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06 अप्रैल 2013

भारत की विश्व विख्यात धरोहर कोहेनूर हीरा

जिसे अंग्रेज भारत से दूर लंदन ले गए थे, भले ही दुनिया का सबसे अनमोल हीरा क्यों ना हो लेकिन उसके साथ भी एक ऐसा श्राप जुड़ा है जो मौत तो लाता ही है लेकिन पूरी तरह तबाह और बर्बाद करने के बाद ! कोहेनूर : कोह-ए-नूर, का अर्थ है रोशनी का पहाड़, लेकिन इस हीरे की रोशनी ने ना जाने कितने ही साम्राज्यों का पतन कर दिया।वर्तमान आंध्र-प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित एक खदान में से यह बेशकीमती हीरा निकाला गया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों में सबसे पहले इस हीरे का उल्लेख बाबर के द्वारा 'बाबरनामा' में किया गया था। बाबरनामा के अनुसार यह हीरा सबसे पहले सन 1294 में ग्वालियर के एक गुमनाम राजा के पास था लेकिन उस समय इस हीरे का नाम कोहेनूर नहीं था। लगभग 1306 ई. के बाद से ही इस हीरे को पहचान मिली। कोहेनूर हीरा हर उस पुरुष राजा के लिए एक श्राप बना जिसने भी इसे धारण करने या अपने पास रखने की कोशिश भी की। इस हीरे के श्राप को इसी बात से समझा जाता है कि जब यह हीरा अस्तित्व में आया तो इसके साथ इसके श्रापित होने की भी बात सामने आई कि : "इस हीरे को पहनने वाला दुनिया का शासक बन जाएगा, लेकिन इसके साथ ही दुर्भाग्य भी उसके साथ जुड़ जाएगा, केवल ईश्वर और महिलाएँ ही किसी भी तरह के दंड से मुक्त होकर इसे पहन सकती हैं !" कई साम्राज्यों ने इस हीरे को अपने पास रखा लेकिन जिसने भी रखा वह कभी भी खुशहाल नहीं रह पाया। इतिहास से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार 1200-1300 ई. तक इस हीरे को गुलाम साम्राज्य, खिलजी साम्राज्य और लोदी साम्राज्य के पुरुष शासकों ने अपने पास रखा और अपने श्राप की वजह से यह सारे साम्राज्य अल्प कालीन रहे और इनका अंत जंग और हिंसा के साथ हुआ। लेकिन जैसे ही यह हीरा 1323 ई. में काकतीय वंश के पास गया तो 1083 ई. से शासन कर रहा यह साम्राज्य अचानक बुरी तरह ढह गया। काकतीय राजा की हर युद्ध में हार होने लगी, वह अपने विरोधियों से हर क्षेत्र में मात खाने लगे और एक दिन उनके हाथ से शासन चला गया। काकतीय साम्राज्य के पतन के पश्चात यह हीरा 1325 से 1351 ई. तक मोहम्मद बिन तुगलक के पास रहा और 16वीं शताब्दी के मध्य तक यह विभिन्न मुगल सल्तनत के पास रहा और सभी का अंत इतना बुरा हुआ जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। शाहजहां ने इस कोहेनूर हीरे को अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया लेकिन उनका आलीशान और बहुचर्चित शासन उनके बेटे औरंगजेब के हाथ चला गया। उनकी पसंदीदा पत्नी मुमताज का इंतकाल हो गया और उनके बेटे ने उन्हें उनके अपने महल में ही नजरबंद कर दिया। 1605 में एक फ्रांसीसी यात्री, जो हीरों जवाहरातों का पारखी था, भारत आया और उसने कोहेनूर हीरे को दुनिया के सबसे बड़े और बेशकीमती हीरे का दर्जा दिया। 1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर आक्रमण कर दिया। इस तरह मुगल सल्तनत का पतन हो गया और सत्ता फारसी शासक नादिर शाह के हाथ चली गई। 1747 में नादिर शाह का भी कत्ल हो गया और कोहेनूर उसके उत्तराधिकारियों के हाथ में गया लेकिन कोहेनूर के श्राप ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, सभी को सत्ताविहीन कर उन्हीं के अपने ही समुदाय पर एक बोझ बनाकर छोड़ दिया गया। फिर यह हीरा पंजाब के राजा रणजीत सिंह के पास गया और कुछ ही समय राज करने के बाद रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई और उनके बाद उनके उत्तराधिकारी गद्दी हासिल करने में कामयाब नहीं रहे। अन्ततः ब्रिटिश शासन के अधिकार में ले लिया गया और अब उनके खजाने में शामिल हो गया। भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान इसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजराएली ने महारानी विक्टोरिया को तब भेंट किया जब उसे सन 1877 में उन्हें भारत की भी सम्राज्ञी घोषित किया। ब्रिटिश राजघराने को इस हीरे के श्रापित होने जैसी बात समझ में आ गई और उन्होंने यह निर्णय किया कि इसे कोई पुरुष नहीं बल्कि महिला पहनेगी, इसीलिए 1936 में इस हीरे को किंग जॉर्ज षष्टम की पत्नी क्वीन एलिजाबेथ के क्राउन में जड़वा दिया गया और तब से लेकर अब तक यह हीरा ब्रिटिश राजघराने की महिलाओं के ही सिर की शोभा बढ़ा रहा है। कोहिनूर नए रत्नतराशों की सलाह पर इसकी प्रतिरत्न के कटाव में कुछ बदलाव हुए, जिनसे वह और सुंदर प्रतीत होने लगा। 1852 में, विक्टोरिया के पति प्रिंस अल्बर्ट की उपस्थिति में, हीरे को पुनः तराशा गया, जिससे वह 186,16 कैरेट / 186.06 कैरेट (37.2 ग्राम) से घट कर 105.602 कैरेट / 106.6 कैरेट (21.6 ग्राम) का हो गया, किन्तु इसकी आभा में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई। अल्बर्ट ने बुद्धिमता का परिचय देते हुए, अच्छी सलाहों के साथ, इस कार्य में अपना अतीव प्रयास लगाया, साथ ही तत्कालीन 8000 पाउंड भी इसे तराशने में खर्च, जिससे इस रत्न का भार 81 कैरट घट गया, परन्तु अल्बर्ट फिर भी असन्तुष्ट थे। हीरे को मुकुट में अन्य दो हजार हीरों सहित जड़ा गया। फिलहाल इसे भारत वापस लाने को कोशिशें जारी हैं। आजादी के फौरन बाद भारत ने कई बार कोहिनूर पर अपना मालिकाना हक जताया है। महाराजा दिलीप सिंह की बेटी कैथरीन की सन् 1942 मे मृत्यु हो गई थी, जो कोहिनूर के भारतीय दावे के संबध में ठोस दलीलें दे सकती थीं। इस कोहेनूर हीरे की वर्तमान कीमत का अनुमान 150 हजार करोड़ रुपये से अधिक है।

24 मार्च 2012


अफगानिस्तान में तैनात एक शीर्ष अमेरिकी कमांडर ने कहा है कि तालिबान का फिर से सिर उठाना और अफगानिस्तान सरकार को हटा कर सत्ता हथियाना पाकिस्तान के हित में नहीं है और यह बात पाकिस्तान का शीर्ष सैन्य नेतृत्व अच्छी तरह समझता है। अगर तालिबान लौटा तो तो बरबाद हो जाएगा पाकिस्तान...
अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो बलों के कमांडर जनरल जॉन एलेन ने कहा कि मेरा अनुमान है कि पाकिस्तानी सरकार और सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी शायद इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि अफगानिस्तान में फिर से तालिबान का सिर उठाना और अफगान सरकार को हटा कर सत्ता हथियाना किसी भी तरह उनके हित में नहीं है।

पीबीएस न्यूज नेटवर्क के चर्चित चार्ली रोज शो में एक साक्षात्कार में एलेन ने कहा कि तालिबान सरकार ने कभी भी पाकिस्तान के हित पूरे नहीं किए। काबुल में तालिबान फिर से सिर उठा रहा है।

उन्होंने कहा कि यह किसी के हित में नहीं है। अल-कायदा से खुद को अलग करने के लिए तालिबान ने प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर कोई प्रयास नहीं किया है। इससे पता चलता है कि वह केवल अफगान लोगों या अफगान सरकार के लिए ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक गंभीर खतरा बना हुआ है।

एलेन ने कहा कि संघीय प्रशासित कबायली इलाकों में अलकायदा की सुरक्षित पनाहगाहों से आने वाले कुछ समय में दिक्कतें होंगी। उन्होंने कहा कि इन पनाहगाहों को समाप्त करने के लिए अमेरिका पाकिस्तान से और कदम उठाने को कह रहा है। (भाषा) 

22 अक्टूबर 2011

रहिये तैयार कैन्सर से लड़ने के लिये



जी‌ हां, हमेशा, क्योंकि कैन्सर कोई इन्फ़ैक्शन से तो शायद ही होता हो.. यह तो कोशिकाओं का गुण है कि वे सख्या में बढ़ोत्तरी करती रहें ताकि हम बढ़ते रहें , हमारी मृत कोशिकाओं की क्षतिपूर्ति होती रहे । बस बात कोशिकाओं की बढ़त पर नियंत्रण की है और स्वस्थ्य कोशिकाएं आवश्यकता पूरी करने पर अपनी‌ बढ़त रोक देती हैं। जिस तरह मानव का स्वभाव है गलती करना उत्नी तो नहीं किन्तु यह कोशिकाएं भी करोड़ों में एकाध बार गलती कर देती हैं और अपनी बढ़त करती‌ जाती हैं। यही मौका है जब हमारा प्रतिरोधी तंत्र इनसे लड़ाई करता है, और यदि स्वस्थ्य रहा तो जीत जाता है।
बात प्रतिरोधी तंत्र के सशक्त होने की है। तम्बाकू शराब जं‌क फ़ूड या ड्रिंक, दूषित वातावरण, जल तथा आहार भी प्रतिरोधी तंत्र को दुर्बल करते हैं और बादाम, अखरोट, अंगूर, पपीता, अनार, नारंगी, केला, अमरूद आदि फ़ल, तथा हमारे मसाले, विशेषकर हलदी, मिर्च तथा शिमला मिर्च और अन्य सब्जियां प्रतिरोधी तंत्र को सशक्त करते हैं।
और शारीरिक व्यायाम भी हमेशा की तरह हमें रोगों से तथा कैन्सर से लड़ने की शक्ति देता है।
तो बस हमेशा रहिये तैयार कैन्सर से लड़ने के लिये ।

16 अक्टूबर 2011

Introducing the New Gifs: Soccer Throw Headshot

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Introducing the New Gifs: Spank Prank

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19 अगस्त 2011

नक्सलवाद भी एक फ़ोड़ा


नक्सलवाद भी एक फ़ोड़ा है को नासूर बन गया है।आज रात फ़िर छुटटी पर जा रहे 9 जवानों को लगभग डेढ सौ नक्सलियों ने घेर कर मौत के घाट उतार डाला।औपचरिकता के लिये मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के घर आला अफ़सरों की बैठक हो गई है। उन नौ जवानों के घर में आये आंसूओं के सैलाब को कौन थामेगा?क्या स्वामी जी को भ्रष्टाचार के आंदोलन से फ़ुरसत मिलेगी?वे नक्सलियों को कह पायेंगे कि निर्दोष जवानो का खून बहाना बंद करें।

18 अगस्त 2011

ANNA


जज्बात


अपने जज्बात को,
नाहक ही सजा देती हूँ...होते ही शाम,
चरागों को बुझा देती हूँ...
जब राहत का,
मिलता ना बहाना कोई...लिखती हूँ हथेली पे नाम तेरा,
लिख के मिटा देती हूँ......................

ई मीडिया को लेकर अक्सर ये सवाल उठते रहे हैं कि वो अपने दायित्व को ठीक से निभा नही रहा हैं,लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन को आज जन आंदोलन बनाने का किया हैं तो उसमें ई मीडया ने महती भूमिका निभाई है। ई मीडिया के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ हैं कि जब २४ घंटे तक कोई खबर के लिए बुलेटिन निकला हो और जिसका लाइव होता रहा। वास्तव में एक बार फिर से मीडिया अपनी ताकत का एहसास करा दिया हैं। जिस तरह से देश को आजादी दिलाने में पूर्व में अखबरो नें अपनी भूमिका निर्वहन किया था ठीक आज उसी तरह देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने में ई मीडिया अपनी भूमिका अदा कर रहा हैं। यह सत्य हैं कि आज भ्रष्टाचार हर कही और इससे मीडिया भी अछूता नहीं है बावजुद इसके जब मीडिया को एक मीडिया याने माध्यम या कहिए एक मंच अन्ना हजारे के रुप में मिला हैं तो उसनें भी इस मूहिम को अंजाम तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा हैं। यही मीडिया का सत्य हैं। जय अन्ना, जय मीडिया ।

08 अगस्त 2011

हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी



न भोगी हू न जोगी हूँ , मै निष्पाप कहानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ
मै ज्ञान नहीं मै ध्यान नहीं, अरमान नहीं भगवान् नहीं,
मत देख तू मुझको ऐसे प्यारे मै मजदूर के माथे वाला पानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ
हे मनु तू कितना निर्दयी तुने ये क्या भेद बनाया है,
हिन्दू में क्या रखा, जो मुस्लिम ने ना पाया है,
क्यों कहता इंसा इंसा से तू हिन्दुस्तानी मै पाकिस्तानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ
खून बहा जाने कितनो का इस अनचाहे बटवारे से
आसमान जैसे बिछड़ा कोई अपने प्यारे  तारे से
न शर्मा हू न वर्मा हू, मै शास्वत रूप से कर्मा हूँ
खान ना कहना मुझको प्यारे मै खान नहीं खानदानी हूँ
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ…..
मत कह तू मुझको हिन्दू प्यारे मै हिन्दू से पहले हिन्दुस्तानी हूँ……

जब गिलास बोला……


मै एक गिलास हूँ
हर पथिक की प्यास हूँ
न मुसलमान हूँ  ना इसाई हूँ
न हिन्दू हूँ न कसाई हूँ
मै धर्म नहीं देखता, मै कर्म नहीं देखता
मै तो अपने कर्मो का घड़ा भरता हूँ,
और निस्वार्थ भाव से आपकी सेवा करता हूँ
वो मियाँ अभी अभी मस्जिद से आये है
कुछ पावन लब्ज कुरान के अधरों पर छाए है
वह जिन्दगी जी रहे है,
मजे से जल पी रहे है
उनके अधरों को छू कर मेरे वारे न्यारे
वे गए पंडित काशीनाथ पधारे
क्या पावन एहसास मिला  है
एक पंडित का साथ मिला है
सूखे गले को तरण कर रहे है
वे भी जल ग्रहण कर रहे है
दोनों को जल पिला दिया
दोनों अधरों को मिला दिया
पर क्या सच में मिले है
शायद कुछ बैर पले है
पर क्यों ?
जब एक राह पर चल सकते है,
एक समान पल सकते है
एक समान बोलते है
एक समान सोचते है
एक से विचार है
एक सा आचार है
एक सा व्यवहार है
एक सा ही ज्ञान है
इससे भी बढ़कर दोनों इंसान है
मै निर्जीव हूँ, पर विचार से सजीव हूँ
जब मै हिन्दू  मुस्लिम में भेद नहीं करता,
समजल  देता हूँ कोई खेद नहीं करता
तो आप तो बुद्दिमान है, ज्ञानवान है,
उससे भी बढकर आप दोनों इंसान है
आज से सीख डालो,
अपने मन में प्रीत पालो
आप दोनों भाईचारे की शोभा है, आभा है
दोनों ही  धर्मा है, दोनों ही  कर्मा है
आप दोनों ही  गीता है, दोनों ही कुरान है
उससे भी बढकर आप दोनों इंसान है
उससे भी बढकर आप दोनों इंसान है ………..

06 अगस्त 2011

वफ़ा की राह में देखें , हमारा क्या ठिकाना है !!

दिया लेकर, भरी बरसात में, उस पार जाना है !
उधर पानी, इधर है आग, दोनों से निभाना है !!
करो कुछ बात गीली सी , ग़ज़ल छेड़ो पढो कविता !
किसी को याद करने का , बहुत अच्छा बहाना है !!
मेरा आईना भी मेरी, बहुत तारीफ करता है !
मुझे लगता है सोने से, इसे भी मुंह मढाना है !!
मुहब्बत की डगर सीधी , मगर दस्तूर उलटे है !
अगर चाहो इसे पाना ,तो फिर जी भर लुटाना है !!
ये मंज़र प्यार में तुमने , अभी देखे कहाँ होंगे !
 लिपटना है घटा से , प्यास, शबनम से बुझाना है !!
मुखौटे तोड़ने भी हैं , भरम जिंदा भी रखना है !
यहाँ पर कुफ्र है पीना , औ, लाजिम डगमगाना है !
ये आंसू भी तो स्वाँती, बूँद से कुछ कम नहीं मेरे !
संवर जाये तो मोती है , बिखर जाये फ़साना है !!
मेरी बेचारगी को माफ़ करना ऐ जहाँ वालो !
ये किस्सा है हसीनों का , मशीनों को सुनाना है !!
अभी तक तो नहीं पाई , किसी ने भी यहाँ मंजिल !
वफ़ा की राह में देखें , हमारा क्या ठिकाना है !!

झूठा प्रदर्शन मत करो वरना


किसी नगर में एक जमीदार का लड़का था , उसे पढ़ना-लिखना बहुत पसंद था | उसके पास दुनिया भर की किताबे भरी थी , उसको आपने ज्ञानी होने पर बहुत घमंड था और वो लोगो को चेलेंग भी करता रहता था | एक बार उसको किसी ने बताया की तुम्हारा ज्ञान अधुरा है , जब तक तुम स्वामी जी से ज्ञान ना लो ....... वो ऐसा सुनके स्वामी जी के पास ज्ञान लेने आ गया स्वामी जी उसके ज्ञान से प्रभावित हो गये उन्होंने कहा तुम को सब पता है ... मै तुम को कुछ नहीं दे सकता..... | वो दुखी हो गया ... ये देखकर स्वामी जी ने उसे 7 किताबे दे... दी... जिसे लेकर वो ख़ुशी -ख़ुशी घर आने लगा रस्ते में एक नदी थी जिसके पुल को पार करते वक़्त अचानक उसकी किताबे नदी में गिर गयी और वो जोर - जोर से चिल्लाकर रोने लगा... उसके आवाज सुनके एक गिलहरी आई उसने पूछा क्या हुआ ??... लड़का आश्चर्यचकित हो गया.. फिर भी उसने कहा मेरी किताबे नदी में गिर गयी... गिलहरी ने चिड़िया को आवाजमारी क्या तुमको इसकी किताबे दिख रही है...?? चिड़िया बोली नहीं.. मगरमछ से पुचो.. मगरमछ ने बताया .... लड़के तुम्हारी किताब ख़राब हो गई है... तुम नयी किताबे ले आओ | ये सुनते ही लड़का किताबो के लिए स्वामी जी के पास दौडा... जब स्वामी जी को उसने पूरी घटना बताई ... तो स्वामी जी हंसने लगे और कहा तुम पागल हो गये हो ... लड़के को क्रोध आ गया उसने जोर से कहा... मै सच बोल रहा हूँ... तब स्वामी जी ने कहा अगर ये सच है, तो तुम से बड़ा ज्ञानी कोई नहीं पर ये ज्ञान सभी के सामने नहीं दिखाना वरना लोग तुमको पागल कहेगे.... फिर उन्होंने बताया की तुम्हारे चारो तरफ ज्ञान ही ज्ञान है ... जितना तुम जानो उतना कम है , इसलिए जो भी है उसको बढ़ाते जाओ झूठा प्रदर्शन मत करो वरना लोग तुम को पागल कहेगे....

02 अगस्त 2011

आँखे नम हो जाती है

  हिंदुस्तान के कई वीरो ने अपनी धरती माँ की सेवा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी ,उन के बारे में जब भी चिंतन किया जाता है तो आँखे नम हो जाती है , इन वीरो को ये नहीं पता था की जिस देश के लिए हम जान दे रहे है उस देश में नेता के नाम पर चोर भर जायेंगे , उन शहीदों की आत्मा आज भी इस देश को देख कर तडपती होगी ,सोचता होगा भगत सिंह की किन लोगो के लिए मैंने अपने प्राण गवा दिए जिन को आपस में लड़ने से फुर्सत नहीं है वो देश का भला क्या करेंगे ,जो अपना घर भरने में लगे हो वो देश की चिंता क्यों करेंगे ,
सहादत अनमोल है इसका मोल मत लगाइए 
शहीदों की अमर गाथा को कमजोर मत बनाइये 
हमने नहीं माँगा कोई मोल सहादत का 
सहादत को इस दुनिया में मखोल मत बनाइये  
जय हिंद .............


उन्हें यह फ़िक्र है हरदम नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है

हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें,चर्ख से क्यों ग़िला करें

सारा जहाँ अदू सही,आओ! मुक़ाबला करें
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
 
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, माय रँग दे बसन्ती 
 
चोला।।

20 जुलाई 2011

nothing


क्या सचमुच सर्कस है जीवन....? ( शो तीन घंटे का ...पजल घंटा बचपन है दूसरा जवानी है और तीसरा बुडापा है..?)
Ravi Gurbaxani 19 जुलाई 18:46
क्या सचमुच सर्कस है जीवन....? ( शो तीन घंटे का ...पजल घंटा बचपन है दूसरा जवानी है और तीसरा बुडापा है..?)

15 जुलाई 2011

सुधारों के बहानें .....!?


 इन नीतियों ,सुधारों के अंतर्गत देश की केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे देश -प्रदेश के संसाधनों को , सावर्जनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को इन विशालकाय कम्पनियों को सौपती जा रही है |कृषि भूमि का भी अधिकाधिक अधिग्रहण कर वे उसे कम्पनियों को सेज टाउनशिप आदि के निर्माण के नाम पर सौपती आ रही हैं | उन्ही के हिदायतों सुझाव के अनुसार 6 से 8 लेन की सडको के निर्माण के लिए भी सरकारे भूमि का अधिग्रहण बढाती जा रही है | यह सब राष्ट्र के आधुनिक एवं तीव्र विकास के नाम पर किया जा रहा है | सरकारों द्वारा भूमि अधिग्रहण पहले भी किया जाता रहा है |पर वह अंधाधुंध अधिग्रहण से भिन्न था | वह मुख्यत: सावर्जनिक उद्देश्यों कार्यो के लिए किया जाने वाला अधिग्रहण था |जबकि वर्मान दौर का अधिग्रहण धनाड्य कम्पनियों , डेवलपरो , बिल्डरों आदि के निजी लाभ की आवश्यकताओ के अनुसार किया जा रहा है |उसके लिए गावो को ग्रामवासियों को उजाड़ा जा रहा है |कृषि उत्पादन के क्षेत्र को तेज़ी से घटाया जा रहा है |थोड़े से धनाड्य हिस्से के निजी स्वार्थ के लिए व्यापक ग्रामवासियों की , किसानो का तथा अधिकाधिक खाद्यान्न उत्पादन की सार्वजनिक हित की उपेक्षा की जा रही है |उसे काटा घटाया जा रहा है| कोई समझ सकता है की , निजी वादी , वैश्वीकरण नीतियों सुधारो को लागू करते हुए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया रुकने या कम होने वाली नही है |इसलिए कानूनों में सुधारों बदलाव का हो हल्ला मचाकर किसानो ग्रामवासियों और अन्य जनसाधरण लोगो को फंसाया व भरमाया जा सकता है , पर उनकी भूमि का अधिग्रहण रुकने वाला नही है| अत: अब निजी हितो स्वार्थो में किये जा रहे कृषि भूमि अधिग्रहण के विरोध के साथ -साथ देश में लागू होते रहे , वैश्वीकरण नीतियों ,सुधारों के विरोध में किसानो एवं अन्य ग्राम वासियों को ही खड़ा हो ना होगा| इसके लिए उनको संगठित रूप में आना होगा |

भूमि - अधिग्रहण कानून के संशोधन में आखिर अडचन कंहा हैं ?



अधिग्रहीत जमीनों का मालिकाना ले रही कम्पनियों के मुँह से ही उनकी अडचन सुन लीजिए
 कृषि भूमि अधिग्रहण को लेकर उठते विवादों ,संघर्षो का एक प्रमुख कारण ,मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून में बताया जाता रहा है |इस कानून को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा 1894 में बनाया व लागू किया गया था| भूमि अधिग्रहण के झगड़ो -विवादों को हल करने के लिए इसी कानून को सुधार कर नया कानून बनाने की बात की जा रही है| इस सन्दर्भ में पहली बात तो यह है कि 1894 के कानून में सुधार का कई वर्षो से शोर मच रहा है ,इसके बावजूद सुधार नही हो पा रहा है तो क्यों ? आखिर अडचन कंहा हैं ? 2007 से ही इस कानून को सुधारने ,बदलने का मसौदा बनता रहा है| उसके बारे में चर्चाये भी होती रही है|
उदाहरण स्वरूप .............................

इस सुधार की यह चर्चा आती रही हैं कि, सेज ,टाउनशिप आदि के लिए आवश्यक जमीनों के 70 % से लेकर 90 % तक के हिस्सों को कम्पनियों को किसानो से सीधे खरीद लेना चाहिए| उसमे सरकार भूमिका नही निभायेगी| बाकी 30 % या 10 % को सरकार अधिग्रहण के जरिये उन्हें मुहैया करा देगी| हालांकि अरबपति-खरबपति कम्पनियों को ,किसानो की जमीन खरीदकर उसका मालिकाना अधिकार लेना या पाना कंही से उचित नही हैं| क्योंकि कृषि भूमि का मामला किसानो व अन्य ग्रामवासियों की जीविका से जीवन से जुड़ा मामला है राष्ट्र की खाद्यान्न सुरक्षा से जुदा मामला हैं |इस सन्दर्भ में यह दिलचस्प बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि सरकारों ने हरिजनों कि जमीन को बड़ी व मध्यम जातियों द्वारा खरीदने पर रोक लगाई हुई हैं| वह भी इस लिए कि बड़ी जातिया उन्हें खरीद कर हरिजनों को पुन: साधनहीन बना देंगी| जो बात हरिजनों के अधिकार क़ी सुरक्षा के रूप में सरकार स्वयं कहती हैं ,उसे वह सभी किसानो क़ी जीविका क़ी सुरक्षा के रूप में कैसे नकार सकती है ? उसे खरीदने क़ी छूट विशालकाय कम्पनियों को कैसे दे सकती हैं ? दूसरी बात जब सरकार ने ऐसे सुधार का मन बना लिया था तो ,उसमे अडचन कंहा से आ गयी ? क्या उसमे किसानो ने या राजनितिक पार्टियों ने अडचन डाल दी ? नही| उसमे प्रमुख अडचन अधिग्रहण के लिए लालायित कम्पनियों ने डाली है |इसकी पुष्टि आप उन्ही के ब्यान से कर लीजिये |18 मई के दैनिक जागरण में देश के सबसे बड़े उद्योगों के संगठन सी0 आई0 आई0 ने कहा कि" कारपोरेट जगत अपने बूते भूमि अधिग्रहण नही कर सकता | यह उन पर अतिरिक्त दबाव डाल देगा |... कम्पनियों द्वारा 90 % अधिग्रहण न हो पाने पर पूरी योजना पर सवालिया निशान लग जाएगा |इससे न सिर्फ औधोगिक कारण ही बल्कि आर्थिक विकास दरप्रभावित होगा | सुन लीजिये ! ए वही कारपोरेट घराने है ,जो सार्वजनिक कार्यो के प्रति ,खेती -किसानी के प्रति ,सरकारी शिक्षा ,सिचाई के इंतजाम के प्रति ,सरकारी चिकित्सा आदि के प्रति सरकार कि भूमिकाओं को काटने ,घटाने कि हिदायत देते रहे है और सरकार उन्हें मानती भी रही है |जनसाधारण के हितो के लिए आवश्यक कामो से अपना हाथ भी खिचती रही है |लेकिन अब वही कारपोरेट घराने स्वयं आगे बढ़ कर जमीन का सौदा करने को भी तौयार नही है |वे चाहते है कि सरकार अपने शासकीय व कानूनी अधिकार से किसानो को दबाकर जमीन अधिग्रहण कर दे ताकि वह उसे कम से कम रेट पर प्राप्त कर उसका स्वछ्न्दता पूर्वक उपयोग , उपभोग करे |सरकारे और राजनितिक पार्टिया ,राष्ट्र के आर्थिक विकास के नाम पर कारपोरेट घराने के इस व एनी सुझाव को आडा- तिरछा करके मान भी लेंगे |कानून में सुधार भी हो जाएगा और कम्पनी हित में अधिग्रहण चलता भी रहेगा |
कयोंकि यह मामला कानून का है ही नही |बल्कि उन नीतियों सुधारों का है ,जिसके अंतर्गत पुराने भूमि अधिग्रहण के कानून को हटाकर या संशोधित कर नया कानून लागू किया जाना है |सभी जानते है की पिछले २० सालो से लागू की जा रही उदारीकरण विश्विक्र्ण तथा निजीकरण नीतियों सुधारों के तहत देश दुनिया की धनाड्य औधिगिक वणिज्य एवं वित्तीय कम्पनियों को खुली छुट दी जा रही है |

13 के तिलिस्‍म में जल रहा है भारत


देश में हुए कई बड़े धमाकों के लिये आतंकियों ने महिने के 13 और 26 तारीख को चुना है। 26 भी 13 की पूर्ण योगफल है। बुधवार को मुबई में सिलसिलेवार बम धमके भी 13 तारीख को ही किये गये। तो आईए 13 तारीख को हुए आतंकी हमलों पर एक नजर डालते हैं।

13 दिसम्‍बर 2001-  देश के संसद पर आतंकी हमला, 12 लोगों की मौत
26 मई 2007-       गोवाहटी में बम विस्‍फोट, 6 लोगों की मौत
13 मई 2008-      जयपुर में बम धमाका, 68 लोगों की मौत
26 जुलाई 2008-   अहमदाबाद में सिलसिलेवार बम धमाकों में 57 लोगों की मौत
13 सितम्‍बर 2008- दिल्‍ली में हुए सीरियल बम धमाकों में 26 लोगों की मौत
26 नवम्‍बर 2008-  मुंबई आतंकी हमले में 166 लोगों की मौत
13 फरवरी 2010-   पूणे में हुए बम ब्‍लास्‍ट में 17 लोगों की मौत
13 दिसम्‍बर 2004- असम के विधानसभा के बाहर धमाके में 2 लोगों की मौत

मैं पत्थर हूँ

मैं पत्थर हूँ मुझे जीना नहीं भगवान सा बनकर ।
मुझे रहना नहीं खुद में कोई मेहमान सा बनकर ।

कोई जीता यां हारा ख़ाक मेरी ही उडी हर पल ,
जीआ मैं ज़िन्दगी को जंग का मैदान सा बनकर ।

मेरी हर सोच में रहता है यह बाज़ार दुनिया का ,
मैं अप्पने घर पड़ा रहता हूँ बस सामान सा बनकर ।