्क होगा तब स्वाभाविक है कि राष्ट्रभाषा और असली भारत की योग्यता पीछे कर दी जायेगी.

अगर अंग्रेज़ी के विशेष ज्ञान की आवश्यकता किन्ही पदों के लिये आयोग महसूस करता था तो उन पदों के लिये चयनित विद्यार्थियों को एक दो माह का अंग्रेज़ी के शिक्षण का विशेष कार्यक्रम चलाया जा सकता था परन्तु उद्देश्य तो कुछ और ही है. फिर एक प्रश्न यह भी है कि अगर अंग्रेज़ी का प्रश्न पत्र अनिवार्य कर रहे हैं तो राष्ट्रभाषा हिन्दी का भी एक प्रश्न पत्र अनिवार्य क्यों नहीं किया? अगर विदेशों से संपर्क के लिये अंग्रेज़ी आयोग की नजरों में ज़रुरी है तो यह भी नहीं भूलना चाहिये कि जिस भारत में नौकरी करना है, जिस भारत के पैसों से बड़ी-बड़ी तनख्वाह और सुविधायें मिलनी है, उस भारत से संपर्क व संवाद के लिये हिन्दी उससे कम ज़रुरी नहीं है.

क्या आयोग के और भारत सरकार के यह गौरांगदास महाप्रभु इस बात का भी उत्तर देंगे कि दुनिया तो छोड़ो यूरोप के कितने देश अंग्रेज़ी के पक्षधर हैं? क्या जर्मनी, फ्रांस में कोई अंग्रेज़ी बोलता है? या यूरोप के इन देशों में अंग्रेज़ी बोलना पसंद भी किया जाता है? सच्चाई तो यह है कि यूरोप के अधिकांश देश अंग्रेज़ी बोलने वालों को नफरत की हद तक नापंसद करते हैं तथा उसे अपनी राष्ट्रीयता के विरूद्ध मानते है. अंग्रेज़ी विश्व भाषा नहीं है वरन् वह विश्व व्यापार संगठन, अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष याने दुनिया के आर्थिक साम्राज्यवाद की भाषा है.
दूसरा इस प्रश्न का उत्तर आयोग व सरकार को देना चाहिये कि अगर ब्रिटेन से संर्पक करने के लिये भारतीय नौजवानों को अंग्रेज़ी का विशिष्ट ज्ञान अपरिहार्य है तो क्या ब्रिटेन के नौजवानों के लिये भारत से संपर्क के लिये हिन्दी का विशिष्ट ज्ञान ज़रुरी नहीं है? तब क्या हिन्दी का प्रश्न पत्र ब्रिटिश प्रशासनिक सेवाओं में अनिवार्य नहीं होना चाहिये?

भाषा का संबंध अगर योग्यता से है तो मात्र यही है कि व्यक्ति अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा में अपनी योग्यता को ज़्यादा ठीक ढंग से व्यक्त व सिद्ध कर सकता है. विदेशी भाषा की कसौटी तो योग्य को अयोग्य व अयोग्य को योग्य बनाने का षड़यंत्र होती है.

राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल करने वाले प्रशासनिक अधिकारी अपने देशवासियों की समस्याओं को ज़्यादा बेहतर समझ सकते हैं. तथा उनसे ज़्यादा संवेदनशील होने की अपेक्षा हो सकती है. और प्रशासनिक संवेदनशीलता व सहभागिता के दायरों को ज़्यादा बढ़ा सकते हैं. आज विकास का ढांचा अंग्रेज़ी के ऊंचे पायदानों पर खड़ा होता है और व्यापक अर्थों में राष्ट्र नीचे जमीन पर बिछा रह जाता है. इसीलिये विकास के नाम पर महानगरों के टापू तो बन जाते हैं परन्तु गांव की गलियां उपेक्षित और खाई बनी रह जाती है.

अंग्रेज़ी भारत में साम्राज्यवादी गुलामों के भेदभाव व शोषण की भाषा भी है ओर साथ ही भ्रष्टाचार की भाषा भी. बहुत सारे सामान्य लोग इसलिये शोषित होने को बाध्य हैं कि कानून अंग्रेज़ी में बोलता है. अदालतें अंग्रेज़ी सुनती हैं और न्याय अंग्रेज़ी में होता है. शासन की नीतियां व दफ़्तरों कर पत्रावलियां अंग्रेज़ी में दौड़ती हैं. यह अंग्रेज़ी के भक्त सैकड़ों वर्षों से देश के सामान्य व्यक्तियों के लिये डरावने व लूटने वाले ही लगते हैं. जब तक राष्ट्रभाषा, राज्यभाषा, जनभाषा एक नहीं होती तब तक न तो देश का की योग्यता का सही परीक्षण हो सकता है और न ही सही अर्थो में विकास हो सकता है.

आज़ादी के आंदोलन में महात्मा गांधी ने और आज़ादी के बाद डॉ. राममनोहर लोहिया ने अंग्रेज़ी हटाओ और भारतीय भाषायें लाओ का नारा दिया था. आज़ादी के तत्काल बाद गांधी ने एक संवाददाता को संदेश देते हुए कहा था कि “दुनिया को बता दो, गांधी अंग्रेज़ी भूल गया है.’’ इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि अगर मेरा बस चले तो एक क्षण में अंग्रेज़ी को हटाकर हिन्दी को लागू कर दूं. आज़ादी के बाद डॉ. लोहिया ने अंग्रेज़ी व अंग्रेज़ी मानसिकता को हटाने का जो आंदोलन चलाया था कि उसी का यह परिणाम हुआ कि केन्द्रीय लोकसेवा आयोग में अंग्रेज़ी परीक्षा की अनिर्वायता समाप्त हुई. प्रो.डी.एस. कोठारी को याद करना चाहिये, जिन्होंने अपनी रपट में केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेज़ी को समाप्त करने की सिफारिश की थी.

आज समूचा देश भ्रष्टाचार से पीड़ित और परेशान है और अक्सर अब लोग कहने लगे हैं कि नख से शिख तक याने नीचे से उपर तक भ्रष्टाचार फैल गया है. लोग यह भी कहते हैं कि भ्रष्टाचार का दीमक समूचे राष्ट्रीय जीवन को नष्ट कर रहा है. निःसंदेह इसमें सच्चाई है पर इस सच्चाई के साथ-साथ इसको भी स्वीकारना होगा कि अंग्रेज़ी का भ्रष्टाचार लाखों करोड़ों का है और विदेशी बैंकों में जमा अरबों रुपया काले धन की अर्थव्यवस्था का जनक है. हिन्दी व भारतीय भाषाओं का भ्रष्टाचार पटवारी सिपाही आदि का 100-500 वाला ही है. याने बड़ा भ्रष्टाचार अंग्रेज़ी वाला है. अंग्रेज़ी शैली और अंग्रेज़ी सभ्यता और अंग्रेज़ी के संपर्क आज काले धन की अर्थव्यवस्था की जनक, प्रसारक व संरक्षक और सबसे बड़े उपयोगकर्ता हैं.
क्या यह सत्य नहीं हैं कि अंग्रेज़ी की कोख से जन्मे यह देशी अंग्रेज आधे समय विदेशों में ही रहते हैं. उनके बच्चे विदेशों में पढ़तें हैं तथा अगर लूटने के लिये ज़रुरी ना हो तो ये विदेशों में ही बसना चाहते हैं. यह संबंध केवल भाषा का नहीं वरन् भारत के उपर इंडिया व विदेशी सभ्यता की गुलामी का है. सही अर्थों में यह साम्राज्यवादी मानसिकता से मुक्ति संघर्ष है. हमें केन्द्रीय लोकसेवा आयोग व भारत सरकार को बाध्य करना होगा कि अंग्रेज़ी के अनिवार्य किये गये प्रश्न पत्र को वापिस लें वरना भारत पर इंडिया का राज कायम रहेगा. भारत के बच्चे पटवारी बनेंगे. इंडिया के बच्चे अफसरशाह बनेंगे. भारत के बच्चे उन नीतियों के शिकार होंगे, जो उन्हें ना जिन्दा रहने देगी और न मरने देगी. उनके भीख के कटोरे में राहत के नाम पर कुछ दाने डाल दिये जायेंगे. नीतियों का निर्धारण इंडिया ही करेगा, जो सम्पन्नता के सागर में हिलोरें लेता रहेगा. समता जो अभी दूर का सपना है, शायद सपना भी नहीं रहेगा.